A doctor entered the hospital in hurry after being called in for an urgent surge...ry. He answered the call ASAP, changed his clothes & went directly to the surgery block. He found the boy's father pacing in the
hall waiting for the doctor. On seeing him, the dad yelled, "Why did you take all this time to come? Don't you know that my son's life is in danger? Don't you have any sense of
Posted by Archana (noreply@blogger.com) on February 27, 2012 10:40 AM· permalink
मैराथन में दौडने के बाद दिया बच्चे को जन्म Khaskhabar.com शिकागो। एक महिला धावक ने मैराथन में दौडने के बाद बच्चे को जन्म दिया। दरअसल धाविका अबेर मिलेर गर्भवती थी और 42 किमी की शिकागो मैराथन की फिनिश लाइन पार करने के कुछ ही मिनट बाद उसे प्रसव पीडा शुरू हुई और कुछ घंटे बाद उसने एक बच्ची को जन्म दिया। जब धाविका अबेर मैराथन में दौड रही थी तब उसके पेट में 39 सप्ताह का गर्भ था। अबेर को गर्भवती होने का पता रेस के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद चला था। अबेर ने यह मैराथन>छह घंटे 25 मिनट पूरी ... पहले मैराथन में दौड़ी, फिर बच्ची जन्मीनवभारत टाइम्स मैराथन के बाद महिला ने बच्ची को जन्म दियाstar.newsbullet
शांतिशहर में नहीं पैदा हुई थी।गाँव में पैदा हुई थी। जन्मलेने के पाँच साल बाद तक भीउसने शहर नहीं देखा था। उसकागाँव ही उसकी सम्पूर्ण दुनियाथा। जो चीज़ गाँव में थी वहीउसकी दुनिया में थी और जो चीज़गाँव में नहीं थी वो दुनियामें भी नहीं थी। गाँव में किसीके भी आँगन में गुलाब का फूलनहीं होता था इसलिए शांति केलिए दुनिया में गुलाब का फूलनहीं होता था। इसी तरह आईसक्रीमऔर टीवी जैसी चीज़े जो गाँवके दृश्य में कहीं उपस्थितनहीं थे, वो भी उसकीदुनिया का हिस्सा नहीं थे।इसलिए पूरे पाँच साल तक गुलाब,आईसक्रीम और टीवी सेख़ाली दुनिया मे रहने के बादशांति जब शहर गई तो उसकी दुनियाबदल गई।
शहरमें गुलाब, आईसक्रीम,और टीवी के अलावा भीबहुत कुछ ऐसा था जो शांति नेकभी नहीं देखा था। शहर मेंनज़र के ठहरने का कोई ठिकानाही नहीं था। इतनी चीज़े होतीदेखने को कि नज़र लगातार भटकतीरहती। वो जितनी देर जागतीरहती, हर नई चीज़को फटी-फटी आँखोंसे ताकती रहती। सारी नई चीज़ेउसकी आँखों के रास्ते अन्दरचली जातीं। और जब शांति सोतीतो अन्दर आईं नई चीज़े उसकीदुनिया में रात भर खलबली मचातीरहतीं। कुछ तोड़-फोड़भी करतीं पर बहुत ज़्यादा नहींक्योंकि शांति की दुनिया मेंबहुत सारी ख़ाली जगह थी। उसकीदुनिया में बहुत सारी ख़ालीजगह थी क्येंकि गाँव में बहुतसारी ख़ाली जगह थी।
गाँवमें जब शांति घर से बाहर निकलतीऔर किसी भी एक दिशा में चलतीतो बहुत देर तक उस दिशा मेंचलते रहने पर भी उस दिशा काअंत नहीं होता था। गाँव केबाहर में बहुत सारा बाहर था।और इसी तरह गाँव के अन्दर मेंभी बहुत सारा अन्दर था पर बाहरसे कम। जब वो अन्दर आती तो अन्दरभी बाहर की तरह बहुत सारी ख़ालीजगह थी। बहुत सारे लोगों कोअन्दर आ जाने का बाद भी घर भरतानहीं था। मुर्गी, कुत्ते,चूहे, बिल्लीऔर गाय के अन्दर आ जाने पर भीनहीं। घर का मतलब था मिट्टीकी दीवारों के बीच की और खपरैलके छप्पर के नीचे की ख़ालीजगह। जिसमें खाट, बिछौना,बरतन, घड़ा,अनाज और तेल की ढिबरीजैसी चीज़ें रखी जा सकें।
गाँवमें चीज़ें कम थीं। और उन परभरोसा किया जा सकता था। पेड़अपनी जगह रहता था, तालाबअपनी जगह, घूरा अपनीजगह और सबके घर अपनी जगह पर।सूप खूंटी पर ही होता, रस्सीकुँए की घिर्री पर ही रहती,और उपले दीवार पर ही।वो चलती और बदलती नहीं थी औरऔर अगर वो चलती और बदलती भी तो भी तो इतना धीरे जैसे कि मौसमबदलता है। शांति ने पाया किशहर में ऐसा नहीं था। शहर मेंकुछ तय नहीं था कि कौन सी चीज़कब कहाँ चली जाएगी और कब क्याशकल ले लेगी। कल तक सड़क परजहाँ पेड़ था, कलवहाँ खम्बा हो सकता है। जहाँघर था, वहाँ मैदानहो सकता है। और जहाँ मैदान था,वहाँ ऊँची दीवार होसकती है। किसी के घर के अन्दरजहाँ भगवान थे, वहाँटीवी हो सकता है। जहाँ टीवीथा, वहाँ बिस्तर होसकता है और जहाँ बिस्तर था,वहाँ कल को बाथरूम होसकता है।
एकबार तो ऐसा भी हुआ कि शांति केघर के सामने जो घर था वो घर तोरहा पर जिन लोगों का घर था वोलोग ही नहीं रहे। शांति के लिएवह बहुत ही सन्न कर देने वालीघटना रही। वो बार-बारउस घर के दरवाजे पर पड़े तालेको देखती और फिर भी मान नहींपाती कि वो लोग सचमुच अपना घरछोड़कर चले गए। कुछ दिनों बादजब उसने इस दरवाजे को खुलादेखा तो वो बेहिचक उस घर मेंअन्दर तक दौड़ गई। पर अन्दरतो कोई और ही लोग थे। और अन्दरजो घर उसे दिखा वो घर भी कोईऔर ही घर था। दीवारें और छतवही थे पर सामान अलग था। वोलोग और सामान मिलकर उसके अन्दरफिर से एक खलबली पैदा कर रहेथे। शांति के भीतर की दुनियामें उस घर का जो जुगराफ़ियाथा, वो बाहर केजुगराफ़िये से टकरा कर बहुतदिनों तक अजीब उलझन पैदा करतारहा।
औरबाद में जब ख़ुद शांति के पापाको अपना घर बदलना पड़ा तब तोहालत और भी विकट हो गई। यह बातउसे बड़ी कठिनाई से समझ आई किघर भी किराए पर लिया और दियाजाता है। घर बदलने के बाद भीलम्बे समय तक वो पहले वाले एककमरे के घर को ही घर कहती औरवहीं चलने की ज़िद करती। शांतिके मम्मी-पापा समझदारथे- उनको ऐसी कोईतक़लीफ़ नहीं थी। वो उसे कईतरह से लुभाते और समझाते किदेखो ये घर अधिक बड़ा है,रौशनीदार है।
धीरे-धीरेशांति भी समझदार हो गई। पुरानेदोस्तों को आसानी से भूलनासीख गई। और जल्दी से नए दोस्तबनाना भी सीख गई। और जो चीज़पहले उसके भीतर बहुत उलझन पैदाकरती थी, उसी बातमें उसे दिलचस्पी पैदा हो गई।वो जब भी किसी के घर जाती तोउस घर के रहने वालों से मिलनेजाती और उस घर से भी मिलने जाती।एक जैसे मकान होने पर भी कोईदो घर एक जैसे नहीं होते। हरघर अलग होता। वैसे ही जैसे हरआदमी के नाक-कान-मुँहहोता है फिर भी हर आदमी अलगहोता है।
शांतिको किसी के घर के भीतर जाना उसव्यक्ति के भीतर प्रवेश करनेजैसा लगता। शांति को लगता जैसेघर के अन्दर कई लोग रहते हैंवैसे ही व्यक्ति के अन्दर भीकई लोग रहते हैं। शांति ने यहभी पाया कि हर बार हर घर कुछबदल जाता है वैसे ही जैसे हरबार हर आदमी भी थोड़ा सा बदलजाता है। शांति के लिए किसीके घर जाना लगभग उससे हाथ मिलानेऔर दोस्ती करने जैसा था। रहस्यमयलोग अपने घर के दरवाजे हमेशाबंद रखते। शांति जिनसे दोस्तीकरना चाहती, उन्हेघर बुलाती और उन्हे अपना कमराज़रूर दिखाती। सिर्फ़ उन्हीलोगों के लिए उसके दरवाजे बंदरहते जिन्हे वो पसन्द नहींकरती।
शांतिकी यह दिलचस्पी शादी के पहलेतक क़ायम रही। पर अब वो दिननहीं रहे। अब लोग एक-दूसरेके घर नहीं आते-जाते।जाते भी हैं तो शालीनता सेलिविंग रूम में गुफ़्तगू करतेहैं और लौट आते हैँ। लिविंगरूम की बनावट से आदमी की बनावटभर का ही पता चलता है और कुछनहीं। अधिकतर लोग बाहर कहींमिलने लगे हैं। और वो जगहेंऐसी हैं जिनमें उनकी कोई निजतानहीं झलकती। शांति के लिए यहएक नई उलझन बन गई है। शांति कोलगने लगा है कि वो किसी को नहींपहचानती। कौन कैसा है, कुछभी नहीं जानती।
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(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on October 11, 2011 06:10 AM· permalink
वक्त ही ऐसा कि हवा भटकती है सांय सांय सिर फोड़ती खिड़की दरवाजों पर, इस कोलहाल के वीराने मुझे अपनी सांस से भी लगता है डर मैं उसे आशा की तरह साधे रहता हूँ अपनी मुस्कान में.
Posted by मोहन राणा - Mohan Rana (noreply@blogger.com) on October 10, 2011 10:21 PM· permalink
हि न्दी में ‘होना’ एक बहुत आम क्रिया है। कुछ घटित होने के अर्थ में होना क्रिया बोली और लिखत-पढ़त की भाषा में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली क्रिया है। ‘होना’ क्रिया का जन्म अधिकांश विद्वान संस्कृत के ‘भवन्’ से मानते हैं। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक भवन का प्राकृत रूप होण था जिसका हिन्दी रूप होना है। समझा जा सकता है कि भवन > हअण > होण > होन > होना, कुछ इस क्रम में ‘होना’ का विकास समझ आता है। इस वाक्य को अगर यूँ लिखा जाए- “कुछ इस क्रम में होना का विकास हुआ होगा” गौर करें कि ये ‘हुआ’ और ‘होगा’ भी ‘होना’ के ही कालसूचक क्रियारूप हैं अर्थात ये भी ‘भवन’ से सम्बद्ध हैं। होना की मूल धातु ‘हो’ है। कुछ का कुछ होना यानी काम बिगड़ना, किसी का होना यानी अपनी आस्था किसी को सौंपना, होता-सोता यानी सगा-सम्बन्धी। होकर रहना यानी अनिष्ट घटना आदि।
हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। इसमें ‘भू’ से ही होना का विकास अब सर्वमान्य है। उदयनारायण तिवारी और धीरेन्द्र वर्मा हूँ रूप को ‘अस्मि’ से यूँ सिद्ध करते हैं- संस्कृत, अस्मि > प्राकृत, अम्हिं > हिन्दी, हूँ। डॉ भोलानाथ तिवारी ‘हूँ’ का विकास संस्कृत की ‘भू’ धातु के वर्तमानकालिक रूप से ही मानते हैं मसलन संस्कृत, पाली में भवामी > प्राकृत में होमी > अपभ्रंश में होवि > हौं > हिन्दी, हूँ। डॉ तिवारी कहते हैं कि ये सभी रूप ‘हो’ धातु के हैं जो कि ‘भू’ से ही विकसित हो सकते हैं न कि ‘अस्’ से। इन सहायक क्रियाओँ की विशेषता ये है कि इनमें पुरुष और वचन के अनुरूप बदलाव होता है। लिंग से वाक्य रचना में कोई अन्तर नहीं पड़ता। जैसे उत्तम पुरुष में- मैं जा रहा हूँ / हम जा रहे हैं। मध्यम पुरुष में तुम जा रहे हो / वे जा रहे हैं। अन्य पुरुष में वह जा रहा है/ वे जा रहे हैं। ‘भव’ से ही पूरवी बोलियों का ‘भया / भवा’ शब्द बना है। हिन्दी में इसका रूप ‘हुआ’ बनता है। ‘भयो’ का मालवी रूपान्तर काँईं ‘हुओ’ / काँईं’ होयो’ है। अन्यमनस्कता को सिद्ध करने के लिए हिन्दी में ‘हूँ-हाँ करना’ मुहावरा बहुत कुछ कह देता है।
संस्कृत के ‘भवनम्’ का एक अर्थ होता है आवास, निवास, घर, प्रकोष्ठ, स्थान, आधार, इमारत या प्रकृति। यहाँ प्रकृति शब्द पर गौर करें। इसके अलावा जितने भी पर्याय हैं वे सब आश्रय शब्द के दायरे में आते हैं। ये निर्मित हैं। भवन को बनाया जाता है अर्थात उसमें होने की क्रिया निहित है। कुछ आश्रय प्राकृतिक भी होते हैं जैसे वृक्ष-कोटर, पर्वत-कंदरा, गुफा आदि। ये सब मनुष्य के प्राकृतिक आवास होते हैं। प्रकृति अपने आप में जीव-जगत का नैसर्गिक आश्रय है, इसलिए प्रकृति का एक अर्थ ‘भवन’ महत्वपूर्ण है। भवनम् बना है संस्कृत धातु ‘भू’ से जिसमें मूलतः घटित होने का भाव है। घटित होने में उगने, पैदा होने, जन्म लेने, उदित होने, आकार लेने, उगने, निकलने, जीवित रहने, विद्यमान रहने का भाव है। व्यापक और दार्शनिक अर्थों में ये सब क्रियाएँ और भावार्थ सृष्टि की ओर इंगित करते हैं।
भू से संस्कृत में भूः बनता है जिसमें विश्व, सृष्टि, पृथ्वी जैसे भाव हैं। पृथ्वी के सभी भाव बड़े प्रतीकात्मक में हैं। इसी कड़ी में ‘भू’ से बना भूमि जो विश्व के सभी जीवधारियों का आश्रय है। ‘भूमि’ जैसी रचना में होने का भाव स्वतः निहित है। ‘भूमि’ यानी जो हो चुकी है अर्थात जो विद्यमान है। ‘भूमिका’ शब्द का अर्थ भी ज़मीन, आधार, पृथ्वी, स्थान, प्रदेश आदि है। अभिनय के संदर्भ में भूमिका का अर्थ है नाटक का कोई चरित्र। यहाँ आधार शब्द प्रमुख है। नाटकीय चरित्र ही नाटक का आधार होते हैं। ‘भौमिक’ का अर्थ है पार्थिव अर्थात भूमि सम्बन्धी। ‘भू’ के साथ जब ‘क्त’ प्रत्यय लगता है तो बनता है ‘भूत’ अर्थात जो हो चुका है, बीत चुका है, व्यतीत हो चुका है। अतीत का विषय। जो घट चुका है। भूतकाल का हिस्सा है इसलिए जो सामने है, वर्तमान है, जो सामने है, वह भी भूत है और जो घट चुका है, जो अतीत है वह भी भूत है। भूत यानी तत्व यानी पंचमहाभूत-अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश। ज़ाहिर है समूची सृष्टि के भाव वाला ‘भू’ यहाँ स्पष्ट है। व्यतीत के अर्थ में ‘भूत’ का एक अर्थ और है, मगर यही अर्थ सर्वाधिक लोकप्रिय और व्यापक है। भूत यानी प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, बुरी आत्मा आदि। मनुष्य का जीवन जब सम्पन्न हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। यह माना जाता है कि प्रत्येक शरीर में आत्मा का वास होता है। सद्ग्रहस्थ या सन्यासी को मोक्ष मिलता है मगर विषय वासना से युक्त जीवधारी की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता और मतात्मा तभी भूत कहलाती है। भूत का होना यहाँ सिद्ध है। जो हो चुका है, बीत चुका है वही भूत है। न भूतो, न भविष्यति उक्ति से सब अवगत हैं।
भवनम् से बने ‘होना’ में अस्तित्व या विद्यमानता का भाव प्रमुख है। ‘भव्य’ शब्द भी इसी मूल का है जिसमें उत्तम, शानदार, योग्य जैसे भाव है। मुख्यतः भव्य में भी विद्यमानता या होने वाला जैसे ही भाव है। अर्थविस्तार होते हुए इसमें मनोहर, प्रिय, अत्युत्तम, आलीशान जैसे भाव भी समा गए। होना मे मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है। होनी, अनहोनी, होनहार जैसे शब्द जो इसी कड़ी से जुड़े हैं, मुहावरे की अर्थवत्ता रखते हैं। ‘होनी’ का अर्थ हो जो होने वाला है अर्थात भविष्य के गर्भ में छुपी बात। अनहोनी यानी अनिष्ट, दुर्भाग्य आदि। ‘होनहार’ का अर्थ सकारात्मक है। भविष्य में होने वाली अच्छी बात। होनहार संज्ञा के रूप में अच्छे गुणों वाला सुपुत्र भी होता है। अच्छे लक्षणों वाली संतति या बच्चा होनहार कहलाता है। होनहार बिरवान के, होत चीकने पात कहावत किसने नहीं सुनी होगी। ‘भू’ धातु से हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में कई शब्द बने हैं।
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Posted by अजित वडनेरकर (wadnerkar.ajit@gmail.com) on October 10, 2011 07:36 PM· permalink
शकील अहमद
मुंबई। होठों से छूकर भारतीय उपमहाद्वीप के लोग उन्हें आधुनिक युग की ग़ज़ल सबसे बेहतरीन गायक और एक तरह ग़ज़ल को दुबारा ज़िंदगी देनेवाला मानते हैं। जगजीत सिंह को ‘ग़ज़ल सम्राट’ कहा गया, ‘ग़ज़ल का बादशाह’ कहा गया। और जगजीत भी ग़ज़लकारों के पैरोकार की तरह ...
मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई पर आतंकवादियों ने कई बार योजनाबद्ध रूप से हमले किए हैं। पेश है उन हमलों का लेखा-जोखा :
* मुंबई पर आतंकवादी हमलों की शुरूआत 12 मार्च 1993 से हुई, जब मुंबई ने पहली बार शृंखलाबद्ध बम धमाकों का खौफनाक मंजर देखा और ...
मुंबई। रामलीला मैदान में योगगुरु बाबा रामदेव द्वारा कालेधन के खिलाफ शुरू हुआ आमरण अनशन जब केंद्र सरकार ने जोर-जबरदस्ती खत्म करवाया, तो बाबा रामदेव और कांग्रेस सरकार के बीच कड़वाहट कुछ इस कद्र बड़ी की दोनों खुलेआम एक-दूसरे की निंदा करने लगे और आरोप-प्रत्यारोप का एक लंबा दौर शुरू ...
पिछले कई सालों से विकास की राह पर सरपट दौड़ रहे भारत के शेयर बाजारों में कई दिनों से चली आ रही सुस्ती ने इस सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन भयानक रूप धारण कर लिया। सेंसेक्स ने 650 अंकों से ज्यादा की डुबकी लगा दी, जबकि निफ्टी ...
राहुल गांधी की चाची मेनका गांधी ने उन्हें लम्बी उम्र का आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बनें, वैसे भी इस देश में प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं है।
मेनका गांधी ने राहुल गांधी की काबिलीयत पर सवालिया निशान खड़ा ...
कहां वो हुस्न-ओ-इश्क की शिकायतें,
कहां वो मुहब्बत-ओ-रुसवाई की बातें;
कहां वो दिल की रंगीनियां, अठखेलियां,
कहां वो बगीचों की हंसीन मुलाकातें!
यूं तो सुमधुर संगीत का दौर कभी खत्म नहीं होता और न ही शायरी या कविता कभी फिल्मों से दूर हो सकती है, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि ...
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी टीम चेन्नई को लगातार दूसरी बार चैपियन बनाकर दिखा दिया है कि क्रिकेट की दुनिया में उनका कोई सानी नहीं है। आईपीएल में धोनी की टीम चेन्नई तीन बार फाइनल में पहुंची है जिसमें से दो बार उसने खिताब पर ...
पूर्व विश्व सुंदरी और बॉलीवुड की खूबसूरत अदाकारा ऐश्वर्य राय बच्चन पिछले दस बरसों से फ्रांस में आयोजित होनेवाले कान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अपनी खूबसूरती के जलवे लगातार बिखेरते आ रही हैं। इस साल भी उनके अंदाज ने सभी का मन मोह लिया और फोटोग्राफर्स उनकी एक झलक पाने ...
अलकायदा के सरगना और दुनिया के सबसे बड़े घोषित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की खोज करते-करते अमेरिका ने दस बरस में घाटियों, दर्रों, गुफाओं, पहाड़ियों और न जाने कहां-कहां की खाक छानी, लेकिन वह मिला तो उसी के साथी पाकिस्तान की मांद में, उसके अनुसार आतंकवाद की लड़ाई में उसका ...
ठहरा ठहरा सा रगों का पानी है, शौक की कश्ती मगर दीवानी है। हुस्न की लह्रें हुईं हरजाई बेश, अब मुहब्बत का सफ़र बेमानी है। देखा जब से महजबीं का पाक रुख, जाने क्यूं इस दिल में बेईमानी है। सब्र की बुनियाद जर्जर हो चुकी, बस हवस की राह में आसानी है। वो समझती है वफ़ा का अर्थ ,ये बेवफ़ाई उसकी इक नादानी है। चेहरे से वो सख्त लगती है मगर, उसकी सीरत की गली गुड़धानी है। गो बड़े शहरों में पैसा है बहुत,
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 08:17 AM· permalink
दीपावली पर मित्रों को उपहार देने की सोच रहे हैं तो इन उपहारों पर भी नजर डाल लें, इन्हें आधुनिक तौर-तरीका भी कह सकते है और उपहार देने का ‘गीक’ अंदाज भी.
Posted by तरकश ब्यूरो (pbengani@gmail.com) on October 10, 2011 08:08 AM· permalink
रंग-ए-जिंदगानी. रंग-ए-जिंदगानी यूँ अनमना क्यूँ है ? आखिर तू मेरी महफ़िल से फ़ना क्यूँ है? माना विपथगमन की होगी कोई वाइस मत पूछ दामन अश्कों से सना क्यूँ है? गुरूर के पेड़ों पर कभी फल नहीं लगते. वो शख्स आखिर इस कदर तना क्यूँ है? दुआ-सलाम ही तो की है,रुसवा नहीं की तेरे शहर में खैरियत पूछना मना क्यूँ है? उजाला तो हो,बर्क मेरे नशेमन पे गिरे सब परेशां है,अँधेरा इतना घना क्यूँ है? दर्द अगर
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:51 AM· permalink
उसने मेरी वफा का ऐसा सिला दिया चाहत को मेरी रूसवा सरे आम कर दिया दामन के मेरे फूल कुछ ऐसे चुरा कर आंखों में मेरी अश्कों के कांटों को भर दिया चाहता मैं फिर भी था अपना बना लूं लेकिन बदनामियों के डर से मेरा रूख पलट गया पीता न था मैं आकर साकी तेरी गली में देखा तेरा फरेब तो फिर मैं बदल गया हर बार यही सोच कर पीता हूं छोड दूं हर बार मैं पीता रहा और शराबी बन गया -- मुरसलीन (साकी) जिला
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:43 AM· permalink
एक है गुल्ली एक है टुल्लीदोनों ऊधम करती हैंकितना भी डाँटो समझाओनहीं किसी से डरतीं हैं टुल्ली है चुलबुल थोड़ी सीगुल्ली सीधी सादी हैअक्सर चाय और बिस्कुटदेती उनको दादी है आपस में दोनों लड़ती हैंबाल खींचतीं आपस मेंउनमें समझौता करवानानहीं किसी के था बस में| मम्मी ने रसगुल्ले लाकररखे एक कटोरी मेंभरकर लाई चाकलेट वहएक छोटी सी बोरी में| मम्मी बोली अब तुम दोनोंकभी न लड़ना आपस मेंवरना चाकलेट रसगुल्लेकर
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:16 AM· permalink
बच्चों के साथ रोज़ जाने कितने ही अनुभव होते रहते हैं। कक्षा २/३ के छात्र-छात्रायें। ७-८ साल के बच्चे। रोज़ ही किसी न किसी वजह से एक बार खुल कर हँस लेने का मौका मिल ही जाता है। यहाँ के नियम के अनुसार, सारे दिन ही शिक्षिका को कक्षा के बच्चों के साथ रहना होता है। चाहे कोई भी विषय हो, उन्हें एक ही शिक्षिका को पढ़ाना होता है (कुछ एक को छोड़ कर)। इस तरह शिक्षक/ शिक्षिका और बच्चों के बीच का संपर्क बहुत मज़बूत होता है। एक दिन मेरे स्कूल न आने से बच्चे उदास हो जाते हैं और अगले दिन बच्चों से सबसे पहले यही सुनने को मिलता है, " आई मिस्ड यू येस्टर्डे"। उपस्थिति मार्क करते समय बच्चे मुझे गुड्मार्निं कहते हैं। कार्पेट पर बैठ कर बच्चे अपनी पिछले दिन की कई घटनायें बताते हैं। सारा दिन उनके साथ किस तरह गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता।
कई छोटी-छोटी बातें होती ही रहती हैं। कल रीसेस के समय दो बच्चियाँ मेरे पास आईं, " आपके लिये हमने एक केक बनाया है...चॉकोलेट आइसिंग वाला"। मैंने कहा अच्छा? वो कैसे? तो पता चला कि रीसेस में उन्होंने खेलते हुये मिट्टी और पत्थर से मेरे लिये एक केक बनाया था। तो वो चाहतीं थी कि मैं उस केक को काटूँ। तो भई हम ने भी उस केक को काटा...कहा, कितना सुंदर है...आदि :) बच्चियों की चेहरे की खुशी देखते बनती थी।
सराहना बच्चों के लिये बहुत बड़ा प्रोत्साहन का काम करती है। प्रोत्साहन भी दो तरह के होते हैं- एक प्रोत्साहन वह कि बच्चे किसी चीज़ की आशा में अपना काम करें। यह अच्छी बात है मगर दूसरा प्रोत्साहन वह जो कि जो अन्दरुनी परिवर्तन लाये। बच्चा खुद अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उस काम को करे, किसी प्राइज़ की आशा में नहीं। सराहना करते वक़्त सिर्फ़ इतना कह देना कि ’वाह बहुत अच्छा जवाब दिया’ और एक "गुड" लिख देना काफ़ी नहीं होता। साथ में ये भी बताया जाये कि क्या अच्छा था जवाब में। इसके अलावा भी जवाब में और क्या होना चाहिये था कि जवाब और अच्छा होता। कक्षा में गलत जवाब के लिये कभी भी सज़ा नहीं दी जानी चाहिये। सज़ा भला क्यों? कि उसे जवाब नहीं आया? या उसका ध्यान नहीं था पढ़ाई में। अगर बच्चे को नहीं आता कोई जवाब तो मौका दिया जाये कि वो अपने साथी के साथ मिल कर जवाब तलाशे और फिर खुद इन्जडिपेंडेट्ली जवाब दे। इस तरह बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। सज़ा ( वह भी ऐसी जिससे बच्चा कुछ सीखे) सिर्फ़ व्यवहार या अन्य वाजिब वजह से दी जानी चाहिये। जैसे मेरी कक्षा में बच्चे कोई काम करना भूल जायें (जैसे रीडिंग लॉग या स्कूल डायरी न साइन करवाई हो अनुभावकों से) तो ज़रूर सज़ा मिलती है उन्हें कि वो अपना काम याद रखें अगले दिन के लिये। उन्हें अपने मूल्यवान रीसेस के आधे घंटे में से २ मिनट देने होते हैं यानि सभी मित्रगण खेलने गये पर वो दो मिनट बाद जायेंगे। और जो बच्चे यह सब साइन करवा के लायें, उन्हें एक स्टिकर मिलेगा और ३० स्टिकर इकट्ठा कर लें वे तो एक प्राइज़। हाँ होमवर्क न करे कोई, तो रीसेस में मेरे साथ बैठ कर करना होगा होमवर्क...! प्राय: सभी बच्चे अपना काम करते हैं इस तरह।
कल एक बच्ची का जन्मदिन था मेरी कक्षा में। मेरे पास एक बक्सा है, छोटा सा कार्ड्बोर्ड का। बच्चे जानते हैं कि टीचर का यह ट्रेशर बॉक्स किसी के जन्मदिन पर खुलता है या टीचर बहुत खुश हो किसी के व्यवहार से तो ही। तो उस वक़्त उस बच्चे को उस ट्रेशर बॉक्स से आँख बंद कर के कोई भी चीज़ चुनने का मौका मिलता है। वह एक छोटी सी किता ब भी हो सकती है, कोई पेन या कोई खिलौना भी। बच्चे नहीं जानते कि उस बक्से के अंदर क्या है। देखा जाये तो यह सब बाह्य प्रोत्साहन हैं (extrinsic motivation) लेकिन कई बातों के लिये बहुत कारगर। बच्चे द्वारा किये गए किसी भी अच्छे काम की सराहना और यह बताना कि वो काम क्यों अच्छा था, इसके क्या अच्छे फल हुये अन्दरुनी प्रोत्साहन का उदाहरण है। उसी को नियम बना लेना बच्चों की आदत में ढल जाता है फिर। पूरे जीवन के लिये एक अच्छी शिक्षा।
फिर अगले सप्ताह की शुरुआत होगी। बच्चों की खिलखिलाहट सुनने को मिलेगी और उनके सप्ताहांत के अनुभव सुनने को। मैं भी उन्हें बताने को उत्सुक हूँ कि इस सप्ताहांत मेरी पिट्स्बर्ग की यात्रा, रंगीन पेड़ों को देखते हुये कैसी रही...। फिर फ़ॉल कलर्स पर कुछ चित्र बनाने का आर्ट प्रोजेक्ट उसी से संबंधित...
