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  <title>Hindi Blogs</title>
  <updated>2008-10-09T11:29:43Z</updated>
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    <name>Amit Chakradeo</name>
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    <title>जलेबी-फाफड़ा</title>
    <summary>एक अलिखित कानून है की दशहरे के दिन नाश्ता हो तो मात्र फाफड़ा जलेबी इसलिए रात बारह बजे से बिक्री चालू है और फिर भी आपका नम्बर दो घंटे से पहले आने से रहा.</summary>
    <updated>2008-10-09T11:28:39Z</updated>
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      <subtitle>संजय बेंगाणी द्वारा कम शब्दों में खरी-खरी बात</subtitle>
      <title>जोगलिखी</title>
      <updated>2008-10-09T11:28:39Z</updated>
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    <title>देशों का एल्फाबेट सोंग</title>
    <summary>ये है Nations of the World, आपने Alphabet Song तो सुना ही होगा लेकिन इस दुनिया के लगभग सभी देशों के नाम अगर उसी अंदाज में कहे जायें या मुझे कहना चाहिये गाये जायें तो और वो भी 1 मिनट 47 सेंकड में। इस Alphabet Song को बनाने वालों ने काफी दिमाग लगाया है इसे [...]</summary>
    <updated>2008-10-09T11:28:39Z</updated>
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        <name>Nithalla Chintan: à¤¨à¤¿à¤ à¤²à¥à¤²à¤¾ à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¤à¤¨ à¤à¤ à¤à¤à¥à¤°à¥à¤¶ à¤¹à¥ à¤µà¤¿à¤à¤¾à¤°à¥à¤ à¤à¥ à¤à¤à¤§à¥ à¤à¤¾, à¤à¤ à¤¦à¥à¤µà¤à¤¦ à¤¹à¥ à¤¸à¤ à¤à¤° à¤à¥à¤  à¤à¤¾, à¤à¤ à¤­à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ à¤¹à¥ à¤ªà¥à¤¯à¤¾à¤°</name>
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      <subtitle>निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारौं की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की॥</subtitle>
      <title>Nithalla Chintan</title>
      <updated>2008-10-09T11:28:39Z</updated>
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    <title>अनुज खरे का व्यंग्य : ये है हमारी देशभक्ति डॉट कॉम</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><p/>  <h2>व्यंग्य</h2>  <h2>ये है हमारी देशभक्त डॉट कॉम</h2>  <p> </p>  <h2><font color="#ff0080">--- अनुज खरे</font></h2>  <p> </p>  <p>हाल ही में विदेश से लौटा हूं। स्तब्धनुमा खुमारी में उत्साहित हूं। अभी फिजूल की बातें सुनने का टाइम नहीं है। अच्छा भाई साहब एक बात तो बताइए कि क्या आप भी कभी विदेश गए हैं? नाराज मत होइए, गए होंगे। ऐसा है कि मैं तो पहली ही बार गया था, इसलिए तो ज्यादा ही उत्साहित हूं। इसलिए पूछ डाला। खैर, आप भी इसी तरह से उत्साहित होंगे, जब पहली बार वहां से लौटे होंगे। स्तब्धनुमा खुमारी का तो ऐसा है कि वहां का डिस्प्लिन, जज्बात, देशभक्त आदि-आदि देखकर मेरे पेट में मरोड़ उठने लगे, आंखें तक भर-भर आईं। कसम से क्या गजब की देशभक्त होते हैं। आप ने देखे तो होंगे ही वहां, सच्ची बोलिओ गए थे कि नहीं? वो क्या है कि हम भी आम देशवासियों टाइप किसी के अब्राड आदि जाने की बात पर आसानी से कम ही यकीन करते हैं। नहीं आप बोल रहे हो तो गए तो होगे ही। यार क्या सडकें हैं... क्या बिल्डिंगें हैं.... कितनी प्यारी-प्यारी कारें हैं.... कितने सुंदर-सुंदर तो लोग हैं...गंदगी का कहीं नामोनिशान नहीं। सड़कों पर कचरा कहीं मिलता तक नहीं। देश को साफ सुथरा रखने के प्रति कितने कांशस रहते हैं विदेशी सोच-सोच के ही मुझे तो चक्कर आने लगते हैं। </p>  <p> </p>  <p>कुछ तो इतने सफाई प्रेमी रहते हैं कि गंदगी करने से पहले ही उसे साफ करने की जुगत में चिंतित रहते हैं। यकीन नहीं आ रहा होगा, आएगा भी कैसे कभी गए हो..... मान लिया गए होगे। एक बार मैंने एक अंग्रेज को डस्टबिन के पास खड़े देखा, काफी देर तक जब वो वहां से नहीं हिला तो मैंने पूछा कि भाई साहब क्या बात है। उसने जो कहा उसे सुनकर अपना देश होता तो कोई उसे डस्टबिन में ही डालकर केरोसिन छिड़क देता। कह रहा था कि उसका दोस्त अभी कुछ केले लेकर आने वाला है इसी कारण वह यहां खड़ा है ताकि खाकर छिलके डस्टबिन में फेंक सके। क्यों? ताकि सड़क पर कहीं गंदगी न रहे। फुरसतिया कहीं का। आप करेंगे ऐसा? क्या कहा-हां करेंगे... आपकी इतनी मजाल... अपने देश को लजाओगे क्या? ... आप कम से कम भारतवासी तो नहीं हो सकते। मैं मान ही नहीं सकता। क्या कोई अपने देशवासी भाई को ऐसा ‘गंदा’ जवाब देता है भला?</p>  <p> </p>  <p>अच्छा एक किस्सा सुनो- एक बार एक किसी मोहल्ले में सफाई करता दिखा। मालूमात करने पर पता चला कि वह तो बिचारे किसी कंपनी के सीनियर ऑफिसर हैं। जब कभी टाइम मिलता है तो मोहल्ले की सफाई में जुट जाते हैं। ताकि कचरे का ढेर न लग जाए। अब लो ऐसे-ऐसे सनकी भरे पड़े हैं विदेश में कि पूछो मत। हम क्या इतने फोकट हैं कि ऑफिस जाना छोड़कर ऐसे निकृष्ट से कामों में भिड़े रहें। वहां भले ही काम न हो लेकिन कार्यालयीन समय का ऐसा घोर अपव्यय कदापि नहीं करेंगे। एक सुबह से पूरी स्ट्रीट के लोगों को एक नाली की सफाई में लिप्त पाया। कैसे ठरकी मोहल्ला है, मैंने तत्काल सोच लिया था कि यहां अपने दोस्त के घर रहना ही नहीं है। ऐसी फालतू की चीजें देख-देखकर आदतें खराब होने का डर था भाई। इसलिए मैं वहां से खिसक लिया था। अरे, हमारी वो बजबजाती नालियों की बात ही कुछ और है, विदेशियों ने देखी ही नहीं हैं वे शानदार नाले-नालियां। क्या तो गंदगी- राष्ट्रीय एकता के जीवंत स्मारक हैं जीवंत स्मारक। सौहार्द से सराबोर। समरसता से ओतप्रोत। विशाल खुली बांहें जो चाहे आसरा ले ले। क्या तो जानवर, क्या तो शराबी,क्या तो सन्यासी। सब का समान भाव से स्वागत। ऐसा उत्साह। इतनी उद्दात भावना। ठेठ गांव से धुर शहरों तक। महक का आलम ये कि 50-50 कोस तक ख्याति की लहरें पहुंचे। नाक पर चाहे कितना भी रूमाल लगा लो सब बेअसर। खुले आम सुबह की कुछ मुर्गेनुमा बैठकर की जाने वाली क्रियाओं के लिए भी सर्वथा अनुकूल। कहीं होती है इतनी सस्ती भोर संगोष्ठी, बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल इसी संगोष्ठी से निकला है। हालांकि ये बात इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है लेकिन आम आदमी से पूछकर देख लो, बता देगा। </p>  <p> </p>  <p>और ये यहां विरासत के ऐसे प्रतिमानों को नष्ट करने पर तुले हैं, कृतघ्न कहीं के। इनके यहां होती नहीं हैं ये चीजें तो हमारे यहां कि ऐसी चीजों को लेकर नाक-भ सिकोड़ते फिरते हैं। देश गंदा है। ‘है तो है, तुम कर लो।’ बस दूसरे देशों की गंदगी में ही दिलचस्पी, वहां का कूड़ा ही दिखता है इन्हें, गर्दे पर ही नजर रहती है। मुझे नहीं जमते भइया ऐसे लोग। तभी तो नाली को साफ करते देखकर मेरा तो खून खौल गया। बस चलता तो सालों को वहीं नाली में ही ढकेल देता। विदेश का मामला था अपन ने भी सोचा दोस्त किसी लफड़े में पड जाएगा। नहीं तो सच्ची में ढकेल ही देता फिर कोई कुछ भी कर लेता, नौटंकी अपन को बर्दाश्त ही नहीं। लेकिन एक बात तो है काम ईमानदारी से करते हैं पट्ठे, साले सारे के सारे जुट जाते हैं। ज्यादा न-नुकर नहीं करते। हमारे यहां तो ऐसे कामों के लिए एक को खोजने जाओ तो सारा दिन मनाते रहो फिर इकट्ठे भी हों तो आपस में ही इतनी किच-किच कि इससे तो अच्छा साली नाली ही गंदी पड़ी रहे। सो पड़ी ही रहती है। हालांकि इसके पीछे हमारा स्वाभाविक धरोहरों को संजोने का प्रेम है, और नहीं तो क्या? तभी तो हमने वर्षों की मेहनत से इन नाले-नालियों में इतिहास-पुरातत्व की कई लेयर जमा कर ली हैं। </p>  <p> </p>  <p>कभी सदियों में खुदाई हो तो आश्चर्य नहीं कि को छोटी-मोटी सभ्यता इन्हीं के किनारे निकल आए। नालीघाट जैसी महान धरोहर को संजो कर रखने वाली विकसित सभ्यता। खैर, मैं बात कर रहा था कि विदेश में ऐसा नहीं होता। एक बार कुछ लोग दिखे एक जगह मूर्ति बने खडे थे, टस से मस नहीं हो रहे थे। पास गया तो पता चला राष्ट्रगान बज रहा था। सब वहीं पर जमे हुए थे सीना ताने-सिर ऊपर उठाए। अब लो बताओ कैसे लोग हैं सांस तो ले लो भइया कहीं शहीद ही ना हो जाओ। ऐसे दिखावे के चक्कर में। हमें देखो ऐसे चक्करों में बिलकुल नहीं पड़ते। राष्ट्रगीत बजे या गान पड़े हैं तो पड़े हैं। काहै का दिखावा दिल में है तो देशभक्त का सैलाब। जब कहोगे रेडीमेड निकाल कर दिखा देंगे। क्या खड़े होने भर से साबित हो जाएगी देशभक्त। इन विदेशियों के तरीके इन्हीं मामलों में तो खिसकेले हैं, सारा जोर दिखावे में दिल से कुछ नहीं, भावनाएं भाड़ में जाएं, दिखावा होना चाहिए। करते रहो दिखावा। मैं तो सालों को बस के आगे धकेल देता। काफी लोग थे तो इसलिए तो बस रहने ही दिया।