Posted by मानसी (noreply@blogger.com) on October 10, 2011 03:21 AM· permalink
इतवार का दिन नौकरी पेशा वालों के लिये आराम का दिन माना जाता है। कुछ इसे बचे काम निपटाने का दिन भी मानते हैं। लेकिन यह वैचारिक मतभेद हर इतवार को खतम हो जाता है क्योंकि बचे काम निपटाने वाले भी अपने काम निपटाने का काम अक्सर अगले इतवार तक के लिये स्थगित कर देते हैं। नतीजतन इतवार का दिन आराम का दिन ही होकर रह जाता है।
किसी नियम सिद्धि के लिये अपवाद की आवश्यकता का भी नियम है। इसी जालिम नियम का पालन करते हुये आज सुबह-सुबह बच्चे को लेकर ’राष्ट्रीय विज्ञान मेधा खोज परीक्षा’ के अखाड़े में जाना पड़ा। अखाड़ा से अगर आप थोड़ा चकित होना चाहें तो हो लें। कुछ देर की बात है। आगे आप शायद सहमत हो जायें।
घर से वाया गुमटी होते हुये परीक्षा केन्द्र वाले स्कूल जाना हुआ। सड़क फ़ुल वात्सल्य से हमारी गाड़ी को उछालती, संभालती रही। पहली बार मुझे इस बात का एहसास हुआ कि सड़क की चौड़ाई आमतौर पर गाड़ियों की चौड़ाई से ज्यादा क्यों रखी जाती है। ऐसा इसलिये होता है ताकि गाड़ी जब किसी गढ्ढे में पड़कर उछले तो वापस आकर सड़क पर ही गिर सके। गुमटी शहर का कभी सबसे अच्छा बाजार माना जाता था। आज यह शहर के अन्य सभी बाजारों की लुटा-पिटा सा दीखता है। कहीं सड़क खुदी है,कहीं सड़क के नीचे का नाला परदा प्रथा का विरोध करते हुये अपने मुखड़े से सड़क का घूंघट हटाकर निर्द्वंद बहता है। बेहया सा। गढ्ढों में पड़कर उछलने से दिमाग में फ़ंसा निदा फ़ाजली जी शेर झटके से याद आ गया: यूं जिंदगी से टूटता रहा, जुड़ता रहा मैं,
जैसे कोई मां बच्चा खिलाये उछाल के।
सड़क को देखकर यह भी लगा कि आने वाले कुछ दिनों में कहीं यह सरस्वती नदी की तरह लुप्त न हो जाये। पूरी सड़क पर गाड़ियां तितर-बितर देश के घपलो घोटालों सी पसरी थी। जानवर दिखे नहीं सुबह। शायद वे भी इतवार मना रहे हों।
स्कूल पहुंचकर गेट के खुलने का इंतजार किया। बच्चे का रोल नंबर और परीक्षा केन्द्र रात में ही घंटों फ़ोनियाने के बाद रात बारह बजने से कुछ मिनट पहले ही बता दिया गया। हमने प्रतिभा खोजने वालों की प्रतिभा और इंतजाम को नमन किया कि उन्होंने परीक्षा शुरु होने के कुछ घंटे पहले ही बच्चों का परीक्षा केन्द्र तय कर दिया।
केंद्र का फ़ाटक जब खुला तो बच्चे और अभिभावक नोटिस बोर्ड की तरफ़ लपके ताकि कमरा नंबर पता कर सकें। लोग ज्यादा थे और नोटिस बोर्ड एक ही इसलिये वहां मांग और आपूर्ति का नियम लागू हो गया। नोटिस बोर्ड के सामने वह चीज जमा हो गयी जिसे अपने यहां भीड़ के नाम से जाना जाता था। उसके बाद वह हुआ जिसे भीड़ का सहज व्यवहार माना जाता है और जिसे आम जनता धक्कममुक्का के नाम से जानती है। पहले भीड़ आपस में धक्कममुक्का करती रही। फ़िर उसने इसमें अपने आसपास के परिवेश को भी शामिल कर लिया। अब परिवेश के नाम पर सबसे नजदीक नोटिस बोर्ड ही था सो वह ही इस प्रक्रिया का शिकार बना।
धक्कममुक्का का शिकार बने नोटिस बोर्ड पर अचानक गति विज्ञान के नियम ने हमला बोल दिया और वह परिणामी बल की दिशा में विस्थापित होने लगा। जैसे ही एक तरफ़ थोड़ा सा विस्थापन हुआ वैसे ही न्यूटन जी का तीसरा नियम भी ताल ठोंक कर मैदान में आ गया। बोर्ड दूसरी तरफ़ विस्थापित होने लगा। इसके बाद तीसरी तरफ़ और अंतत: सब तरफ़ विस्थापित होने लगा। आखिर में नोटिस बोर्ड की हालत निर्दलीय विधायक सरीखी हो गयी। वह उधर ही विस्थापित हो जाता जिधर बल-बहुमत होता।
लेकिन बात केवल बोर्ड के विस्थापन तक ही सीमित न रही। इस बीच बल प्रयोग की अधिकता के चलते नोटिस बोर्ड का रूप परिवर्तन भी होने लगा। बोर्ड और स्टैंड में पहले मतभेद हुआ। फ़िर मनभेद हुआ। स्टैंड एक तरफ़ जाना चाहता तो बोर्ड दूसरी तरफ़। मतभेद/मनभेद के बाद दोनों के बीच दरार पड़ गयी। फ़िर वह दरार बढ़ भी गयी। अंतत: हुआ यह कि नोटिस बोर्ड और उसके स्टैंड का गठबंधन टूट गया। दोनों पाकिस्तान और बांगलादेश की तरह अलग-अलग हो गये। जनता स्टैंड को नीचे छोड़कर बोर्ड की तरफ़ लपक ली। इससे उपयोगिता के सिद्धांत की भी खड़े-खड़े पुष्टि हो गयी। अब मामला नोटिस बोर्ड तक ही केन्द्रित होकर रह गया।
हमने बहुत मेहनत से भीड़ के अन्दर घुसकर नोटिस बोर्ड के नजदीक पहुंचने की बहुत कोशिश की। लेकिन बहुत देर तक असफ़ल रहे। रह-रहकर अपना मोबाइल भी देखते रहे। यह विचारते हुये कि कहीं कोई इसे पार न कर दे। लेकिन मोबाइल मेरे पास आखिर तक बना रहा। इससे पुष्टि हुई कि मोबाइल चोर या तो आराम तलब होते हैं या फ़िर वहां जाना पसंद नहीं करते जहां प्रतिभा की खोज होती हो!
अंतत: हम हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती के नियम का पालन करते हुये बोर्ड के एकदम पास पहुंचे। लोग उसके ऊपर थे। दायें थे। बायें थे। इधर थे। उधर थे। मतलब सब तरफ़ थे। उसकी हालत गुंडों के बीच फ़ंसी रजिया सी हो गयी थी। हल्का हो जाने के कारण उसे लपक कोई उठा लेता जैसे चील चूहा पंजे में ले जाती है। लेकिन उसी समय कोई दूसरा उसे बाज की तरह झपटकर वापस वहीं ले आता। उसका परिणामी विस्थापन शून्य ही रहा।
जब अपने बच्चे का कमरा नंबर पता करके हम निकलने लगे तो जनता ने निकलने नहीं दिया। हम पीछे निकलने की कोशिश करते-जनता धकिया के आगे कर देती। हमारी हालत ब्लागर की सी हो गयी जो आता तो अपने से है लेकिन अगर वह बताकर वापस जाना चाहे तो लोग उसे जाने नहीं देते। फ़िर हमने नीचे झुककर निकलने की सोची तो जनता सहयोग देकर और नीचे करने लगी। एक बारगी लगा हम फ़र्श के गले लग जायेंगे। लेकिन हम झटके से एक तरफ़ निकले लेकिन वहां खड़ी मोटर साइकिल ने रास्ता रोक लिया। शायद वह भी किसी का कमरा नम्बर देखने में लगी थी।
जब कमरे पहुंचे तो देखा कि वह अन्ना मय था। हर कमरे में ’अन्ना नहीं ये आंधी है’ वाले पोस्टर लगे थे। उन आंधी वाले कमरों में पंखे मंथर गति से चल रहे थे। एक हाल नुमा कमरे में 20 वाट का सीएफ़एल जल रहा था। रोशनी इतनी पर्याप्त थी कि अगर किसी का मन करे तो रोशनी के सहारे यह विश्वास के साथ कह सकता था कि उस कमरे में एक बल्ब जल रहा था। न सिर्फ़ इतना बल्कि कोशिश करके यह भी बता सकता था कि बल्ब कमरे में किधर लगा हुआ था। कमरे की मेज-कुर्सी ऐसी थीं जैसे किसी अनगढ़ स्केचिये बच्चे ने जो मेज-कुर्सी बनाई उसई को लकड़ी पहना के वहां धर दिया गया।
जो कमरा बताया गया बच्चे की सीट उसमें थी नहीं। ’ जिन खोजा-तिन पाइयां’ के जीपीआरएस की पूंछ पकड़कर जब हम मेज तक पहुंचे तो वह कमरा बताये कमरे से तीन कमरे दूरी पर था।
इस बीच हमने जल्दी-जल्दी आसपास का माहौल देखा। बहुत दिन बाद तीन मंजिले से किसी की छत पर पड़ी खटिया देखी। मोहल्ला देखा। खटिया देखते ही ’सरकाई लेव खटिया जाड़ा लगे’ गाना याद आया लेकिन फ़िर हमने गाने से कहा यहां उचित नहीं है तुमसे और ज्यादा हेल-मेल। बाद में मिलेंगे।
और ज्यादा कुछ देखते-करते तब तक स्कूल वालों ने कुछ अनाउंस करना शुरू कर दिया। शोर में कुछ सुनाई नहीं दिया लेकिन जिस तरह लोग बाहर जाने लगे उससे लगा कि उन सबको बाहर कर दिया गया है जो बच्चों की मेधा परीक्षा में विघ्न पहुंचा सकते हैं। महाजनो एन गत: स: पन्था का अनुसरण करते हुये हम भी बाहर आ गये।
हम इतने में ही पसीने-पसीने हो लिये। जो बच्चे वहां वहां अपनी मेधा की जांच करवाने आये होंगे उनका क्या हाल हुआ होगा। कल्पना की जा सकती है।
यह तो एक दिन की बात है। ऐसे न जाने कितने वाकये होते हैं जब बच्चों की मेधा की परीक्षायें होती रहती हैं। इनमें सफ़ल होना भले मेधा की बात होती हो लेकिन इसमें सम्म्लित होने में मेधा का कम पहलवानी का रोल ज्यादा होता है।
इसके बाद भी जब अगर नारायणमूर्ति जी कहें कि मेधा के स्तर में गिरावट आयी है तो किसी को भी बुरा लग सकता है। शायद ऐसा हुआ हो कुछ मेधा पहलवानी में खर्च हो गयी हो।
लौटते समय देखा कि गुमटी चौराहे पर किसी भी तरह की मेधा परीक्षा के झांसे से दूर दिहाड़ी मजूर अपने-अपने औजार लिये अपने आज के खरीदार के इंतजार में खड़े थे।
धारावाहिक की पिछली कड़ियाँ - एक , दो, आओ कहें...दिल की बात कैस जौनपुरी (3) आई लव यू बाबा...! बाबा...! बहुत दिनों से आपको, दिल में जो है वो बताने का मन था. वो बात... जो मेरे दिल में एक पत्थर की तरह चुभके बैठी थी. आज कह देता हूँ बस.... बचपन से मैं खुद को दूसरों से कम...या बदनसीब समझता था. वो सब जो बाकी लोगों को मिल रहा है...वो मुझे क्यों नहीं मिल रहा था...? वो खिलौने...वो घड़ी...वो कपड़े...अन्दर
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 12:25 PM· permalink
समीक्षक- डॉ.वेद प्रकाश अमिताभ डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़-202001 समीक्ष्य कृति- पत्थरों के शहर में , गजलकार- नीरज शास्त्री प्रकाशक- जवाहर पुस्तकालय मथुरा पृष्ठ-अस्सी , मूल्य- एक सौ पचास रुपये मात्र ''अपनी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए'' दुष्यन्त कुमार की यह अवधारणा नीरज शास्त्री के गजल संग्रह 'पत्थरों के शहर में' की रचनाओं में ध्वनित है। रचनाकार का स्पष्ट उद्घोष है-'देश की हालत बदलना
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 12:13 PM· permalink
डाक-टिकट भला किसे नहीं अच्छे लगते. याद कीजिये बचपन के वो दिन, जब अनायास ही लिफाफों से टिकट निकालकर सुरक्षित रख लेते थे. न जाने कितने देशों की रंग-बिरंगी डाक टिकटें, अभी भी कहीं-न-कहीं सुरक्षित हैं. आज जब करोड़ों में डाक-टिकटों की नीलामी होती है तो दुर्लभ डाक टिकटों की ऐतिहासिकता और मोल पता चलता है. आज तो यह सिर्फ शौक ही नहीं, बल्कि व्यवसाय का रूप भी धारण कर चुका है. डाक- टिकटों का व्यवस्थित
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 07:04 AM· permalink
“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.
इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।
हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।
कांशीराम
कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।
कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।
कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।
कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।
इस गरीब देश को एक सरकार चाहिए। सरकार कैसी भी हो, लेकिन चले, काम करे और जरुरत के समय आम आदमी की मदद करे। इस देश का हर मतदाता एक स्थायी, टिकाउू और मजबूत सरकार चाहता है, मजबूर सरकार नहीं। आखिर कब तक देश सरकार विहीन रहेगा। अगर सरकार नहीं होगी तो देश कैसे चलेगा। देश को चलाना है तो सरकार चाहिए। चुनाव-दर चुनाव आये और गये मगर देश को सरकार नहीं मिली। कभी मिली तो चली नहीं। चली तो किसी ने टांग खींच कर
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:22 AM· permalink
चलो रावण जलाये मैदान में जमघट छाया है आज फिर दशहरा आया है अधर्म को खत्म कर धर्म का परचम फहराने को नवदुर्गा का आशीष लेकर श्रीराम जी का रथ आया है अभी राम का बाण चलेगा ये पापी रावण धूं-धूं कर जलेगा | यो तो हर बार दशहरा आता है हर बार रावण को जलाया भी जाता है फिर भी वह यही खड़ा नजर आता है लगता है शायद केवल उसका पुतला जलता है अक्स मगर यही हमारे समाज में पल रहा है फिर कभी भ्रष्टाचारी बनकर
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:14 AM· permalink
आतंकवाद ब्रिटिश शासन के अंत के बाद स्वाधीन भारत में आतंकवाद गहरे सदमे का यह प्रहार नहीं झेल सकेगा अपना समाज राजीव कांड में इसका हाथ कश्मीर चाहता पृथक राष्ट्र नागा और बोडो का विवाद स्वाधीन भारत में आतंकवाद नहीं रहेगी राजनीति में चहल-पहल जब हो जायेगा इसका हल करते है नेता आज-कल नहीं निकलेगा इसका कोई हल कश्मीर से कन्याकुमारी गुजरात से लेकर अरुणाचल चारों तरफ बस एक ही बात
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:09 AM· permalink
लौट के बुद्धू घर को आये घुटने टेके सिर को झुकाये, गुलामों जैसा खेल दिखाये।अंग्रेजों से मात खा गये, सभी मैचों को हार के आये। इंसान समझकर भेजे थे, इंग्लैण्ड पहुँच गदहा कहलाये। दहाड़़ते थे शेरों जैसे , पूँछ दबा कर भारत आये। करोड़़ों रुपए कमाने वाले, सौ रुपये का खेल दिखाये। कितनी पार्टी और उत्सव में, कन्याओं संग कमर हिलाये। उसी का यह परिणाम है भाई, नौटंकी सा खेल दिखाये। बैटिंग बालिंग बच्चों
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:07 AM· permalink
1- जीवन चक्र काट दिए जाते पेड़ जरूरत पड़ने पर वर्षों पश्चात् जमीन में बहुत गहरे तक दबी जडें कभी कभी उचित हवा पानी ऊर्जा पाकर फूट पड़ती हैं लेकर कोमल कोंपलें । वो कहते हैं मैं वो कटा पेड़ हूँ जिसकी जड़ों को भी जलाया गया वक्त की जरूरत के नाम पर धू- धू करके और उसी क्षण नया एक वृक्ष तभी लगाया था नयी हरियाली के नाम पर । क्यों जड़ें तुम्हारी याद करती हैं क्यों जडें उम्मीद
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:04 AM· permalink
एक रावण राज कब से कब तक पुतले जलें। दो हंसा रावण अपनो की वृद्धि से इसबार भी। तीन विजयपर्व कब किस-किसका रावण हंसे। चार वन में राम घर में कोहराम कैसा उत्सव। --- सम्पर्कः-हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र. 9410985048
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:01 AM· permalink
कविताहे पर्वतडॉ. सदा बिहारी साहुप्रबंधक, सिडबी, लखनऊ तुम कैलाश हो, तुम हो नियमगिरिऔर तुम गोवर्धनधरती पर विराजमान, तुम ही तुमतुम वर्णित हो, युगों-युगों से लेखकों के लेख मेंकालिदास के काव्य मेंया कभी बच्चों के चित्रांकन में तुम पूज्य हो, तुम्हें नमनहे कैलाश, हे गोवर्धनतुम श्रेष्ठ हो, तुम सुदृढ़और तुम महानतुम हो संजीवनी, जीवन के संगहो तुम प्रकृति का बड़ा अवदानपर आज तुम लुट चुके होखो चुके हो अपना
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 08:26 AM· permalink
हरी मिर्च वाली धनिये की चटनी बचपन से खाते आ रहे हैं, पहले जब मिक्सी घर में नहीं हुआ करती थी तब सिलबट्टे पर मम्मी या पापा चटनी पीसकर बनाते थे, अभी भी अच्छे से याद है कि थोड़ा थोड़ा पानी पीसने के दौरान डालते थे और चटनी बिल्कुल बारीक पिसती थी, अच्छी तरह से याद है कि उस समय धनिया पत्ती की एक एक पत्ती तोड़कर पीसने के लिये रखते थे, एक भी धनिये का डंठल नहीं गलती से भी नहीं छूटता था। मसाला धनिया, मिर्च, ट्माटर को ओखली में डालकर मूसल से कूटते थे और फ़िर सिलबट्टे पर चटनी को पिसा जाता था।
बाद में मिक्सी घर पर आ गई तो उसी में चटनी बनने लगी और धनिया पत्ती पहले की तरह ही तोड़ी जाती, बिना डंठल के, पर एक बार चटनी हम बना रहे थे तो धनिया पत्ती तोड़ने में बहुत आलस आता था, कि एक एक पत्ती तोड़ते रहो और फ़िर चटनी बनाओ, हमने धनिया की गड्डी धोई और चाकू से पीछे की जड़ें काटकर नजर बचाकर धनिये की चटनी बना डाली, घर में बहुत शोर हुआ कि लड़का बहुत आलसी है और आज चटनी में धनिये के डंठल भी डाल दिये, अब हम तो समय बचाने की कोशिश में नया प्रयोग कर दिये थे, पर फ़िर उसी में इतना स्वाद आने लगा कि हमारी विधि से ही चटनी घर में बनाई जाने लगी।
चटनी भी मौसम के अनुसार स्वाद की बनाई जाती थी, साधारण धनिये की, पुदीना पत्ती के साथ, कैरी के साथ । मसाले में नमक, लाल मिर्च डालते थे फ़िर बाद में हींग और जीरा का प्रयोग भी होने लगा। प्याज और लहसुन के साथ भी चटनी का स्वाद परखा गया।
हरी मिर्च तीखे के अनुसार कम या ज्यादा डालते हैं, अभी थोड़े दिनों पहले बहुत तीखी चटनी खाने की इच्छा हुई तो खूब सारी मिर्च डाल दी तो उस चटनी में से एक चम्मच चटनी भी नहीं खा पाये। अब सोचा कि कम मिर्च की चटनी बनायें तो पता चला कि मिर्च ही इतनी तीखी है कि ५-६ मिर्च में तो बहुत तीखा हो जाता है। बचपन की याद है ७-८ मिर्च में भी चटनी इतनी तीखी नहीं होती थी तो लाल मिर्च डालते थे।
सिलबट्टे पर चटनी पीसने से बैठकर मेहनत करनी होती थी, परंतु मिक्सी में वह सब मेहनत खत्म हो गई, आँखों में जो मिर्च की चरपराहट होती होगी उसका अहसास ही आँखों में पानी ला देता है। अब तो चटनी बनाते समय आँखों में चरपराहट का पता नहीं चलता है। मिक्सी में तो चटनी बनाते समय बीच में दो बार चम्मच घुमाई और चटनी २-३ मिनिट में बन जाती है, हो सकता है कि चटनी उतनी ही बारीक पिसती हो जितनी कि सिलबट्टे पर, अब याद नहीं, और अब सिलबट्टा है नहीं कि पीसकर देख लें। पर हाँ गजब की तरक्की की है, पहले सिलबट्टे पर पीसने में चटनी का बनने वाला समय कम से कम ३० मिनिट का होता था और अब ज्यादा से ज्यादा ५ मिनिट का होता है।
पर यह तो है कि सिलबट्टे की चटनी का स्वाद अब मिक्सी वाली चटनी में नहीं आता ।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 07, 2011 03:26 PM· permalink
धारावाहिक की पिछली कड़ी - कड़ी 1
आओ कहें...दिल की बात
कैस जौनपुरी
प्रिय शीतल...!
प्रिय शीतल को,
ढेर सारा प्यार...!
शीतल...हमारी शादी को आज तकरीबन चार महीने और सत्तरह दिन हो गए हैं. हर औरत की ख्वाहिश होती है कि वो शादी के बाद अपने पति के साथ रहे. लेकिन कुछ कारणों की वजह से हम-तुम साथ नहीं रह पा रहे हैं वो कारण भी तुम्हें मालूम हैं... जैसे हम सीधे बम्बई नहीं आ सकते क्योंकि
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 05:36 AM· permalink
दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन 'दश' व 'हरा' से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे की
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 02:16 AM· permalink
हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करने के पश्चात् यह बात स्पष्ट हो जाता है कि आज जो बहुप्रचलित तथा लोकप्रिय विधा 'उपन्यास' है वह आधुनिक काल में ही आरम्भ हुई. हिंदी उपन्यास का प्रारंभिक युग सामान्य जन जीवन से दूर रहा. इस तथ्य को कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता. जासूसी, तिलस्मी, मनोरंजन प्रधान उपन्यास प्रराम्ब में ज़रूर लिखे गए परन्तु साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं है. इसलिए आचार्य
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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 02:16 AM· permalink
करोड़पति के सेट पर, हो गया आज बवाल । कंप्यूटर स्क्रीन पर, आया गज़ब सवाल ॥ आया गज़ब सवाल जीतकर,फास्टेस्ट फिंगर फस्ट । हॉट सीट पर आ गए, नेता जी एक भ्रस्ट ॥ पहला प्रश्न जिताएगा, रुपये पाँच हजार । देश में भ्रस्टाचार का , कौन है जिम्मेदार ? ॥ सही जवाब बतलाइए , ऑप्शन ये रहे चार । ए) जनता बी) मंत्री सी) नेता डी) सरकार ॥ हम ही नेता, हम ही मंत्री, हमरी ही सरकार । जो जनता को लौक किया, चुनाव जाएँगे हार ॥ मंत्री जी पड़ गए सोच में, मदद करे अब कौन। बोले - विपक्ष के अध्यक्ष को लगाया जाये फोन ॥ तीस सेकंड में हो गई, नोट वोट की डील । कुइट किया नेता जी बोले एक्चुली व्हाट आई फील ॥ बिना जवाब के अरबों बनते अपनी वोट - सीट पर। क्या रखा है "राघव " छोड़ो ऐसी हॉट-सीट पर ॥ झूठे वादे, झूठी क़समें, झूठे दिखा कर सपने । वहाँ जनता के वोटिंग पेड्स पर सारे ऑप्शन अपने ॥ कभी कभी बस भाषण बाज़ी, करके तेवर तीखे । हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥ हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥ हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥
Posted by भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav (raghav.id@gmail.com) on October 06, 2011 08:48 PM· permalink
कुण्डलियां --( 1 )-- जैसा चाहो और से, दो औरों को यार। आवक जावक के जुडे़, आपस मे सब तार।। आपस मे सब तार, गणित इतना ही होता।। मिलती वैसी फसल, बीज जो जैसे बोता।। ठकुरेला’ कवि कहें, नियम इस जग का ऐसा।। पाओगे हर बार, यार बॉंटोगे जैसा।।
--( 2 )
धन की महिमा अमित है, सभी समेटें अंक। पाकर बौरायें सभी, राजा हो या रंक।। राजा हो या रंक, सभी इस धन पर मरते।। धन की खातिर लोग, न जाने क्या क्या करते।। ठकुरेला’ कवि कहें, कामना यह हर जन की।। जीवन भर बरसात, रहे उसके घर धन की।।
Posted by डा० व्योम (jagdishvyom@gmail.com) on October 06, 2011 03:11 PM· permalink
यह चिट्ठी, स्टीव जॉबस् को श्रद्धांजलि है। इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें।
स्टीव का जन्म २४ फरवरी १९५५ में हुआ था। उन्हें जन्म देने वाली, बिन ब्याही मां थी। इसलिये वे स्टीव को गोद में देना चाहती थीं। वे स्वयं स्नातक कक्षा की छात्रा थीं। इसी कारण, वे चाहती थीं कि स्टीव को कोई स्नातक दम्पत्ति ही गोद ले।
सबसे पहले एक वकील दम्पत्ति उन्हें गोद लेने के लिये आये। बाद में उस दम्पत्ति को लगा कि किसी लड़की गोद लेना ठीक रहेगा। इसलिये उन्होंने स्टीव को गोद नहीं लिया।
स्टीव को, दूसरे दम्पत्ति ने गोद लिया। लेकिन उनकी होने वाली मां ने कालेज की शिक्षा पूरी नहीं की थी और पिता तो हाई स्कूल भी पास नहीं थे। इसलिये बिन ब्याही मां ने, कई महीनो तक गोदनामे पर दस्तखत नहीं किया। लेकिन जब गोद लेने वाले दम्पत्ति ने वायदा किया कि वे स्टीव को स्नातक पढ़ाई के लिये भेजेंगे, तभी वे दस्तखत करने को राजी हुईं।
स्टीव अक्सर स्कूल में दिया गया काम नहीं करते थे। उन्हें इसमें बोरियत लगती थी। वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उनके गोद लेने वाले माता पिता मध्यम परिवार से थे। उन्हें लगा कि वे उनका पैसा बेकार कर रहे हैं।
स्टीव को हिन्दी टूटी फूटी आती थी। वे सत्य की खोज में, भारत में आये। इसके लिये उन्होंने साधूओं और महात्माओं के चक्कर भी लगाये। लेकिन उनका यह अनुभव अच्छा नहीं रहा। लेकिन इसी दौरान, वे अपने आप, सत्य के करीब पहुंचे,
'I started to realise that maybe Thomas Edison did a lot more to improve the World than Karl Marx and Kairolie Baba put together'
मुझे लगा कि थॉमस ऍडिसन इस दुनिया को बेहतर बनाने में ज्यादा मदद की बजाय कार्ल मार्क्स या फिर किसी साधू महात्मा ने।
बाद में उन्होंने ऍप्पल कम्पनी बनायी और कम्प्यूटर की दुनिया में क्रान्ति ला दी। कम्पयूटर उपभोक्ता बाज़ार की पकड़ रखने वाला उनसे बेहतर व्यक्ति नहीं हुआ। इसी कारण मैक कंपनी के उत्पाद—चाहे वे कम्प्यूटर हों, या लैपटॉप, या आईपॉड, या फिर आईपैड—बेहतरीन उत्पाद हैं और इनका नशा भी अलग है। मैंने कुछ समय पहले जेफरीस् यंग और विलियेम साइमन के द्वारा लिखी स्टीव जॉब की जीवनी 'आईकॉन: स्टीव जॉबस् द ग्रेटेस्ट सेकेन्ड एक्ट इन द हिस्टरी ऑफ बिसिनेस' पढ़ी। इसके पहले शब्द को दो तरह से पढ़ा जा सकता है:
पहला, icon यानि की वह शख्स जो आदर का प्रतीक हो;
दूसरा I con यानि कि मैं छल करता हूं।
यह पुस्तक उनके उस चरित्र के बारे में भी चर्चा करती है जिसके बारे में हम नहीं सुनना चाहते हैं। यह उनकी कमियों, उनके मानवीय गुणों को भी बताती है। । यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व का संतुलित चित्रण करती है और पढ़ने योग्य है। लेकिन यह पुस्तक किसी भी ऍप्पल स्टोर में नहीं बिक सकती है।
स्टीव के जीवन में तीन महत्वपूर्ण घटनायें हुई हैं,
पहली, वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उन्होंने विश्विद्यालय छोड़ दिया (ड्रॉप आउट)।
दूसरा, वे ऍप्पेल कंप्यूटर से निकाल दिये गये। लेकिन बाद में, उन्हें वापस लिया गया।
तीसरा, उन्हे पाचक-ग्रंथि में कैंसर हो गया और पता चला कि वे छः महीने तक ही जीवित रह सकेंगे। लेकिन बाद मेंउन्होंने ऑपरेशन कराया।
इन सब के बावजूद भी, वे स्वयं इतना उठ सके और ऍप्पल कंप्यूटर कंपनी इतना ऊपर ले जा सके। इसका कारण उनके शब्दों में,
'The only thing that kept me going was that I loved what I did. You've got to find what your love ... the only way to do great work is to love what you do. If you haven't found it yet, keep looking. Don't settle. As with all matters of the heart, you'll know when you find it. And, like any great relationship, it just gets better and better as the years roll on. ... Don't let the noise of others' opinions drown out your own inner voice. And most important, have the courage to follow your heart and intuition. They somehow already know what you truly want to become. Everything else is secondary.' मैं जो भी करता हूं उससे प्यार करता हूं। इसी ने मुझे आगे चलते रहने की प्रेणना दी। तुम्हे वह तलाशना है जिससे तुम प्यार करते हो ... जीवन में किसी बड़े सफल काम को करने के लिऐ, तुम जो भी करो, उससे प्यार करो। यदि तुम्हें अपना प्यार नहीं मिला है तो उसे ढूंढो - रुको नहीं। तुम्हें मालुम चल जायगा जब वह तुम्हें मिलेगा। यह दिल के किसी भी अन्य विषय की तरह है। समय बीतते, यह किसी भी अन्य रिश्ते की तरह बेहतर होता जायेगा। ... दूसरों के विचारों से, अपने अन्दर की आवाज को मत बाधित होने दो। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने दिल और अन्तर्ज्ञान का अनुकरण करो। वे भली भांति जानते हैं कि तुम क्या बनना चाहते हो। बाकी सब गौण है।
इसी साल उन्होंने बिमारी के कारण ऍप्पल कंप्यूटर से इस्तीफ दे दिया। कल, पांच अक्टूबर २०११ को, कैंसर के कारण, उनकी मृत्यु हो गयी। मेरा उनको सलाम।
कुछ समय पहले मैंने, 'अपने प्यार को ढ़ूंढिये' नामक चिट्ठी में, उनके बारे में लिखा है। वहां पर उनके द्वारा स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिये गये भाषण की चर्चा की है तथा इस तरह की अन्य चिट्ठियों की भी चर्चा है। स्टीव के द्वारा दिया गया यह एक बेहतरीन भाषण है। यदि आपने नहीं सुना है तब इसे अवश्य सुनिये।
इस मूल भाषण को अंग्रेजी में यहां और इसका कुछ संक्षिप्त रूप हिन्दी में यहां पढ़ सकते हैं
मैक कम्प्यूटर १९८४ बजार में आया था। इसका सुपर बोल में विज्ञापन भी अनूठा था। इसकी चर्चा मैंने 'क्यों साल १९८४, उन्नीस सौ चौरासी की तरह नहीं था' नामक चिट्ठी में की थी। शायद इसे आप पढ़ना चाहें।
हम जैसे लाखों लोगों के प्रेरणा स्रोत - कंप्यूटर गुरु और दूरदृष्टि युक्त सफल व्यवसायी, स्टीव जॉब्स नहीं रहे.
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें. प्रस्तुत है, उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप उनके एक अत्यंत विख्यात भाषण का हिंदी रूपांतर. यह रचनाकार में पूर्व प्रकाशित है.
ये हैं कंप्यूटर गुरू स्टीव जॉब्स. एप्पल कंप्यूटर और पिक्सार एनिमेशन स्टूडियोज़ के प्रमुख. मौक़ा है स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का. दिन रविवार. तारीख़ 12 जून 2005.
मुख्य वक्ता स्टीव जॉब्स ने छात्रों को जो कुछ बताया वह जीवन को सच्ची जीवटता से जीने की सही मिसाल है. इससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं – बहुत कुछ.
इस विद्यापीठ के, जिसे विश्व के सर्वोत्तम विद्यापीठों में से एक माना जाता है, दीक्षान्त समारोह में शामिल होकर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ. मैंने किसी महाविद्यालय से उपाधि नहीं ली है. सच्चाई यह है कि मैं यहां पर आज मौजूद हूं यह महाविद्यालय और उपाधि से मेरी सबसे ज्यादा निकटता है. आज मैं आपको अपनी जिन्दगी से जुड़ी तीन कहानियाँ सुनाने जा रहा हूं. बस वही. कोई बड़ी बात नहीं, सिर्फ तीन कहानियां.
पहली कहानी है बिन्दुओं को मिलाने के बारे में.
मैंने रीड कालेज पहले ६ महीने में ही छोड़ दिया था, लेकिन मैं वहां पर अगले १८ महीने और रहा. उसके बाद मैंने कालेज सही अर्थों में छोड़ दिया. मैंने कालेज क्यों छोड़ा ?
दरअसल इसकी नींव तो मेरे जन्म लेने से पहले से रखी जा चुकी थी . मेरी जन्मदात्री जवान कुंवारी मां कालेज स्नातक छात्रा थी. उसने मुझे किसी को गोद देने का निश्चय किया था. उसकी मजबूत सोच थी कि मुझे किसी कालेज स्नातक माता पिता को ही गोद लेना चाहिए. इस लिये एक वकील और उसकी पत्नी मुझे गोद लेने के लिये तैयार थे, लेकिन जब मेरा जन्म हुआ तब उन्होंने आखिरी क्षणों में लड़की गोद लेना निश्चय किया. अब मेरे पालक जो प्रतीक्षा सूची में थे को आधी रात में फोन कर के पूछा गया "अप्रत्याशित रूप से हमारे पास एक बालक शिशु है, क्या आप उसे गोद लेना चाहेंगे ?" उनका जवाब हां में ही था. मेरी जन्मदात्री मां को बाद में जब पता चला कि मेरी मां और पिता ने किसी कालेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त नहीं की है, गोद लेने के काग़ज़ातों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. मेरे माता पिता के मुझे कालेज भेजने के आश्वासन देने बाद मेरी जन्मदात्री मां किसी तरह से हस्ताक्षर करने को तैयार हुई.
और, इस तरह १७ साल बाद मैं कालेज गया. लेकिन मैंने जो कालेज चुना था वह स्टैनफोर्ड के जैसा ही महंगा कालेज था. मेरे माता पिता की सारी कमाई मेरी फीस में चली जाती थी. ६ महीनों के बाद मैंने महसूस किया कि इस कालेज शिक्षा का कोई लाभ मेरे लिए नहीं है. मुझे नहीं मालूम था कि मैं जिन्दगी में क्या करना चाहता हूँ, और मेरे कालेज की शिक्षा इसमें क्या मदद करने वाली है. और मैं उस कालेज शिक्षा पर अपने माता पिता की सारी जिंदगी की कमाई खर्च कर रहा था. तब मैंने कालेज छोड़ने का निश्चय किया और विश्वास किया कि इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा, यह एक डरावना निर्णय था, लेकिन जब आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह निर्णय मेरे द्वारा लिये गये सर्वोत्तम निर्णयों में से एक है. जिस क्षण मैंने कालेज छोड़ा, मैंने अरुचिकर कक्षाओं में जाना बन्द कर दिया और रुचिकर कक्षाओं में जाना कम कर दिया.
यह सब अच्छा (रोमांटिक) नहीं था. मेरे पास सोने के लिये कमरा नहीं था, मैं दोस्तों के कमरे में जमीन पर सोता था. मैं कोक की बोतलों को जमा कर वापस करता था जिससे मुझे हर बोतल पर ५ सेंट मिलते थे, इन पैसों से मैं खाना खरीदता था. हर रविवार मैं ७ मील चलकर हरे कृष्णा मन्दिर अच्छा खाना खाने जाता था. मुझे यह सब अच्छा लगता था. मेरी जिज्ञासा और अंतरात्मा को लेकर मेरा संघर्ष बाद में अमूल्य साबित हुआ. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ
रीड कालेज उस समय कैलीग्राफी (लिपि/अक्षर बनाने की कला) का सबसे अच्छा शिक्षण देता था. पूरे कैम्पस में हर पोस्टर , दराजों पर लिखे गये नाम बहुत ही सुंदरता से लिखे गये थे. मैं कालेज छोड़ चुका था और मुझे सामान्य कक्षाएँ नहीं करनी होती थी, मैंने कैलीग्राफी की कक्षाएँ करने का निश्चय किया. मैंने शेरीफ और सैन्स शेरीफ टाईप फ़ेस सीखा, विभिन्न तरह के अक्षरों के बीच की कम ज्यादा जगह छोड़ने के बारे में सीखा, मैंने सीखा कि क्या है जो किसी टाइपोग्राफी को अच्छा बनाती है. यह एक सुंदर , ऐतिहासिक, कला है, जो विज्ञान नहीं सिखा सकता, और मुझे मनोरंजक लगा.
इसमें से कुछ भी मेरी जीवन में काम आएगा ऐसी उम्मीद नहीं थी. लेकिन १० साल बाद जब हम पहला मैकिंतोश बना रहे थे, यह सब मुझे याद आया. और यह सब हमने मैक में डाला. वह पहला कम्पयूटर था जिसके अक्षर सुंदर थे. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैक के पास विभिन्न चौड़ाई और दो अक्षरों के बीच भिन्न-भिन्न खाली जगह वाले फ़ॉन्ट नहीं होते . और जिस तरह विन्डोज ने मैक की नकल की, यह संभावना है कि किसी भी निजी कम्प्यूटर में ये नहीं होता. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैंने कैलीग्राफी की कक्षा नहीं की होती और निजी कम्प्यूटर में सुन्दर टाइपोग्राफी नहीं होती. हां मेरे कालेज में रहते हुए बिन्दुओं को सामने की ओर जोड़ना असंभव था, लेकिन दस साल बाद ये आसान है.
फिर से आप बिन्दुओं को आगे की तरफ नहीं जोड़ सकते, आप उन्हें पीछे की ओर देखते हुए ही जोड़ सकते हैं. आपको भरोसा करना होगा कि ये सभी बिंदु भविष्य में जुड़ जाएंगे. आपको अपनी शक्ति, भाग्य, जीवन, कर्म वगैरह पर भरोसा करना होगा. मेरी इस शैली ने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया है और इसी ने मेरा जीवन कुछ हट कर बनाया है.
मेरी दूसरी कहानी है प्यार और नुकसान के बारे में
मैं भाग्यशाली था. मैंने जिन्दगी की शुरूआत में जान लिया था कि मुझे किससे प्यार है. वाझ और मैंने अपने मातापिता के गैरेज में "एप्प्ल" की शुरूआत की, जब मैं २० साल का था. हमने कड़ी मेहनत की और १० साल में एप्प्ल गैरेज में काम करने वाले हम २ लोगों से बढकर २ बिलियन डॉलर और ४००० कर्मचारियों वाली कंपनी बन चुका था. एक साल पहले हम अपनी सबसे खूबसूरत कृति मैकिंतोश को बाजार में उतार चुके थे, और मैं ३० साल का हो चुका था. और तब मुझे एप्प्ल से निकाल दिया गया ! आप उस कम्पनी से कैसे निकाले जा सकते हैं जिसकी स्थापना आपने की थी ? अच्छा, जैसे-जैसे एप्पल बढने लगा था, हम लोगों ने कुछ ऐसे लोगों को नौकरी दी थी जिनके बारे में मैं सोचता था कि वे मेरे साथ कंपनी चलाने में प्रतिभाशाली साबित होंगे. और पहला साल अच्छा गया. लेकिन उसके बाद हमारी भविष्य की सोचों में अंतर आने लगा और हम अलग होने लगे. जब ऐसा हुआ तब कंपनी के निदेशक मंडल ने उनका साथ दिया. तो ३० साल की उमर में मैं बाहर था. मेरी संपूर्ण वयस्क जिन्दगी का केन्द्र जा चुका था और ये दिल तोड़ देने वाला था.
अगले कुछ महीनों तक मुझे नहीं मालूम था कि क्या करना चाहिए. मुझे महसूस होता था कि मैंने पिछली पीढ़ी के व्यावसायिकों को नीचा दिखाया है. मुझे दिया गया 'बेटन' मैंने नीचे गिरा दिया है. मैं डेविड पैकार्ड और बॉब नोयके से मिला और उनसे इस बुरी स्थिती के लिये क्षमा माँगी. मैं एक असफलता का प्रतीक था और मैंने 'सिलिकॉन वैली' से भाग जाने की भी सोच लिया था. लेकिन मेरे अंदर कुछ आलोकित हो रहा था, मैंने जो किया उससे मुझे प्यार था. एप्प्ल में जो कुछ हो रहा था उसमें कुछ भी नहीं बदला था. मुझे नकार दिया गया था लेकिन मैं उससे प्यार करता था. और मैंने सब कुछ फिर से शुरू करने की ठानी.
मैंने उस समय महसूस नहीं किया लेकिन एप्पल से मुझे निकाल दिया जाना मेरी जिन्दगी में घटित सबसे अच्छी घटना है, एक सफल इंसान होने का बोझ, अब एक नयी शुरूवात करने वाले का हल्का मन बन चुका था. इस घटना ने मुझे अपने जिन्दगी के सबसे क्रियाशील हिस्से में आने का अवसर दिया.
अगले ५ सालों में मैंने एक कम्पनी NeXT शुरू की, एक और कम्पनी 'पिक्सार' भी शुरू की. उसी समय एक प्यारी स्त्री के प्यार के गिरफ़्त में भी आ गया जो बाद में मेरी पत्नी बनी. पिक्सार ने विश्व की सबसे पहली कम्प्यूटर द्वारा एनीमेशन फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनायी. आज पिक्सार विश्व का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है. परिस्थितियों में बदलाव कुछ ऐसे हुआ कि एप्प्ल ने NeXT को खरीद लिया, मैं एप्प्ल वापिस लौटा और जो तकनीक हमने NeXT में विकसित की आज एप्पल की तकनीक का हृदय है. और लारेंस और मेरा एक सुखी परिवार है.
मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मुझे एप्पल से निकाला नहीं गया होता तो ये सब कुछ नहीं होता. वह एक कड़वी दवाई थी लेकिन मरीज को उसकी जरूरत होती है. यदि जिन्दगी आपके सर पर एक ईंट का प्रहार करे तो भी भरोसा ना छोड़ें. मुझे विश्वास है कि इकलौती चीज जो मुझे संघर्ष करने की प्रेरणा देती रही, वो था मेरा अपने किये गये कार्य से प्यार. आपको अपना प्यार पाना है, और यह आपके काम के लिये उतना ही सच है जितना आपके प्रेमी के लिये. आपका कार्य आपकी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रहा है और अपने जीवन में संतोष पाने का इकलौता रास्ता है आपका सोचना कि जो काम मैं कर रहा हूँ वो सर्वोत्तम है. और एक सर्वोत्तम काम वह है जिससे आप प्यार करते है. यदि आपको अपना प्यार नहीं मिला, ढूंढते रहें – ढूंढते रहें. रुकें नहीं. वह आपको जब भी मिलेगा आपका दिल उसे पहचान लेगा . और एक अच्छे रिश्ते की तरह वह समय के साथ अच्छा, और अच्छा होते जाता है, तो ढूंढते रहिये, रूकें नहीं.
मेरी तीसरी कहानी है मौत के बारे में
जब मैं १७ वर्ष का था, मैंने कहीं पढ़ा था "यदि आप हर दिन को जिन्दगी के अंतिम दिन की तरह जीते हैं, किसी दिन आप जरूर सच होंगे". इसने मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाला था और तब से पिछले ३३ सालों से हर सुबह मैंने आईने में खुद को देखा है और पूछा है "यदि आज मेरी जिन्दगी का अंतिम दिन है तो मैं आज मैं करने जा रहा हु वह मैं करना चाहूँगा या नहीं ?" और जब मेरा उत्तर कुछ दिनों तक लगातार नकारात्मक आया है मुझे मालूम हो जाता है कि मुझे कुछ परिवर्तन की जरूरत है.
अपनी मृत्यु को याद रखना, वह सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसने मुझे जिन्दगी के हर बड़े चुनावों में मदद की है. क्योंकि लगभग सब कुछ , हर उम्मीद , गर्व या असफलता की शर्म का डर ये सब मौत के सामने मायने नहीं रखते, बच जाता है जो सच ए महत्वपूर्ण है. आप एक दिन मरने वाले हैं इसे याद रखना , आपको कुछ खो देने के डर के जाल में फंसने से बचाएगा. आप के पास खोने के लिये कुछ नहीं है, आप को अपने दिल की भावना का पालन नहीं करने के लिये कोई कारण नहीं है.
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एक साल पहले मुझे कैंसर होने का पता चला था. सुबह ७.३० बजे मेरी जांच हुई, और मेरे पित्ताशय में मैने ट्यूमर अच्छी तरह से दिख रहा था. मुझे पित्ताशय क्या होता है यह भी नहीं मालूम था. डाक्टर ने बताया कि इस तरह के कैंसर का कोई इलाज नहीं है और मुझे ३ से ६ महीने से ज्यादा जीने की उम्मीद नहीं रखना चाहिए. डाक्टर ने मुझे घर जा कर सभी काम व्यवस्थित करने की सलाह थी, जो उनकी भाषा में होता है मृत्यु की तैयारी करो. इसका मतलब होता है अपने बच्चों को आपके अगले १० सालों की योजना को कुछ महीनों में बताना. इसका मतलब होता है कि सब कुछ व्यवस्थित कर देना जिससे आपके परिवार को परेशानी कम से कम हो. इसका मतलब था अलविदा कहना.
पूरे दिन मैं उस जांच के भय के साथ रहा. बाद में शाम को मेरी बॉयप्सी हुई,. उन लोगों ने में मेरे गले से एक एन्डोस्कोप, मेरे पेट में, मेरी आंतों तक पहुँचाया और मेरे पित्ताशय से सुई के द्वारा कुछ कोशिकायें निकाली. मैं बेहोश था, लेकिन मेरी पत्नी जो वहां पर थी, ने बताया कि जब डाक्टरों ने कोशिकाओं को सुक्ष्म्दर्शी से देखा और चीखना शुरू कर दिया. यह उन बिरले कैंसर में से एक था जो शल्यचिकित्सा से ठीक हो जाता है. मेरी शल्य चिकित्सा हुई और मैं अब अच्छा हूँ.
यह मौत से मेरा सबसे नजदीकी साक्षात्कार था, और आशा है इसका अनुभव अगले कुछ दशकों तक रहेगा. इस से गुजरने के बाद मैं आपसे कुछ ज्यादा विश्वास से कह सकता हूँ कि मौत एक उपयोगी लेकिन बौद्धिक विषय है.
कोई नहीं मरना चाहता. जो स्वर्ग जाना चाहते है वह भी वहां जाने के लिये मरना नहीं चाहते. लेकिन मौत एक ऐसा मंजिल है जिसे हर किसी को पहुँचना है. कोई बच नहीं पाया है. और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि मौत जिंदगी का सबसे बडा आविष्कार है. वह जीवन का परिवर्तक है. वह पुराने को हटा, नये के लिये रास्ता बनाता है. आज आप नये है, लेकिन एक दिन - आज से ज्यादा दूर नहीं, आप बूढ़े हो जाएंगे और किनारे हटा दिये जाएंगे. नाटकीयता के लिये क्षमा चाहूँगा, लेकिन यही सच है.
आपके पास समय कम है, इसलिये किसी और की जिन्दगी जीने के लिये बर्बाद न करें. किसी और के विचारों के अनुसार जीने के जाल में न फँसें. किसी और की सोच का शोर आपकी अंतरात्मा की आवाज को दबा ना पाये. और, सबसे महत्वपूर्ण, आपके पास अपने दिल और अंतरात्मा के कहे का पालन करने का साहस होना चाहिये. वो किसी-तरह-से जानते है कि आप सच में क्या बनना चाहते हैं. बाकी सब, किसी महत्व का नहीं है.
जब मैं जवान था, एक अच्छा प्रकाशन था "व्होल अर्थ कैटेलाग", जो हमारी पीढ़ी के लिये बाइबिल था. वह यहां मेनलो पार्क से कुछ ही दूर रहने वाले स्टीवर्ट ब्राण्ड ने लिखा था, और उसे काव्यात्मक अंदाज में जीवन दिया था. यह १९६० के दशक के आखिर की बात है जब निजी कम्प्यूटर और डेस्कटॉप का प्रकाशन नहीं था. यह टाइपराटर, कैंची और पोलराईड कैमरों से बनी थी. उसे गूगल का पेपरबैक अंक कहा जा सकता है, ३५ साल पहले, गूगल के आने से पहले. वह एक आदर्श था और अच्छी जानकारी से भरपूर था.
स्टीव और उनकी टीम ने "व्होल अर्थ कैटेलाग" के कई अंक प्रकाशित किये और जब वे थक गये तब उन्होंने उसका अंतिम अंक प्रकाशित किया. यह १९७० के दशक के मध्य की बात है जब मैं आपकी उम्र का था. उसके अंतिम अंक के पिछले कवर पर एक गांव के रास्ते का सुबह के समय का चित्र था, कुछ उस तरह का आपको पहाड़ों में देखने को जरूर मिलेगा यदि आप साहसी है और हिचहाइकिंग करते है. उसके नीचे लिखा था. "भूखे रहो, मूर्ख रहो" यह विदाई का संदेश था, क्योंकि उन्होने प्रकाशन बन्द कर दिया था. भूखे रहो, मूर्ख रहो और मैंने अपने लिये यही चाहा है और आपको भी यही शुभकामना देता हूँ
भूखे रहो, मूर्ख रहो – नए ज्ञान के लिए - भूखे रहो, मूर्ख रहो.
धन्यवाद
स्टीव जॉब्स
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 06, 2011 06:22 AM· permalink
स्टीव जॉब्स, सिलिकन वैली के महारथी. कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर व इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद निर्माता कम्पनी एप्पल के इस 56 वर्षिय संस्थापक का कैलिफोर्निया में बुधवार को निधन हो गया. स्टीव कैंसर से पीडित थे, उनके निधन के साथ एप्पल ने ही नहीं विश्व ने एक दूरदर्शी व रचनात्मक प्रतिभा को खो दिया है. उनमें अलग सोचने और उसे सच में बदल देने की अद्भूत क्षमता थी.
Posted by संजय बेंगाणी (sanjaybengani@gmail.com) on October 06, 2011 05:34 AM· permalink
पिछले दिनों लंदन के कुछ इलाकों में हुए भारी दंगों का बादल अब शहर परसे छंट चुका है.
पूरा शहर टेम्स नदी के किनारे सालाना जलसा 'टेम्स समारोह' मनाने के लिए जुटा हुआ है. यह समारोह लंदन शहर के जज्बे को सलाम करने और उसके दिल में बसे टेम्स नदी के प्रति अपना प्यार जताने के लिए मनाया जाता है.
टेम्स के किनारे चिनार के हरे और हल्के पीले पत्ते हवा के झोंके के संग इधर-उधर उड़ते रहते हैं. माहौल चारो तरफ काफी खुशगवार है.
दूर तक लगे झाड़-फानूस, खाने-पीने के खोमचों, सडकों पर नाच-गाने और शोर-शराबे को देख कर ऐसा लगता है कि हम किसी भारतीय शहर में आ गए हैं. लेकिन जहाँ भारत में पर्व-त्योहारों पर ही ऐसा रेला दिखता है, वहीं टेम्स के प्रति अपना हक अदा करने के लिए लंदनवासी इस पर्व का आयोजन करते हैं.
हमने अपनी नदियों को देवी-देवता मान कर उसे पूज्य बना दिया पर प्यार और सम्मान देना कहाँ सीखा!
बहरहाल गर्मी की अब बस छाया भर हैऔर शरद की आहट हवाओं में है. हल्की बूंदा-बांदी और बादल के घिरने से ठंड का एहसास होने लगता है. हालांकि कुछ लोग कमीज में हैं तो कुछ लोग स्वेटर और जैकेट पहने हुए दिखते हैं.
वीक एंड पर पबों में मस्ती और सड़कों पर बीयर की टूटी हुई बोतलें! लेकिन सोमवार की सुबह होते ही ट्यूब स्टेशनों, लंदन के सड़कों की पहचान लाल रंग की दुमंजिली बसों पर काम-काज पर आने-जाने वालों की भीड़ का रेला. हल्की धूप में ‘ट्रैफल्गर स्कवेयर’ पर सैलानियों की चहल-पहल और रात में ‘सोहो’ की गलियों की रंगनियाँ! शहर अपनी पूरी रफ्तार में है.
पर इस भीड़ और कोलाहल के बीच भी आर्थिक बदहाली की चर्चा कहीं दबी जुबान में तो कहीं सरगोशी से सुनाई पड़ जाती है.
चर्चित सेंट पाल कैथिडरल और लंदन म्यूजियम के बीच सड़क के एक किनारे स्थित ‘इंडियन क्यूजिन’ नामक एक रेस्तरां में काम करने वाले महफूज कहते हैं, “बड़ा कठिन समय है...अजीब-अजीब लगता है कभी कि किस मुलुक में आ गए हैं हम.”
तीसवर्षीय महफूज मूलत: बांग्लादेश के सिलहट के हैंऔर पिछले चार वर्षों से वे लंदन में हैं.
तलघर और पहले मंजिल पर फैले इस रेस्तरां में महज दो-चार लोग डिनर करते हुए दिखते हैं. ‘करी’ भले ही भारतीय व्यंजन के रुप में लंदन में चर्चित हो लेकिन ज्यादातर भारतीय रेस्तरां में इसे बनाते बांग्लादेशी मूल के लिए लोग ही हैं.
महफूज कहते हैं, “ आज कल सब कुछ मंदा चल रहा है. कम ही लोग रेस्तरां में आते हैं..पता नहीं क्यों है ऐसा, पर यह पिछले साल था और फिर इस साल भी है.”
महफूज अपनी बीवी और दो बच्चों के साथ रहते हैं. बीवी लंदन की नागरिक हैं और अब वे भी लंदन के नागरिक हो गए हैं.
बीवी टीचर थी लेकिन दो बच्चों को संभालने के लिए अभी नौकरी नहीं कर रही है. ऐसे में परिवार पर आर्थिक बोझ आज कल ज्यादा है. वे कहते हैं कि अब तो लगता है कि यहीं के होकर रह गए. अब वापस भी नहीं लौट सकते.
इससे पहले दिन में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर’ में भारतीय मीडिया के लेकर एक कांफ्रेस के दौरान भारतीय मूल के प्रोफेसर और शोधार्थियों से मुलाकात हुई. विश्वविद्यालय मेंएक युवा रिसर्च एसोशिएट ने कहा ‘दोहरी मंदी की मार झेल रहे हैं हम. आप भारत में ही अच्छे हैं.’
ऐसा नहीं कि मंदी की मार सिर्फ लंदन पर है. ग्रीस से लेकर फ्रांस तक इससे जूझ रहा है.
ट्यूब में यात्रा के दौरान मिले ग्रीस के एक शोधार्थी का कहना था, “एक कमरे का 650 पाउंड देना पड़ रहा है जिसे हम कुछ छात्र मिल कर शेयर कर रहे हैं. और कमरा क्या है बस रहने लायक जगह है. “
ग्रीस के हालात को जानते हुए मुझसे यह पूछने कि हिम्मत नहीं हुई कि किस तरह से वे लंदन में जिंदगी बसर कर रहे हैं. मंदी की मार बेरोजगारों से बेहतर कौन जानता है.
शिशु घन-कुरंग लंदन के आसमान की पहचान हैं. इससे पहले भी 70 और 80 के दशक में लंदन आर्थिक मंदी की मार झेल कर मजबूती से उबरा था. पर इस बार मंदी का घना बादल लंदन के आसमान में फैला दिखता है.
ऐसा लगता है कि लोग ‘गर्मी की तपिश’ के बाद इस बार ‘शीत के असंतोष’ को झेलने के लिए मन को मजबूत कर रहे हैं.
यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। सच में बुद्धिमान वह हैं जो दूसरी की गलती से ही सीख ले लेते हैं।
मैंने कुछ दिन पहले 'जिया धड़क धड़क जाये' शीर्षक से चिट्ठी प्रकाशित की थी। इसमें वर्ष २००८ का लेखा जोखा लिखा था। कुछ लोगों को लगा कि मैं इस बात से दुखी हूं कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं।
मुझे इस बात का मलाल नहीं है कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं। टिप्पणियां न मिलने के कई कारण हैं। मैं उनसे वाकिफ हूं। मैंने उक्त चिट्ठी पर टिप्पणियों की बात, सांख्यिकी के तौर पर लिखी थी न कि शिकायत के कारण।
मुझे मालुम है कि मेरी चिट्ठियां पढ़ी जाती हैं। मुझे, वर्ष २००६ में लिखी चिट्ठियों पर, औसतन एक से भी कम टिप्पणियां मिलीं। फिर भी, हिन्दी चिट्टागजत ने, इसी साल के लिये तरकश द्वारा आयोजित चुनाव में रजत कलम दिया। अब जब समीर जी सामने हों तो किसी और को स्वर्ण कलम कैसे मिल सकता है :-)
मुझे यह भी लगता है कि कुछ लोग मेरा लेखन पसन्द करते हैं। शायद, इसीलिये इस वेबसाइट को शुरू किया होगा।
कौन है यह शख़्स, क्यों शुरू की यह वेबसाइट - कुछ समझ में नहीं आता है। लगता है कि मैं अज्ञात में चिट्ठाकारी करता हूं इसलिये ईश्वर ने मुझे यह सजा दी कि तुम भी इसी सोच में परेशान रहो।
कई लोगों को मेरी यह चिट्ठी, अलग-अलग कारणों से पसन्द नहीं आयी पर मेरे परिवार वालों को यह चिट्ठी अच्छी लगी। मुन्ने की सात समुन्दर पार से लिखी ईमेल और उसे मेरा जवाब यह है।
पापा मैंने अपने लैपटॉप में मैक का नया सॉफ्टवेयर डलवाया है। इसमें हिन्दी देखने में कोई मुश्किल नहीं है। अब मैं तुम्हारे चिट्ठे का आनन्द ले सकूंगा।
तुम्हारी चिट्ठी 'जिया धड़क धड़क जाये' मन को छूने वाली है। मै अज्ञेयवादी हूं पर यदि ईश्वर है तो सच में, हमारे परिवार को उसका आशिर्वाद प्राप्त है। उसने हमें वह सब कुछ दिया जो आज तक किसी और को दिया है। मैं नहीं समझता कि हमें किसी भी चीज की जरूरत है। हम भाग्यशाली हैं।
तुम्हारी उक्त चिट्ठी को पढ़ने के बाद मुझे रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता कि यह पंक्तियां याद आयीं,
'The woods are lovely, dark and deep, But I have promises to keep, And miles to go before I sleep, And miles to go before I sleep' जंगल बहुत सुन्दर और घने हैं मुझे बहुत से वायदे निभाने हैं, और मुझे सोने से पहले बहुत दूर जाना है और मुझे सोने से पहले बहुत दूर जाना है।
मुन्ना
बेटे राजा तुम्हारी प्यारी सी ईमेल मिली। मुझे खुशी है कि मैक के नये सॉफ्टवेयर में हिन्दी देखने में कोई मुश्किल नहीं है। हम तुम इस चिट्ठे के जरिये काफी बात कर पायेंगे।
मैंने अपनी उक्त चिट्ठी में मैंने कुछ पति, पत्नी के सम्बन्धों के बारे में लिखा है। मुझसे कहीं कुछ गलती हो गयी पर तुम्हारी मां से नहीं। एक पुरानी कहावत है,
'Those who learn from the mistakes of others are intelligent; those who are learn from their mistakes are ordinary; and those who even do not learn from their mistakes are fools.' जो लोग दूसरे की गलती से सीखते हैं वे बुद्धिमान होते हैं। जो अपनी गलती से सीखते हैं वह सधारण होते हैं और जो अपनी गलती से भी नहीं सीखते वे बेवकूफ होते हैं।
मुझे यह बताने की जरूरत नहीं कि मैं किस श्रेणी में आता हूं। मुझे यह भी बताने की जरूरत नहीं कि हम सब तुम्हें किस श्रेणी में समझते हैं और तुम वास्तव में किस श्रेणी के हो।
बिटिया रानी का शोध ठीक चल रहा होगा। भौतिक शास्त्र तो मेरा प्रिय विषय रहा है। यदि मेरा बस चलता तो मैं भी भौतक शास्त्री होता पर शायद भाग्य में फाइलें ही ऊधर उधर करना लिखा था। बिटिया रानी ने वायदा किया है कि वह इस साल कार चलाना सीख लेगी। आशा करता हूं कि वह इस पर कायम रहेगी :-)
लिखना कि तुम्हारा शोध कैसा चल रहा है। क्या तुम्हें हरपीस वायरस के कार्य करने के तरीके के बारे में कुछ और पता चला। यह चिट्ठी भी देखो यह तुम्हारे शोध कार्य में सहायता करेगी। पापा
मिश्र जी ने टिप्पणी कर, रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता का हरिवंश राय बच्चन के द्वारा किया गया अनुवाद, बताया है। यह मेरे किये गये अनुवाद से कहीं बेहतर है। मैं उसे यहां उद्धरित कर रहा हूं।
'सुन्दर सघन मनोहर वन तरु, मुझको आज बुलाते हैं। किये मगर जो वादे मैंने, याद मुझे आ जाते हैं। अभी कहाँ आराम मुझे, यह मूक निमंत्रण छलना है। और अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है।'
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सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. Click where 'Download' and there after name of the file is written.)