</p>  <p> </p>  <p>फिर एक दिन टीवी देख रहा था। कहीं बाहर का कोई नेता इनके पार्लियामेंट में गलाफाड़ रहा था। फ्रेंच में अपना भाषण ठोंक रहा था। सबके खोपड़े में हैडफोन। मुझे तो सुनते-सुनते ही बेहोशी छाने लगी। कहां हमारे नेता हैं। देश से बाहर जाते ही तहजीब का ख्याल रखते हैं, मेजबानी को आदर देते हैं, सामने वालों को परेशानी न हो, इसलिए दनादन अंग्रेजी में बोलते हैं। इस मामले इतने अनुरागी जीव हैं कि जिस देश में जाएं, वहां की भाषा में बोलने को तैयार हैं, वो तो वहां की भाषा न सीख पाने की मजबूरी है। अन्यथा तो किसी गैर देशवासी के कष्ट से हम तत्काल ही द्रवित हो जाते हैं। एक ये हैं विदेश में आकर भी मातृभाषा में भाषण भांज रहे हैं। देखते नहीं लोगों को कितनी परेशानी हो रही होगी। होए तो होए इन्हें क्या? ये तो अपना मातृभाषा प्रेम ही दिखाते रहेंगे। दिखावटी कहीं के। एक बार एक स्ट्रीट पर जा रहा था। देखा एक भिखारीनुमा आदमी सड़क पर हैट रखकर वायलिन पर अंगुलियां घसीटे ही जा रहा है, लोग उसके हैट में नोट डाल रहे हैं। देखते ही अपने ने भांप लिया बच्चू लोगों को ब्लैक मेल करके पैसे ऐंठ रहा हैं कि डालो हैट में नोट नहीं तो ऐसे ही भयानक वायलिन बजा-बजा के कान फोड डालूंगा। एक हमारे यहां के हैं, शालीन नफासत भरे अंदाज वाले, भिखारीपन की ठसक लिए। काहै का गाना-बजाना। भिखारी हैं तो काम किस बात का और डराना ही होगा तो वायलिन या संगीत से डराएंगे क्या?, वैसई न छीन लेंगे नोट। </p>  <p> </p>  <p>इसलिए तो मुझे कई बार लगता है साले स्ट्रीट पर भी डिजाइनर भिखारी खड़े कर देते हैं। ताकि बाहर से आने वालों पर इम्प्रैशन पड़े कि देख लो हमारे भिखारी तक कमा के खाने की भावना रखते हैं। अबे, सोचते ही नहीं कमाने खाने का जज्बा रखते तो भिखारी बनते क्या? नकली नहीं लगते ये लोग आपको, देखो मना मत करिओ नहीं तो फिर मानूंगा ही नहीं कि कभी विदेश गए थे। हां, क्या कहा- लगते हैं। गुरु, पैंतरे बदलू, पक्के देशवासी ही हो। अच्छा एक तो इतना तो ये बैकग्राउंड में नकलीपन भरे हैं ऊपर से बातें सुनो पट्ठों की नकली-नकली सी। यू नो माई कंट्री... माई नेशन...टाइप की। अबे, हमारा भी कंट्री, हमारा भी नेशन है। हम कभी गाते दिखते हैं क्या? ये क्या कि बात-बात पर प्राउड करने लगो। प्राउडी लोग अपने को पसंद ही नहीं इसलिए अपने देश की गर्व से बातें करते ही नहीं हैं कि पता नहीं भइया सामने वाला देश के बारे में क्या सोचने लगें। इसलिए तो देश के बारे में सारी अच्छी-अच्छी बातों को किताबों में ही रखते हैं। बोलते है क्या? ज्यादा जानना है तो किताबों में पढ़ लो। लोगों से पूछोगे तो बेचारे सीधे सहज लोग, घमंड का नमोनिशान नहीं। संकोच के मारे क्या अच्छा बता पाएंगे देश के बारे में, ज्यादा जोर दोगे तो आपका सम्मान रखने के लिए यहां कि बुराई और शुरू कर देंगे। इतनी सादगी कहीं मिलती है भला। सीधे-सादे, भोले-भाले, घमंड रहित लोगों का देश है। </p>  <p> </p>  <p>दूसरे लोगों-देशों के प्रति इतना प्रेम रखते हैं कि अपने देश की तारीफ करना ही भूल जाते हैं। सहज हैं ना। ऐसा नहीं है कि ये जेनरेशन ही इतनी विनम्र है। हमारी तो पिछली कई जेनरेशनों में ऐसी विनम्रता कूटकूट कर भरी है। ऐसा विनय से लबालब लोगों का देश देखा है कहीं? जो अपने व्यक्तिगत गुणों को सर्वोपरि मानें। घमंड के समूल नाश के लिए सबकुछ दांव पर लगा दें, देश तक। यूं ही नहीं दुगुर्णों से मुक्ति पाई जाती है। अच्छी-अच्छी चीजों की कुर्बानी देनी पड़ती है। भारी प्रयास करना होता है। क्या तारीफ करूं अपने देशवासियों की। यहां तो देश के लिए सम्मान की भावना तक नहीं है। ये क्या कि देश का झंडा तक लपेटे फिर रहे हैं। क्यों भाई? ऐसा क्या सम्मान कि झंडा तक पहन लिया ऊपर से अंदर तक। हमें देखो झंडा छूने देते हैं किसी को, ससम्मान चढ़ाया-उतारा फिर लपेट कर रख दिया। वर्षों तक तो हम उसे गोपनीय वस्तु की तरह सरकारी तौर पर सहेजकर रखे रहे। अब जाकर कुछ फहराने-वहराने की छूट दी है। तो भी दस नियम पंद्रह कायदे साथ में बता दिए हैं। वो तो हम जरा नियम-कायदों का लिहाज कर जाते हैं अन्यथा तो हमारा राष्ट्रप्रेम इतना उत्कृष्ट कोटि का है कि एक बार झंडा फहराएं तो वर्षों तक यूं ही लहराने दें। </p>  <p> </p>  <p>ऐसे ही मुझे इनकी युवा पीढ़ी पर बड़ी कोफ्त होती है। देश-दुनिया की कोई जानकारी ही नहीं। वैरी पुअर जनरल नॉलेज। एक हमारे बच्चे हैं, अमेरिका के बारे में पूछ लो टप्प से बता देंगे। इतनी इंफॉर्मेशन रखते हैं जैसे हायर सेकंडरी वहीं से किया हो। मेहनती है हमारी युवा पीढ़ी । वीजा जैसी कंपलीकेटेड चीज के बारे में पूछ लो-एच-1,पी-1 कोई सा भी वन-ट-थ्री हो सभी की मुकम्मल मालूमात। पूरा टेलेंड अमेरिका को विकसित करने में लगा देंगे। यू नो वही वसुधैव कुटुंबकम् की भावना। फिर देश का भी ध्यान रखते हैं। विदेश संभालेंगे हम और देश को गंजले,संजले मंझले भैइया, इतने सारे तो हैं कोई भी संभाल लेगा ही। विदेश जाकर भी इतनी चिंता है देश की , कहीं देखे हैं ऐसे लोग। ऐसे ही नहीं सूचना और तकनीक में विश्व में भारतीय छाए हुए हैं। इतनी तेजी से तरक्की कर रहे हैं भैइया कि मुझे तो डर लगता है कि आने वाले समय में कहीं नई जेनरेशन को देशभक्ति के मायने भी देशभक्ति डॉट कॉम में ही नहीं समझाना पड़े। आज ही संभलियो भिया। </p>  <p>-------</p>  <p>संपर्क:</p>  <p>अनुज खरे</p>  <p>सी-175 </p>  <p>मॉडल टाउन</p>  <p>जयपुर</p>  <p>मो.- 9829288739</p>  
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    <updated>2008-10-09T06:10:11Z</updated>
    <published>2008-10-09T06:10:00Z</published>
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      <subtitle>इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के दस्तावेज़ीकरण का एक सार्थक प्रयास...</subtitle>
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    <title>क्षणिकाएं</title>
    <summary type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml">(१)<br/>जल<br/>छू सकता<br/>महसूस कर सकता<br/>छाया को<br/>लेकिन, अपने साथ<br/>बहा नही सकता<br/>(२)<br/>छाया<br/>लिपट सकती<br/>चूम सकती<br/>जल से<br/>लेकिन, उसमें<br/>नहा नही सकती<br/>(३)<br/>पेड़<br/>अचल तन मन<br/>मनस्वी<br/>नदी छाया के<br/>खेल से अविचलित<br/>तपस्वी<br/>(४)<br/>नदी<br/>पहाड़ से बिछडती<br/>विलाप करती<br/>कितनी शांत<br/>जब सागर से<br/>मिलाप करती<br/>(५)<br/>पहाड़<br/>उर की आग<br/>मन का गुबार<br/>घुटन का उभार<br/>(६)<br/>बादल<br/>रुई के<br/>उड़ते फोहे नम<br/>पहाड़ के जख्मों पर<br/>लगाते मरहम<br/>(७)<br/>फूल<br/>अम्बर को<br/>स्वीकार<br/>माटी का<br/>आभार<br/>.<br/>विनय के जोशी</div>
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    <updated>2008-10-09T05:31:00Z</updated>