ऑनलाईन भुगतान आम आदमी ने कब से करना शूरू किया ? और आम आदमी को नेटबैंकिंग और ऑनलाईन भुगतान पर विश्वास कैसे हुआ ? आजकल जो आम आदमी आराम से विश्वास से बेधड़क ऑनलाईन नेटबैंकिंग और क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर रहा है, पता है इसके लिये रेल्वे विभाग का बहुत बड़ा हाथ है ।
रेल्वे ने ऑनलाईन टिकट की सुविधा देकर उपभोक्ता सेवा के क्षैत्र में क्रांति पैदा कर दी और आम ग्राहक को विश्वास दिलवाया कि अगर ऑनलाईन भुगतान किया जाये तो उसका टिकट उसे मिल जायेगा, रेल्वे ने वादा किया कि दो दिन में टिकट अगर आपको घर पर मिल जायेगा तो रेल्वे ने अपना वादा निभाया और ग्राहक के विश्वास को जीत लिया।
ऑनलाईन खरीदी करने पर ग्राहक को समय पर सेवा उपलब्ध होने का जो विश्वास रेल्वे ने ग्राहकों को दिया, इस विश्वास का फ़ायदा भारत के लगभग सभी वेबसाईटों को मिला और ग्राहक ऑनलाईन खरीदी करने में विश्वास करने लगे। इस ईलेक्ट्रॉनिक भूगतान का आँकड़ा अगर देखा जाये तो अविश्वसनीय है, जिस तेजी से ई-भुगतान बढ़ता जा रहा है वह लगभग सभी के लिये अच्छा है, क्योंकि इसमें होने वाला खर्चा काफ़ी कम है और चूँकि इसमें मानवीय हस्तक्षेप नहीं है तो इसमें त्रुटि होने की संभावनाएँ भी काफ़ी कम हैं।
रेल्वे आम उपभोक्ता के लिये एक जरूरी सुविधा है और ई-टिकट के लिये रेल्वे ने अलग से शुल्क लेना शुरू किया जो कि आम उपभोक्ता की मजबूरी है, क्योंकि अगर वह रेल्वे स्टेशन जाकर टिकट लेगा तो उसका खर्चा उस शुल्क से कहीं ज्यादा है और उसके लिये उसे रेल्वे स्टेशन जाना होगा, पर ई-टिकटिंग में उपभोक्ता अपने घर पर ही अंतर्जाल की मदद से टिकट कर सकता है।
ऑनलाईन खरीदी के लिये रेल्वे ने जो मॉडल पेश किया वह बहुत ही सराहनीय है, परंतु ऑनलाईन खरीदी करने पर रेल्वे ने जो अतिरिक्त शुल्क लगाया वह थोड़ी ज्यादती है, रेल्वे का मानवीय हस्तक्षेप कम हो गया और जो रेल्वे खिड़की पर जो ऑनलाईन ग्राहकों का आना कम हुआ उसका फ़ायदा उन ऑनलाईन ग्राहकों को नहीं दिया गया।
ऑनलाईन खरीदी करने वाले ग्राहकों को कुछ अतिरिक्त सुविधा देनी चाहिये जैसे कि अगर कुछ प्रतिशत की छूट देनी चाहिये जिससे वे ग्राहक वापिस से रेल्वे की खिड़की पर ना जायें और जो ग्राहक रेल्वे खिड़की पर जाते हैं वे भी ऑनलाईन ग्राहक बन जायें। रेल्वे को साथ ही टोल फ़्री सुविधा भी देनी चाहिये जैसे कि आजकल की सभी ऑनलाईन पोर्टल्स दे रहे हैं।
रेल्वे को मेरी तरफ़ से बहुत बहुत धन्यवाद है कि ग्राहकों का विश्वास ऑनलाईन भूगतान के प्रति जमाया।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 06, 2011 01:47 AM· permalink
शांतिको वो रोज़ मिलती थी। कभी-कभीतो दिन में दो बार भी मिलतीथी। दफ़्तर आते-जाते जब भी शांति का स्कूटर अम्बेडकरचौराहे पर रूकता तो शांति कीनिगाहें ख़ुदबख़ुद ही उसेढूंढने लगती। और पचासों वाहनोंके बीच भी उसकी लहकती हुई कायाको अलग से पहचान लेने में शांतिको कोई मुश्किल नहीं होती।शांति ने उसे जब भी देखा,हमेशा टिपटॉप देखा।हफ़्ते के हर दिन वो एक नए रंगमें दिखाई पड़ती। जिस रंग कीसाड़ी उसी रंग का ब्लाउज़ औरसैण्डल। यहाँ तक कि जुएलरीभी मैचिंग पहनती। वैसे तो वोइतनी सुन्दर थी कि वो कुछ भीमेकप न करती और कुछ भी पहन लेतीतो भी उस पर से नज़रें हटानामुश्किल होता। इतना सजने-धजनेके बाद तो वो बिजलियां ही गिरानेलगती। वो ठुमकते हुए शांतिके पास चली आती और उसकी बलैयांलेने लगती। शांति पर्स खोलकरउसे कुछ न कुछ ज़रूर देती। कभीपाँच रूपये कभी दो रुपये। अगरकभी उसके आने से पहले ही सिगनलहरा हो जाता तो भी वो शांति कोमुसकराकर बलैयां लेके ही विदाकरती और बार-बारआशीर्वाद देती।
कुछलोग कहते हैं कि इनके आशीर्वादमें बड़ी ताक़त होती है। परवही लोग उसे देखकर बुरी तरहघबरा जाते। वो कुछ कहती तोआँखें तरेरने लगते। हाथ लगातीतो छिटकने लगते। और उनके लाखस्त्रीवेश रखने पर भी कुछ लोगउन्हे आता-जाता कीक्रिया में पुरुष की तरह हीसम्बोधित करते। ये सही है किइन हिजड़ों में से कई कीमांसपेशियाँ पुरुषों की भांतिही उभरी हुई होती हैं और चेहरेपर दाढ़ी-मूँछ केखूँटे भी झलकते रहते हैं। परशांति ने पाया है कि उन हिंजड़ोका स्वभाव भी बहुत नाज़ुक औरलचीला होता है जिनके शरीर मेंस्त्रियों जैसी कोई तरलतानहीं होती। उनका शरीर भलेपुरुष का हो वे मन से नारी होतेहैं और हर कोशिश कर के पूरीतरह वही हो भी जाना चाहते हैं।इन कोशिशों में हारमेन्स कीगोलियों से लेकर विदेशों मेंकिए जाने वाले मँहगे ऑपरेशन्सतक होते हैं।
शांतिके लिए यह बात कभी मुद्दा हीनहीं रही कि उन्हे पुरुष मानाजाय या स्त्री। जैसे किसी कानाम होता है या किसी का मज़हबहोता है वैसे ही शांति इसे भीमानती रही है। अगर वे अपने कोस्त्री मानते हैं तो उसमेंकिसी को क्या ऐतराज़ होनाचाहिये। पर कुछ लोगों का नज़रियाइस मसले पर बेहद कट्टर और क्रूरपाया जाता है। और इस क्रूरतासे शांति का परिचय बहुत बचपनमें ही हो गया था। शांति केस्कूल में एक बार एक लड़कापढ़ने आया था नीरज- जोपहनता तो पैंट-शर्टथा लेकिन उसके हाव-भावऔर अंदाज़ सब लड़कियों वालेथे- हर समय खिलखिलाना,कुछ लहराते हुए साचलना, किसी पहाड़ीनदी की तरह धाराप्रवाह बोलना,थोड़ी सी भी चोट लगजाने पर आँखों में आँसू डबडबाजाना। हालांकि कम ही लड़कियांउससे बात करतीं पर वो लड़कियोंके साथ घुलमिलकर के रहने कीपूरी कोशिश करता। लड़कियो कीही तरह वो लड़को से कटता औरलड़के भी उससे कटते। लड़केकभी उससे बात करते भी तो उसकामखौल बनाने के लिए।
नीरजपढ़ने में तेज़ था पर पढ़ाईसे अधिक मन उसका सजने-धजनेऔर फैशन में लगता था। वो बड़ेबाल रखता और हर दिन एक अलगस्टाईल में बाल सजाकर आता।कभी-कभी नीरज अपनीछोटी उंगली में नेल पॉलिश लगालेता था। एक दिन वो दसों उंगलियोंमें नेलपॉलिश लगाकर आ गया।लड़कियों ने झुण्ड बनाकर उसपर मीन-मेख निकाला,लड़कों ने छींटाकसीकी, और टीचर ने देखातो कसकर डाँटा। नीरज ने सरझुका के सुना तो पर उस पर कोईअधिक असर नहीं हुआ। कुछ दिनोंबाद वो स्कूल में लिपस्टिकऔर मस्कारा लेके आ गया और लंचमें कुछ लड़कियों के साथ मिलकरउसने दोनों का इस्तेमाल अपनेचेहरे पर कर डाला। शांति कोयाद है कि वो किसी हीरोईन कीतरह सुन्दर लग रहा था। यह बातवो भी जानता था और उसीलिए ख़ुशीसे इसके क़दम सीधे नहीं पड़रहे थे। न जाने यह उसकी ख़ुशक़िस्मतीथी या बदक़िस्मती, किसीटीचर की नज़र उस पर नहीं पड़ी।छुट्टी होने तक लड़कियों कीखिलखिल और लड़कों की छींटाकसीज़ारी रही। मगर छुट्टी के बादजो हुआ उसकी कल्पना किसी नेनहीं की थी। स्कूल से निकलनेके बाद लड़कों ने उसे घेर लियाऔर उसके कपड़े फाड़ डाले। उसदिन जब नीरज घर पहुँचा तो उसकेशरीर पर कपड़ों के निशान सेबड़े ख़ून के निशान थे।
आख़िरउसका अपराध क्या था? क्या सिर्फ़ इतनाकि वो औरतों की तरह सुन्दरदिखना चाहता था?
नीरजउस दिन के बाद स्कूल लौटकरनहीं आया। शांति को यह भी पतानहीं चला कि उसके बाद वो फिरकिसी स्कूल गया कि नहीं। उसहादसे के बाद नीरज किसी भीसामाजिक समूह में सहज होकररह पाया होगा, मुश्किललगता है। यही सोचकर शांति जबभी हिंजड़ो के समूह को देखतीहै तो सोचने लगती है कि उसकासहपाठी नीरज भी शायद उनमेंशामिल हो गया हो। उस हसीनहिंजड़े को देखकर तो शांतिको हमेशा नीरज की याद आती हैक्योंकि वो कोई बहुत ज़हीनऔर पढ़ा-लिखाइंसान मालूम देता था। जिसकोदेखकर किसी का भी मन में उसेजानने और दोस्ती करने की इच्छापनप जाय। वैसे तो बिना किसीजान-पहचानके ही उनके बीच एक अजीब सीदोस्ती का रिश्ता क़ायम होगया था पर शांति को उसका नामभी नहीं मालूम था। शांति नेकई बार सोचा कि वो कभी रुककरउससे उसका नाम पूछे और उसकीकहानी भी। मगर वो मौक़ा कभीनहीं आया। एक रोज़ शांति कोवो अम्बेडकर चौराहे पर नज़रनहीं आई। और उसके बाद फिर कभीनज़र नहीं आई। आते-जातेशांति की निगाहों उसे खोजतीरहतीं। पर वो नहीं मिली। शांतिके पास यह जानने का कोई ज़रियानहीं था कि वो कहाँ चली गई औरक्यों चली गई?
फिरएक दिन अख़बार में एक ख़बरदेखी- पुलिसमे कुछ हिंजड़ो को भीख माँगनेऔर वैश्यावृत्ति करने केइल्ज़ाम में हवालात में बंदकर दिया था। साथ में पुलिसअफ़सर का बयान भी था कि वो किसीको समाज में अनैतिकता नहींफैलाने देगा। साथ में एक छोटीसी तस्वीर भी थी। उस तस्वीरमें पुलिस अफ़सर के पीछे हवालातमें बंद हिंजड़ो सें से एक काआधा मुँह साड़ी के आँचल से ढकाहुआ था और दिखाई पड़ रहा आधामुँह लाल टमाटर की तरह सूजाहुआ था। शायद उसे भी किसी नेसुन्दर लगने का ईनाम दिया था।शांति ने ग़ौर से देखने कीकोशिश की कहीं वो चेहरा उसेमिलने वाली उसकी अनाम दोस्तका तो नहीं है? परवो कुछ तय नहीं कर सकी-वो एक हिंजड़े काचेहरा भर था जिसके लिए समाजके भीतर या बाहर कोई जगह नहींथी।
***
(पिछले इतवार दैनिक भास्कर में छपी)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on October 05, 2011 10:51 AM· permalink
वे जो आइ-फोन 5 की प्रतिक्षा कर रहे थे, उन्हें आइ-फोन 4 के उत्तर-कृति (सिक्वल) संस्करण 4s से ही संतोष करना पड़ा है. इसके बाद भी नए संस्करण में नया क्या है, यह जानने की जिज्ञासा कम नहीं हुई है. यही कारण है कि नए संस्करण के जारी होने के साथ ही उत्पादक कम्पनी मैक की साइट चाहकों के भारी आगमन के कारण दबाव में दिखी.
Posted by संजय बेंगाणी (sanjaybengani@gmail.com) on October 05, 2011 09:46 AM· permalink
आज शर्माइन सुबह चार बजे ही उठ गईं। महीने का पहला इतवार जो है। ब्रैड का बड़ा पैकेट और मक्खन तो शर्मा जी कल ही ले आये थे, सिर्फ ग्वाला की बर्फी ही लानी बाकी है। काम में युद्ध स्तर पर भिड़ी हुईं शर्माइन किचिन से ही चिल्लाईं - " जल्दी उठो, छै बजन वाले है। ई बार आठ बजे तक पहुँचने ही है, नहीं तो धूप हो जै। बिक्कू को भी उठा दो और पूजा भी कर लो नहीं तो भगवान बेचारे ऐसे ही बैठे रै जात। लौटत - लौटत
>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 05, 2011 06:10 AM· permalink
अभी कुछ समय से अपने ऊपर ही विश्लेषण कर रहा हूँ कि एक बार लेपटॉप पर कुछ थोड़ा सा कार्य लेकर बैठे तो कार्य तो खत्म हो गया, किंतु बाकी का समय फ़ेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग पढ़ने में निकल जाता है, और यह समय किस तेजी से भागता है, यह तो सिस्टम ट्रे की घड़ी और सामने दीवार पर लगी घड़ी दोनों बताते रहते हैं।
वर्षों पहले बचपन की सुनहली तस्वीर सामने आती है, जब न बुद्धुबक्सा था न अंतर्जाल तक पहुँचाने वाला ये तकनीकी यंत्र नहीं था, तब लगभग सभी परिवार अपने आप में बेहद मजबूती से बंधे हुए थे, और सबको एक दूसरे के दुख सुख का अहसास होता था, पता होता था। सामाजिक मूल्यों की परिभाषा अलग होती थी और अब सामाजिक मूल्यों की परिभाषा में बदलाव सहज ही देखा जा सकता है।
कल फ़ेसबुक पर बहुत सारे दोस्तों को जो कि केवल फ़ेसबुक दोस्त थे, जो इसलिये बना लिये गये थे कि उनके और हमारे कुछ कॉमन दोस्त थे, हटा रहे थे। दोस्तों की इतनी भीड़ देखकर दंग था और उनके द्वारा जारी किये गये स्टेटसों को भी देखकर, कुछ तो केवल अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे और कुछ केवल समय का कत्ल कर रहे थे, तो हमने सोचा कि ऐसे समय का कत्ल करने वाले दोस्तों से पीछा छुड़ाना ज्यादा ठीक होगा, ठीक है थोड़ा सा अपना पारिवारिक समय का कत्ल होगा।
पीछा छुड़ाने से यह फ़ायदा तो होगा जो वाकई में दोस्त हैं उनके दुख सुख में शामिल तो हो सकेंगे उनकी वर्तमान गतिविधियों को देख तो सकेंगे। कल इतने समय फ़ेसबुक पर शायद पहली बार मैंने वक्त गुजारा और देखा कि कुछ लोग तो केवल दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं और सार्वाधिक दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं। केवल अपने मन को तृप्त करने के लिये ?
समय आ गया है कि थोड़ा अपने समय का कत्ल करके ऐसी चीजों से बचा जाये और बेहतरीन समय प्रबंधन कर परिवार को उचित समय दिया जा सके।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 05, 2011 03:22 AM· permalink
इंग्लैण्ड - इंग्लैण्ड के राजा/रानी का एंग्लीकेन चर्च का सदस्य होना अनिवार्य है। 24 बिशप व 2 आर्कविशप, संसद के उच्च सदन House of Lords के सदस्य मनोनित होते हैं।
इटली - वहाँ का संविधान कहता है कि "कैथोलिक मत के ईसाई तत्व ही सार्वजनिक शिक्षा की नींव और शिखर दोनों है" शिक्षकों और उपदेशकों को चर्च अधिकारियों की सम्मति लेनी पड़ती है, अन्यथा वे पद से बर्खास्त कर दिये जाते है।
पुर्तगाल- शिक्षा चर्च के अधिकारियो की सम्मति से ही होनी अनिवार्य है।
कोलम्बिया - कैथोलिक मत के अतिरिक्त किसी भी अन्य को अपने पूजा घर से बाहर प्रचार की अनिमति नही है।
डेनमार्क - यहाँ का राष्ट्रीय चर्च लूथेरियन चर्च है। इसी चर्च को राज करने का अधिकार है और चर्च की सभी गतिविधियों के लिये धन सरकार द्वारा दिया जाता है।
नार्वे - राजा सदै लूथेरियन चर्च का अनुयायी होगा, आधे से अधिक मन्त्रियों का चयन चर्च करेगा। सभी विद्यालयो मे ईसाई मत की शिक्षा अनिवार्य है।
स्वीडन - ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य मत के व्यक्तियों को अने बच्चों की शिक्षा के लिये विद्यालय चलाने पर प्रतिबन्ध है।
अमेरिका - वहाँ के न्यायालयों ने अमेरिका को ईसाई देश माना है। "अमेरिका के बहुसंख्यक लोगा ईसाई होने के कारण हमारे कानून और संस्थाएँ ईसा के उपदेशों से अनुप्राणित होनी चाहिए!" हमारी नीतियों का प्रारम्भ ईसाई मत द्वारा हुआ है। हमारी न्याय व्यवस्था की मूल चेतना वही है। सरकारी प्रशासन के पार्वभूमि में ईसाई मत है। कुल मिला कर ईसाई मत देश के कानून का हिस्सा है। - अमेरिकन चर्च लॉ0
एक प्रश्न
आखिर क्यों जब भारत मे हिन्दू विधि विधान से नैतिक शिक्षा, योग शिक्षा, दीप प्रज्ज्वल, सरसवती वंदना अथवा वंदेमातरम् आदि से सेकुलर छवि कैसे भ्रष्ट हो जाती है?
Posted by महाशक्ति (pramendraps@gmail.com) on October 04, 2011 02:28 PM· permalink
सब ने तेरी महफिल में मेरा नाम लिया होगा तूने भी तड़प कर दिल थम लिया होगा कहती है मुझे मजनूं,दीवाना भी कहती है तूने भी तो जालिम कभी प्यार किया होगा देखा था तुझे मैंने बेचैनी की हालत में उस वक्त तेरे दिल में मेरा दर्द रहा होगा कहता है बेवफा आज जमाना मुझको इक बावफा को तूने ये नाम दिया होगा ये दौरे सियासत है हर चीज बिकाऊ है ये सोच कर ही तूने दिल मेरा लिया होगा -- मुरसलीन साकी
>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 04, 2011 05:42 AM· permalink
घर के पास ही दुर्गापूजा का पांडाल लगा है, तो पहले ही दिन पूजा में हो आये, जाकर देखा तो इतना बड़ा पांडाल और इतनी सी मूर्ती, खैर अब मुंबई की आदतें इतनी जल्दी भी नहीं जायेंगी। गरबा और डांडिया का तो कहीं आस पास पता ही नहीं है और अगर है भी तो इतनी दूर वह भी रात १० बजे से शुरू होता है और पूरी तरह से व्यावसायिक, जहाँ गरबा के मैदान में जाने का टिकट है, वह भी ५०० रुपये से शुरु।
पहले झाबुआ में थे तो वहाँ असली गरबे का रंग चढ़ा था, और जो गरबे वहाँ देखे और खेले थे वह गरबे और डांडिया बस यादें बनकर रह गये हैं। झाबुआ में लगभग हर कॉलोनी में गरबे डांडिया रास का आयोजन होता था, और सभी लोग गरबे में शिरकत किया करते थे। और कहीं पर भी किसी भी जगह डांडिया खेलने की आजादी होती थी, जरूरी नहीं होता था कि कोई शुल्क दिया जाये या वहीं के रहवासी हों।
परंतु अब तो हर जगह गरबा डांडिया ने व्यावसायिक रूप ले लिया है, डांडिया दुर्गामाता की आराधना करने का ही एक स्वरूप माना जाता है, परंतु आराधना भी अब सामान्य वयक्ति के बस की बात नहीं रह गई है।
आज भी अच्छॆ से याद है हमारे महाविद्यालय में कार्यालय में कार्यरत राठौड़ साहब इतना अच्छा गरबा गाते थे कि उनकी माँग दूर दूर तक होती थी, जैसे माँ का आशीर्वाद हो उनके ऊपर, उनका सबसे अच्छा गायन लगता था पारंपरिक गरबे पर “पंखिड़ा ओ पंखिड़ा “।
आजकल पारंपरिक गरबे के गाने तो सुनने को मिलते ही नहीं हैं, आजकल फ़िल्मी गानों पर गरबा होता है। खैर पता नहीं कि झाबुआ में भी अब गरबे का स्वरूप व्यावसायिक हो गया हो, परंतु हाँ पुराने दिन तो याद आते ही हैं।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 04, 2011 03:27 AM· permalink
प्रकृति को पूरी तरह से समझना अब तक मानव मन के बूते के बाहर रहा है। मानव ने अपने इतिहास मे प्रकृति के कई रहस्य खोजे, ढेर सारे प्रश्नो का उत्तर पा लिया लेकिन उतने ही नये अनसुलझे रहस्य सामने आते गये है। मानव आज अपनी मातृभूमि पृथ्वी की सीमाओं को लांघ कर चंद्रमा तक जा पहुंचा [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on October 04, 2011 01:30 AM· permalink
जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था, कि एम एस ऑफ़िस 2010 हिंदी वर्तनी जाँच और गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच में तुलना करेंगे, तो प्रस्तुत है एक त्वरित तुलना.
तुलना के लिए मैंने एक छोटी सी कविता की कुछ पंक्तियाँ लीं, और एमएस वर्ड 2010 हिंदी में चिपकाया और उसी को गूगल डॉक्स में भी चिपकाया.
पाया कि न तो कोई बीस है और न ही उन्नीस!
और, न तो कोई पास है, और न ही फेल!
दोनों के ही वर्तनी जाँच परिणाम आमतौर पर एक जैसे रहे, दोनों में ही हिंदी के कुछ आम प्रचलित सही शब्दों को भी गलत समझ कर लाल रंग से रंग दिया गया.
हाथ कंगन को आरसी क्या? आपके लिए दोनों के स्क्नीनशॉट उपलब्ध हैं.-
गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच -
एमएस वर्ड 2010 हिंदी वर्तनी जाँच
अब आप खुद ही तय करें कि एमएस ऑफ़िस 2010 का 11 सौ रुपए मूल्य का वर्तनी जाँच बेहतर है या मुफ़्त का गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच.
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 03, 2011 06:50 AM· permalink
मनमोहनॉमिक्स के करीब 20 साल पूरे हो रहे हैं, अतः उस कोरस को याद करना बहुत वाजिब होगा, जिसका राग मुखर वर्ग पहले तो खूब गर्व से और फिर खुद को दिलासा देने के लिए अलापता रहा हैः 'आप चाहे जो भी कहें, हमारे पास डॉ मनमोहन सिंह के रूप में सबसे ईमानदार आदमी हैं. उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला जा सकता'. लेकिन ऐसा अब कम सुनने को मिलता है - ऐसे उद्गार अब ईमानदारी का झंडा बुलंद करनेवाले दूसरे चालबाजों की स्तुति में ज्यादा व्यक्त होते हैं. लेकिन बड़ी तादाद में लोग अब रोज यह कहते फिर रहे हैं : 'ईमानदार प्रधानमंत्री निर्विवाद रूप से हमारे इतिहास में अब तक के सबसे भ्रष्ट सरकार की मुखियागिरी कर रहे हैं.' और निश्चय ही इस कथन में कई सबक छुपे हुए हैं.
डॉ सिंह द्वारा संपादकों के साथ साप्ताहिक मुलाकात का फैसला हमें बताता है कि उन्होंने इन घोटालों से क्या सबक सीखा है. अब उन्हें यह लगने लगा है कि सरकार के लिए भ्रष्टाचार जन संपर्क से जुड़ा एक मामला है. हालांकि कुछ ऐसा ही मीडिया के साथ भी है, जो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजनेताओं पर लगातार भौंकता रहा लेकिन इस घोटाले के आरोपी प्रमुख कॉरपोरेट्स को बरी कर दिया. डॉ सिंह अक्सर मीडिया को 'अभियोक्ता, अभियोजक और न्यायाधीश' तीनों ही रूपों में एक साथ देखते हैं. (हो सकता है वो इस मामले में सही हों). इसके बावजूद वो प्रमुख संपादकों के साथ बैठकी लगाना चाहते हैं. तो क्या यह जन संपर्क से जुड़ा मामला भर है? या वह यह मानते हैं कि भारत के संपादकों के पास ही ऐसा कोई नुस्खा है, जो सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार (मीडिया के भ्रष्टाचार को छोड़कर) समाप्त कर देगा? मुझे पहले की उम्मीद है.
उनकी सरकार के घोटालों का हिसाब-किताब रखना जनगणना करने की कवायद जैसा है. एक बड़ी और जटिल गणना की तरह. कुछ ऐसे घोटाले हुए जिन्हें दफन कर दिया गया और लेकिन कुछ अभी भी ठंडे नही हुए हैं. आने वाले दिनों में और घोटालों का खुलासा होने वाला है. कुछ का पता चल चुका है, बस भंडाफोड़ बाकी है. साथ ही कई ऐसे हैं जिनपर मीडिया जान-बूझकर चुप्पी बरत रहा है. बहुतेरे के बारे में तथ्य जुटाये जा रहे हैं. हमारा वर्तमान केंद्रीय कैबिनेट संभवतः अब तक का सबसे धनवान मंत्रिमंडल है, जिनके सदस्यों के पास 500 करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति है. पहले के सभी पूर्ववर्ती मंत्रिमंडल सदस्यों की कुल संपत्ति को जोड़ दें तो भी यह ज्यादा ही होगा.
जाहिर है भ्रष्टाचार के कई कारण हैं और हर किसी के पास इससे जुड़ी अपनी-अपनी पसंदीदा कहानी है. लेकिन तीन ऐसे मूल कारण हैं जिन्हें नजरअंदाज करने से कोई भी विश्लेषण निरर्थक रहेगा. पहला कारण है : भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताएं, जिसमें संपत्ति और सत्ता का बड़े पैमाने पर संकेंद्रण, वर्ग और जाति, लिंग और इनसे जुड़े दूसरे भेदभाव शामिल हैं.
दूसरा पहलू आर्थिक नीतियों का पूरा ढांचा है जिसने इन असमानताओं की खाई पैदा की एवं उसे और ज्यादा गहरा किया है, साथ ही इन्हें एक किस्म की वैधता भी प्रदान की है. पिछले 20 वर्षों में ऐसा तेजी से घटित हुआ है. उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि संविधान का मजाक उड़ाते हुए कॉरपोरेटों को नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है.
और तीसरा पहलू है न्यूनतम जवाबदेही के साथ हरेक तरह का अपराध कर बचने और स्वेच्छाचारिता की संस्कृति का पैर जमाना. ऐसा होना रसूखवालों को अपराध कर बच निकलने का कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही देता है. हद तो यह है कि एक राज्य का कोई जज सिर्फ इस कारण कार्यदिवसों पर सभी तरह की विरोध रैलियों पर रोक लगा देता है क्योंकि उसकी कार कोर्ट जाते वक्त एक रैली में फंस गयी थी. ऐसे निजाम में भांति-भांति के बाबा उस समय तक हरेक कर कानून को तोड़ सकते हैं जब तक कि वे सत्तारूढ़ शासन को चुनौती नहीं देते.
भ्रष्टाचार की गंगोत्री का मुहाना बंद किये बगैर, उससे निपटने की कोशिशें कुछ वैसी ही होंगी कि हम नल खुला छोड़ दें, उससे पानी भी बहता रहे और फर्श को सूखा रखने की कोशिशों में भी लगे रहें. ये स्रोत बहुत पुराने हैं. आज इन स्रोतों का दायरा, आकार और नुकसान नई-नई हदें तय कर रहे हैं.
बीते 20 वर्ष धन के अभूतपूर्व संकेंद्रण के साक्षी रहे हैं, इस धन को अक्सर गलत तरीके से आर्थिक नीति की आड़ में इकट्ठा किया गया है. राज्य की भूमिका कॉरपोरेट समृद्धि लाने वाले एक उपकरण मात्र की रह गयी है. वह निजी निवेश के लिए उचित माहौल उपलब्ध कराने भर के लिए रह गया है. प्रत्येक बजट कॉरपोरेट जगत के लिए (और आंशिक रूप से उसके द्वारा भी) तैयार किया जाता है. पिछले छह बजट में सिर्फ प्रत्यक्ष कॉरपोरेट आय कर, सीमा और उत्पाद शुल्क में छूट के रूप में कॉरपोरेट जगत को 21 लाख करोड़ रुपयों का उपहार दिया गया है. और इसी अवधि में खाद्य सब्सिडी और कृषि क्षेत्र को कटौती का सामना करना पड़ा है.
नव-उदारवादी आर्थिक ढांचे के अंतर्गत राज्य आम लोगों की कीमत पर कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए खाद-पानी मुहैया करता है. यही कारण है कि हम उस दौर में जी रहे हैं जहां सब कुछ का निजीकरण किया जा रहा है. कॉरपोरेट मुनाफे को और बढ़ाने के लिए जमीन, पानी, स्पेक्ट्रम जैसे सभी दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों को निजी हाथों में सौंप देना अब राज्य का मिशन बन गया है. यह प्रक्रिया और कुछ नहीं निजी क्षेत्र को उन्हीं को तरजीह देने वाले शर्तों के आधार पर राष्ट्र के संसाधनों को सौंपना है जो कि हमारे समय में भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है. घोटाले तो लक्षण मात्र हैं, रोग यह है कि भारतीय राज्य, नागरिकों की जगह कॉरपोरेट निगमों के हित साधता है.
चुनाव खर्च के बारे में चिंता करनेवालों को दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए. आज एक ऐसा वर्ग पैदा ले चुका है जिसके पास खर्च करने के लिए बहुत अधिक पैसा है, काली कमाई है. वो इतना पैसा उड़ाते हैं, जिसकी कल्पना तक 1947 में संभव नहीं थी. कई राज्यों में, आप करोड़पति हुए बिना चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते.
इस साल मई में चार राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश (और कडप्पा उपचुनाव) में निर्वाचित 825 विधायकों का उदाहरण लें. उनकी घोषित संपत्तियां देखें. हमें इन चुनावों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए नेशनल इलेक्शन वाच (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म -एडीआर) का शुक्रगुजार होना चाहिए. इन आंकड़ों का विश्लेषण करना एक मज़ेदार काम है.
एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि इन 825 विधायकों की घोषित संपत्ति का कुल मूल्य 2,128 करोड़ रुपयों के आसपास है. इनमें से 231 दूसरी बार विधायक बने हैं. 2006 से 2011 के बीच इन्होंने अपनी संपत्ति में 169 प्रतिशत की औसत वृद्धि की है. इसका मतलब यह है कि विधायक बनने के पहले इन्होंने जितनी संपत्ति अर्जित की थी, उससे भी अधिक 'वैध' संपत्ति इन्होंने बतौर विधायक अपने पहले पांच साल के दौरान इकट्ठी कर ली.
अब 825 भूमिहीन श्रमिक परिवारों के बारे में सोचें. हम उनकी 'संपत्ति' की तुलना विधायकों की संपत्ति से नहीं कर सकते क्योंकि इन भूमिहीन श्रमिक परिवारों के पास कुछ नहीं है और वो लगातार कर्ज में डूब रहे हैं. इसका हिसाब लगाना बहुत ही दिलचस्प होगा कि मनरेगा जैसी योजना के सहारे कमाते हुए उन्हें 825 विधायकों के बराबर संपत्ति बनाने में कितना वक्त लगेगा?
मनरेगा में मिलने वाले 100 दिन के काम के जरिये वो राष्ट्रीय औसत पर 12 हजार 6 सौ रुपये के आस-पास कमा सकते हैं. इस तरह 825 भूमिहीन परिवारों को 2128 करोड़ रुपये अर्जित करने में 2,000 साल से अधिक लगेंगे. और साथ ही इसके लिए उन्हें भोजन जैसी तुच्छ आदतें छोड़नी पड़ेंगी. अगर श्रमिक परिवारों की संख्या 10 हजार कर दी जाये तो इस जैकपॉट को पाने में 170 साल के करीब का समय लगेगा. यहां तक कि दस लाख घरों को भी ऐसा करने में एक साल से अधिक का ही समय लग जाएगा. (याद रखें कि उन 231 विधायकों ने 60 महीने में अपनी संपत्ति दोगुनी से भी अधिक कर ली.)
इन गहरी असमानताओं के बीच ऐसी कोई संभावना ही नहीं दिखाई देती कि मजदूर परिवारों के पास भी कभी किसी भी तरह की संपत्ति होगी, 2,128 करोड़ रुपयों का तो जिक्र करना ही बेकार है. वे कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे. और वे इन कर्जों के एवज में जो सूद भेरेंगे वो शायद उन विधायकों की तिजोरी में भी जमा होगा जो साहूकार भी हैं. इसके बावजूद उन विधायकों की संपत्ति कॉरपोरेट जगत की उस विशाल संपत्ति की तुलना में मामूली है जो राज्य के सहयोग से जमा की गयी है. एक ओर मनरेगा की कमाई के सहारे दस लाख मजदूर परिवारों को 3.5 लाख करोड़ जमा करने में 275 साल के आसपास लगेंगे और दूसरी ओर पिछले छह साल से लगातार सरकार हर साल इतनी ही राशि कॉरपोरेट सेक्टर को बतौर छूट बांट रही है.
और फिर यहां बस अपराध करने की छूट है, दण्ड का कोई प्रावधान नहीं. डॉ सिंह अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर कर सकते हैं, लेकिन क्या इससे बहुत कुछ बदल जाएगा? एक कृषि मंत्री हैं, जो क्रिकेट पर अधिक समय बिताते हैं और राष्ट्रीय जुनून को फूहड़ता के भद्दे, कारोबारी दलदल में बदलने में मददगार रहे हैं. कपड़ा मंत्री इस शासन की लड़खड़ाती दूसरी पारी में मैदान छोड़ने को मजबूर होने वाले सबसे हालिया 'बल्लेबाज' है. एक दूसरे भारी उद्योग मंत्री हैं जो साहूकारों को मदद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा शर्मिंदा किये जाने के तुरंत बाद ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में पदोन्नत कर दिये गये. अगर उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा भी दिया जाता है तो उनका विकल्प युवा होने के बावजूद हालात बदल नहीं पायेगा. ऐसे में क्या यह सिर्फ सुस्त प्रशासन या लचर नियमों से जुड़ा मामला भर है? नहीं, यह भ्रष्ट नीतियों से जुड़ा मामला है.
क्या आप आज के समय में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं? तो आप संरचनात्मक असमानता को ढाहने के लिए कदम बढ़ायें, जो नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों से उपजा रोग और जवाबदेही के बिना स्वेच्छाचारिता की संस्कृति है. क्या हमें एक लोकपाल की जरूरत है? हां. क्या यह सरकार से भी शक्तिशाली हो सकती है? संवैधानिक ढांचे से ऊपर और जवाबदेही के बिना? अगर हम ऐसा ही लोकपाल चाहते हैं तो हम मुसीबत मोल ले रहे हैं. क्या यह असमानता, आर्थिक नीति और स्वेच्छाचारिता पर काबू पा सकता है? नहीं, लोकपाल का वर्तमान स्वरूप ऐसा करने में सक्षम नहीं. यह समग्र रूप से आम लोगों और उनके संस्थानों के लिए एक बड़ी लड़ाई है. जैसा कि एक पुरानी कहावत है, आपके अधिकार उस प्रक्रिया जितने ही सुरक्षित होते हैं, जिसके द्वारा आप अपने अधिकारों को सुरक्षित रखते हैं.
इस समय देश भर में विस्थापन, जबरन भूमि अधिग्रहण, संसाधनों की लूट के खिलाफ और वन व अन्य अधिकारों की बहाली के लिए लड़ाई तेज हो रही है. ये 'स्थानीय' संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे बड़े पैमाने पर, यहां तक कि वैश्विक फलक पर भ्रष्टाचार को चुनौती देते हैं. वे असमानता और भेदभाव से लड़ रहे हैं. वे खुली छूट, लालच और मुनाफाखोरी का विरोध करते हैं. वे अपने शासकों को जवाबदेह बनाने की कोशिश करते हैं. इरोम शर्मिला जैसे कुछ लोग काले कानूनों की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरे कई केवल वन अधिकार कानून जैसे मौजूदा कानूनों को जमीन पर उतारने के लिए सड़क पर उतर चुके हैं. लेकिन इनमें से कोई भी खुद को राष्ट्र से ऊपर नहीं मानता. ये लोग यह घोषित नहीं करते कि वे कानून बनायेंगे जिसका दूसरों को पालन करना ही होगा. न ही इस पर जोर देते हैं कि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. फिर भी, वे अपने और हमारे अधिकारों के लिए लड़ते हैं और दमनकारी संरचनाओं को और अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं.
इस मामले में अतीत को थोड़ा भुला दिया जा रहा है. मगर एक भ्रष्ट व कमजोर सरकार और बेशक कांग्रेस पार्टी को सब कुछ अच्छी तरह से पता है. बमुश्किल 36 साल पहले, एक व्यक्ति ने खुद को सभी संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर रख लिया था- बिलकुल बेलगाम. यह याद करना वाकई दुखद है कि कितने संगठनों, मध्यमवर्गीय लोगों और यहां तक कि कुछ बुद्धिजीवियों ने उस व्यक्ति और उसके युग के पक्ष में बढ़-चढ़ कर जयकार लगाया था. उस व्यक्ति का नाम था संजय गांधी और उस युग को आपातकाल कहा जाता था.
बाकी सब इतिहास है.
दि हिंदू, 8 जुलाई, 2011 से साभार.
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on October 03, 2011 06:03 AM· permalink
(१) अब ना कोई मेरे ज़ज्बातों से खेले। शहर क़ातिलों का है यहाँ कैसे चले। लोगों ने अपना कर ऐसे ठुकराया, जैसे कोई जलते अंगार को छू ले। तड़पा है मन प्यार के लिए ऐसे , जैसे बच्चे से कोई खिलौना ले ले। चारों तरफ भीड़ है कोलाहल है, और हसरतें अपनी रह गयी अकेले। साथी न सही,अजनबी की तरह चलते, लोग तो ना कहते कि हम है अकेले। (२) क्या कहूँ, तकदीर कितनी बेरुख़ी होती है। मिलते है जब दो दिल
>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 03, 2011 05:03 AM· permalink
घर में बेटी की किलकारियां, घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे सुबह जगी नींद में स्वप्न कोई सुहाना पले, जैसे दुःख का अंधेरा ढले, मंदिरों में दिया सा जले, मंदिरों में दिया सा जले, बज उठीं श्याम की मुरलियां, घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे सागर की लहरों नें हो, तट के आंचल को आकर छुआ, जैसे तारों भरी रात में, चांदनी नें पढ़ी हो दुआ, चांदनी नें पढ़ी हो दुआ, जैसे मोती भरी सीपियां, घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे भूले हुए गीत का, आ गया हो सिरा याद सा, जैसे साहिर के शब्दों को पा, खिलता संगीत नौशाद का, खिलता संगीत नौशाद का, तितलियों की हैं अठखेलियां, घर में बेटी की किलकारियां.
रेत के गाँव में जिस तरह, कोई नदिया कहानी कहे, धुप को मुंह चिढ़ाती हुई, मंद शीतल पवन सी बहे, मंद शीतल पवन सी बहे, गीत, झूले, हरी डालियाँ, घर में बेटी की किलकारियां.
जैस मीठे से संतूर पे, राग कोई मधुर सा बजे, सात रंगों को संग में लिए, आसमां पे धनुष सा सजे, आसमां पे धनुष सा सजे, जैसे महकी सी फुलवारियां, घर में बेटी की किलकारियां.
Posted by अभिनव (shukla_abhinav@yahoo.com) on October 02, 2011 02:21 PM· permalink
आज बहुत दिनों बाद लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, पता नहीं परंतु ऐसा लग रहा था कि दिमाग के साथ साथ लेखन पर भी विराम लग चुका है। खैर अपनी अनमयस्कता से बाहर आ चुका हूँ और अब वापिस से पटरी पर आने की कोशिश जारी है। न कुछ पढ़ने का मन होता था न लिखने का, यूँ कहें कि कुछ करने का मन नहीं होता था तो ज्यादा ठीक होगा। न किसी से मिलने का, अगर मजबूरी में मिल भी लिये तो मन मारकर मिल लेते कि सामने वाले को बुरा न लगे। खैर जिंदगी में हर तरह के दौर आते हैं, जिसमें सभी तरह की घटनाएँ घटित होती रहती हैं।
जब जिंदगी बेपटरी हो जाती है तो किसी की भूख मर जाती है और किसी को ज्यादा भूख लगती है, हम दूसरे तरह के निकले, इतनी भूख लगती कि जो सामने आता खा जाते। बस खाते रहो और अपने चिंतन की गहराई में गोते लगाते रहो। कभी ऐसा लगता कि मोटापा ज्यादा बढ़ता जा रहा है, परंतु कुछ अपने से ज्यादा मोटों को देखकर थोड़ी चिंता कम होती कि चलो अपने अभी इससे तो कम हैं। खैर यह तो मन को मनाने की बात है परंतु चिंता का विषय भी है, खैर अब दिनचर्या को ठीक करने का प्रयत्न जारी है।
इसी बीच एक अच्छी और ठीक ठाक खबर यह रही कि एक और बीमा लिया तो उन्होंने पूरे शरीर की जाँच करवाई तो अपने शरीर के सारे पुर्जे बराबर पाये गये और उसमें हमें उत्तीर्ण कर दिया गया। खासकर टीमटी में तो दौड़ाकर और चलाकर और फ़िर हृदय को आराम मिलने तक जो प्रक्रिया रही तो हृदय की पूरी जाँच हो गई।
अब फ़िर से लेखन में नियमितता आ पायेगी, ऐसी उम्मीद है, इसी बीच बहुत सारे वित्तीय लेख पढे और बहुत सारे वित्तीय विषयों और प्रबंधन विषयों पर विश्लेषण भी किया अगर वे या कुछ मेरे शब्दों में ढ़ल पाये तो जल्दी ही पोस्ट ठेलायमान होगी।
लेपटॉप पर विन्डोज का हिन्दी सुविधा भी चालू कर ली है, परंतु उसका कीबोर्ड रेमिंग्टन है, क्या हम उसे फ़ोनोटिक में उपयोग कर सकते हैं ? अगर कोई यह बता दे तो अपना एक माह का समय रेमिंग्टन सीखने से बच जायेगा।
अब यह संकल्प भी लिया है कि हर महीने कम से कम एक पुस्तक तो पढ़नी ही है, और अपने मोबाईल पर पीडीएफ़ पढ़ने में थोड़ी तकलीफ़ होती है तो अमेजन किंडल फ़ायर लेने की आग मन में लगी हुई है परंतु अब सोचा जा रहा है कि भौतिक रूप से किताबों को ही पढ़ा जाये और अपनी अलमारी को ही भरा जाये।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 02, 2011 01:28 PM· permalink
कश्मीर भारत के दो युद्ध क्षेत्रों में से एक है, जहां से कोई खबर बाहर नहीं निकल सकती. लेकिन गुमनाम कब्रों में दबी लाशें खामोश नहीं रहेंगी
23 सितंबर की सुबह 3 बजे दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचने के कुछ ही घंटों के भीतर अमेरिकी रेडियो पत्रकार डेविड बार्सामियन को वापस भेज दिया गया. पब्लिक रेडियो पर प्रसारण के लिए स्वतंत्र रूप से मुफ्त कार्यक्रम बनाने वाला यह खतरनाक आदमी चालीस वर्षों से भारत आता रहा है और उर्दू सीखने और सितार बजाने जैसे खतरनाक काम कर रहा है.
बार्सामियन की एडवर्ड सईद, नोम चोम्स्की, हॉवर्ड जिन, एजाज अहमद और तारिक अली के साथ इंटरव्यू की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं (वे जब नौजवान थे तो चोम्स्की और एडवर्ड हर्मेन की किताब मैन्यूफैक्चरिंग कन्सेंट पर पीटर विंटॉनिक की डॉक्यूमेंटरी फिल्म में बेल-बॉटम पहने हुए एक साक्षात्कारकर्ता के रूप में दिखे थे).
भारत के अपने हालिया दौरों के दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं, अकादमिशियनों, फिल्म निर्माताओं, पत्रकारों और लेखकों (जिनमें मैं भी शामिल हूं) से रेडियो इंटरव्यू की शृंखला पर काम किया है. बार्सामियन का काम उनको तुर्की, ईरान, सीरिया, लेबनान और पाकिस्तान ले गया है. वे इनमें से किसी भी देश से वापस नहीं लौटाए गए हैं. तो आखिर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस अकेले, सितार बजाने वाले, उर्दू बोलने वाले, वाम रुझान वाले रेडियो कार्यक्रम निर्माता से इतना डर क्यों गया? बार्सामियन खुद इसका खुलासा इस तरह करते हैं:
‘इसकी वजह कश्मीर है. मैंने झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, नर्मदा बांध, किसानों की आत्महत्याओं, गुजरात जनसंहार और विनायक सेन के मुकदमे पर काम किया है. लेकिन यह कश्मीर है जो भारतीय राज्य की चिंताओं के केंद्र में है. इस मुद्दे पर सरकारी कहानी को चुनौती नहीं दी जा सकती.’
उनको लौटा देने के बारे में आयी खबरों में आधिकारिक ‘स्रोतों’ का हवाला दिया गया था, जिनका कहना था कि बार्सामियन ने ‘2009-10 के अपने दौरे के दौरान वीजा नियमों का उल्लंघन करते हुए पेशेवर रूप से काम किया था, जबकि उनके पास पर्यटक वीसा था.’ भारत में वीजा नियमों के जरिए सरकार की चिंताओं और पूर्वाग्रहों का अंदाजा लगाया जा सकता है. ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के फटे हुए पुराने बैनर का इस्तेमाल करते हुए गृह मंत्रालय ने आदेश जारी किया है कि सम्मेलनों में बुलाए गए विद्वानों और अकादमीशियनों को वीजा जारी करने से पहले सुरक्षा क्लियरेंस जरूरी है. इस क्लियरेंस की जरूरत कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिवों और बिजनेसमैनों को नहीं होगी.
तो जो आदमी बांध निर्माण में निवेश करना चाहता है, या एक स्टील प्लांट बनाना चाहता है या एक बॉक्साइट की खान खरीदना चाहता है वह सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जाता. लेकिन एक विद्वान जो शायद विस्थापन या सांप्रदायिकता या इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते कुपोषण के बारे में एक सेमिनार में हिस्सा लेना चाहता है, वह सुरक्षा के लिए खतरा है. बुरे इरादों वाले आतंकवादियों ने शायद यह अंदाजा लगा लिया होगा कि किसी सेमिनार में हिस्सा लेने की तरकीब अपनाने के बजाय कामकाजी पोशाक में सज-धज कर कोई खान खरीदने का नाटक करना ज्यादा कारगर होगा.
डेविड बार्सामियन कोई खान खरीदने या किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत नहीं आए थे. वे बस लोगों से बातें करने आए थे. ‘आधिकारिक सूत्रों’ के मुताबिक उनके खिलाफ जो शिकायत की गई है, वह यह है कि भारत के अपने पिछले दौरे के दौरान उन्होंने जम्मू और कश्मीर की घटनाओं के बारे में रिपोर्टिंग की थी और वह रिपोर्टिंग ‘तथ्यों पर आधारित नहीं थी’. याद रखें कि बार्सामियन रिपोर्टर नहीं हैं. वे लोगों से बातें करने वाले आदमी हैं. वे अधिकतर असहमत लोगों से उस समाज के बारे में बातचीत करते हैं, जिनमें वो लोग रहते हैं.
क्या पर्यटक जिस देश में जाते हैं, वहां के लोगों से बातें करना गैर कानूनी है? क्या यह मेरे लिए गैर कानूनी होगा कि मैं अमेरिका या यूरोप जाऊं और वहां मिले लोगों के बारे में लिखूं? भले ही मेरा लेखन ‘तथ्यों पर आधारित नहीं हो?’ कौन तय करेगा कि कौन ‘तथ्य’ सही है और कौन नहीं? क्या बार्सामियन तब भी लौटा दिए जाते अगर उन्होंने दुनिया के सबसे सघन फौजी कब्जे में (कश्मीर में अंदाजन एक करोड़ की आबादी पर छह लाख सक्रिय फौजी जवान तैनात हैं) रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बातचीत रिकॉर्ड करने के बजाय कश्मीर चुनावों में भारी मतदान की तारीफ करने वाली बातचीत रिकॉर्ड की होती?
डेविड बार्सामियन पहले आदमी नहीं हैं, जिन्हें कश्मीर की संवेदनशीलता के नाम पर भारत सरकार ने वापस लौटा दिया है. सान फ्रांसिस्को के एक नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर रिचर्ड शापिरो नवंबर, 2010 में दिल्ली हवाई अड्डे से बिना कोई वजह बताए वापस लौटा दिए गए थे. शायद यह उनकी सहयोगी अंगना चटर्जी पर दबाव डालने का एक तरीका था. अंगना इंटरनेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्युमन राइट्स एंड जस्टिस की सह-संयोजक है, जिसने सबसे पहले कश्मीर के गुमनाम सामूहिक कब्रों की मौजूदगी को दर्ज किया था.
सितंबर, 2011 में मनीला स्थित एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉल्यूंटरी डिसएपियरेंस (अफाद) के मायो आकिनो को दिल्ली हवाई अड्डे से वापस लौटा दिया गया. इस साल के शुरू में 28 मई को एक मुखर भारतीय जनवादी अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को श्रीनगर हवाई अड्डे से दिल्ली लौटा दिया गया था. कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने उनको लौटा देने को जायज ठहराते हुए कहा था कि नवलखा और मुझ जैसे लेखकों को कश्मीर के मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ‘कश्मीर जलने के लिए नहीं है.’
कश्मीर को सारी चीजों से काटा जा रहा है. उसे दो सीमाओं पर सख्त गश्ती के जरिए बाहर की बाकी दुनिया से काटा जा रहा है. ये सीमाएं हैं दिल्ली और श्रीनगर. मानों कश्मीर आजाद हो चुका हो और जिसके पास वीजा देने की अपनी अलग व्यवस्था हो. इसकी सीमा के भीतर सरकार और फौज के लिए शिकार का अनवरत सिलसिला चलता रहता है. कश्मीरी पत्रकारों और आम लोगों को काबू में करने की कला के तहत रिश्वत, धमकियां, ब्लैकमेल और बयान न की जा सकने वाली क्रूरता की मदद ली जाती है.
जिस वक्त सरकार जिंदा लोगों को खामोश करने की कोशिशें कर रही है, लाशों ने बोलना शुरू कर दिया है. शायद यह बार्सामियन की निष्ठुरता थी कि उन्होंने कश्मीर जाने की योजना तब बनाई जब राज्य मानवाधिकार आयोग ने आखिरकार आधिकारिक रूप से कश्मीर के तीन जिलों में 2700 गुमनाम कब्रों की मौजूदगी को स्वीकार करने का पाखंड किया. दूसरे जिलों से हजारों कब्रों की रिपोर्टें भी आ रही हैं. शायद यह उन गुमनाम कब्रों की निष्ठुरता है जिन्होंने ठीक उस समय भारत सरकार को परेशानी में डाल दिया है जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में भारत के रिकॉर्ड की समीक्षा होनी है.
खतरनाक डेविड के अलावा दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और किन लोगों से डरता है? छत्तीसगढ़ राज्य में दंतेवाड़ा से आनेवाले एक आदिवासी नौजवान लिंगाराम कोडोपी से, जिन्हें 9 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस का कहना है कि उसने उन्हें बाजार में रंगे हाथों तब पकड़ा तब वे एक लौह-अयस्क खनन कंपनी एस्सार से सुरक्षा राशि (प्रोटेक्शन मनी) लेकर प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को दे रहे थे. उनकी चाची सोनी सोरी कहती हैं कि सादी वर्दी में आई पुलिस उन्हें पालनार गांव में उनके दादा के घर से सफेद बोलेरो कार में ले गई.
दिलचस्प है कि अगर पुलिस की कहानी सही है, तो उन्होंने लिंगाराम को गिरफ्तार कर लिया और माओवादियों को भाग जाने दिया. यह उन बेतुकी बातों के सिलसिले की सबसे ताजा कड़ी है, जिसके तहत उन्होंने लिंगाराम के खिलाफ सनक भरे आरोप लगाए और वापस लिए थे. उनका असली कसूर यह है कि वो स्थानीय गोंडी भाषा जानने वाले अकेले पत्रकार हैं और वे यह भी जानते हैं दंतेवाड़ा के दूर-दराज के जंगली इलाकों में कैसे बात करनी है. दंतेवाड़ा भारत का एक दूसरा युद्ध क्षेत्र है, जहां से किसी भी हालत में कोई खबर बाहर नहीं आनी चाहिए.
सरकार ने मध्य भारत में आदिवासी समुदायों की जमीन के बड़े बड़े टुकड़े बहुराष्ट्रीय खनन और आधारभूत संरचना कारपोरेशनों को एक के बाद एक गोपनीय करारों के जरिए सौंप दिया है. इसके बाद उसने इन जंगलों को लाखों सुरक्षा बलों से भर दिया. हथियारबंद और गैर हथियारबंद, सारे प्रतिरोधों को ‘माओवादी’ के रूप में चिह्नित कर दिया गया है (जैसे कि कश्मीर में सब ‘जिहादी तत्व’ हैं).
गृह युद्ध के तेज होने के साथ सैकड़ों घर जलाए जा रहे हैं. हजारों आदिवासियों ने भाग कर पड़ोसी राज्यों में पनाह ली है. लाखों डरे हुए लोग जंगलों में छिपे हुए हैं. अर्धसैनिक बलों ने जंगल को घेर लिया है, जिससे गांववालों के लिए जरूरी चीजों और दवाओं के लिए बाजार जाना एक दु:स्वप्न हो गया है. अनगिनत गुमनाम लोग जेलों में हैं जिन पर देशद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप हैं. उनके बचाव के लिए कोई वकील तक नहीं है. उन जंगलों से बहुत थोड़ी खबरें आ पाती हैं और वहां तो लाशों की कोई गिनती नहीं है. इसलिए यह देखना मुश्किल नहीं है कि क्यों लिंगाराम कोडोपी से इतना बड़ा खतरा है. पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित होने के पहले वे दंतेवाड़ा में एक ड्राइवर थे. 2009 में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर उनकी जीप को जब्त कर लिया. उन्हें 40 दिनों तक एक छोटे से शौचालय में बंद कर के रखा गया जहां उऩ पर सलवा जुडूम में शामिल होने और विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनने के लिए दबाव डाला गया. सलवा जुडूम सरकार पोषित एक हत्यारी सेना है जिसे लोगों को उनके गांवों से निकाल बाहर करने के लिए बनाया गया था (सलवा जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया है).
पुलिस ने लिंगाराम को तब छोड़ा जब गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अदालत में बंदी को अदालत में पेश करने की याचिका दायर की. लेकिन पुलिस ने लिंगाराम के बूढ़े पिता और परिवार के दूसरे पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया. उन्होंने उनके गांव पर हमला किया और गांववालों को धमकाया कि वे उन लोगों को शरण न दें. आखिरकार लिंगाराम दिल्ली भाग आए जहां उनके दोस्तों और शुभचिंतकों ने उनका दाखिला एक पत्रकारिता स्कूल में करा दिया. अप्रैल, 2010 में उन्होंने दंतेवाड़ा का दौरा किया और गांववालों को दिल्ली तक लाए ताकि वे इंडिपेंडेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल के सामने सलवा जुडूम, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की बर्बरता की गवाही दे सकें. खुद अपनी गवाही में लिंगाराम ने माओवादियों की भी तीखी आलोचना की थी.
लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस इससे भी बाज नहीं आई. 2 जुलाई, 2010 को माओवादी पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता कॉमरेड आजाद आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा पकड़ कर मार दिए गए. छत्तीसगढ़ पुलिस के उप महा निरीक्षक केल्लुरी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एलान किया कि लिंगाराम कोडोपी को माओवादी पार्टी द्वारा कॉमरेड आजाद की भूमिका के लिए चुना गया है (यह ऐसा ही था मानो 1936 के येनान में एक छोटे स्कूली बच्चे को चाऊ एन लाई कहा जाए). इस आरोप का इतना मजाक उड़ा कि पुलिस को इसे वापस लेना पड़ा. इसके फौरन बाद उन्होंने लिंगाराम पर दंतेवाड़ा में एक कांग्रेस विधायक पर हुए माओवादी हमले का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाया. लेकिन यह इतनी बकवास बात थी कि वे उन्हें गिरफ्तार नहीं कर पाए.
लिंगाराम दिल्ली में बने रहे और उन्होंने अपना कोर्स पूरा करके पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया. मार्च, 2011 में अर्धसैनिक बलों ने दंतेवाड़ा में ताड़मेटला, तिम्मापुरम और मोरापल्ली नामक तीन गांवों को जला दिया. छत्तीसगढ़ सरकार ने इसका इल्जाम माओवादियों पर मढ़ा. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इसकी जांच करने का जिम्मा दिया. लिंगाराम एक वीडियो कैमरे के साथ दंतेवाड़ा लौटे और गांव-गांव जाकर गांव वालों से गवाहियां जमा करते रहे, जिन्होंने पुलिस को कसूरवार ठहराया. ऐसा करके उन्होंने खुद को दंतेवाड़ा के मोस्ट वांटेड लोगों में शामिल करा दिया. आखिरकार 9 सितंबर को पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया.
लिंगाराम छत्तीसगढ़ में खबरें जुटाने और उन्हें दूसरों तक पहुंचाने वाले तकलीफदेह लोगों की जमात में शामिल हो गए हैं. सबसे शुरू-शुरू में एक मशहूर डॉक्टर विनायक सेन को खामोश करने की कोशिश की गयी, जिन्होंने सबसे पहले 2005 में सलवा जुडूम के अपराधों के खिलाफ आवाज उठाई थी. उन्हें एक माओवादी होने का आरोप लगा कर 2007 में गिरफ्तार कर लिया गया और आजीवन कारावास की सजा दे दी गई. कई साल जेल में बिताने के बाद वे अभी जमानत पर बाहर हैं.
कोपा कुंजम दंतेवाड़ा के जंगल के गांवों में मेरे पहले गाइड थे. जब वे हिमांशु कुमार के वनवासी चेतना आश्रम के साथ काम करते थे तो उन्होंने ठीक वही काम किए थे, जिन्हें बाद में लिंगाराम करने की कोशिश कर रहे थे. वे दूर-दराज के गांवों में यात्राएं करते थे, खबरें लाते थे और लोगों पर हावी खौफ को दर्ज करते थे. दंतेवाड़ा के दौरे पर गए पत्रकारों, लेखकों और अकादमिशियनों की आखिरी तटस्थ पनाह वह आश्रम 2009 के मई में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा तोड़ दिया गया.
कोपा को सितंबर, 2009 में मानवाधिकार दिवस के दिन गिरफ्तार किया गया. उन पर एक आदमी की हत्या और एक दूसरे के अपहरण के मामले में माओवादियों से मिलीभगत का आरोप लगाया गया. कोपा के खिलाफ मामला तब बिखरने लगा जब पुलिस के गवाह उस बयान से मुकर गए, जिसे उन्होंने कथित रूप से पुलिस के सामने दिया था. उनमें वह आदमी भी शामिल था, जिसका अपहरण हुआ था. वास्तव में इससे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि भारत में तो प्रक्रिया ही सजा है.
कोपा को बेगुनाह साबित होने में कई साल लग गए. जिन लोगों ने कोपा से प्रेरणा लेकर पुलिस के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई थीं उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. उनमें महिलाएं भी शामिल थीं, जिनका अपराध यह था कि उनका बलात्कार हुआ था. कोपा की गिरफ्तारी के ठीक बाद हिमांशु कुमार को दंतेवाड़ा से खदेड़ दिया गया.
आखिरकार यहां भी मुर्दे बोलेंगे. और केवल मारे गए लोग ही नहीं बोलेंगे, मारी गई जमीन, मारी गयी नदियां, मारे गये पहाड़ और मारे गए जंगलों के मारे गए जीव सुनने पर मजबूर कर देंगे.
निगरानी, इंटरनेट पुलिसिंग और फोन टेपिंग के इस दौर में जब हर गुजरते दिन के साथ बोलने वालों पर हमलों की कठोरता बढ़ती जा रही है, यह बहुत अटपटा है कि भारत साहित्यिक महोत्सवों की सपनीली मंजिल बनता जा रहा है. इनमें से अनेक महोत्सव उन्हीं कारपोरेशनों के पैसों पर आयोजित होते हैं, जिनकी तरफ से पुलिस ने आतंक का राज कायम कर रखा है.
श्रीनगर में हारुद साहित्यिक महोत्सव (जिसे कुछ समय के लिए स्थगित किया गया है) उनमें सबसे नया था. यह भारत का सबसे रोमांचक साहित्यिक महोत्सव था- ‘जब शरद पत्तियों का रंग बदल रहा होगा तो कश्मीर वादी शायरी, अदबी गुफ्तगू, बहसों-मुबाहिसों से गूंज उठेगी...’
इसके आयोजकों ने इसे एक ‘अराजनीतिक’ आयोजन के रूप में प्रचारित किया था. लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि शासक और दसियों हजार लोगों की हत्याएं करने वाला क्रूर फौजी कब्जा कैसे ‘अराजनीतिक’ हो सकता है. मुझे जानने की इच्छा है- क्या मेहमान पर्यटक वीजाओं पर आएंगे? क्या श्रीनगर और दिल्ली के लिए अलग-अलग वीजाएं होगीं? क्या उन्हें सेक्योरिटी क्लियरेंस की जरूरत होगी?
इस सारी झूठी आजादी के महोत्सव का यह शोर-शराबा हवाई अड्डों के गलियारों में बजते उन लोगों को कदमों की आवाजों को घोंटने में मदद करने के लिए है, जिन्हें टांग कर वापस लौटते जहाजों पर चढ़ाया जा रहा है. यह हथकड़ियों की उन खनखनाहटों को खामोश करने के लिए है जो मजबूत, गर्म कलाइयों में लगी हुई हैं. यह जेल के दरवाजों के ठंडे लोहे की खनक को दबाने के लिए है.
हमारे फेफड़ों से ऑक्सीजन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. शायद यह वह वक्त है कि हम अपनी देह में जो भी सांस बची रह गई है उसका इस्तेमाल करें और कहें: ‘खूनी दरवाजों को खोल दो.’
गार्जियन में प्रकाशित मूल आलेख से साभार. लेखक द्वारा दिए गए मूल लिंकों को पोस्ट में बरकरार रखा गया है. डेविड बार्सामियन के बारे में और जानने के लिए इस अंग्रेजी लिंक पर जाया जा सकता है.
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on October 02, 2011 07:20 AM· permalink
ब्लॉगिंग से कमाई करने की आस देखने वालों के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है. एक नई सेवा चालू की गई है. पोस्ट्स जीनियस. यह बहुभाषी सेवा है, जिसमें हिंदी भी शामिल है. इस सेवा के जरिए ब्लॉग पोस्टें लिख कर कमाई की जा सकती है. यह सेवा दो-तरफा है. जहाँ ब्लॉगर या वेबसाइट मालिक किसी उत्पाद के रीव्यू व ब्लॉग पोस्टें लिख कर कमाई कर सकते हैं तो तो उत्पादक या विक्रेता ऐसी पोस्टें लिखवा कर अपने उत्पाद का विज्ञापन/विपणन भी कर सकते हैं.
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आजकल किसी भी उत्पाद की खरीदी के लिए इंटरनेट के जरिए उसके रीव्यू और फ़ीडबैक का सहारा लेने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. इसी बात को मद्देनजर रखते हुए यह सेवा प्रारंभ की गई है.
विज्ञापनदाताओं / व्यापारियों के लिए कहा गया है -
"विज्ञापनदाता, विपणनकर्ता तथा एसईओ
अपने वेबसाइट, उत्पाद या सेवा के लिए प्रायोजित आलेख, भुगतान किए गए ब्लॉग पोस्ट व समीक्षाएँ खरीदें और ट्रैफ़िक व बज़ पाएँ. किसी नई साइट, उत्पाद या सेवा के लिए बज़ पैदा करें. इसके बारे में पूरी दुनिया को लोगों को बताएँ. सर्च इंजिन रैंकिंग बढ़ाने के लिए उच्च गुणवत्ता के स्थाई पाठ कड़ियाँबनाएँ. व्यवसायिकसमीक्षकों तथा उनके पाठकों से सही व रचनात्मक सुझाव प्राप्त करें. लक्षित पाठकों से और ज्यादा डायरेक्ट विजिटर्स प्राप्त कर अपने वेबसाइट ट्रैफ़िक को बढ़ाएँ. प्रति पोस्ट/आलेख/समीक्षा की कीमत $5 से प्रारंभ होती है और यह सिर्फ आप पर निर्भर है कि आप कितना भुगतान करना चाहते हैं."
देखना ये है कि इसे विज्ञापनदाता, उत्पादक और विक्रेता किस रूप में लेते हैं. ब्लॉगर तो खैर अतिरिक्त आय की आस में इससे जल्द ही जुड़ेंगे. परंतु जब तक इससे अच्छी खासी संख्या में विज्ञापनदाता नहीं जुड़ेंगे, इस सेवा की सफलता में संदेह है.
फिर भी, ब्लॉगिंग से - वह भी हिंदी ब्लॉगिंग से कमाई का एक और चैनल खुला तो सही. अब ये दीगर बात है कि हमें सफलता कब और कितनी मिलती है, या मिलती भी है या नहीं!
Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 02, 2011 06:34 AM· permalink
पिछले सालमानसून में मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम की पढ़ाई कर रहा था. इस संस्थान ने पिछले साल ही अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए. एफटीआईआई की यात्रा और भारतीय सिनेमा में उसके योगदान को लेकर मैंने एक लेख लिखा था और इसी सिलसिले में मणि कौल को मैंने फोन किया था. उन्होंने कहा कि ‘मैं आ ही रहा हूँ वहीं बैठ कर बात कर लेंगे.’
पाठ्यक्रम के आखिरी दिन मणि कौल ने अपना व्याख्यान दिया था. मैं उनके हंसमुख व्यक्तित्व और मजाकिया लहजे से परिचित था. ‘ओसियान’ फिल्म समारोह के दौरान दिल्ली में उनसे गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी.बीते कुछ वर्षों से वे दिल्ली ही रह रहे थे और ओसियान से जुड़े थे.व्याख्यान के दौरान जब एप्रीसिएशन पाठयक्रम के संयोजक सुरेश छाबरिया ने उनका परिचय कराते हुए कहा कि‘मणि हमारे समय के सबसे बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं’तो कई सहपाठियों ने विस्मय से उनकी ओर देखा था. हमारी पीढ़ी जिसने नब्बे के दौरान होश संभाला, मणि कौल और उनकी फिल्मों को नहीं जानती. लेकिन मणि कौल एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’पढ़ाई के दौरान में हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’लेकिन‘सिद्देश्वरी’देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.
दरअसल, मणि कौलखुद के बारे में बेहद मजाकिया लहजे में बात करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने हमें एक वाकया सुनाया था. चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह?रोटी के ऊपर फिल्म!और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओहम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज’हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं? मणि कौल को संगीत की गहरी समझ थी. उन्होंने डागर बंधुओं से विधिवत संगीत सीखा था और जिसकी परिणति ‘ध्रुपद’फिल्म में सामने आई. मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा हैं. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे.
वर्ष 1969 में महज 25 वर्ष की उम्र में मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर इसी नाम से फिल्म बना कर उन्होंने हिंदी फिल्मों को ‘पापुलर सिनेमा’ से बाहर निकाल कर ‘समांतर सिनेमा’ का एक नया रास्ता दिखाया था. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.
घटक की तरह ही हम उनके योग्य शिष्य मणि कौल की फिल्मों को उनके जीते जी समझ नहीं पाए.