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      <title>हिन्द-युग्म</title>
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    <title>जा रहे हैं विमोचन में...पढ़ेंगे अपनी कविता</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml">११ अक्टूबर को <strong>गीत सम्राट राकेश खण्डेलवाल जी</strong> की पुस्तक <strong>’अंधेरी रात का सूरज’</strong> का विमोचन है. हमारे तो खैर वो गुरु जी हैं और हम उनके खास मूँह लगे चेले. न भी बुलाते, तो भी जाते जबरन. मगर पिछले तीन साल से लगातार वो उस कवि सम्मेलन में हमें बुला रहे हैं और हम जा रहे हैं, जिसमें इस साल विमोचन भी होना है. कितना बड़ा सौभाग्य है.<br/><br/>इस बार हम वहाँ तिहरी भूमिका में जा रहे हैं. एक राकेश जी के भक्त शिष्य की, दूसरी शिवना प्रकाशन, सिहोर, जिसने इस पुस्तक का प्रकाशन किया है, उनके प्रतिनिधि के रुप मे और तीसरे हम खुद भी तो कुछ मायने रखते हैं भई.<br/><br/><strong>शिवना प्रकाशन</strong> जो हमारे गुरु पंकज सुबीर जी का है, उसके एक विमोचन में मैं सिहोर में था पिछले साल. हटीला जी की पुस्तक ’बंजारे गीत’ का विमोचन था और साथ ही कवि सम्मेलन भी. सारा कार्यक्रम देखा, सुना और सुनाया. बहुत ही सम्मान और अभिनन्दन के साथ होता है विमोचन. बड़ा आनन्द आया था. इस बार उसी परम्परा का निर्वहन मैं करुँगा शिवना के लिए, यह सौभाग्य की बात है. फोटो आदि भी आगे पोस्ट की जायेंगी, मेरे लौटने पर.<br/><br/>यह आय्जन राकेश जी के लिए भावुक क्षण होगा..मेरे लिए भी. अनूप भार्गव जी और उनकी पत्नी रजनी भार्गव न्यू जर्सी से एवं घनश्याम गुप्ता जी जी फिलाडॆफिया से आ रहे हैं इस कार्यक्रम में शिरकत करने. बहुत आनन्ददायी यात्रा रहेगी. ३ घंटे की एक जगह रुकते फ्लाईट है. परसों दोपहर में...निकलेंगे और आनन्द उठायेंगे और आनन्द फैलाना की कोशिश तो खैर रहेगी ही.<br/><br/>राकेश जी के लिए:<br/><br/>हमारे पास तो राकेश जी के हर गीत के लिए एक ही टिप्पणी है: <strong>’अद्भुत’</strong><br/><strong><br/></strong>अब सुनिये पिछली बार इसी जगह हुए कवि सम्मेलन की रिकार्डिंग:<br/><br/><br/><br/><br/><strong>अनेकों शुभकामनाऐं</strong> इस कार्यक्रम के लिए. बाकी वहाँ से आकर रिपोर्ट पेश करता हूँ.
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    <updated>2008-10-09T00:59:00Z</updated>
    <published>2008-10-09T00:59:00Z</published>
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      <subtitle type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml">--ख्यालों की बेलगाम उडान...कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप और कभी कविता के माध्यम से......
<p>हाथ में लेकर कलम मैं हालेदिल कहता गया<br/>काव्य का निर्झर उमड़ता आप ही बहता गया.</p></div>
      </subtitle>
      <title>उडन तश्तरी  ....</title>
      <updated>2008-10-09T10:19:27Z</updated>
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    <title>Live Stream India Vs Australia: 1st Test Day 1</title>
    <summary>Image by Gouldy99 via Flickr   India will take on Australia in 1st Cricket Test Match at Chinnaswami Stadium, Bangalore on 9th October 2008. The Live streaming video of the even is available here. The match would start at 09:30h IST (04:00 GMT).</summary>
    <updated>2008-10-08T20:51:00Z</updated>
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      <subtitle>राम चन्द्र मिश्र का हिन्दी चिट्ठा!</subtitle>
      <title>हिन्दी ब्लॉग : hIndi Blog</title>
      <updated>2008-10-09T11:29:23Z</updated>
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    <title>एक टुकड़ा शब्द</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><span/><br/><span style="color: rgb(255, 102, 0); font-size: 130%;"><span>लहू</span>-<span>लुहान</span><br/><span>तड़पता</span> <span>रहा</span> <span>देर</span> <span>तक</span><br/><span>और</span> <span>दम</span> <span>तोड़</span> <span>दिया</span> <span>आखिर</span>.<br/><br/><span>सारे</span> <span>आवाज़</span> <span>एक</span> <span>बार</span> <span>फिर</span> <span>तोड़</span> <span>दिए</span> <span>थे</span><br/><span>फर्श</span> <span>पे</span> <span>पटक</span> <span>के</span> <span>उसने</span>.<br/><br/><span>सन्नाटा</span> <span>दीवार</span> <span>के</span> <span>कानो</span> <span>पे</span> <span>बर्फ</span> <span>हो</span> <span>गया</span> <span>था</span><br/><span>और </span><span>जिंदा</span> <span>बचे</span> <span>अल्फाज़</span><br/><span>पूरी</span> <span>ताकत</span> <span>से</span> <span>अपनी</span> <span>कंपकंपी</span> <span>संभाल</span> <span>रहे</span> <span>थे</span>.<br/><br/><span>ऐसा</span> <span>हीं</span> <span>हो</span> <span>जाया</span> <span>करता</span> <span>था</span> <span>अक्सर</span>.<br/><br/><span>एक</span> <span>दिन</span> <span>अपनी</span> <span>आवाज़</span> <span>उठा</span> <span>के</span> <span>वो</span> <span>चली</span> <span>गयी</span><br/><span>और</span> <span>दीवारों</span> <span>को</span> <span>सन्नाटे</span> <span>में</span> <span>छोड़</span> <span>दिया</span></span></div>
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    <updated>2008-10-08T18:49:20Z</updated>
    <published>2008-10-08T18:29:00Z</published>
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      <subtitle>कुछ शब्द जो मेरे मौन के खाली घर में आते हैं उन्हें मैं आवाज के पनाह में लाने की कोशिश करता हूँ . बस यही करता रहा हूँ .</subtitle>
      <title>मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य</title>
      <updated>2008-10-08T19:10:14Z</updated>
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    <title>ŕ¤¸ŕ¤­ŕĽ€ ŕ¤Žŕ¤żŕ¤¤ŕĽŕ¤°ŕĽ‹ŕ¤‚ ŕ¤•ŕĽ‹ ŕ¤ľŕ¤żŕ¤œŕ¤Ż ŕ¤Şŕ¤°ŕĽŕ¤ľ ŕ¤•ŕĽ€ ŕ¤šŕ¤žŕ¤°ŕĽŕ¤Śŕ¤żŕ¤• ŕ¤śŕĽŕ¤­ŕ¤•ŕ¤žŕ¤Žŕ¤¨ŕ¤žŕ¤ŕ¤‚—ŕ¤Ąŕ¤ž.ŕ¤°ŕ¤Žŕ¤ž ŕ¤ŚŕĽŕ¤ľŕ¤żŕ¤ľŕĽ‡ŕ¤ŚŕĽ€</title>
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    <updated>2008-10-08T17:16:06Z</updated>
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      <subtitle>ŕ¤…ŕ¤šŕ¤¸ŕ¤žŕ¤¸ŕĽ‹ŕ¤‚ ŕ¤•ŕĽ‹ ŕ¤¸ŕ¤‚ŕ¤œŕĽ‹ŕ¤Żŕ¤ž ŕ¤šŕĽˆ ŕ¤ŽŕĽˆŕ¤‚ŕ¤¨ŕĽ‡, ŕ¤…ŕ¤¨ŕĽŕ¤­ŕĽ‚ŕ¤¤ŕ¤żŕ¤ŻŕĽ‹ŕ¤‚ ŕ¤•ŕĽ‹ ŕ¤Şŕ¤żŕ¤°ŕĽ‹ŕ¤Żŕ¤ž ŕ¤šŕĽˆ ŕ¤ŽŕĽˆŕ¤‚ŕ¤¨ŕĽ‡, ŕ¤Źŕ¤¨ŕĽ‡ ŕ¤¸ŕ¤¤ŕĽŕ¤Ż,ŕ¤śŕ¤żŕ¤ľ, ŕ¤¸ŕĽŕ¤¨ŕĽŕ¤Śŕ¤°ŕ¤Ž ŕ¤Żŕ¤š ŕ¤•ŕ¤˛ŕ¤ś,ŕ¤Žŕ¤žŕ¤¨ŕ¤¸ ŕ¤•ŕĽ€ ŕ¤—ŕ¤‚ŕ¤—ŕ¤ž ŕ¤ŽŕĽ‡ŕ¤‚ ŕ¤§ŕĽ‹ŕ¤Żŕ¤ž ŕ¤šŕĽˆ ŕ¤ŽŕĽˆŕ¤‚ŕ¤¨ŕĽ‡..</subtitle>
      <title>ŕ¤…ŕ¤¨ŕĽŕ¤­ŕĽ‚ŕ¤¤ŕ¤ż ŕ¤•ŕ¤˛ŕ¤ś</title>
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    <title>शास्त्रीजी आपकी टिप्पणी के लियेः धन्यवाद</title>
    <summary>फर्स्ट थिंग फर्स्ट, हमको शायद पहली बार शास्त्रीजी की टिप्पणी पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, ये टिप्पणी का प्रताप है कि हमें शुक्रिया कहने को पोस्ट लिखनी पड़ रही है इसलिये तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय।
शास्त्री जी ने हमारे नये चिट्ठे पर कुछ यूँ टिप्पणी छोड़ी (उनकी तरह ही कट-पेस्ट करके यहाँ [...]</summary>
    <updated>2008-10-08T11:28:48Z</updated>