समांतर सिनेमा को दुरूह और अबूझ कह कर खारिज करने की कोशिश की जाती रही है. हालांकि उन्होंने कहा था कि ‘वर्तमान में जब अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशक मुझे फोन कर के कहते हैं कि मेरी फिल्मों से उन्हें काफी सीख मिलती है तो काफी खुशी होती है.’ दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्मों में संवेदनशील, प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों की आवक बढ़ी है जो मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं.
लेकिन आज जब कुछ लोग‘डेल्ही बेली’औरउसमें प्रयुक्त भौंडेपन और गालियों को ही सिनेमा की भाषा मानने पर जोर दे रहे हैं, ऐसे में मणि कौल की फिल्मों की पहचान कैसे होगी?
(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 9 जुलाई 2011 को प्रकाशित. चित्र में एफटीआईआई-एनएफएआई में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम, 2010 के दौरान व्याख्यान देते मणि कौल)
Posted by Arvind Das (noreply@blogger.com) on October 01, 2011 07:10 PM· permalink
हिंदी की हैदराबादी सुर डॉ. रमा द्विवेदी हमीरपुर (उत्तर प्रदेश) में 1953 में पैदा हुईं डॉ. रमा द्विवेदी ने गीत, गजल, मुक्तक, क्षणिकाएं, हाइकू , छंद मुक्त कविता, कहानी, लेख, समीक्षा जैसी तमाम विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है. अखिल भारतीय कवयित्री समेलन, खुर्जा द्वारा प्रकाशित ‘कविता’ के अलावा ‘पुष्पक’ के कई अंकों का संपादन [...]
Posted by ramadwivedi on October 01, 2011 05:24 PM· permalink
अनाड़ी इसलिए लिखा कि आप सब मेरे पाक कला ज्ञान से अच्छी तरह से वाकिफ़ है। मेरे बनाए खाने का क्या-क्या हाल हुआ। लेकिन इन गर्मियों की छुट्टियों में लगन से खाना बनाना सीखा और सब्जी-रोटी बिना किसी गलती के एकदम सही बनाई भी।
पिछले दिनों फेसबुक पर मैने अपने हाथों से बनाए मक्के के हल्वे का फोटो लगाया तो बहुत से मित्रों ने उसकी रेसेपी पूछी, तो मैं आज आप सभी के लिए मक्काई का हल्वा बनाने की विधी पेश कर रहा हूँ। इस स्वादिष्ट हलवे को राजस्थानी में “जाजर्यो/ जाजरियो” कहते हैं।
बनाने से पहले ध्यान देने योग्य बातें:
मक्काई का हल्वा बनाने के लिए अन्य मिठाईयों की तुलना में अधिक मेहनत और समय लगता है।
सामग्री: 6 हरे और कोमल दानों वाले देशी ( स्वीट कोर्न नहीं) भुट्टे, जिनके दानों को नाखुन से दबाने पर दूध निकलता हो।
शुद्ध घी 200 ग्राम, शक्कर 200 ग्राम ( स्वादानुसार कम या ज्यादा की जा सकती है)
काजू, किशमिश और अपने मनपसन्द कटे हुए सूखे मेवे 1 कप, 1 लीटर पानी
बनाने से पहले की तैयारी। भुट्टों को छील लें और ध्यान रखें कि उसमें भुट्टे की मूछें (बाल) ना रहने पाये भुट्टों को छलनी या किसनी पर किस लें, ध्यान रखें कि मक्की के छिलके किसते नीचे ना जायें वैसे छिलका ऊपर जाली में रह जाता है, उसे निकालते जायें और फेंक दे।
विधी:
एक मोटे पैंदें वाली कड़ाही में घी तेज गर्म करें जब घी अच्छी तरह गर्म हो जाये किसी हुई मक्का को घी में डाल दें और चम्मच या खुरपे से हिलाते जाएं। इस दौरान गैस की आँच एकदम धीमी रखें, आपको कम से कम 45-50 मिनिट तक इसे हिलाते रहना पड़ेगा, हिलाते समय चम्मच बिल्कुल रुके नहीं वर्ना हल्वा चिपक जायेगा और जल जायेगा। चित्र क्रमांक 1-2
अब इसमें से पानी उड़ जायेगा और घी भी गायब हो जायेगा और यह एकदम सूख जायेगा मानों आप मक्की की सूजी को भून रहे हों। इस समय तेज खुशबु भी आने लगेगी। पदार्थ का रंग लाल होने लगेगा, अभी कुछ देर और सेकें। चित्र-3
अब दूसरे गैस पर पानी गर्म करें, पानी उबलने तक गर्म करें चित्र-6
पहले वाले गैस पर हलवा एकदम लाल होने लगे (चित्र-4) ध्यान रखें कि जल कर काला ना हो जाये, तब खौलता हुआ गर्म पानी उसमें सावधानी से डाल दें, और अब धीरे धीरे हिलाएं लेकिन रुके नहीं वर्ना गांठे पड़ जायेंगी।चित्र-5
कुछ देर में पानी उड़ने लगेगा अब आप इसमें सूखे मेवे डाल दें, और हिलाते रहें। चित्र 7
जब पानी एकदम उड़ जाये आप इसमें चीनी डाल दें। चित्र 8-9
कुछ देर और हिलायें जब शक्कार घुल जायेगी वापस अपने आप घी दिखने लगेगा। अगर आपको यहाँ घी कम दिखता है तो और अगर आपका स्वास्थय इजाजत दे तो थोड़ा घी और डालें। चित्र 10-11-12
बस हल्वा तैयार है, गर्मा-गर्म परोसें और सूखे मेवों की सजावट करें और खाएं। यह गर्म तो स्वादिष्ट लगता है ही, ठंडा होने पर भी अच्छा लगता है। चित्र 13
इस चिट्ठी में लेखक रस्किन बॉन्ड के बारे में चर्चा है। यह मेरी मथुरा यात्रा की भूनिका है। इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें।
रस्किन बॉन्ड पुस्तकों की दुकान पर - चित्र फोटोबकेट से चित्र
रस्किन बॉन्ड (Ruskin Bond), अंग्रेजी भाषा के, बेहतरीन लेखक हैं। उनके पिता रॉयल ऐयर फॉर्स में थे। उनका एक भाई और एक बहन है। उनका जन्म १९ मई १९३४ में कसौली हिमाचल में हुआ था। उनका बचपन जामनगर, शिमला और देहरादून में बीता। वे छोटे ही थे जब उनके माता पिता का तलाक हो गया। उनकी मां ने एक हिन्दू से शादी कर ली।
रस्किन बॉन्ड ने अपनी पढ़ाई शिमला के बिशप कॉटन स्कूल से पूरी की। इसके बाद वे लंदन चले गये। लेकिन वे भारत को भूल नहीं पाये और वापस यहीं आ कर बस गये। इस समय वे, मसूरी के पास, लैंडोर (Landour) में, अपने गोद लिये परिवार के साथ, रहते हैं।
रस्किन बॉन्ड का बचपन पुस्तकों के बीच बीता। शायद इसी ने, उनके मन में पुस्तक प्रेम जगाया जिसने उन्हें लेखक बनने के लिये प्रेरित किया। उन्होंने १७ साल की उम्र में पहली कहानी 'रूम ऑन द रूफ' (Room On The Roof) लिखी। इसके लिये उन्हें १९५७ में John Llewellyn Rhys पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरुस्कार ३५ साल से कम उम्र के कॉमनवेल्थ को इंग्लैंड में प्रकाशित अंग्रेजी लेखन के लिये दिया जाता है।
उन्हें साहित्य अकादमी के द्वारा १९९२ में अंग्रेजी लेखन के लिये उनकी लघु कहानियों के संकलन 'Our Trees Still Grow in Dehra' पर साहित्य अकादमी पुरुस्कार भी मिल चुका है। १९९९ में बाल साहित्य में योगदान के लिये वे पद्म श्री से सम्मानित किये गये हैं।
रस्किन बॉन्ड की कई कहानियों पर फिल्में बन चुकी हैं। शशी कपूर की फिल्म 'जनून' १८५७ की स्वतंत्रता की लड़ाई की घटना पर है। यह उनकी कहानी 'A Flight of Pigeons' पर आधारित है। फिल्म 'The Blue Umbrella' भी उनकी इसी नाम की कहानी पर बनी है। प्रियंका चोपड़ा के द्वारा अभिनीत की गयी फिल्म 'सात खून माफ', उनकी लघु कथा 'Susanna's Seven Husbands' पर बनायी गयी है।
रस्किन बॉन्ड, मेरे बेटे के प्रिय लेखक भी हैं हांलाकि मैंने उन्हें नहीं पढ़ा है। अपने बेटे के कहने पर, मैंने उनकी पस्तक 'The Best of Ruskin Bond' पढ़नी शुरू की। इसमें उनकी लघु कहानियां, वीभत्स कहानियां, निबन्ध, यात्रा वर्णन, गीत और प्रेम कवितायें हैं।यात्रा वर्णन में, उनका एक लेख मथुरा के बारे में 'Mathura's Hallowed Haunts' शीर्षक से है। इसमें वे लिखते हैं,
'It has been said that, “if a man spend in Benaras all his lifetime, he has earned less merit than if he passes but a single day in the sacred city of Mathura' कहा जाता है कि बनारस में पूरा जीवन बिताने पर भी, मथुरा में एक दिन व्यतीत करने से कम पुण्य मिलता है।
लेकिन मथुरा में है क्या - यह अगली बार।
'द ब्लू अम्ब्रैला' का लोकप्रिय गीत 'छतरी का उड़न खटोला' सुनिये
मथुरा में एक दिन, पूरे बनारसी जीवन पर भारी - मथुरा यात्रा
कि सी भाषा की लम्बी उम्र और शब्द-समृद्धि के मूल में उस भाषा का अन्य भाषाओं से जीवंत सम्पर्क महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से भाषाई आदान-प्रदान होता रहा है। सभ्यता के विकासक्रम में क्षेत्रीय भाषाओं में से कोई एक भाषा परिनिष्ठित भाषा का रूप लेती है। तब शुद्धता का आग्रह भी सामने आता है। आज के दौर में हिन्दी भी ऐसी ही परिस्थिति से जूझ रही है। हिन्दी में अब बोली-भाषा के शब्द धीरे धीरे गायब हो रहे हैं। गौरतलब है कि लोक बोलियों के विभिन्न शब्दों की अर्थवत्ता बड़ी व्यापक होती है। साहित्यिक प्रयोगों के ज़रिये इन शब्दों से पढ़ा-लिखा समाज परिचित होता है। दो दशक पहले तक परिनिष्ठित हिन्दी में आंचलिक बोली के शब्दों का इस्तेमाल होता था। समर्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा में शब्दों की आवाजाही ज़रूरी है, किन्तु हिन्दी वालों में साहित्यानुराग भी धीरे धीरे कम हो रहा है लिहाज़ा लोकभाषा के शब्दो से अपरिचय वाला हिन्दी समाज हमारे सामने है।
श्रवण करने की क्रिया के लिए हिन्दी में ‘सुनना’ शब्द के अलावा कोई अन्य विकल्प हमारे सामने नहीं है। इसका प्रयोग सुनवाई, सुनना, सुनाई पड़ना जैसे अर्थों में होता है। इसके अलावा विचार करना, ध्यान देना जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। सुनना क्रिया से सुन-गुन लेना जैसा मुहावरा भी हिन्दी में चल पड़ा है। संस्कृत में सुनने के लिए ‘श्रवण’ शब्द है। यह बना है ‘श्रु’ धातु से जिसमें सुनने, सुनाई पड़ने का भाव है। ‘श्रवण करना’ यूँ तो सुनने के संदर्भ में हिन्दी में बोला जा सकता है, मगर ऐसे वाक्य प्रयोग व्यवहार में नहीं है। पाली में ‘श्रवण’ का ‘सवन’ रूप है और प्राकृत में ‘सवण’। इसी कड़ी में हिन्दी की ‘सुनना’ क्रिया का विकास हुआ। ताज्जुब होता है कि सुनने की क्रिया के लिए कभी हमारे पास ‘अकनि/अकुनि’ जैसी क्रिया भी थी। सूरदास, तुलसीदास जैसे मध्यकालीन कवियों ने इसके विविध रूपों का प्रयोग किया है। डॉ रामविलास शर्मा इस ‘अकनि/अकुनि’ क्रिया के बारे में लिखते हैं कि अन्य भारतीय आर्यभाषाओं में भी सुनने के अर्थ वाली इस क्रिया का इस्तेमाल होता है। उनके मुताबिक ‘अकनि’ क्रिया के मूल में ‘अक्’ जैसी धातु होनी चाहिए, मगर संस्कृत में ‘अक्’ जैसी कोई क्रिया नहीं है। वे ग्रीक भाषा की क्रिया ‘अकोउओ’ से ‘अकनि’ की तुलना करते हैं जिसका अर्थ भी सुनना ही होता है। उनका मानना है कि ‘अकनि’ या ‘अकुनि’ और ‘अकोउओ’ परस्पर सम्बद्ध हैं। माना जाता है कि आर्यों के भारत आने से पहले प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा से ग्रीक शाखा अलग हो गई थी। ‘अकोउओ’ प्राचीन ग्रीक का शब्द है, आधुनिक ग्रीक का नहीं। इस तरह के शब्द साम्य से ऐसा लगता है कि इंडो-यूरोपीय भाषाओं के विकास को समझने के लिए उनका तुलनात्मक अध्ययन केवल संस्कृत से नहीं बल्कि आधुनिक आर्य भाषाओं से भी करना चाहिए।
ब्रज, अवधि में प्रचलित ‘अकनि/अकुनि’ , ‘अकनना’ जैसी क्रियाओं से मिलती जुलती एक क्रिया मराठी में भी है। हिन्दी की ’सुनना’ जैसी ही स्थिति मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की भी है अर्थात यहाँ भी ‘श्रवण’ करने के लिए ‘ऐकणे’ (अइकणे) के अलावा कोई अन्य पर्यायी शब्द नहीं है। डॉ रामविलास शर्मा जिस दिशा में संकेत कर रहे हैं उससे ऐसा आभास होता है कि संभवतः प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार कि भारतीय शाखाओं में ‘ऐकणे’ (अइकणे),‘अकनि / अकुनि’ जैसे शब्दों की उपस्थित प्राचीन ग्रीक के
‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है। प्रोटो भारोपीय भाषाओं के मूल स्रोतों की दिशा में महान काम करने वाले जूलियस पकोर्नी जैसे ख्यात भाषा शास्त्री का ध्यान इस ओर नहीं गया होगा, यह बात मानना मुश्किल है।
‘अकोउओ’ का प्रभाव मानी जानी चाहिए। इसे आर्यों के आप्रवासन का परिणाम भी माना जा सकता है और प्राचीन यूनान से वृहत्तर भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों का नतीजा भी। ग्रीक ‘अकोउओ’ का परवर्ती रूपान्तर ‘अकूस्टोस’ होता है जिसमें सुनने लायक जैसा भाव है। इसका ही एक रूप ‘अकूस्टिकोस’ होता है जिसका अर्थ भी सुनना ही है। अंग्रेजी के ‘अकूस्टिक’ acoustic और फ्रैंच के acoustique से इसकी रिश्तेदारी निर्विवाद है। जूलियस पकोर्नी द्वारा बताई गईं प्रोटो भारोपीय धातु kous से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ शर्मा का सुझाव महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारोपीय भाषाओं के विकास को परखने के लिए संस्कृत समेत आधुनिक आर्यभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन भी होना चाहिए। मगर विभिन्न संदर्भों के मद्देनज़र अवधि का ‘अकनि/अकुनि’ और मराठी के ‘ऐकणे’ (अइकणे) की रिश्तेदारी ग्रीक की बजाय संस्कृत से ही जुड़ती लग रही है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘अकनि’ दरअसल संस्कृत के ‘आकर्णन’ का रूपान्तर है। आकर्णन का प्राकृत रूप ‘आकण्णण’ होता है। इसका एक रूप ‘आकर्णे’ भी है। ‘आकण्णण’ के अवहट्ठ भाषा में ‘आकण्ड’, ‘आकण्णे’ जैसे रूप भी हैं। ‘अकनि/अकुनि’ इसी कड़ी में आता है।
यह मानना दूर की कौड़ी लगती है कि ‘आकर्णन’ से बने ‘आकण्ण’, ‘अकनि / अकनि’ और ‘ऐकणे’ जैसे शब्दों की ग्रीक ‘अकोउओ’ से रिश्तेदारी है। ध्यान देना चाहिए कि ग्रीक ‘अकोउओ akouo’ का उच्चारण a-koo-oh अर्थात ‘अ कू ओह’ होता है। यह स्पष्ट है कि संस्कृत के आकर्णन की अर्थवत्ता ‘कर्ण’ अर्थात कान से स्थापित हो रही है जिसका गुण सुनना है। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक ‘आकर्णन’ से बनी ‘अकनना’ क्रिया का अर्थ सुनना, कर्णागोचर करना जैसे भाव हैं। आहट लेने, अंदाज़ा लेने के लिए बना सुन-गुन वाला भाव भी आकर्णन या अकनना में है। ‘कान लगा कर सुनना’ जैसा भाव ही वाशि आप्टे के संस्कृत कोश में भी है। यहाँ ‘आकर्णनम्’ शब्द की व्युत्पत्ति आ + कर्ण+ल्युट बताते हुए इसका अर्थ सुनना, कान लगा कर सुनना दिया है। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘अभिकर्ण’ से बताई गई है। संस्कृत के ‘अभि’ उपसर्ग का अर्थ ‘की ओर’, ‘की दिशा में’ होता है। इस तरह अभिकर्ण में भी कान लगा कर सुनने का भाव ही है। इसका मराठी प्राकृत रूप होता है अहिकण्ण > अहिक्खण्ण > ऐकणे। मेरा मानना है कि मराठी ऐकणे का विकास भी संस्कृत के आकर्णनम् से ही हुआ होगा। क्योंकि संस्कृत कोशों में अभिकर्ण शब्द की प्रविष्टि मुझे नहीं मिली।
संस्कृत के ‘कर्ण’ की व्युत्पत्ति हुई है ‘कर्ण्’ धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। ‘कर्ण्’ में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान की संरचना के संदर्भ में इन भावों का अर्थ स्पष्ट है। कान दरअसल एक दीर्घ विवर जैसी संरचना ही है। ‘कर्ण्’ से बने ‘कर्ण’ का अर्थ है किसी वस्तु को थामने वाली संरचना, बाहर निकला हुआ हिस्सा, हत्था, दस्ता या मूठ आदि। कर्ण शब्द की कान के संदर्भ में यहां गुणवाचक अर्थवत्ता भी है और भाववाचक भी। श्रवणेन्द्रिय होने की वजह से यहां स्पष्ट है कि कानों में ध्वनि प्रवेश करती है। इस तरह स्पष्ट है कि ग्रीक ‘अकोउओ’ या अवधी के ‘अकनि/अकनि’ में शब्द साम्य है मगर यह मानना थोड़ा मुश्किल लगता है कि ‘आकर्णनम्’ के प्राकृत रूपों का प्रसार ग्रीक भाषा में हज़ारों वर्ष पहले हुआ होगा। खास बात यह कि ‘अकनि / अकनि’ की रिश्तेदारी जिस तरह से कान अर्थात कर्ण ( संस्कृत धातुमूल कर्ण्) से सिद्ध हो रही है, ग्रीक के ‘अकोउओ’, उसकी मूल धातु kous और इससे बने ‘अकूस्टिक’ जैसे शब्दों में कहीं भी शरीरांग ‘कान’ का भाव नहीं है। प्रोटो भारोपीय शब्दों के मूल स्रोत खोजने का बड़ा काम करने वाले ख्यात भाषाविद् जूलियस पकोर्नी ने इस पहलू की जानबूझ कर अनदेखी की है, यह बात माननी मुश्किल है। ‘अकनि’ और ‘ऐकणे’ की व्युत्पत्ति कल्पित ‘अक्’ धातु की बजाय ‘कर्ण’ में ही निहित है।
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Posted by अजित वडनेरकर (wadnerkar.ajit@gmail.com) on September 29, 2011 07:23 PM· permalink
उनकी हत्या के सप्ताह भर पहले मैं उनके साथ कुछ समय था । होशंगाबाद जिले में गिरफ़्तार हमारे साथी के समर्थन में वे आए थे। होशंगाबाद स्टेशन पर अपना सीधा-सादा एयर बैग पलिटफार्म पर छोड़कर उन्होंने कहा ,’चलो चाय पीते हैं’।मैंने बैग का ध्यान दिलाया तो बोले कि देश भर में इतना भय फैला रखा है कि कोई उसे नहीं छूएगा। हम चाय पीकर आए, बैग ज्यों का त्यों था। वैसे भी उसमें किताबें और एक जोड़ा कपड़ा था। उन्हें मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा से मिलना था। मुख्यमन्त्री के सचिव ने नाम लिख लेने के बाद कहा,’पद-वद बताइए’। नियोगी ने तत्काल अत्यन्त सहजता से कहा,’बता देना गुहा और नियोगी’। पूंजीपतियों द्वारा कराई गई हत्या के दिन भी इस शेर के कमरे की खि्ड़की खुली थी । दल्ली राजहरा के असंगठित मजदूरों को जब भिलाई स्टील प्लान्ट के मजदूर के बराबर मजदूरी दिलाई तब हड़ताल को मुख्य ताकत किसान संगठन द्वारा दिए गए राशन से मिलती ्थी। वेतन बढ़ा तब दो अक्टूबर के दिन २०-२५ हजार मजदूरों ्की रै्ली में नियोगी ने कहा कि शराब पीने के पक्ष में आकर लोग बोलें। फिर अन्त में समझाया कि बढ़ा वेतन दारू कीमत अदा करने में फिर उन्हीं उद्योगपतियों के पास न चला जाए। उनक यूनियन ने शानदार ’शहीद अस्पताल ’ बनाया । विनायक सेन उसके पहले डाक्टरों में थे। विधायक बनाने वाली पहली यूनियन। शहीद नियोगी- लाल जोहार ।
शांति कीतीन ननदें हैं। दो बड़ी और एकछोटी। सबसे बड़ी ननद सबसे पासरहती हैं पर लगाई-बुझाईके झंझटो से बहुत दूर रहतीहैं। न ऊधो का लेना न माधो कोदेना- वो अपनी गिरस्थीमें ही मगन रहती हैं। जब कभीमिलती हैं तो मुहब्बत से मिलतीहैं और मुहब्बत से विदा लेतीहैं। सबसे दूर रहनेवाली बीचवालीननद बोलती बहुत हैं और उनकाख़याल है कि खाना बनाने सेलेकर सजने-सँवरनेऔर नाचने-गाने तक,खानदान में उनके बराबरकोई है ही नहीं। शांति अगर इसपर मतभेद ज़ाहिर करना भी चाहेतो बीचवाली ननद की प्रवचनधाराके बीच बोलने का मौक़ा नहींहोता। वो बहुत कम आती हैं ओरजब भी आती हैं तो शांति को बसएक ही परेशानी होती है- वोउनकी बातें सुनसुनकर बुरीतरह थक जाती है। बीचवाली कोबीच में टोकने और उनकी बोलतीबंद कर सकने का साहस सिर्फ़छोटीवाली ननद में है। उन्हेसब प्यार से पेटपुछनियां कहतेहैं क्योंकि वो अपनी माँ कीअंतिम संतान हैं और इसीलिएमाँ की लाडली भी हैं। ननद केनाम से जिस खट्टे-मीठेरिश्ते की कल्पना की जाती हैउस में छोटी ननद अचला एकदम फिटबैठती हैं। जो कुछ प्यार-तकरारहोता है उन्ही से होता है।पहले तो बहुत आती थीं पर अब भीसाल में दो-तीन चक्करउनके लग ही जाते हैं।
इस बार वोबड़े दिनों बाद आईं और हमेशाकी तरह सासू माँ के कमरे मेंही ठहरीं। शांति ने जब से उन्हेदेखा है उनके बीच सबसे अलग एकख़ास रिश्ता रहा है। जब दोनोंसाथ रहती हैं तो दोनों को तीसरेकी मौजूदगी की ज़रूरत नहींरहती- तीसरा सिर्फ़चर्चा में रहता है। घंटो दोनोंसर से सर जोड़कर दुनिया-जहानकी बातें बतियाया करती हैं।सुबह से शाम और शाम से रात होजाती है पर उनकी बातें खतम हीनहीं होतीं। दोनों एक ही बिस्तरपर सोतीं और बिस्तर पर पड़े-पड़ेभी देर रात तक खुसुर-फुसुरकरती रहतीं- न जानेक्या। घर में अजय की अपनी बहनाऔर बच्चों की अपनी बुआ से बातहोती है पर ज़रा कम। उम्मीदथी कि इस बार भी अचला को दूसरेघरवालों की बहुत ज़रूरत नहींपड़ेगी। दिन में तो सब घर सेनिकल ही जाते हैं और शाम को जबघर लौटते हैं तो पहलू मेंअपनी-अपनी परेशानियोंके साथ। न अचला को उनसे बातकरने की बहुत बेचैनी होती हैऔर न ही घरवालों को। पर इस बारमामला दूसरा हुआ।
शनिवारको जब शांति घर लौटकर आई तो घरमें घुसते ही अचला ने उसे घेरजैसे लिया। बाथरूम जाने केसमय को छोड़कर सारे समय अचलाशांति के पीछे ही लगी रही।अपने पति-बच्चों,सास-ससुर,घर-परिवारकी छोटी-बड़ी सबबातें बिना किसी भेद-भावके शांति के कानों में उड़ेलतीरही। शांति को समझ ही न आया किबात क्या है। अचानक उमड़ी इननज़दीकियों को सबब क्या है। बीसियों शिकवे-शिकायतोंके बाद एक शिकायत अचला ने अपनीमाँ की भी कर डाली।
ये अम्माको क्या हो गया है..?
क्या होगया है.. ?
कुछ बातही नहीं करती..!?
करती तोहैं..
क्या करतीहैं..?दिनभर बैठकर टीवी देखती हैं..!
हाँ,टीवी तो बहुत देखनेलगी हैं आजकल!शांति ने हामी में सरहिलाया।
बहुत..!!??बहुत से समझ नहींआता कि वो कितना टीवी देखतीहैं.. सुबह उठकरसाढ़े छै तक नहाधोकर तैयारहो जाती हैं और तब से लेकर रातग्यारह बजे तक देखती ही रहतीहैं.. देखती ही रहतीहैं.. मैं कोई बातकरूँ तो एकाधा मिनट तो देखतीहैं मेरी तरफ और उसके बाद नजरवापस टीवी पर.. मैंबोलती जाती हूँ और वो टीवीदेखती जाती हैं..जैसे मैं कोई बकवासकर रही हूँ.. और अपनीतरफ से कोई बात ही नहीं??!!और जब मैं कहूँ कि अम्माकुछ बात करो.. तो ऐसेबात करती हैं जैसे कोई अजनबीसे करता है.. ?? तेरेबच्चे कैसे हैं..?पति कैसा है..?फिर मैं कहती हैं किअम्मा तुम तो कोई बात ही नहींकरती.. कुछ बात करो..तो कहती हैं कि क्याबात करूँ.. और फिरमुंडी घुमाके टीवी देखने लगजाती हैं.. बताओ,क्या हो गया है अम्माको.. ?
शांति केपास अचला के सवाल को कोई जवाबनहीं था। सासू माँ को जो बीमारीहुई थी उसके लक्षण किसी डॉक्टरीकी किताब में दर्ज़ नहीं थे।टीवी बहुत देखना और अपनी बेटीसे बात न करना - इसलक्षण की कोई बीमारी नहीं है।लगातार दिन-रातचलने वाले चैनल यही मानकर के24 घंटेअपना प्रसारण जारी रखते हैंकि कोई उन्हे देख रहा है। उन्हेदेखना कोई असामान्यता नहींहै और किसी से बात करना या नकरना भी कोई असामान्यता नहींहै। फिर भी सासूमाँ का जो बरतावथा उसे जीवन की भाषा में स्वस्थव्यवहार नहीं कहते-उदासीनता कहते हैं।
ऐसा नहींथा कि शांति और अजय ने सासूमाँमें आए इस बदलाव पर ग़ौर नहींकिया था पर यह उनके लिए यह बदलावधीरे-धीरेएक अरसे में हुआ था। और रोज़-बरोज़उसका सामना करके वे उसके प्रतिनिरापद भी हो गए थे। सासूमाँका लगातार टीवी देखना और किसीसे ज़्यादा कुछ बातचीत न करनाउन्हे अब चौंकाता नहीं था।उन्होने सासूमाँ की उस उदासीनताको स्वीकार कर लिया था।
उस रातशांति यही सोचते-सोचतेसो गई। इतवार को भी पूरा समयअचला ने शांति, अजयऔर बच्चों के साथ के साथ हीगुज़ारा। और सोमवार की सुबहअपना सामान बाँध लिया। शांतिने कुछ दिन और रुक जाने के लिएकहा भी पर अचला को डर था किअम्मा तो टीवी देखती रहेंगीवो करेगी क्या। शांति और अजयके साथ अचला भी घर से निकल गई।बच्चे तो पहले ही स्कूल चलेगए थे। घर में सिर्फ़ सासूमाँरह गईँ। उनका टीवी चालू था-वो कहीं नहीं जानेवालाथा।
***
(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on September 28, 2011 01:14 PM· permalink
अन्ना हजारे का उपवास जारी था.हम सवेरे आफिस के लिए निकले और दिल्ली से गुरगांव वाले रास्ते पर यही सब मनन चिंतन करते हुए चले जा रहे थे. क्राउन प्लाज़ा पर एक्सप्रेसवे से बाहर निकलना था. सामने देखा कुछ जेम सा नज़र आया .शायद आगे की बत्ती लाल हो. उस बाहर जाने वाले रास्ते से पहले एक अन्दर आने का रास्ता है. देखा लोगों ने गाडी मोड़ दी और उस अन्दर के रास्ते से बाहर की ओर जाने लग गए.एक और जेम शुरू हो गया .क्या नियमों का उल्लंघन करना ठीक था ?
कल हमारे घर में काम करने वाला बड़ा खुश दिखा .दिन भर कहीं गायब था. मैंने पूछा ,क्या हो गया ? बोला आज कार चलाने का लाईसेंस बनवा लिया! मैंने पूछा ,"किसका?" अपना ! अरे कार साफ़ करने के अलावा तो तुमने कार आज तक छुई नहीं है. एक हज़ार रुपये दिए और मुझे लाईसेंस मिल गया. दो हज़ार बोल रहा था पर मैंने भी एक हज़ार पर जिद्द पकड़ ली थी. कार क्या उसने आजतक साइकिल छोड़ कर स्कूटर तक को हाथ नहीं लगाया है.
मेमसाहब आपके आफिस में कोई जगह नहीं निकलती,मेरे भाई को लगवा दीजिये.पर वो तो घूमता रहता है.आठवीं के बाद पढ़ा ही नहीं है. और नौकरी के लिए कम से कम इंटर तो होना चाहिए. अरे मेमसाहब , सर्टिफिकेट तो मैंने बनवा लिया है . पी ऍफ़ से एक लाख रुपये निकालने हैं.क्या हो गया. बच्चे की शादी हो रही है क्या? नहीं ,सरकारी दफ्तर में नौकरी के लिए देने हैं. पर उसकी तनखाह कितनी होगी . १५००० महीने शायद .तब तो १ लाख कितने साल में वापस आयेगा. अरे नौकरी लगने के बाद बहुत से कमाई के रास्ते खुल जायेंगे.
बिजली का बिल सालों से मीटर न लगे होने की वजह से भरा नहीं गया है.अब सरकार ने मुहिम छेड़ी है ,बकाया पैसे वसूलने की. कैसे भरेंगे इतने रुपये.फ़िक्र मत करो, चलो दफ्तर चलते हैं. सौदा तय हुआ,बिल कम हो गया . सरकारी खजाना किसी और का हो गया .
यह सब वास्तविक ज़िंदगी के उदाहरण हैं. अन्ना हजारे के अनशन से यह सब प्रश्न भी सामने आते हैं.क्या हम नैतिक तौर से भ्रष्टाचार के लिए तैयार हैं. क्या हम भारतीयों के चरित्र मैं त्रुटी है की हम नियमों का उल्लंघन करने , किसी काम के लिए मेहनत न कर शोर्ट -कट लेने , देश की संपत्ति का आदर न करने ,इन सब में तो माहिर हैं .क्या भ्रष्टाचार ऐसे ही आचरण से दूर हो पायेगा.? जन लोकपाल बिल तो ठीक है पर इन सबका इलाज तो हमारे अपने पास ही है.हर नागरिक वैयक्तिक स्तर पर ज़िम्मेदार है हमारे देश के इस हाल के लिए.