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        <name>Nithalla Chintan: à¤¨à¤¿à¤ à¤²à¥à¤²à¤¾ à¤à¤¿à¤¨à¥à¤¤à¤¨ à¤à¤ à¤à¤à¥à¤°à¥à¤¶ à¤¹à¥ à¤µà¤¿à¤à¤¾à¤°à¥à¤ à¤à¥ à¤à¤à¤§à¥ à¤à¤¾, à¤à¤ à¤¦à¥à¤µà¤à¤¦ à¤¹à¥ à¤¸à¤ à¤à¤° à¤à¥à¤  à¤à¤¾, à¤à¤ à¤­à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ à¤¹à¥ à¤ªà¥à¤¯à¤¾à¤°</name>
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      <subtitle>निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारौं की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की॥</subtitle>
      <title>Nithalla Chintan</title>
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    <title>गीत-संगीत पर नया ब्लोगः गीत गाता चल</title>
    <summary>गानों के शौक ने फिर से करवट ली और दिल ने कहा गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल। जी हाँ संगीतमय ब्लोगों की कतार में हम भी अपनी ढपली अपना राग ले कर आ गये हैं। हमारे इस नये ब्लोग का नाम है - गीत गाता चल। इस नये ब्लोग में हम अपनी पसंद [...]</summary>
    <updated>2008-10-08T11:28:48Z</updated>
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    <title>एक और कारनामा</title>
    <summary>एक भारत में कई भारत बसते है. भाषा और संस्कृति की भिन्नता और लोगो के सोच में दो ध्रुवीय अंतर आश्चर्य जगाता है. एक निष्फल वाद को ढ़ोते बंगाल में जहाँ टाटा की परियोजना का विरोध हो रहा था....</summary>
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      <subtitle>संजय बेंगाणी द्वारा कम शब्दों में खरी-खरी बात</subtitle>
      <title>जोगलिखी</title>
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    <title>अपना दोष सरकार के सर…</title>
    <summary>कल मुम्बई में महाराष्ट्र सरकार द्वारा आयोजित सर्वभाषा सम्मेलन समाप्त हुआ. हिन्दी के लिए बोलना था अतः मैने जाना स्वीकार किया. मैने पाया कि वहाँ शुरूआत से ही सरकार को कोसने का काम शूरू हो चुका था.</summary>
    <updated>2008-10-08T11:28:44Z</updated>
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      <subtitle>संजय बेंगाणी द्वारा कम शब्दों में खरी-खरी बात</subtitle>
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    <title>देवी का नेजा अबके बरस</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><a href="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SOyIc86iNLI/AAAAAAAAEGg/55ppAN04cik/s1600-h/mother.jpg" target="_blank"><img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5254724896203879602" src="http://4.bp.blogspot.com/_Zl-3hmYZQL8/SOyIc86iNLI/AAAAAAAAEGg/55ppAN04cik/s400/mother.jpg" style="float: right; margin: 0 0 10px 10px; cursor: pointer; cursor: hand;"/></a><strong>इन दिनों</strong> धूप में चौंध तो है लेकिन किरनों की नोकें मुलायम पड़ने लगी हैं। दोपहर में बरछी की तरह लगे तो शाम को सहलाती भी है। ओह, ओस पड़ने लगी है। कितने दिन हुए उसे सुबह-सुबह देखे। बचपन मे उसे शीशी में भरते थे। किसी घास या फूल पर ताजा, हैरत से ताकती एक आंख जिसमें सारी कायनात झिलमिलाती है। लेकिन ओस हमारी जिंदगी से जा रही है और उसकी खाली जगह को भरने के लिए स्प्रे, टिशू पेपर, फेंगशुई और केमिकल से बनी ढेर सारी टायलेट्रीज आ रही है, जिनके बारे में बला की खूबसूरत और जरा सलीके की बेहया मॉडलों का दावा है कि ये चीजें हमें ताजगी और अहसास देती हैं। लाहौल बिला... और मुझ पर माजी का नजला गिरे, मैं फिर मीनमेख निकालने में जुट गई।<br/><br/>...गरज ये है कि साल का यह समय बेहद पुरकैफ औऱ रूहानी तासीर से भरा-भरा लगता है। बचपन से। हवा में लोबान, गुगल की महक, ढाक की थाप, पूजा के खेमों से देर रात लौटती लड़कियों की हंसी और एक इत्मीनान कि सारे कामधाम थोड़ी देर को रोक दो देवी आ रही हैं। हवा में कुछ होता है जो कहता है कि हाथ फैलाकर, इस इरादे से कि सारी कायनात का अर्क भीतर भर जाए, जोर की सांस लो। कपास के फूलों के ऊपर से जाते बचे खुचे सुफेद नन्हें-नन्हें बादलों को खुदा हाफिज कहो। वे अब अगले साल से पहले नहीं आने वाले। मन... उस काली सफेद चिड़िया क्या तो नाम है उसका जो इन्हीं दिनों आती है, कहीं ठहरती नहीं... की तरह भागता है। ओह, बदलते मौसम में इतना चंचल तो बस प्यार ही हो सकता है। पुराने दोस्त याद आते हैं और फुसफुसाहटों के टुकड़े कानों के पास उड़ने लगते हैं। एक बार तो विसर्जन को जाते शरारती लड़कों ने सरसों की मुट्ठी दे मारी थी जो देर तक कपड़ों के भीतर घुस कर गुदगुदी मचाती रही।<br/><br/>क्या दिन होते हैं ये। बारिश की झड़ी और जाड़ों की धुंध के बीच का ट्रांजिशन पीरियड। बरामदा है जिसके एक तरफ सर्दी तो दूसरी तरफ गरमी। हमारे मुल्क में अगस्त में गेट वे आफ फेस्टिवल खुलता है जसका महकता रास्ता, मकरसंक्राति के आगे होली तक जाता है।<br/><br/>देवी को देखने, ताकत को महसूस करने, आदाब कहने जरूर जाती हूं। उनके आगे हाथ मे शोले के कटोरे लिए वह नाच बेहद अच्चा लगता है। बस एक बात अजीब लगती है कि हमारी सोसायटी में जहां, देवी पर लोगों का इतना अकीदा है कि नौ दिन शराब नही पीएंगे, गोश्त नहीं खाएंगे यहां तक कि बाज नेता झूठ नहीं बोलते और अफसरान दफ्तरों में इन दिनों रिश्वत तक नहीं लेते, वहां औरतों की इतनी बेकदरी क्यों है?<br/><br/>यह पाखंड हमारी सोसायटी की बेहद खास पहचान है। कम अज कम मै तो इसे शिद्दत से महसूस करती हूं। वो देवी, देवी... देवी... ये पांव की जूती... जूती... जूती!!!<br/><br/>इस पाखंड पर बिना उंगली उठाए, बिना इसे लड़े, बिना इसे चूर किए हम कहीं नहीं जा पाएंगे। इस पाखंड के पत्थर के नीचे नखलिस्तान है। आधी आबादी का टारबाइन है। जिसके घूमने की आवाज में यह मंत्र गूंजता है-<blockquote><em>गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम। मया त्वयि हतेत्रैव गर्जिष्यांत्याशु देवताह।।</em></blockquote>काश देवी का नेजा अबके बरस इस मर्दाना पाखंड के अजदहे महिषासुर पर गिरे। आमीन।<div class="blogger-post-footer"><!--
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    <updated>2008-10-08T10:16:41Z</updated>
    <published>2008-10-08T09:07:00Z</published>
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      <subtitle>हम सब कभी वहीं थे... अब भी नहीं भूले हैं अपना-अपना मोहल्ला...</subtitle>
      <title>मोहल्ला</title>
      <updated>2008-10-09T11:08:37Z</updated>
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    <title>समावरोह... ( बदल रही है मेरी दिल्ली)</title>
    <summary type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml">दिल्ली बीचो-बीच  में  भवन  भव्य  विज्ञान <br/>कर्मठता का पुलिस को, मिलना था सम्मान <br/>मिलना था सम्मान, सो पहुँचे सभी वक्त पर <br/>मोटी - मोटी  तोंदों  वाले  आला अफसर <br/>लम्बे - पतले, मोटे - छोटे, नाटे - गट्टे <br/>अब तक शक्ल दिखी ना जिनकी हुए इकट्ठे <br/>चेहरे  रगड़  मलाई,  सेंट  लागाकर  आये<br/>उचक उचक कर तकें कि कब कोई हमें बुलाये<br/>अवार्ड बेस्ट मुस्तैदी का जब पा गया कुत्ता <br/>हुई सिपाही अफसर में फिर गुत्थम-गुत्था<br/>अवार्ड  दिलाने  के  लिये  इसने  पैसे खाये<br/>तील साल में  मुझसे  छ: छोछक  दिलवाये <br/>उछल उछल कर कुत्ता मंच पर उड़ाये खिल्ली<br/>देशभक्त या द्वेषभक्त, बदल रही है मेरी दिल्ली</div>
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    <updated>2008-10-08T09:29:00Z</updated>
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      <title>हिन्द-युग्म</title>
      <updated>2008-10-09T11:28:11Z</updated>
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    <title>गज़ल</title>