Posted by Poonam Misra (noreply@blogger.com) on September 27, 2011 08:23 AM· permalink
जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के 11 छात्रों की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम राजस्थान के भरतपुर जिले में हुए गोपालगढ़ हत्याकांड के कारणों और घटनाक्रम का पता लगाने के लिए 25 सितंबर को गोपालगढ़ और आसपास के गांवों में गई. इस टीम में शामिल थे: अनिर्बान (डीएसयू, जेएनयू), अनुभव (डीएसयू, जेएनयू), आनंद के राज (जेएनयू), गोगोल (डीएसयू, जेएनयू), रेयाज (डीएसयू, जेएनयू), श्रीरूपा (जेएनयू), श्रिया (डीएसयू, जेएनयू), अदीद (सीएफआई), शोभन (डीएसयू, डीयू) और सुशील (डीएसयू, डीयू). इस दौरान हम चार गांवों में गए और हमने तीन दर्जन से अधिक लोगों से बात की. इस हत्याकांड में मारे गए लोगों के परिजनों, घटनास्थल पर मौजूद चश्मदीद गवाहों और हत्याकांड में जीवित बच गए लोगों, घायलों और पीड़ित समुदाय के दूसरे अनेक सदस्यों से हुई बातों के आधार पर हम मुसलिम समुदाय पर प्रशासन के पूरे संरक्षण में हुए इस सांप्रदायिक फासीवादी हमले की आरंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं. आगे हम एक विस्तृत रिपोर्ट भी जारी करेंगे.
गोपालगढ़ के लिए रवाना होते समय हमारे पास इस हत्याकांड से जुड़ी जानकारियां सीमित थीं. अखबारों और दूसरे समाचार माध्यमों को देखते हुए लगा कि इस हत्याकांड के खबरों को जान-बूझ कर छुपाया जा रहा है. जिन कुछेक अखबारों में इसकी खबरें आईं भी, वो आधी-अधूरी ही नहीं थीं, बल्कि उनमें घटनाओं को पुलिस और सरकार के नजरिए से पेश किया गया था. इसने पीड़ितों को अपराधियों के रूप में और अपराधियों को पीड़ितों के रूप में लोगों के सामने रखा. केवल एक अंगरेजी अखबार ने कुछ खबरें प्रकाशित की थीं, जिनमें पीड़ित मुसलिम समुदाय का पक्ष जानने की कोशिश की गई थी और इस हत्याकांड के पीछे की असली ताकतों के संकेत दिए गए थे.
ये संकेत तब नामों और चेहरों में बदल गए जब हम भरतपुर जिले में दाखिल हुए. जिले के पापरा, जोतरू हल्ला (अंधवाड़ी), ठेकरी, हुजरा, पिपरौली आदि गांवों और गोपालगढ़ कस्बे के पीड़ित मुसलिम समुदाय के लोगों ने एक के बाद एक जो कहानियां बताईं वो एक बार फिर भारतीय राज्य के फासीवादी चरित्र को सामने ले आती हैं और राज्य के साथ गुर्जर तबके की सामंती ताकतों तथा आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के तालमेल को साबित करती हैं.
घटनाक्रम की शुरुआत 13 सितंबर से हुई. गोपालगढ़ कस्बे में करीब 50 घर मुसलिम परिवारों के हैं, जिनमें से अधिकतर मेव हैं. इस समुदाय की लगभग साढ़े ग्यारह बीघे जमीन के एक टुकड़े पर आपस में लगी हुई एक मसजिद है, ईदगाह है और कब्रिस्तान की जमीन है. मसजिद और ईदगाह पर पक्का निर्माण है, जबकि कब्रिस्तान की जमीन पर फिलहाल कोई निर्माण नहीं है. 1928 से यह वक्फ की संपत्ति है और कम से कम 40 साल पहले इस जमीन के एक टुकड़े को कब्रिस्तान घोषित किया गया था. लेकिन इस जमीन पर स्थानीय गुर्जर समुदाय के एक सदस्य और गोपालगढ़ के सरपंच ने बार-बार गैरकानूनी रूप से कब्जा करने की कोशिश की है. मेव मुसलिमों की तरफ से यह मामला दो बार स्थानीय एसडीएम अदालत में ले जाया गया, जहां से दोनों बार फैसला मुसलिम समुदाय के पक्ष में आया है. 12 सितंबर को एसडीएम अदालत ने सरपंच को यह जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, जिसके बाद मसजिद के इमाम हाफिज अब्दुल राशीद और मसजिद कमेटी के दो और सदस्य सरपंच के पास इस जमीन को खाली करने के लिए कहने गए. इस पर सरपंच और दूसरे स्थानीय गुर्जरों ने मिल कर तीनों को बुरी तरह पीटा.
इमाम और कमेटी पर हमले की इस खबर से मुसलिम समुदाय में आक्रोश की लहर दौड़ गई. उस रात को जब मेव मुसलिम इस विवाद को अगले दिन की पंचायत में बातचीत के जरिए सुलझाने की तैयारियां कर रहे थे, उस रात गोपालगढ़ में भरतपुर से कम से कम दो सौ आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता गुर्जरों के जमा हो रहे थे. उन्होंने आसपास के अनेक गांवों से गुर्जरों को अगले दिन गोपालगढ़ आने के निर्देश दिए. अगले दिन 14 सितंबर को जब इस मामले के निबटाने के लिए स्थानीय थाने में दो विधायक और दोनों समुदायों के लोग जमा हुए तो केरवा, भैंसोड़ा, बुराना, बुरानी, पहाड़ी, पांडे का बयाना, बरखेड़ा, बौड़ोली और नावदा के गुर्जर आरएसएस कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में गोपालगढ़ को एक तरह से अपने कब्जे में कर चुके थे. उन्होंने सड़कों पर पहरे लगा दिए थे और लोगों को कस्बे में आना-जाना रोकने लगे थे. उधर बैठक में दोनों समुदायों के जिन दो प्रतिनिधियों के ऊपर फैसला लेने की जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने यह फैसला किया कि जमीन पर उसी समुदाय का अधिकार है, जिसके नाम रेकार्ड में यह जमीन दर्ज है. इस पर भी सहमति बनती दिखी कि कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जे के लिए दोषी व्यक्ति मेवों से माफी मांगें. लेकिन यहीं कुछ गुर्जरों और आरएसएस के लोगों ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने थाने की कुरसियों और दूसरे सामान की तोड़फोड़ शुरू कर दी. मीटिंग में मौजूद अनेक प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आरएसएस के लोगों और गुर्जरों ने मीटिंग में मौजूद भरतपुर के डीएम और एसपी के साथ धक्का-मुक्की की और कॉलर पकड़ कर पुलिस को मुसलिमों के ऊपर फायरिंग का आदेश दिलवाया.
मीटिंग आखिरी दौर में थी, जब पूरे गोपालगढ़ कस्बे में फैले आरएसएस, विहिप, बजरंग दल और गुर्जर समुदाय के हथियारबंद लोग मुसलिम मुहल्ले पर हमला कर रहे थे. चुन-चुन कर मुसलिमों की दुकानों को लूट कर आग लगा दिया गया. उनके घरों के ताले तोड़ कर सामान लूट लिए गए. इस वक्त सारे मर्द या तो थाने में चल रही मीटिंग में थे या मसजिद में, इसलिए महिलाएं भीतर के घरों में एक जगह जमा हो गई थीं. इस घर से लगी छत पर चढ़ कर हमलावरों ने महिलाओं के ऊपर भारी पथराव किया. इस घर में 11 दिन बाद भी बिखरे हुए पत्थर पड़े थे और पथराव के निशान मौजूद थे. हमलावर भीड़ एक-एक करके मुसलिम घरों से सामान लूटती रही और उनकी संपत्ति बरबाद करती रही. यह लूट अभी अगले तीन दिनों तक चलनेवाली थी और इसमें इमाम अब्दुल रशीद, अली शेर, अली हुसैम, डॉ खुर्शीद, नूर मुहम्मद, इसहाक और उम्मी समेत तमाम मुसलिम घरों को तबाह कर दिया जानेवाला था.
दोपहर ढल रही थी और असर की नमाज का वक्त हो रहा था. आस-पास के गांवों के लोग गोपालगढ़ में सामान खरीदने के लिए आते हैं. नमाज का वक्त होते ही स्थानीय मुसलिम बाशिंदे और खरीदारी करने आए लोग मसजिद में जमा हुए. पिछले दो दिनों की घटनाओं की वजह से मसजिद में भीड़ थोड़ी ज्यादा ही थी. पिपरौली गांव के इलियास इसकी एक और वजह बताते हैं. उनके मुताबिक कस्बे में तब यह खबर भी थी कि गुर्जर और आरएसएस-विहिप-बजरंग दल के लोग पुलिस के साथ मिल कर मसजिद तोड़ने आनेवाले हैं. मसजिद में उस वक्त कम से कम 200 लोग मौजूद थे (कुछ लोग यह संख्या 500 से हजार तक बता रहे थे). जोतरू हल्ला के 35 वर्षीय सपात खान उनमें से एक थे. उन्हें याद है कि उन्होंने नमाज पढ़नी शुरू ही की थी कि मसजिद पर फायरिंग शुरू हुई.
पुलिस का दंगा नियंत्रण वाहन मसजिद के ठीक सामने खड़ा हुआ और उसने मसजिद पर फायरिंग शुरू की. मसजिद से बाहर निकलने के दोनों दरवाजों पर गुर्जर और आरएसएस के लोग हथियारों के साथ खड़े थे. इसलिए मसजिद के भीतर घिरे लोग पीछे की तरफ की एक पतली दीवार तोड़ कर भागने लगे. सपात खान को भागने के क्रम में पांव में गोली लगी और वे गिर पड़े. उन्होंने करीब दस लोगों को गोलियों से जख्मी होकर दम तोड़ते देखा. फर्श पर पड़े हुए उन्होंने देखा कि गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गोलियों से जख्मी लोगों के पेट में लाठी और फरसा मार कर लोगों की जान ले रहे थे. फायरिंग रुकने के बाद जब दर्जनों लोग मसजिद की फर्श पर घायल और मरे हुए पड़े थे, तो उनके शरीर पर से गोलियों के निशान हटाने के लिए उनके हाथ-पांव काटे गए. घायलों को और लाशों को गुर्जर और आरएसएस के लोग पुलिस की गाड़ी में लाद रहे थे. सपात खान भी उनमें से एक थे. गाड़ी में लादे जाने के बाद वे बेहोश हो गए. पांचवें दिन जब उन्हें होश आया तो उन्होंने खुद को भरतपुर हॉस्पीटल में पाया. वे खुशकिस्मत रहे कि वे जिंदा जलाए जाने से बच गए. लेकिन पथरौली के शब्बीर, लिवाशने के इस्माइल, पिलसु के हमीद, ठेकरी के उमर, खटकरा के कालू खां, जोतरू हल्ला के ईसा खां उतने खुशकिस्मत नहीं थे. उनमें से कइयों को तेल छिड़क कर जिंदा जलाने की कोशिश की गई. ये सारे लोग जयपुर के सवाई मान सिंह हॉस्पीटल में अब तक भरती हैं. घायलों में से हत्याकांड के 11 दिन बाद 25 सितंबर को दम तोड़ा, जिस दिन हम गोपालगढ़ में मौजूद थे.
लेकिन मसजिद में मारे गए और घायल हुए कई लोगों को जला दिया गया. उन्हें मसजिद की सीढ़ियों से महज दस कदम दूर सरसों की सूखी लकड़ी पर रख कर जलाया गया. वहां अधजली हड्डियां, जूते और कपड़ों के टुकड़े पड़े हुए हैं. यहां से एक-डेढ़ किमी दूर एक जंगल में भी अधजली हड्डियां मिली हैं. मसजिद से सटी ईदगाह में एक कुआं है, जिसमें से घटना के तीन दिनों बाद तीन अधजली लाशें मिली थीं. कुएं के पत्थर पर जली हुई लाशों को घसीटने के निशान बारिश और 11 दिन बीत जाने के बावजूद बने हुए हैं. ईदगाह में लाशों को जलाने के लिए लाए गए डीजल से भरा एक टिन रखा हुआ है. आसपास के इलाके पर पुलिस का पहरा है. जिस मसजिद में यह हत्याकांड हुआ, उसमें पुलिस किसी को जाने की इजाजत नहीं दे रही है. लेकिन बाहर से भी साफ दिखता है कि मसजिद में कितनी तबाही हुई है. सारी चीजें टूटी हुई हैं और फर्श पर बिखरी पड़ी हैं. खून के निशानों को मिटाने की कोशिश की गई है. दीवार पर गोलियों के कम से कम 50 निशान मौजूद हैं, जिन्हें सीमेंट लगा कर भरा गया है. जाहिर है कि यह काम पुलिस या उसकी मरजी से किसी आदमी ने किए हैं. गौर करने की बात यह भी है कि घटना के बाद से मसजिद में मुसलमानों को घुसने नहीं दिया जा रहा है.
जिन्होंने पूरी घटना अपनी आंखों से देखी और मारे जाने से बच गए उनके मुताबिक हमले की सारी कार्रवाई इतनी व्यवस्थित और संगठित थी कि इससे साबित होता है कि इसकी योजना पहले से बनाई गई थी. गुर्जरों और आरएसएस की हत्यारी भीड़ का नेतृत्व गोपालगढ़ के आरएसएस नेता केशऋषि मास्टर, जवाहर सिंह (बेडम) और भोला गूजर (पहाड़ी) कर रहे थे. इसमें आरएसएस द्वारा संचालित एक ‘आदर्श विद्यालय’ के शिक्षक भी लुटेरों के साथ शामिल थे, जिनकी पहचान उसी विद्यालय में पढ़नेवाले एक मुसलिम छात्र ने की. छठी कक्षा में पढ़ने वाले सखावत की नई साइकिल इस लुटेरी भीड़ ने छीन ली. वह उस शिक्षक को ‘गुरुजी’ के नाम से जानता है.
घटना के बाद गोपालगढ़ के मुसलिम परिवार घर छोड़ कर अपने रिश्तेदारों के यहां रह रहे हैं. अधिकतर घरों में कोई नहीं है. कुछ में ताला लगा है, लेकिन बाकी घरों के दरवाजे और कुंडियां गुर्जर-संघी लुटेरों ने उखाड़ ली हैं. जिस दिन हम गोपालगढ़ में थे, एकाध लोग अपने घरों की खबर लेने के लिए कस्बे में लौटे थे. गोपालगढ़ में कर्फ्यू रहता है लेकिन पिपरौली के इलियास बताते हैं कि यह कर्फ्यू सिर्फ मुसलमानों पर ही लागू होता है. कर्फ्यू के दौरान भी गुर्जर और आरएसएस के लोग खुलेआम कस्बे में घूमते हैं. वे यह देख कर इतने हताश थे कि वे पूछते हैं, ‘हिंदुस्तान में हिंदुओं का राज है. मुसलमानों का कौन है?’
सरकार दावा कर रही है कि इस घटना में महज तीन लोग मारे गए हैं. लेकिन लोग बताते हैं कि कम से कम 20 लोग इस हमले में मारे गए हैं. उनमें से सारे मुसलिम हैं. जख्मी लोगों की संख्या भी लगभग इतनी ही है और वे सारे लोग भी मुसलिम हैं. इसके अलावा कम से कम तीन लोग लापता हैं. इनमें से दो हैं: ढौड़ कलां (फिरोजपुर झिरका) के मुहम्मद शौकीन और चुल्हौरा के अज्जू. इतने बड़े हत्याकांड को दो समुदायों के दंगा कह कर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की जा रही है. लोग पूछते हैं कि अगर यह दंगा था तो गुर्जरों और पुलिस की तरफ से कोई घायल तक क्यों नहीं हुआ. वे लोग जानते हैं कि हमलावरों में कौन लोग थे, लेकिन किसी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं हुआ है. उल्टे, लोगों की शिकायत है कि 600 मुसलमानों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि डीएम और एसपी का तबादला हो गया है, लेकिन लोग तबादलों से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी साफ मांग है कि मुसलमानों पर गोलियां चलाने वालों पर हत्या के मुकदमे दर्ज किए जाएं. इसको लेकर अंधवाड़ी में पिछले छह दिनों से धरना चल रहा है, जिसमें रोज लगभग आठ सौ से एक हजार लोग शामिल होते हैं.
मुसलिमों पर गुर्जरों का यह हमला कोई नई बात नहीं है. छोटे-मोटे हमले लगातार होते रहे हैं. यहां खेती आजीविका का मुख्य साधन है. मेव मुसलमानों की यहां खासी आबादी है, लेकिन उनमें से आधे से भी कम लोगों के पास जमीन है. जमीन का आकार भी औसतन दो से तीन बीघे है, जिसमें सिंचाई निजी बोरवेल से होती है. बाकी के मेव छोटे मोटे धंधे करते हैं, दुकान चलाते हैं और पहाड़ों पर पत्थर काटते हैं. गुर्जर यहां पारंपरिक रूप से जमीन के मालिक रहे हैं. उनके पास न केवल बड़ी जोतें हैं, बल्कि दूसरे कारोबारों पर भी उनका वर्चस्व है. खेती, इलाज और शादी वगैरह के खर्चों के लिए मेव अक्सर गुर्जरों से कर्ज लेते हैं, जिस पर उन्हें भारी ब्याज चुकाना पड़ता है (गांववालों ने बताया कि उन्हें चौगुनी रकम लौटानी पड़ती है). देर होने या नहीं चुका पाने पर अक्सर मुसलिमों-मेवों पर हमले किए जाते हैं- इसमें धमकाने, गाली देने से लेकर मार-पीट तक शामिल है. इस तरह जमीन का सवाल यहां एक अहम सवाल है.
इस नजरिए से गोपालगढ़ का हत्याकांड नया नहीं है. कानपुर, मेरठ, बंबई, सूरत...हर जगह अल्पसंख्यकों, मुसलमानों को उनके नाममात्र के संसाधनों से भी उजाड़ने और उनकी संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए प्रशासन, पुलिस और संघ गिरोह की तरफ से मिले-जुले हमले किए जाते रहे हैं, गोपालगढ़ उनमें सबसे ताजा हमला है. इसी जून में बिहार के फारबिसगंज में अपनी जमीन पर एक कंपनी के कब्जे का विरोध कर रहे मुसलमानों पर गोली चलाकर पुलिस ने चार मुसलिमों की हत्या कर दी थी और नीतीश सरकार के इशारों पर कारपोरेट मीडिया ने इस खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की.
गोपालगढ़ में भी कारपोरेट मीडिया और सरकार ने तथ्यों को दबाने की कोशिश की. मिसाल के तौर पर इस तथ्य का जिक्र कहीं नहीं किया गया कि डीएम और दूसरे अधिकारियों द्वारा आरएसएस नेताओं के कहने पर गोली चलाने का आदेश दिए जाने के बाद पुलिस के शस्त्रागार को खोल दिया गया और पुलिस के साथ-साथ गुर्जरों और आरएसएस कार्यकर्ताओं को भी पुलिस के शस्त्रागार से आधुनिक हथियार दिए गए. मसजिद पर हुई गोलीबारी में पुलिस के हथियारों का उपयोग ही हुआ, लेकिन उन हथियारों को चलानेवालों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. यह दिखाता है कि इन तीनों ताकतों की आपस में कितनी मिलीभगत थी. इलाके के मेव शिक्षा और रोजगार में बहुत पिछड़े हुए हैं. सरकारी-गैर सरकारी नौकरियों में भी उनका हिस्सा नगण्य है. इसके उलट गुर्जर समुदाय के लौगों की नौकरियों में भरमार है. जिस पुलिस ने मेव लोगों पर हमला किया, उसमें बहुसंख्या गुर्जरों की ही थी और उसमें एक भी मुसलिम नहीं था. गुर्जरों के बीच आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों का काफी काम है और इसका असर पुलिसबलों पर भी साफ दिखता है. इसीलिए जब पुलिस मसजिद पर फायरिंग करने पहुंची तो उसकी कतारों में गुर्जर और आरएसएस के लोग भी शामिल थे. जाहिर है कि यह दो समुदायों के बीच कोई दंगा का मामला नहीं है, जैसा कि इसे बताया जा रहा है, बल्कि गोपालगढ़ में हुई हत्याएं एक सुनियोजित हत्याकांड हैं.
डीएसयू की तरफ से जारी
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 26, 2011 08:05 PM· permalink
शंकर 'टकर' ये नाम सुन कर कुछ अज़ीब नहीं लगता आपको ? जब आप इस अमेरिकी वादक को क्लारिनेट पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ संगत करते देखेंगे तो आपका ये विस्मय और भी बढ़ जाएगा। कुछ ही दिनों पहले मैंने शंकर को टीवी के एक संगीत चैनल पर अपनी कला का प्रदर्शन करते देखा और एक बार में ही क्लारिनेट पर उनकी कलाकारी देख कर मंत्रमुग्ध हो गया। तो चलिए आज आपसे बातें करते हैं इस अद्भुत युवा अमेरिकी वादक के
(अगर ये विषय आपकी पसंद का है तो पूरा लेख पढ़ने के लिए आप लेख के शीर्षक की लिंक पर क्लिक कर पूरा लेख पढ़ सकते हैं। लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया आप जवाबी ई मेल या वेब साइट पर जाकर दे सकते हैं।आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा!)
Posted by Manish Kumar (manish_kmr1111@yahoo.com) on September 26, 2011 04:00 PM· permalink
पिछले हफ्ते आपसे बातें हुई शंकर टकर और उनके एलबम 'दि श्रुति बॉक्स 'में शामिल क्लारिनेट पर बजाई उनकी अद्भुत धुनों पर। अगर आपनें ये धुनें नहीं सुनी तो यहाँ पर जरूर सुन लीजिएगा। इससे पहले कि आज मैं इस एलबम में शामिल निराली कार्तिक की गाई एक बंदिश का जिक्र करूँ अपने वादे के मुताबिक ये बताना जरूरी होगा कि इस अमेरिकी कलाकार का नाम 'शंकर' कैसे पड़ा ?
दरअसल शंकर का परिवार अम्मा यानि माँ अमृतानंदमयी का
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Posted by Manish Kumar (manish_kmr1111@yahoo.com) on September 26, 2011 01:00 AM· permalink
पढ़ता हूँ कुछ साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ और कवितायें नये जमाने की और सोचता हूँ:
शब्द शब्द जोड़ कुछ ऐसा सजाऊँ जैसे काढ़ी हो सलीके से कुछ बूटियाँ और तैयार कर....
एक जामा पहना दूँ अपनी कविता को... इस खूबसूरती से कि निखर जाए उसका रूप सौन्दर्य भी उकेर दूँ उसके अंग अंग...
उसकी निश्चेत फेन्टिसीज को उभारती हुई..
शायद जीत लूँ एक ईनाम मैं भी साहित्य के इस तथाकथित पावन मकड़जाल में....
-समीर लाल ’समीर’
मैं पूछता उस अंधेरी रात में बिस्तर पर लेटे अंधेरे में छत को ताकते तुमसे:
’कोई गाना सुनोगी?’
तुम कहती
’क्या तुम गाओगे अपना गीत?’
मैं कहता...
’न, मैं थका हूँ.. सी डी लगा देता हूँ...फरीदा गा देगी.. दिल जलाने की बात करते हो...आशियाने की बात करते हो..’
तुम कहती...
-हूंह्ह...फिर आगे से ऐसी बात न छेड़ना...जो तुम न कर पाओ...बस, सो जाओ...अब...’
मैं सोचता हूँ....
’अब बात क्या छेडूँ???’
मौन की न जाने क्या ताकत है...अब जानूँगा मैं!!!
फेरीवाले की इकतारे की धुन.. और बचपन भाग निकलता था गलियों में....
उस धुन को बजा लेने की कोशिश में न जाने कितने दीपक फोड़े हैं मैने न जाने कितने ख्वाब जोड़े हैं मैने
लेकिन मन है कि मानता नहीं!! और वो फेरीवाला... ये बात जानता ही नहीं...
-समीर लाल ’समीर’
जिंदगी की आंधी में फड़फड़ाते भावों के पन्ने शब्दों की कलम में आँसूओं की स्याही.. कुछ खास रच जाने को है.. एक आत्म कथा.. एक कविता... या नज़्म पुकारेंगे लोग उसे... तुम- चुप रह जाना.. बिना कुछ कहे.. सब सह जाना...
-समीर लाल ’समीर’
(फेसबुक पर बिखेरे टुकड़े सहेजते हुए)
Posted by Udan Tashtari (sameer.lal@gmail.com) on September 26, 2011 01:00 AM· permalink
यह लेख कोइ फिल्म समीक्षा नहीं है। केवल यह कहना चाह्ता हूँ कि एक बार फिर बॉलीवुड ने सांप्रदायिकता पर अपनी कमजोर समझ को उजागर किया है। दुर्भाग्य से पंकज कपूर जैसे मंजे हुए कलाकार के निर्देशन में भी। मौसम एक प्रेम कहानी के रूप में प्रस्तुत की गयी है जो ई. सन् 1992 से शुरू होती है और 2002 में समाप्त। आप जानते होंगे कि 1992 में अयोध्या में रामजन्मभूमि पर बना विवादित ढाँचा ढहाया गया था। 1993 में मुंबई में बम विस्फोट हुए, 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ, 2001 में अमेरिका पर इस्लामी आतंकवादियों ने हमले किये और 2002 में गुजरात के दंगे। आप यह भी जानते होंगे कि 1984 में दिल्ली में सिख विरोधी दंगे हुए थे।
क्या इन सारी घटनाओं को लेकर एक ही फिल्म बन सकती है?
क्या इन सभी घटनाओं से सीधे तौर पर प्रभावित नायक और नायिका की कोइ जोड़ी हो ऐसी कहानी लिखी जा सकती है?
ऐसी ही एक कहानी पर लिखी गयी फिल्म है मौसम। अब ज़रा ध्यान दें कि प्रेम कहानी के अतिरिक्त इन सभी घटनाओं का उल्लेख यह फिल्म किस तरह करती है:
1. कश्मीर में हिंसा। नायिका जो मुसलमान है उसका पिता उसे अपने रिश्तेदारों के पास पंजाब छोड़ना चाहता है क्योंकि टेररिस्ट (जेहादी या मुजाहिद नहीं) की वजह से उनका श्रीनगर में रहना मुश्किल हो गया है। यानी मुसलमानों ने पंडितों को श्रीनगर से भगाया यह तथ्य तो छिपाना मुश्किल है। लेकिन दिखाया गया है कि एक मुसलमान परिवार अधिक पीड़ित है।
2. एक दृश्य में नायिका सपना देख रही है, उसका मुसलमान पिता एक कश्मीरी पंडित मित्र को बचाने के लिये आतंकवादियों को उसका पता नहीं बताता। आतंकवादी उसे गोलियों से भून देते हैं। कश्मीर की हिंसा के इस दृश्य में आतंकवादी दिखायी नहीं देते। उनका धर्म पहचानना मुश्किल है। यानी मुसलमान सांप्रदायिक नहीं हैं। उन्होंने तो पंडितों को बचाने के चक्कर में खुद घाटी छोड़ दी!
3. 6 दिसंबर की अयोध्या की घटना का विडियो दिखाया गया है। जो खबर उस दिन की सुनायी गयी है, उसमें कार सेवकों ने ‘मस्जिद’ गिरा दी । ध्यान दीजिये ढाँचा नहीं, मस्जिद। पार्श्व में कारसेवक “जय श्री राम” के नारे लगा रहे हैं। दृश्य पर्याप्त समय तक है ताकि आप जान लें अगर अब तक नहीं जानते थे कि ये हिमाकत करने वाले किस धर्म से हैं!
4. मुंबई में 1993 के बम विस्फोटों में नायिका का मुसलमान ‘फूफा’ मारा जाता है। इन विस्फोटों का कोइ दृश्य नहीं। इसमें मरे हिन्दुओं के बारे में एक इशारा तक नहीं। दुनिया जानती है कि दाउद इब्राहिम ने पाकिस्तान की आई.एस.आई. के साथ मिलकर 1992 का बदला लेने के लिये यह हिन्दू विरोधी विस्फोट कराए थे। लेकिन जहाँ बाबरी ध्वंस को बाकायदा दिखाया गया है, इस घटना का कोइ दृश्य नहीं। यानी इस बार भी कोइ पीड़ित है तो वो है सिर्फ मुसलमान!
5. 1999 का कारगिल युद्ध। किसने किया? कोइ नाम तक नहीं!! पाकिस्तान का नाम तक नहीं लिया गया। क्यों हुई यह लड़ाई बताया तक नहीं गया। तो क्या यहाँ गुनहगारों की पहचान छुपाने की कोशिश की गयी है?
6. 2001 में अमरीका पर आतंकवादी हमले की खबर।कोइ दृश्य नहीं। लेकिन जो खबर दिखायी गयी है उसमें ये कहा गया है कि चूँकि ये हमले ओसामा बिन लादेन और उसके साथियों (उनके धर्म का नाम नहीं लिया गया), ने करवाये हैं तब से पश्चिम में मुसलमानों के प्रति भेदभाव बढ़ गय है। कमाल है, यहाँ भी फिल्म हमलों में मारे गये हजारों लोगों का दर्द भूल जाती है, कोइ पीड़ित है (विक्टिम है) तो वो है सिर्फ मुसलमान!
7. 2002 के गुजरात दंगे। ‘बेस्ट बेकरी’ याद है आपको? जी हाँ खबर है कि अहमदाबाद की इस बेकरी में कुछ मुसलमानों को जिन्दा जलाया गया था। अब लीजिये। नायिका मुसलमान है। अपनी बुआ के साथ वह अहमदाबाद में एक बेकरी चलाती है। फिर कुछ लोग इस मुसलमान नायिका की बेकरी, उसका घर और उसका मोह्ल्ला जला देते हैं। अंदाज लगाइये किस धर्म के होंगे वे लोग? लेकिन नायिका के पूछने पर कि वे कौन थे नायक कहता है – साये थे, कोइ पहचान नहीं थी उनकी!! लेकिन बारीकियाँ क्या कहती हैं? यही कि मुसलामान ही यहाँ भी विक्टिम है। और हिन्दू हत्यारा!
8. दंगो की आग के बीच नायक याद करता है कि 1984 के दंगों में उसकी माँ चल बसी। लेकिन इन दंगों का भी कोइ दृश्य नहीं। 1984 के दंगों की कोइ पहचान या पृष्टभूमि नहीं। यानी सिख विक्टिम हो सकता है, पीड़ित हो सकता है, लेकिन इस दर्द को काँट छँट कर, कम कर के बताया गया है सफाई से।
कुल मिलाकर दंगों का मतलब यह कि ‘कौम’ विशेष ही पीड़ित है। पंकज कपूर की यह फिल्म चले न चले, यदि इस फिल्म से वे सांप्रदायिक सद्भाव का कोइ संदेश देना चाहते थे, तो मेरी नजर में उनका यह प्रयास सच्चा नहीं था। और यदि प्रेम कहानी दिखानी ही थी तो इतनी सारी घटनाओं को घुसाने की आवश्यकता ही क्या थी? यह समझ से परे है।
नानाकी तेरहीं मंगल की थी। बड़ेमामाजी के तीनों बेटे बाहररहते हैं और ख़ुद उनको गठियाकी पुरानी शिकायत है। तो अनेकआशीर्वाद के साथ सामान की एकलिस्ट मामाजी ने शांति को सौंपदी थी। शांति ने सोचा कि बजायइतवार ख़राब करने के शनिवारको ही सारा काम निबटा लियाजाय। उस दिन दफ़्तर की आधीछुट्टी होती है-दोपहरके बाद सारी ख़रीदारी कर लेगी।उस दिन शांति सुबह नौ बजे घरसे निकली। आम तौर पर शनिवारके दिन शांति टिफिन लेके नहीजाती है। पर उस दिन शांति टिफिनलेकर गई। जैसा कि उसने सोचाथा एक बजे तक उसने काम किया औरफिर फाइलें समेट दीं, दराज़ोंमें ताला लगा दिया और लैपटॉपशटडाउन कर के खाना खा लिया।तब तक दफ़्तर लगभग सन्नाटाहो गया था। चलने से पहले शांतिने सोचा न जाने बाज़ार मेंकितना समय लगे-बाथरूमहो लूँ। बाथरूम पहुँचने सेपहले ही उसे भाड़-भूड़की आवाजें सुनाई पड़ने लगीथीं। पर बाथरूम में घुसने परही समझ आया कि वहाँ मरम्मत चलरही है। बगल में ही जैन्ट्सटॉयलेट था और पूरी तरह सुनसानथा पर शुचिता के मद्देनज़रउसका इस्तेमाल पूरी तरह वर्जितथा, लिहाज़ाशरीर के आवेग को दबा दिया।
अगरअपने लिए ख़रीदारी करना होतीतो शायद शांति सस्ते के बजायसहूलियत का चुनाव करती और कहींआस-पाससे ही सारी ख़रीदारी निपटालेती। मगर बड़े मामा जी कापूरा ज़ोर सस्ते पर था इसीलिएतो वो अपने क़स्बे के जाने-पहचानेव्यापारियों को छोड़कर शांतिकी कर्तव्यपरायणता का सहाराले रहे थे। सस्ता सामान लेनेके लिए शांति भीड़ भरे रास्तोंसे होते हुए शहर की पुरानीगलियों में आबाद थोक के बाज़ारजा पहुँची। गाड़ी,मोटर,स्कूटर,साइकिल,रिक्षा,गाय,कुत्ते,ठेले,सबएक रफ़्तार से और एक अधिकारसे अपने आगे बढ़ने का रस्ताढूँढ रहे थे। उन सब मे शायदसबसे सफल चूहे थे जो निर्द्वन्द्वऔर निरपेक्ष भाव से बड़ीरफ़्तार से गलियों में विचरणकर रहे थे। शहर के नागरिक सड़कपर ही चाट और मिठाइयों का स्वादले रहे थे और सड़क पर ही दोने,पत्तल,औरकुल्हड़ फेंक रहे थे। और कुछलोग वहीं सड़क पर खड़े होकरअपनी शंकाओ का समाधान कर रहेथे। और उनमें से एक नागरिक तोइतना ढीठ निकला कि जिस जगहशांति अपने स्कूटर पर बैठे-बैठेट्रैफ़िक के आगे सरकने काइंतज़ार कर रही थी,ठीकउसी के सामने पैंट खोलकर पेशाबकरने लगा।
शांतिने यकायक चीख पड़ी-'क्याकर रहे हो..'