    <summary type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml">शैदाई समझ कर जिसे था दिल में बसाया ।<br/>कातिल था वही उसने मेरा कत्ल कराया ॥<br/><br/>दुनिया को दिखाने जो चला दर्द मैं अपने,<br/>हर घर में दिखा मुझको तो दुख दर्द का साया ।<br/><br/>किसको मैं सुनाऊँ ये तो मुश्किल है फसाना<br/>दुश्मन था वही मैने जिसे  भाई बनाया ।<br/><br/>मैं कांप रहा हूँ कि वो किस फन से डसेगा,<br/>फिर आज है उसने मुझसे प्यार जताया ।<br/><br/>आकाश में उड़ता था मैं परवाज़ थी ऊँची,<br/>पर नोंच मुझे उसने जमीं पर है गिराया ।<br/><br/>गीतों में मेरे जिसने कभी खुद को था देखा,<br/>आवाज मेरी सुन के भी अनजान बताया ।<br/><br/>कांधे पे चढ़ा के उसे मंजिल थी दिखाई,<br/>मंजिल पे पहुँच उसने मुझे मार गिराया ।<br/><br/>शैदाई= चाहने वाला, पर = पंख, परवाज = उड़ान<br/><br/>कवि कुलवंत सिंह</div>
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    <updated>2008-10-08T08:56:00Z</updated>
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      <title>हिन्द-युग्म</title>
      <updated>2008-10-09T11:28:12Z</updated>
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    <title>लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के सृजक लिनुस टॉरवाल्ड्स का ब्लॉग : सादा जीवन उच्चविचार?</title>
    <summary type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><p><a href="http://lh4.ggpht.com/raviratlami/SOxqjVnmeXI/AAAAAAAAFE0/obcE3xTfmqY/s1600-h/linus%20torwalds%20blog%202%5B2%5D.jpg"><img alt="linus torwalds blog 2" border="0" height="186" src="http://lh3.ggpht.com/raviratlami/SOxqlL1Gb6I/AAAAAAAAFE4/iHvTBVVxhnw/linus%20torwalds%20blog%202_thumb.jpg?imgmax=800" style="border-right: 0px; border-top: 0px; border-left: 0px; border-bottom: 0px;" title="linus torwalds blog 2" width="244"/></a> </p>  <p>नेट की दुनिया पर अगर आपका वजूद है, तो यकीनन आपका कोई न कोई एक ब्लॉग होगा. लिनुस टॉरवाल्ड्स का भी होगा? अब तक तो नहीं था, मगर, लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के सृजक, लिनुस टॉरवाल्ड्स भी अंतत: पिछले हफ़्ते से ब्लॉग लेखन में कूद पड़े. और वे <a href="http://nuktachini.debashish.com/254">नक़ली स्टीव जॉब्स</a> की तरह नक़ली नहीं हैं, <a href="http://www.networkworld.com/community/node/33708" target="_blank">पूरे असली</a> हैं.</p>  <p>उनका ब्लॉग – <a href="http://torvalds-family.blogspot.com/2008/10/tracking-time-kids-spend-online.html">लिनुस का ब्लॉग</a> सादा जीवन उच्च विचार को इंगित करता है. ब्लॉगर प्लेटफ़ॉर्म पर एकदम सादे, सरल टैम्प्लेट पर बिना किसी साज सज्जा के है उनका ब्लॉग. और उन्होंने अपने <a href="http://torvalds-family.blogspot.com/2008/10/tracking-time-kids-spend-online.html">इस पोस्ट</a> में एक सतर्क पिता के रूप में अपने बच्चों को इंटरनेट के उचित उपयोग संबंधी विचार लिखे हैं.</p>  <p>अब आप वहां आई टिप्पणियों का आनंद लें – लोग बाग़ लिनुस को सीख दे रहे हैं पट्टी पढ़ा रहे हैं कुछ इस तरह:</p>  <blockquote>   <p><strong>एक ने टिप्पणी लिखी – आपने ब्लॉगर का प्रयोग क्यों किया? वर्डप्रेस क्यों नहीं? वर्डप्रेस तो मुफ़्त उपलब्ध, ओपन सोर्स ब्लॉग अनुप्रयोग है, जबकि ब्लॉगर का प्रयोग सिर्फ गूगल के सर्वरों पर ही किया जा सकता है.</strong></p>    <p><strong>एक का कहना था – आप सादा सरल ब्लॉगर का प्रयोग ब्लॉग के लिए क्यों कर रहे हैं? आपको तो गिट (git) का प्रयोग करना था – वो ज्यादा गीकी होता!</strong></p>    <p><strong>एक दूसरे बंधु लिनुस को सलाह देने लगे – आप अपने फोटो इंटरनेट पर टांगने के लिए फ्लिकर या पिकासा का प्रयोग कर सकते हैं.</strong></p>    <p><strong>अगली टिप्पणी है – आपने ब्लॉगर का प्रयोग ब्लॉग लेखन के लिए क्यों किया? आपको तो अपना स्वयं का डोमेन लेकर वर्डप्रेस इत्यादि (या गिट के प्रयोग से) के जरिए ब्लॉग लिखना चाहिए.</strong></p>    <p><strong>एक और टिप्पणी है – आपने ब्लॉगर का चुनाव रेंडमली कर लिया या देख-परख कर किया? यदि आप इसबारे में बताएंगे तो बढ़िया स्टोरी बनेगी.</strong></p> </blockquote>  <p><strong><u>संबंधित आलेख:</u></strong></p>  <p>लिनुस <a href="http://raviratlami.blogspot.com/2007/08/linus-torwalds-linux-microsoft-should.html">टॉरवाल्ड्स से साक्षात्कार</a> (हिन्दी में)</p>  <p>लिनुस टॉरवाल्ड्स ने <a href="http://www.networkworld.com/community/node/33708">ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया</a> (साक्षात्कार अंग्रेज़ी में)</p>  <p>लिनुस <a href="http://www.freewebs.com/linusfacts/index.htm">टॉरवाल्ड्स फैक्ट शीट</a> (अंग्रेज़ी में)</p>  <p>चित्र : साभार – लिनुस टॉरवाल्ड्स फैक्ट शीट</p>  <p/>  <p/>  <p/>  <p>---</p>  <p>tag – linus torwalds blog, linus’ blog</p>
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    <updated>2008-10-08T08:08:00Z</updated>
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      <subtitle>टेढ़ी दुनिया पर रवि की तिर्यक रेखाएँ...</subtitle>
      <title>Raviratlami Ka Hindi Blog</title>
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    <title>ईश्वर, सत्ता और कविता</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><blockquote><em><p align="right">हालांकि मोहल्ला पर ईश्वर और कविता पर बहस धीमी पड़ गयी है, और उसको सांप्रदायिकता और आतंकवाद पर बहस ने हाशिये पर ढकेल दिया है, पर मुझे लगता है कि अगर आप आस्था, समाज और सत्ता को लेकर एक स्पष्ट अवधारणा नहीं रखते हैं, तो सारी बहस बेमानी है। हिंदी के प्रखर आलोचक <strong>रघुवंशमणि</strong> का यह लेख कई स्थापनाओं को स्पष्ट करता है। अभी हाल में ही उन्हें आलोचना का <strong>रामविलास शर्मा सम्मान</strong> मिला है। उनका यह लेख आप सबको पढ़वाना मुझे ज़रूरी लगा।<br/><a href="http://www.blogger.com/profile/04631992081517062854" target="_blank"><strong>विशाल श्रीवास्तव</strong></a></p></em></blockquote><strong><span style="font-size: 130%;">ईश्वर, सत्ता और कविता</span></strong><br/><br/><a href="http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315" target="_blank"><strong>रघुवंशमणि</strong></a><br/><br/><strong>आपातकाल</strong> के बाद, प्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह <a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/&#x939;&#x91C;&#x93C;&#x93E;&#x930;-&#x939;&#x91C;&#x93C;&#x93E;&#x930;_&#x92C;&#x93E;&#x939;&#x94B;&#x902;_&#x935;&#x93E;&#x932;&#x940;_/_&#x928;&#x93E;&#x917;&#x93E;&#x930;&#x94D;&#x91C;&#x941;&#x928;" target="_blank"><strong>हजार हजार बाहों वाली</strong></a> में जनकवि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Nagarjun" target="_blank"><strong>नागार्जुन</strong></a> की एक कविता थी <strong>कल्पना के पुत्र हे भगवान</strong>। अपने शीर्षक को सार्थक करती हुई यह कविता ईश्वर के अस्तित्व पर लिखी गयी उस कालखंड की एक महत्वपूर्ण कविता थी। कल्पनाजनित ईश्वर को संबोधित करती यह कविता कुछ इस प्रकार प्रारम्भ होती है -<blockquote><em>कल्पना के पुत्र हे भगवान<br/>चाहिए मुझको नहीं वरदान<br/>दे सको तो दो मुझे अभिशाप<br/>प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप<br/>चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति<br/>चाहिए संदेह उलझन भ्रांति</em></blockquote>आस्था के स्थान पर संदेह की मांग करती यह कविता बेहद चुनौतीपूर्ण है। संग्रह में दिये गये विवरण के अनुसार इस कविता का रचना समय 1946 है। उस समय के पारंपरिक समाज को देखते हुए यह तथ्य इस कविता के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा देता है। पारंपरिक तौर पर ईश्वर से होने वाली आस्था की माँग के बरक्स अनास्था की मॉग करने वाली यह कविता एक प्रकार का वैचारिक साहस थी। बरबस ध्यान खींच लेने वाली बाबा की यह कविता या तो आश्चर्यमिश्रित उत्साह के साथ पढ़ी गयी या फिर भयाक्रांत निन्दाभाव से। वह दौर हमारे आज के अभी-अभी गुजरे फासीवादी दौर के दु:स्वप्न से बिल्कुल अलग था, वगर्ना संघी भाई लाठी लेकर नागार्जुन को खोजते और बाबा अपनी खास मुद्रा में कोई अटपटा सा उत्तर देते। फासीवादियों को केवल गर्मी और उत्तेजना से मतलब होता है, जिसे वे विचार के लोहे में ढालकर हथियार के तौर पर जनता में ट्रांसफर कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। उन्हें कविता अथवा किसी भी कला के अर्थ, भाव या अभिव्यक्ति की सूक्ष्मताओं से कुछ खास लेना देना नहीं होता। यदि ऐसा न होता तो वे बर्बर दंगाइयों में क्यों तब्दील होते और पिछले तीस वङ्र्ढों का भारतीय इतिहास आदमीयत के खून से सराबोर न होता।<span class="fullpost"><br/><br/>नागार्जुन की इस कविता के सापेक्ष हिन्दी की उस पहली दलित कविता का जिक्र जरूरी लगता है, जिसमें ईश्वर को 'भगवनवा' कहा गया है, अथवा <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Suryakant_Tripathi_'Nirala'" target="_blank"><strong>निराला</strong></a> के उस लघु उपन्यास का जिक्र जिसका नायक ईश्वर पर लाठी चला देता हैं। मगर ये दोनों ही कृतियां नागार्जुन की इस कविता से थोड़ा अलग हैं। हिन्दी की प्रसिद्ध ऐतिहासिक महत्व की पत्रिका <strong>सरस्वती</strong> में प्रकाशित और यहां संदर्भित <a href="http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/2008/07/blog-post.html" target="_blank"><strong>हीरा डोम की कविता</strong></a> अपने वक्तव्यों में पात्र अथवा कवि की विवशता और शिकायत को व्यक्त करती है जो अपनी जीवन स्थितियों से तंग है। यहां वर्ण व्यवस्था के प्रति आक्रोश पढ़ा जा सकता है । लेकिन देखें तो वास्तव में वही मुख्य बात है और ऐसा होना भी चाहिए, क्‍योंकि वर्ण व्यवस्था के प्रति यह आक्रोश ही उसे उद्वेलित कर ईश्वर की ओर ले जाता है और उसकी लानत-मलामत तक उतारता है। मगर वर्ण व्यवस्था की परिधि से बाहर खड़ा यह डोम ईश्वर की सत्ता से इनक़ार नहीं करता। यहां ईश्वर के प्रति निषेध नहीं अपितु एक विडम्बनापूर्ण और विवश धिक्कार है।<br/><br/>हमारे समय में धर्म का सांप्रदायिक और मनुष्य विरोधी स्वरूप काफी स्पष्ट हो गया है। बीसवीं शताब्दि के आखिरी दशकों से लेकर यदि नयी शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक को ध्यान मे रखें तो धर्म को लेकर हुए उत्पातों में जितने निर्दोष लोग मारे गये, उतने किसी भी प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य किसी मानवीय त्रासदी में नहीं मारे गये। यह सांप्रदायिकता विभिन्न प्रकार से उभरी और हिन्दू साम्प्रदायिकता का नग्न नृत्य इसका चरमोत्कर्ष है। पंजाब के सिख आतंकवाद, कश्मीर के मुस्लिम आतंकवाद और हिन्दू सांप्रदायिकता की आग में अपनी जान खो देने वाले निर्दोष लोगों की संख्या का आंकड़ा रख पाना कठिन है। सिर्फ एक गुजरात के दंगों में 6000 से अधिक लोगो के मारे जाने के आंकड़े है। यह संख्या कम अथवा अधिक हो सकती है और यह बहस का मुद्दा नहीं। मुद्दा यह है कि मनुष्य को सदाचार और मानवीयता का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाला धर्म आज राजनीतिज्ञों द्वारा किस प्रकार इस्तेमाल हो रहा है और धर्म और ईश्वर के ठेकेदार किस प्रकार इस अमानवीय कृत्य में लिप्त हैं और किस प्रकार इसे अपना मुद्दा बनाये हुए हैं। धर्म की राजनीति करने वाले लोग हत्याओं तर्क तलाशने में जुटे हुए है। स्वयं को सहिष्‍णु बताने वाले धर्मों के इस प्रकार सामने आने वाले हिंसक रूप किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए चिन्ता का विषय होंगे।<blockquote><em>किसी धर्मस्थल के<br/>विवाद में<br/>तीन हजार लोग बम से<br/>दो हजार गोली से<br/>और पाँच सौ<br/>जलाकर मार डाले जाते हैं<br/><br/>चार सौ महिलाओं की<br/>इज्ज़त लूटी जाती है<br/>और तीन सौ शिशुओं को<br/>बलि का बकरा बनाया जाता है<br/><br/>धर्म में<br/>सहिष्णुता का<br/>प्रतिशत ज्ञात कीजिए<br/><br/><a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/&#x905;&#x937;&#x94D;&#x91F;&#x92D;&#x941;&#x91C;&#x93E;_&#x936;&#x941;&#x915;&#x94D;&#x200D;&#x932;" target="_blank"><strong>अष्टभुजा शुक्ल</strong></a></em></blockquote>ईश्वर और धर्म को लेकर प्रचलित मानववादी दृष्टि का हिंदी कविता में अभाव नहीं। लेकिन इन मानववादी कवियों की तुलना वैदिक अथवा भक्ति युग के कवियो से करना गलता होगा। ईश्वर की सम्पूर्ण सत्ता और उसके आगे निरा समर्पित रहने वाला भक्तिभाव इन कवियो में नहीं। न ही यह ईश्वर उनकी कविता का केन्द्रीय विषय बनता है, जैसा कि भक्ति युग के साहित्य में है। नवजागरण पर चल रही सारी खींचा-तानी के बाद भी यह स्वीकार तो करना ही पड़ेगा कि ईश्वर प्रत्यय सम्बन्धी दार्शनिक सोच के मामले में भक्ति कवि, सन्त अगस्ताइन जैसे यूरोपियन मध्ययुगीनों से बहुत आगे नहीं। मगर ये मानवतावादी कवि तो आधुनिकता में पांव डाले हुए हैं। भक्तियुग की अन्तिम परछायीं हिन्दी साहित्य में निराला की कविता में दिखलाई पड़ती है और वहीं से उससे मुक्त होने का मार्ग भी दृष्टिगोचर होता है। वैसे निराला स्वयं भक्ति के कवि तो कतई नहीं। भक्ति है भी तो छायावाद और आधुनिकता के फार्म में। अत: इस पूरे विश्लेषण में निराला से पहले के समय में जाने की जरूरत नहीं महसूस होती।<br/><br/>इस मानववादी दृष्टि की विशेङ्ढता यह है कि इस दार्शनिक अवस्थिति में ईश्वर की सत्ता मनुष्य की सत्ता से जुड़ जाती है। हरिजन, दलित, मजदूर, किसानों में ईश्वर की प्राप्ति इसी अर्थ मे है और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Ravindra_Nath_Tagore" target="_blank"><strong>रवीन्द्रनाथ टैगोर</strong></a> ऐसी कविताएं लिखने वाले एकमात्र कवि नहीं। ऐसी कविताएं हिन्दी में कम नहीं जिनमें मनुष्य को ईश्वर का रूप बतलाया गया हो और उसकी अवहेलना करके होने वाली ईश्वर भक्ति को पाखण्ड और ढोंग बताया गया हो। ईश्वर की इस मानवीय सत्ता के दर्शन की आवश्यकता हमारे समय में साम्प्रदायिकता के बरक्स बार-बार दिखाई दी और धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों द्वारा बार-बार पीछे जाकर इन कवियों में अपनी परंपरा तलाशने की बेचैनी इसी का प्रतिफलन है। यह देखने की बात है कि टैगोर एक तरफ ईश्वर को सामान्य जनता में तलाशते हैं तो दूसरी तरफ साम्प्रदायिकता के अंधकार को भाई-भाई के बीच हो रहे अज्ञानतापूर्ण अनुचित संघर्ष के रूप में देखते हैं। ये दोनों विचार दार्शनिक स्तर पर नाभिनाल-बद्ध हैं।<br/><br/>राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से प्रादुर्भूत साम्प्रदायिक वैमनस्य के दौर मे <strong>अनिल सिंह</strong> अपनी बहुचर्चित कविता <strong>अयोध्या</strong> में लिखते हैं,<blockquote><em>मनुष्‍य रहते हैं इस शहर में<br/>जिनमें रहता है भगवान<br/>और चूंकि भगवान मनुष्‍य में रहता है<br/>इसलिए वह अल्लाह भी हो सकता है</em></blockquote>फिर मनुष्‍य और उसका सामान्य नागरिक जीवन ईश्वर से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि<blockquote><em>इतना ही यथार्थ है यह शहर जितना यह कि<br/>आदमी का कलेजा काटकर उसकी जगह<br/>शिवलिंग रख देने से वह मर जाएगा</em></blockquote>ईश्वर और मनुष्य की सत्ता का एकाकार होना मानववादी कविता की एक प्रमुख विशेषता है। यह भी कहा जा सकता है कि इस कविता में मनुष्य ही ईश्वर हो जाता है। आगे चलें, तो यह तथ्य सामने आता है कि मनुष्य के तिरस्कार पर ईश्वर और उसकी भक्ति ही निरर्थक हो जाती है। ऐसे में उसके प्रति भक्ति या श्रद्धा का कोई महत्व नहीं। वाह्याडंबरों पर हुए आक्रमण इसी के चलते है। देखें तो ईश्वर और धर्म के प्रति यही सोच भारत में धर्मनिरपेक्षता का मूल बनती है और जिसके कुछ तत्व भक्ति युग में प्राप्त होते हैं। मनुष्य के कारण ही तो ईश्यर का अस्तित्व है वरना धर्म का सारा ताना-बाना बेकार है। आध्यात्म के अखण्ड भाव में पूरे विश्व का समा जाना जरूरी है और मनुष्य तो वही है जो मनुष्य के लिए मरे।<br/><br/>सांप्रदायिक उन्माद के भीषण दौर से पूर्वं, अर्थात 1990 से पहले के समय की समकालीन हिन्दी कविता में ईश्वर की उपस्थिति की तुलना में बाद की कविताओं में उसकी उपस्थिति काबिले गौर है। <a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/&#x938;&#x94D;&#x935;&#x92A;&#x94D;&#x928;&#x93F;&#x932;_&#x936;&#x94D;&#x930;&#x940;&#x935;&#x93E;&#x938;&#x94D;&#x924;&#x935;" target="_blank"><strong>स्वप्निल श्रीवास्तव</strong></a> की कविताओं मे ईश्वर की उपस्थिति एक वैचारिक द्वंद्व का परिणाम है। <a href="http://mohalla.blogspot.com/2008/10/blog-post.html" target="_blank"><strong>ईश्वर एक लाठी है</strong></a> कविता इस अर्थ में ध्यातव्य है। यहां कवि अपने पिता जैसे बूढे लोगों के लिए ईश्वर के निहितार्थ को समझने की कोशिश करता है। इस कविता में यदि पिता के ईश्वर में विश्वास के प्रति सहानुभूति है तो उस विश्वास की व्यर्थता का भी एहसास है। ईश्वर पिता के लिए एक ऐसी लाठी है, जिसे वे अक्सर तान देते हैं। उन्होंने इस लाठी को जिंदगी भर मजबूत रखने की कोशिश की है, मगर उन्हें लाठी में घुन के चालने की आवाज सुनाई देती है। अपनी जीवन भर की आस्था के बाद भी वे यह नहीं जान सके हैं कि ईश्वर आखिर किस कोठ की लाठी है। स्वप्निल श्रीवास्तव की इस कविता के तमाम निहितार्थ निकलते हैं, विशेष रूप से इस कारण कि कवि के काव्यानुशासन में कविता के अर्थ एक दिशा में चलते हुए भी विभिन्न संस्तरों पर खुलते है। एक आस्तिक पिता के द्वंद्व को यह बखूबी रेखांकित करने वाली कविता है, जिसके लिए ईश्वर एक ऐसा सहारा है जो कमजोर होता जा रहा है, मगर जिसे त्याग पाना उसके तर्क स्वभाव में कहीं दूर-दूर तक नहीं।<br/><br/><a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/&#x935;&#x940;&#x930;&#x947;&#x928;_&#x921;&#x902;&#x917;&#x935;&#x93E;&#x932;" target="_blank"><strong>वीरेन डंगवाल</strong></a> की कविता <a href="http://hi.literature.wikia.com/wiki/&#x926;&#x941;&#x936;&#x94D;&#x91A;&#x915;&#x94D;&#x930;_&#x92E;&#x947;&#x902;_&#x938;&#x94D;&#x930;&#x937;&#x94D;&#x91F;&#x93E;._/_&#x935;&#x940;&#x930;&#x947;&#x928;_&#x921;&#x902;&#x917;&#x935;&#x93E;&#x932;" target="_blank"><strong>दुश्चक्र में स्रष्टा</strong></a> अपनी विडम्बनात्मक अभिव्यक्तियों के चलते महत्वपूर्ण है और इसी कारण उसने हिंदी के पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कविता मे उपस्थित यह व्यंग्य और विडम्बना का स्वर कविता के अंत तक पहुंचते-पहुचते आक्रोश में बदल जाता है। <em>दुश्चक्र में स्रष्टा</em> कविता का प्रारंभ भगवान के कारीगरी के कमाल के जिक्र के साथ होता है। समकालीन घटनाक्रम के सापेक्ष यह जिक्र व्यंग्य और विडम्बना के स्वर के साथ है।<blockquote><em>अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!<br/>कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर<br/>स्वाद की मर्मज्ञ<br/>और दुम की तो बात ही अलग<br/>गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ<br/>तुम्हारे मुखड़े पर झलती हुई</em></blockquote>ईश्वर के शानदार कृत्यों का यह विडम्बनापूर्ण वर्णन इस शिकायत के साथ समय के यथार्थ तक पहुंचता है कि भगवान ने अपना कामयाब कारखाना बंद कर दिया है और अब जो कुछ भी इस तथाकथित ईश्वरीय सत्ता के नाम पर है वह बुरा ही बुरा है। क्या अच्छे और आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न करने वाला ईश्वर कहीं विलुप्त हो गया है? आखिर समकालीन तबाहियों के बीच 'रहमानुर्रहीम' या 'करूणानिधान' ईश्वर के अस्तित्व के कोई चिन्ह क्यों नहीं दिखाई पड़ते?<blockquote><em>बाढ़ें तो आयी खैर भरपूर, काफी भूकंप, तूफान<br/>खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब<br/>खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार<br/>रह गयी सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी<br/>वर्दियां जैसे<br/>मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए<br/>एक जैसी हुंकार, हाहाकार!<br/>प्रार्थना गृह जरूर उठाये गये एक से एक आलीशान!<br/>मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से<br/>वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार<br/>उंगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!<br/>आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर<br/>तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?</em></blockquote>वीरेन डंगवाल की यह कविता ईश्वर के अस्तित्व और उसके कार्यों को लेकर प्रचलित मान्यताओं और परंपरागत विचारों से प्रारंभ होकर उन्हीं को प्रश्नांकित करती है। ईश्वर की अनुपस्थिति इस बात में है कि अब उसका इस विश्व पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। पर सवाल यह हुआ कि यदि इस पर उसका नियंत्रण नहीं, तो फिर नियंत्रण है किसका। क्या ईश्वर की कोई वास्तविक सत्ता है भी या यह महज एक परंपरागत असत्य है? क्या ईश्वर नयी क्रूर सत्ताओं सा डर कर भाग गया है? शायद उसका इन क्रूर सत्ताओं से कोई परोक्ष-अपरोक्ष समझौता हो गया हो? कुल मिलाकर कवि के लिए ईश्वर असहनीय हो गया है। यही कारण है कि कविता आक्रोश के ऐसे बिन्दु पर समाप्त होती है, जहां ईश्वर संबंधी सारी पारंपरिक अवधारणाएं नष्ट हो जाती हैं।<blockquote><em>अपना कारखाना बंद करके<br/>किस घोसले में जा छिपे हो भगवान?<br/>कौन सा है आखिर, वह सातवां आसमान?<br/>हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!</em></blockquote>हिन्दी जगत अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में निहायत ही परंपराग्रस्त रहा है। केवल कुछ लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के होने से यह सिद्ध नहीं होता कि सब कुछ क्रान्तिकारी है। परंपरा अभिविन्यस्त होने में सुरक्षा और मान्यता दोनों मिलती रही है। यही कारण है कि धर्म और ईश्वर की पुनरुत्थानी स्वीकृति यहां की संसदीय राजनीति में प्रतिफलित हुई। ऐसे में ईश्वर की सत्ता को परंपरा के प्रवाह की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके प्रति शंका, प्रश्न अथवा विद्रोह को परोक्षत: एक पूरी सत्ता के प्रति होने वाले विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। हिन्दी कविता में इधर उभरते ईश्वर को सिर्फ आज की तात्कालिक सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति से अलग एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने पर उसका स्पष्ट अलगाव दिखाई पड़ता है। यह बात भी सच है कि इस प्रतिरोध की अपनी एक परंपरा है, ठीक वैसे ही जैसे कूपमंडूकता और जाहिल परंपरावाद की परंपरा है ही। इसी विवेक से जुड़ी प्राश्निकता की यह ईश-निन्दक परंपरा रेखांकित करने योग्य है, भले ही यह धारा अल्पसंख्यक और गौण ही क्यों न हो।<br/><br/>ईश्वर और सत्ता का प्रश्न हिन्दी कविता में विशिष्ब्ट तौर पर सांप्रदायिकता के सापेक्ष ही सामने आया, मगर वास्तव में यह सिर्फ सांप्रदायिकता के उभार भर से जुड़ा एक प्रश्न नहीं। यह उस पूरे अतार्किक के विरुद्ध आवाज़ उठाने की बात है, जो तरह-तरह से भारतीय समाज में रचा-बसा है। संस्कृति की अनेकों दैनन्दिन गतिविधियों में यह अतार्किक विद्यमान रहता है और तमाम महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों को पृष्ठभूमि में ढकेलता है।<br/><br/>यदि ईश्वर का प्रत्यय हिन्दी के इन कवियों के लिए सिर्फ एक दार्शनिक प्रत्यय नहीं, तो वह राजनीतिज्ञों के लिए जिस प्रकार एक नीतिगत प्रश्न है वैसा भी नहीं। संसदीय राजनीति में धर्म और ईश्वर के कुटिल प्रयोग होते रहे हैं। सांप्रदायिक दक्षिणपंथी दल उसका सीधा इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितो के लिए करते रहे है। यहाँ तक कि टकराव और दंगों के रास्तों को भी नहीं छोड़ा गया। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण और गुजरात के दंगों के उदाहरण स्थूल और स्पष्टत: रेखांकित करने योग्य हैं, जिसका विरोध इस दौर की हिन्दी कविता ने जोरदार ढंग से किया। मगर धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने ईश्वर और धर्म की स्पष्ट आलोचना से बचने का ही प्रयास किया। यहां वोट प्राप्त करने के लिए यह एक मजबूरी थी। इस प्रकार के प्रयोग सभी राजनीतिक दलों ने किये हैं, बस थोड़ा अलग अलग ढंग से। इस प्रकार के 'हितसाधन' या 'स्वार्थसिद्धि' से समकालीन कवियों को कोई वास्ता नहीं रहा है, हालांकि ऐसे कवियों की कविताएं निहायत राजनीतिक रही हैं। यह तथ्य सीधी संसदीय राजनीति और नागरिक जीवन से जुड़ी राजनीति के फर्क को तो साफ रेखांकित करता ही है। कविता के सरोकार के व्यापकतर घेरे बनते हैं। यही कारण है कि कविता भक्तियुगीन सर्वशक्तिमान ईश्वर से मनुष्‍य में व्याप्त ईश्वर तक पहुंचकर रूक नहीं जाती। वह ईश्वर के एक छोटे से औजार के रूप में परिवर्तित हो जाने के तथ्य को उजागर करती है। इस अर्थ में समकालीन हिन्दी कविता हमारे हिन्दी समाज में छाये एक आध्यात्मिक रहस्यवाद का विखंडन करती है।<blockquote><em>लोग कहते हैं कि ईश्वर ईश्वर ईश्वर<br/>क्या वह बना सकता है एक ऐसा बड़ा ढोका<br/>जिसे वह दांत पीसकर स्वयं ही न उठा सके</em></blockquote></span><div class="blogger-post-footer"><!--
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    <updated>2008-10-08T07:46:35Z</updated>
    <published>2008-10-07T14:14:00Z</published>
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    <title>आइए सुनें नोम चॉम्‍स्‍की को, आमने-सामने</title>
    <content type="xhtml"><div xmlns="http://www.w3.org/1999/xhtml"><blockquote><em><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Noam_Chomsky" target="_blank"><strong>नोम चॉम्स्की</strong></a> का एक लेक्‍चर हमें यूट्यूब पर मिल गया, जो घंटे भर का है। वे दुनिया की पहली पांत के विचारकों में से हैं। धरती के अलग अलग महाद्वीपों में बसे हम लोगों को उन्‍हें सामने सुनने का मौका शायद ही मिले - लेकिन यूट्यूब ने उन्‍हें देखने सुनने का मौका आसान कर दिया है। यहां हम उस वीडियो को पेश कर रहे हैं। साथ ही सभ्‍यताओं का टकराव नाम से मशहूर हुए उनके लेक्‍चर का एक अंश भी हम यहां छाप रहे हैं।</em></blockquote><span class="fullpost"><br/><br/><strong>हंटिंगटन</strong> के सिद्धांत का प्रसंग याद करें जिसमें इसे पेश किया गया था। यह शीत युद्ध के बाद की बात है। पचास साल तक, संयुक्त राज्य तथा सोवियत संघ दोनों ने शीत युद्ध को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया था, उन सब अत्याचारों के लिए जो वे करना चाहते थे। तो अगर रूसी पूर्वी बर्लिन में टैंक भेजना चाहते थे तो उसका कारण शीत युद्ध था। और अगर अमरीका दक्षिण वियतनाम पर आक्रमण करना चाहता था तथा हिंद-चीन को तबाह करना चाहता था तो वो शीत युद्ध के कारण था। अगर आप इस दौर के इतिहास पर नज़र डालें तो बहाने का कारणों से कोई लेना-देना नहीं था। अत्याचारों के जो कारण थे उनका मूल तो घरेलू सत्ता स्वार्थों में था, पर शीत युद्ध ने एक बहाना दे दिया। आप जो भी अत्याचार करें, आप कह सकते थे कि यह दूसरे पक्ष से बचाव के लिए है।<br/><br/>सोवियत संघ के पतन के बाद वो बहाना तो चला गया। नीतियाँ वही हैं, सिर्फ़ हथकंडों में कुछ बदलाव के साथ, लेकिन अब आपको चाहिए एक नया बहाना। और असल में तो बहानों की खोज हो भी रही है काफ़ी लंबे समय से। सही में तो इसकी शुरुआत बीस साल पहले हुई थी। जब रीगन प्रशासन सत्ता में आया, तब ही यह बिल्कुल साफ़ था कि रूसियों के खतरे का बहाना ज़्यादा समय चलने वाला नहीं था। तो वे यह कहते हुए सत्ता में आए कि उनकी विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य होगा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के प्लेग के विरुद्ध संघर्ष करना<br/><br/>यह बीस साल पहले की बात है। इसमें नया कुछ नहीं है। हमें आतंकवादियों से अपना बचाव करना है। और उस प्लेग के विरूद्ध प्रतिक्रिया में उन्होंने दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का सबसे असाधारण जाल बुनना शुरू किया, जिसने मध्य अमरीका में तथा दक्षिणी अफ़्रीका में और बाकी सारी जगह भी भयंकर आतंकवादी गतिविधियाँ चलानी शुरू कर दीं। सच तो यह है कि यह जाल इतना अतिवादी था कि उसकी गतिविधियों की निंदा विश्व न्यायालय तथा सुरक्षा समिति के द्वारा भी की गई। 1989 के आते-आते आपको कुछ नये कारण चाहिए थे। यह बात कोई ढकी-छुपी नहीं थी। याद रखें, बुद्धिजीवियों का एक काम, एक गुरू-गंभीर काम, यह होता है कि वे लोगों को ना समझने दें कि क्या चल रहा है। और इस काम को पूरा करने के लिए आपको, उहाहरण के लिए, सरकारी दस्तावेजों को नज़रअंदाज़ करना होता है जो आपको बता सकते हैं कि असल में क्या-क्या चल रहा है। ऐसा ही मामला यह भी है।<br/><br/>आपको सिर्फ़ एक मिसाल देता हूँ। व्हाइट हाउस हर साल कौंग्रेस के सामने एक लिखित बयान पेश करता है यह बताने के लिए कि हमें विशाल सैनिक बजट की ज़रूरत क्यों है। हर साल यह एक ही चीज़ होती थी: रूसी आ रहे हैं। रूसी आ रहे हैं इसलिए हमें इस दैत्याकार सैनिक बजट की ज़रूरत है। वो सवाल जो हर उस व्यक्ति को अपने-आप से पूछना चाहिए था जिसकी अंतर्राष्ट्रीय मामलों में रुचि है, वो सवाल यह है कि ये लोग मार्च 1990 में क्या कहने वाले हैं? वह कौंग्रेस के सामने पहली प्रस्तुति थी तब जब रूसी निश्चित तौर पर नहीं आ रहे थे – वो मैदान में थे ही नहीं। तो यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथा अत्यंत रोचक दस्तावेज़ है। और जाहिर है इसका कहीं ज़िक्र नहीं होता, क्योंकि यह बहुत ही रोचक है। वो मार्च 1990 था और पहला बुश प्रशासन कौंग्रेस के सामने अपली प्रस्तुति दे रहा था।<br/><br/>बात इस बार भी हर साल वाली ही थी। हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। हमें हस्तक्षेप के लिए ढेर सारी सेना चाहिए, ज़्यादातर मध्य-पूर्व की तरफ डटी हुई। हमें उस चीज़ की रक्षा करनी है जिसे 'रक्षा औद्योगिक आधार' कहा जाता है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि जनता उच्च-तकनीकी उद्योग का खर्चा देती रहे, सैनिक प्रतिष्ठान के माध्यम से, रक्षा के बहाने पर।<br/><br/>तो बात तो एकदम पुरानी वाली ही थी। अंतर सिर्फ़ पेश किए गए कारणों में था। पता चला कि हमारे यह सब चाहने का कारण यह नहीं था कि रूसी आ रहे थे – मैं उद्धरित कर रहा हूं – बल्कि कारण था 'तीसरी दुनिया की बढ़ती हुई तकनीकी सक्षमता'। इसलिए हमें विशाल सैनिक बजट चाहिए। जो ढेर सारी सेना मध्य-पूर्व की तरफ डटी है उसमे वहीं डटे रहना है, औरयहाँ आता है एक रोचक वाक्यांश। यह है कि उन्हें अभी भी मध्य-पूर्व की तरफ डटे रहना है जहाँ 'ह