'क्याकर रहे हैं..?'
'अबबताना पड़ेगा कि क्या कर रहेहो..हदहै बेशर्मी की..'
'नकरें?'
'हेभगवान..तोऔर क्या कह रहे हैं...?'
शांतिकी डाँट कालगभग बुरा सा मानते हुए वोनागरिक वहाँ से चलता बना। नचाहते हुए भी इस प्रकरण सेशांति को अपनी शंका की याद होआई। पर न तो वो उनकी तरह सड़कपर खड़े होकर फ़ारिग़ हो सकतीथी और न ही उसे आस-पासकिसी टॉयलैट के होने की कोईउम्मीद थी। उसने अपने शारीरिकआवेग से ध्यान हटाकर उस कामपर केन्द्रित किया जिसके लिएवो आई थी।
बाज़ारभाव समझने के लिए दो-तीनदुकानें देखना ज़रूरी था।कपड़ों की अलग और बरतनों कीअलग। शांति ने सोचा था कि वोअपने आवेग को दबाए-दबाएसारे काम निबटाकर घर जाकरफ़ारिग़ होएगी पर बरतनों कीबारी आई नहीं कपड़े ख़रीदते-ख़रीदतेही वो बेचैन होने लगी। सब कामख़त्म करके घर पहुँचने मेंउसे कम से कम दो घंटे और लगनेवाले थे। तब तक बरदाश्त करनाअसम्भव हो जाएगा। इस सूरत मेंउसके पास दो ही रास्ते थे-यातो सब ख़रीदारी छोड़छाड़ करघर को भागे या फिर आस-पासही कोई लेडीज़ टॉयलैट तलाशे।
लौटकरघर जाने का विकल्प बेकार थासो शांति उसी कचर-मचरमें थोड़ी देर भटकती रही औरउसकी उम्मीद के विपरीत एक सुलभशौचालय उसे मिल भी गया। शांतिने सोचा कि चलो मुश्किल सेआज़ादी मिली। पर ऐसा होना नथा। अपने आवेग को मार्ग देनेकी मानसिक तैयारी कि लेने केबाद जब शांति ने सुलभ शौचालयके महिलाओं वाले भाग में प्रवेशकिया तो वो एक व्यक्ति सेटकराते-टकरातेबची। यह व्यक्ति एक बाईस-तेईसबरस का नवयुवक था। शांति एकपल को अचकचा गई। वो उलटे पाँववापस लौट आई। उसे लगा कि ग़लतीसे वो पुरुषों के भाग में चलीआई। पर बाहर आके उसने देखा किकोई ग़लती नहीं हुई थी-वोपुरुषों के भाग में नहीं घुसीथी, बल्किवो नवयुवक ही था जो महिलाओंके भाग में अनाधिकार रूप सेघुसा हुआ था।
तमतमाकरशांति उसे हड़काना शुरु किया-'दिखतानहीं है..अंधेहो क्या..बाहरइतना बड़ा-बड़ालिखा है फिर भी यहाँ घुस आए..पढ़नेनहीं आता है या लफंगे हो..'
'क्याबात हो गई बहन जी..'
शांतिने सर घुमाकर देखा कि महिलाओंवाले विभाग से दो-तीनऔर नागरिक उसके आस--पासइकट्ठे हो गए हैँ। इसके पहलेकि शांति कुछ और कहती वो नवयुवकही शांति की शिकायत करने लगा-
'पतानहीं कोहे गरम हो रहीं भैया..जैसेही हम पेसाब करके बाहर निकले..लगीहमको हड़काने..'
उसनवयुवक और उस भीड़ के हाव-भावऔर तेवर से शांति को ये समझ आगया कि भले ही उसकी आपत्ति सभीपैमानों पर जायज़ हो पर वो जिनसे मुख़ातिब थी उनकी चेतनाको किसी पैमानों की कोई हवानहीं थी। अगर शांति पर उसकेशारीरिक आवेग का दबाव न होतातो वो उनकी क़ायदे से ख़बरलेती। उसने सोचा कि पहले फ़ारिग़हो लो फिर उनसे बात करती है।पर अन्दर का जो दृश्य था वो औरभी बेढब था। शहर के नागरिकमहिलाओं के लिए बने उस मूत्रालयमें मल-मूत्रकरने और नहाने-धोनेसे लेकर वो सारे काम किए जारहे थे जो एक टॉयलैट में किएजा सकते हैं-औरवो सब मर्दों द्वारा सम्पन्नकिए जा रहे थे। किसी महिला कावहाँ कोई स्थान नहीं था। क्योंकिशायद शहर के पुरुष यह उम्मीदकरते थे कि महिलाएं घर से निकलेही ना और अगर निकले भी तो अपनेआवेगोँ को दबाकर रखें।
इसअन्याय से उपजे अपने आक्रोशका आवेग तो शांति ने उस समयनिकाल दिया। पर शहर में घर सेबाहर निकलने वाली हर औरत कीतरह शांति को भी अपने दूसरेआवेग को उस रोज़ बहुत ज़ब्तकरना पड़ा और बहुत सहन करनापड़ा। जबकि उसी शहर में रहनेवाला पुरुष अपने आवेगों केलिए दो क़दम और दो मिनट काअन्तराल भी सहन नहीं करता।
***
(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on September 23, 2011 05:30 AM· permalink
धूप का मन जब-जब विचलित हुआ , बादलों को बरसने की रज़ा मिल गई | संग में लोरियां गा रही है पवन नींद की ज़न्नतों में ले गए सपन भाव की कल्पना को मिली इक दिशा शब्द सार्थक रचे और ग़ज़ल बन गई | बादलों को बरसने की रज़ा मिल गई|| वेदना-मरकरी जब-जब ऊंची चढी [...]
Posted by ramadwivedi on September 23, 2011 04:36 AM· permalink
जेनेवा स्थित भौतिकी की दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला सर्न(CERN) में वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने परमाण्विक कण (Subatomic Particles) न्यूट्रिनो की गति प्रकाश की गति से भी ज़्यादा पाई है। अगर ऐसा सच हुआ तो ये भौतिकी के मूलभूत नियमों को पलटने वाली खोज होगी। शोधकर्ता स्वीकार कर रहे हैं कि वे इस [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on September 23, 2011 01:30 AM· permalink
इस चिट्ठी में, आमिर डी ऐक्ज़ल (Amir D Aczel) के द्वारा, गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर (George Cantor) की जीवनी पर लिखी पुस्तक 'द मिस्ट्री ऑफ द एलेफ: मैथमेटिक्स, द केबालह, एन्ड द सर्च फॉर इंफिनिटी' (The mystery of the Aleph: Mathematics, the Kabbalah, and the Search for Infinity) की समीक्षा है।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें।
कुछ समय पहले साईबर अपराध की श्रंखला लिखते समय मैंने कोर्ट गर्डल के अपूर्णता सिद्धान्त और उस पर पढ़ी निम्न पुस्तकों का जिक्र किया था।
इस श्रंखला लिखने के बाद, लेकिन उसके प्रकाशन के समय मैंने 'द मिस्ट्री ऑफ द एलेफ: मैथमेटिक्स, द केबालह, एन्ड द सर्च फॉर इंफिनिटी' (The mystery of the Aleph: Mathematics, the Kabbalah, and the Search for Infinity) पुस्तक को भी पढ़ा। इसमें भी कुछ चर्चा कोर्ट गर्डल के अपूर्णता सिद्धान्त की है। कैंटर, सेट थ्योरी के पिता कहे जाते हैं। अनन्तता (infinity) पर सबसे महत्वपूर्ण काम कैंटर ने किया है। इस पुस्तक में, इसकी विस्तार से चर्चा है। इस पुस्तक के पहले कुछ अध्यायों में, कैंटर के पहले अनन्तता पर किये गये कार्य और उन गणितज्ञयों की भी चर्चा है।
अनन्त भी एक सेट है। मैंने अपनी चिट्ठी, ईश्वर का आस्तित्व नहीं है में सेट के बारे में लिखते समय बताया था,
A set is a collection of well defined distinct objects। सेट चीज़ों, वस्तुओं, पदार्थों का संकलन है।
सेट में जितने सदस्य होते हैं वह उस सेट की गणनीयता (cardinality) कहलाता है। यह सीमित अथवा असीमित या अनन्त हो सकता है। अनन्त नंबरों को कैंटर ने हीब्रियू (Hebbrew) लिपि के अक्षर א (ऍलेफ) से दर्शाया।
अनन्त के भी अजीब गुण हैं।
एक मीटर लम्बी लाइन में अनन्त बिन्दु होते हैं। यह उतने ही हैं जितने कि दो मीटर या उससे लम्बी लाइन में;
एक मीटर लम्बी लाइन में उतने ही बिन्दु हैं जितने की १ वर्ग मीटर या कितने भी वर्ग मीटर में;
एक मीटर लम्बी लाइन में उतने ही बिन्दु हैं जितने की १ घन मीटर या कितने भी घन मीटर में।
हैं न कितना अजीब।
यह अनन्त सेट भी कई प्रकार के हो सकते हैं। प्रत्येक अनन्त सेट बराबर नहीं होते हैं। कुछ गणनीय अनन्त सेट (countably infinite or denumerable sets) {जैसे कि पूर्ण संख्याओं (integers) का सेट} होते हैं। इस तरह के सेटों की गणनीयता को कैंटर ने א० (ऍलेफ शून्य) से दर्शाया। अनन्त सेटों के गुण भी अजीब होते हैं, जैसे, א० + १ = א० א० + क = א० א० x क = א० א० x א० = א० कुछ अगणनीय अनन्त सेट (uncountably infinite sets) होते हैं जैसे कि वास्तविक नंबरों का सेट (set of real numbers) (real numbers include rational and irrational numbers)। इस सेट को सातत्यक (Continuum) (कन्टिन्युअम) कहा जाता है। यह गणनीय अनन्त सेट से बड़े होते हैं। कैंटर ने वास्तविक नंबरों के सेट की गणनीयता को א१ से दर्शाया।
अगणनीय अनन्त सेट भी बराबर नहीं होते हैं। ज्यामितीय वक्रों (geometrical curves) की संख्या का सेट, वास्तविक नंबरों का सेट से बड़ा है। कैंटर ने इसकी गणनीयता को א२ से दर्शाया। अभी तक कोई ऐसा सेट नहीं मिल जो कि इससे बड़ा हो। यानि कि कोई सेट नहीं है जिसे א३ से दर्शाया जा सके।
'There is no set whose cardinality is strictly between that of the integers and that of the real numbers' गणनीय अनन्त सेट א० और वास्तविक नंबरों का सेट (set of real numbers) के सेट या सातत्यक (Continuum) (कन्टिन्युअम) א१ के बीच कोई अनन्त सेट नहीं है।
इसे सातत्यक अनुमान (Continuum Hypothesis) कहा गया। इसका दूसरा प्रतीकात्मक रूप है २אक = אक+१
हिलबर्ट के २३ प्रश्नों के बारे में मैंने यहां लिखा है। उसका पहला प्रश्न इसी अनुमान को सही या गलत सिद्ध करने के बारे में है। इस क्षेत्र में, कोर्ट गर्डल ने भी काम किया है। इसी लिये, इस पुस्तक में, उसका भी जिक्र है।
कैंटर का कहना था
'अनन्तता वास्तविक है। क्योंकि उसे इसके बारे में ईश्वर ने ही उसे बताया था और यह अनुमान ईश्वर की ही देन है। इसे समझना ईश्वर के पास पहुंचना है।'
ऐसा ही विचार, उस समय, कुछ पादरी गणितज्ञों का भी था।
गर्डल और उसके बाद कोहन (Paul Cohen) ने सिद्ध किया कि इस समय जो भी गणित के नियम है उसके अन्दर Continuum Hypothesis न तो सही और न ही गलत सिद्ध की जा सकती है। इन नियमों के अन्दर यह एक पहेली (enigma) ही रहेगी। यानि की, यह इस समय के गणित नियमों की अपूर्णता है जिसे गर्डल ने १९३१ में सिद्ध किया था। शायद गणित का कोई अन्य नियम निकले, तभी इसका हल ढ़ूंढ़ा जा सके।
लेकिन क्या यह इत्तिफाक है कि जब जब कैंटर और गर्डल ने Continuum Hypothesis पर कार्य किया तब दोनो का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। उन दोनो की मृत्यु भी, एक ही तरह से हो गयी। दोनो ने स्वयं को भूखा रख कर मार दिया।
यदि आपको गणित में रुचि है तब इस पुस्तक को अवश्य पढें। यदि आपके बेटे या बेटी गणित में रुचि रखते हों। तो उन्हें अवश्य पढ़ने को दे। लेकिन इसका आनन्द लेने के लिये इंटरमीजिएट कक्षा की गणित का ज्ञान आवश्यक है। यदि आपको अनन्तता के बारे में रुचि हो तो जॉर्ज गैमव (George Gamov) की लिखी पुस्तक 'वन टू थ्री...इंफिनिटी फैक्टस् एण्ड स्पेक्यूलेशन ऑफ साइंस' (One Two Three...Infinity: Facts and Speculations of Science' भी अवश्य पढ़ें। इस पुस्तक के बारे में मैंने यहां चर्चा की है।
कुछ समय पहले बीबीसी ने डेंजरस् नॉलेज (Dangerous Knowledge) नामक श्रृंखला प्रसारित की थी। यह श्रृंखला चार विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति, जिसमें तीन गणितज्ञ- जॉर्ज कैंटर (Georg Cantor), कोर्ट गर्डल (Kurt Gödel) और ऐलन ट्यूरिंग (Alan Turing) - और एक भौतिक शास्त्री लुडविंग बॉल्टज़मैन (Ludwig Boltzmann) पर थी। यह बेहतरीन श्रृंखला है और यदि इसे आपने नहीं देखा है तो यूट्यूब में देख सकते हैं। हांलाकि इस श्रृंखला में, इनकी जीवनी के बारे में कुछ सूचनायें सही नहीं हैं। इसमें कैंटर का भाग यहां देखिये।
प शु और मनुष्य का साहचर्य शब्दों के सफ़र में भी विविध रूपों में नजर आता है। यह उपभोक्ता और उत्पाद के रूप में भी है और पारिवारिक-आध्यात्मिक धरातल पर भी है। सर्वप्रथम मनुष्य की सत्ता पशुओं पर ही कायम हुई। उसने खुद को मानवेतर जीव-जगत का नियंता स्वयं को स्थापित किया। तात्पर्य यह कि अधिकार, स्वामित्व और सम्पत्ति का बहुआयामी बोध अगर किसी ने मनुष्य को कराया है तो वे पशु ही हैं। भाषा में भी यह रिश्ता साफ नज़र आता है। उर्दू –हिन्दी का एक आम शब्द है “माल” जो मूल रूप से सेमेटिक भाषा परिवार का है। माल का अर्थ होता है सम्पत्ति। व्यापक तौर पर धन-दौलत, सामान, भंडार, कीमती सामग्री, वस्तुएं आदि भी आती हैं। यह बना है “माल” अर्थात mwl से जिसका अर्थ होता है पशुओं का रेवड़। खासतौर पर जो दुधारू पशु पालतू हों। सेमेटिक परिवार की हिब्रू, अरबी, सीरियक, आरमेइक आदि कई भाषाओं में इस धातु की व्याप्ति इसी अर्थ में हैं। जाहिर सी बात है कि पशु ही प्राचीन इन्सान की सबसे बड़ी सम्पत्ति थे इसीलिए पशुधन जैसा शब्द हिन्दी में प्रचलित हुआ। साफ है कि माल यानी पशु। प्रचलित अर्थ में यही पशुधन ऐश्वर्य सामग्री, धनसम्पत्ति और दौलत है। जिसके पास माल है वह मालदार है अर्थात ऐश्वर्य वान है, धनी है, श्रीमंत है। माल-असबाब, मालमत्ता और मालामाल जैसे शब्द युग्म भी माल की ही देन हैं। लेनदेन अथवा व्यवसाय के तौर पर मुद्रा की भूमिका सबसे पहले पशुधन ने ही निभाई।
सबसे पहले “माल-असबाब” की बात। विभिन्न शब्दकोशों में असबाब का अर्थ रोजमर्रा के काम की वस्तु होता है। दरअसल “असबाब” अरबी भाषा से फ़ारसी होते हुए उर्दू-हिन्दी में दाखिल हुआ। बुनियादी तौर पर यह अरबी के “सबब” sbb शब्द का बहुवचन है। सबब में अरबी का “अ” उपसर्ग लगने से बनता है “असबाब”। सबब के प्रचलित अर्थ हैं वजह, निमित्त, कारण, अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, सुयोग, मौका अवसर आदि। सबब से बना बेसबब शब्द भी हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ है अकारण। मगर माल-असबाब के संदर्भ में इन अर्थों से बात नहीं बनती है और कोश इससे ज्यादा कुछ नहीं बताते। अरबी के पुराने संदर्भों में “सबब” का अर्थ रस्सी या तम्बू भी होता है “असबाब” में भी रस्सी और तम्बू के बहुवचन का भाव है। यह तम्बू “असबाब” के संदर्भ को और ज्यादा स्पष्ट करता है। कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थों का विकास बाद में हुआ। सभ्यता के अत्यंत प्रारम्भिक युग में इनसान के कुछ खास उपकरणों में रस्सी भी थी। इसी के साथ डण्डा और छाजन भी प्रमुख उपकरण थे जिनके जरिए वह आश्रय से लेकर आत्मरक्षा और पशुपालन जैसे कार्यों का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर पाता था।
गौर करें रस्सी बँटी हुई, गुँथी हुई रचना का नाम है। कुरान की अरबी के विशेषज्ञ मार्टिन आर ज़ैमिट के मुताबिक “सबब” में गूँथने, बँटने का भाव भी निहित है। वे सेमिटिक भाषा परिवार की अन्य भाषाओं के कुछ शब्दों से भी समानता सिद्ध करते हैं जिनमें घूमने, गोलाई, मुड़ने और चक्कर लगाने के भाव हैं। गूँथना और बँटना में यही क्रियाएँ होती हैं। जैमिट के मुताबिक सीरियक में शबा, आरमेइक में सबा, हिब्रू का सबाब और फोनेशियन में सब्ब जैसे शब्द हैं। ध्यान रहे रस्सी एक माध्यम है। किन्ही दो बिन्दुओं के बीच किसी प्रयोजन को सिद्ध करने का ज़रिया। रस्सी का माध्यम या ज़रिया बनना महत्वपूर्ण है। रस्सी में कड़ी या माध्यम का भाव है जो दो बातों, दो बिन्दुओं, दो वस्तुओं को जोड़ने की वजह बनती है। हैन्स व्हेर, जे मिल्टन कोवैन की डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न रिटन अरेबिक में भी “सबब” के प्राचीन मायने रस्सी
या तम्बू ही बताए गए हैं मगर “प्रयोजन, वजह, कारण, हेतु” जैसी अर्थवत्ता इनमें कैसे विकसित हुई होगी, इसका स्पष्टीकरण नहीं मिलता।
सम्पत्ति, गृहस्थी, साज़ो-सामान, कीमती पदार्थ, जमाजत्था, झोला-डण्डा जैसे अर्थों के पर्याय के रूप में अगर माल-“असबाब” पर विचार करें तो प्राचीन अरब समाज का जन-जीवन उभरता है। अरब के विस्तीर्ण मरुस्थलों में बद्दु जाति के लोग अपने मवेशियों के साथ सतत यायावरी करते थे और दाना-पानी मिलने पर यहाँ-वहाँ डेरा जमा लेते थे। अरबी में माल का अर्थ होता है पशु और असबाब यानी शिविर, तम्बू। इन दोनों से मिल कर बनता है माल-असबाब जिसमें समूची गृहस्थी या कीमती वस्तुओं का समावेश हो जाता है। प्राचीन घूमंतू जनजातियों के जीवन का सबसे बड़ा आधार ही उनके पशु और उनका तम्बू होता था। कबाइली जनजातियों के लिए खानाबदोश जैसी उपमा से भी यह स्पष्ट होता है। “खाना” का अर्थ होता है प्रकोष्ठ या आश्रय। यहाँ तम्बू का भाव स्पष्ट है। “दोश” यानी कंधा अर्थात अपने कंधों पर अपना घर लिए फिरने वाले लोग यानी बेदुइन ही खाना-ब-दोश हुए। तम्बू को खड़ा करने में रस्सी और डण्डे की बड़ी भूमिका है। इसी तरह मवेशियों को बांध कर रखने में भी रस्सी एक ख़ास ज़रिया है। तम्बू ही बद्दुओं का आश्रय था। तम्बू में ही गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी है अर्थात दुनियादारी की सभी वस्तुएँ। हिन्दी के झोला-डण्डा, झोला-रस्सी जैसे शब्दयुग्म में समूची गृहस्थी की अर्थवत्ता समायी हुई है।
स्पष्ट है कि “माल-असबाब” में सबब के प्रचलित अर्थ यानी कारण, वजह, प्रयोजन की अर्थवत्ता महत्वपूर्ण न होते हुए इसके प्राचीन भाव का ज्यादा महत्व है। यूँ कारण, वजह, प्रयोजन जैसे अर्थ भी रस्सी की अर्थवत्ता से ही विकसित हुए हैं। रस्सी में समाए माध्यम के भाव का विस्तार हुआ। वस्तुओं, पदार्थों, साज़ो-सामान, जमाजत्था जैसे अर्थ अकारण विकसित नहीं हुए। दरअसल दैनंदिन काम में आने वाली चीज़ें, उपकरण भी माध्यम हैं, एक जरिया हैं। प्रयोजन सिद्ध करने का माध्यम हैं। हमारे इर्दगिर्द जो असबाब है दरअसल वही जीवन का निमित्त है। जीवन का स्थूल अर्थ अब गृहस्थी के साधन जुटाना ही रह गया है सो साज़ोसामान के अर्थ में असबाब का प्रयोजन होना यहाँ सिद्ध है। जॉन प्लैट्स के कोश में औपनिवैशिक दौर की हिन्दुस्तानी ज़बान में प्रचलित असबाब के उदाहरण दिए हुए हैं जैसे असबाब ए पेशा अर्थात व्यवसायगत वस्तुएँ, असबाब ए जंग यानी युद्ध का साज़ोसामान, असबाब ऐ खानादारी यानी बैठकखाने की चीजें-फ़र्निचर, असबाब ए सफ़र यानी यात्रा की ज़रूरी चीज़ें।
अब बात “मालमत्ता” की। माल का अर्थ तो ऊपर स्पष्ट है। “मत्ता” दरअसल अरबी से आया शब्द है और हिन्दी में इसकी स्वतंत्र उपस्थिति न होकर“मालमत्ता” में ही देखने को मिलती है। अरबी में इसका शुद्ध रूप है “माअता” और इसे “मताआ” भी उच्चारा जाता है। अरबी मे प्रश्नवाचक सर्वनाम है “मा” जिसका अर्थ होता है- यह क्या है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में जिस तरह प्रश्नवाची सर्वनाम “की” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में पदार्थ की अर्थवत्ता आ जाने से “ची” का चीज़ रूपान्तरण हुआ और इसका अर्थ वस्तु हुआ ठीक वैसे ही अरबी सर्वनाम “मा” के साथ हुआ। “माअता” शब्द का अर्थ भी वस्तु ही होता है। “मताआ” में हर उस आमफ़हम चीज़ का शुमार है जो जीवन जीवन निर्वाह के लिए ज़रूरी है। उर्दू शायरी में “मता” शब्द का प्रयोग पढ़ने को मिलता है जैसे मता ए बाज़ार यानी बाज़ार में बिकने वाली वस्तु। मता ए ग़ैर यानी किसी और की चीज़।
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Posted by अजित वडनेरकर (wadnerkar.ajit@gmail.com) on September 22, 2011 07:28 PM· permalink
Anticancer chemotherapy using targets amenable by nucleoside drugs:
There are some recently discovered targets where compounds of ‘nucleoside’ class or just the ‘Nucleosides’ have shown some interesting biological effects. Most of these could be modulated to get novel nucleoside based highly targeted therapy of various cancer sub types.
Posted by RC Mishra on September 22, 2011 06:56 PM· permalink
हम दिन भर पैदल लंदन की सड़कों को नाप चुके थे. विवियन यूँ तो वियना की है पर लंदन की गलियों से उसकी पहचान है. शहर के उन हिस्सों में उसकी दिलचस्पी ज्यादा है जो 'लोनली प्लैनेट' सरीखी किताबों और टूरिस्ट गाइडों में जगह नहीं पाती.
सबेरे ‘टेम्स नदी’ की खोज में हम निकले. सिटी सेंटर से टेम्स बहुत दूर तो नहीं था पर इस खोज में हमने कई ऐसी इमारतें देखी जो शायद हम ट्यूब या बस में चढ़ कर नहीं देख सकते थे. वैसे भी शहर की पुरानी गलियों में भटकना नए इलेक्ट्रॉनिकउपकरण से खेलने की तरह होता है. कोई इंजीनियर हमें तकनीकी बारीकियाँ भले समझा दे पर सीखते हम खुद उससे उलझ कर ही है.
किसी भी पुरानी सभ्यता की तरह लंदन में पुराने स्थापत्य और नई इमारतें एक साथ हमजोली की तरह खड़ी नजर आती है. एक तरफ क्रिस्टोफर वारेन की तीन सौ साल पुरानी ‘सेंट पॉल कैथिडरल’ की अदभुत और दिलकश वास्तुशिल्प है तो दूसरी तरफ कारोबार के दमकते नए भवन हैं जो आधुनिक कला के नजारे दिखाते हैं.शहर के अंदरुनी हिस्सों में मजबूत और विशाल भवन ब्रितानी साम्राज्य के अतीत के गवाक्ष हमारे सामने खोलते हैं.
बहरहाल, थोड़ी दूर पर लंदन टॉवर ब्रिज के दो बुर्ज दिख रहे हैं. आसमान साफ है. सफेद-नीले बादलों का गुच्छा टेम्स नदी पर लटक रहा है. हल्की गुलाबी ठंड है और हवा में खनक. टेम्स नदी के किनारे काफी रौनक और चहल पहल है. नदी के तट पर एक जगह मुझे कुछ कंटीले गुलाबी रंग के फूल दिख रहे हैं मैंने ठहर कर अपने कैमरे में उसे कैद कर लिया. हल्की हवा का स्पर्श पाकर चिनार के हरे-पीले पत्ते इधर-उधर उड़ रहे हैं. एक पत्ता उठा कर मैंने अपनी जेब में रख ली.
टेम्स के सम्मोहन में मैं बंधने लगा हूँ. यूरोप की नदियाँ शहरों से इस कदर गुंथी हुई हैं कि आप उसे शहर की संस्कृति से अलगा नहीं सकते. पेरिस में सेन हो, कोलोन में राइन या लिंज में डेन्यूब! क्या कभी गंगा, यमुना और पेरियार भी हमारे शहर की संस्कृति का हिस्सा रही होगी?
टेम्स के ‘साउथ बैंक’ पर सेकिंड हैंड किताबों का बाजार सजने लगा है. सामने नेशनल थिएटर की इमारत पर रंग-बिरंगे पोस्टर दिख रहे हैं. दूसरी ओर कुछ फर्लांग की दूरी पर ‘शेक्सपीयर ग्लोब थिएटर’ और ‘टेट मार्डन गैलरी’ है.
लंदन की यात्रा से पहले मेरे बॉस करण (थापर) ने कहा था कि ‘लंदन जाने पर वहाँ के थिएटर मे जरुर जाना और देखना कि किस तरह बिना चीखे-चिल्लाए वे अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं. हमारे बॉलीवुड की तरह नहीं...’
शेक्सपीयर ग्लोब थिएटर के पास पहुँचने पर हमने देखा कि शो छूटने में बस 10 मिनट है. हम पाँच पांउड में खड़े होकर नाटक देखने का टिकट लेकर ‘द गॉड ऑफ सोहो’देखने ऑडिटोरियम में घुस गए. खुले आसमान में मंच बना है और दर्शकों के लिए दोनों ओर सामने लकड़ी की दो मंजिला बैठक है. खड़े हो कर देखने वालों के लिए बारिश की बूंदा-बांदी से बचाव का कोई साधन नहीं. जितने लोग दर्शक दीर्घा में बैठे है उतने ही खड़े.
नाटकों में मेरी अभिरुचि रही है पर इस तरह का बेबाक डॉयलॉग और अभिनय पहली बार देखा-सुना. वैसे हमें अगाह कर दिया गया था कि नाटक में ‘अभद्र भाषा (filthy language)’ का प्रयोग है और यह नाटक कमजोर दिलवालों के लिए नहीं है!!
थिएटर के निकल कर हम सोचते रहे कि कैसे नाटक की मुख्य स्त्री पात्र ने मंच पर एक-एक कर अपने कपड़े फेंक दिए...! हमारी संवेदना को झकझोरने के लिए यह एक नया और अलग अनुभव था. वैसे नाटक के कथानक को देखते हुए हम दृश्य संयोजन से अचंभित नहीं थे.
शाम हो रही थी और हमें तय करना था कि अब लंदन के किस कोने में हमें जाना है. किन सड़कों पर भटकना है.
बातों बातों में मैंने कहा कि ‘कार्ल मार्क्स की कब्र लंदन में ही है.’
अच्छा! मुझे पता नहीं था….विवियन ने कहा. हाइड पार्क या मार्क्स की कब्र- दो में एक चुनना था और हमनें हाईगेट कब्रगाह जाने का निश्चय किया.
कब्रगाह शहर से बाहर था. हाईगेट स्टेशन पर ट्यूब से निकल कर हम जिस कॉलोनी से कब्रगाह की ओर बढ़ रहे थे वह पॉश कॉलोनी लग रही थी. ऊँची पहाड़ियों पर खूबसूरत भवन. महंगे कार और करीने से सजे लॉन.
दो-तीन किलोमीटर पैदल चल कर जब हम कब्रगाह पहुँचे शाम के करीब सात बज रहे थे.
चारों तरफ सन्नाटा था और कब्रगाह में ताला लटक रहा था. अगल-बगल हमने नजर दौड़ाई पर वहाँ कोई नहीं दिख रहा था. अलबत्ता कब्रगाह के अंदर एक लोमड़ी टहलती दिख रही थी.
इसी बीच सड़क पर निकले एक व्यक्ति को रोक कर हमने पूछा कि ‘क्या मार्क्स की कब्रगाह यही है?’
भले मानुष ने थोड़ी हताशा भरी स्वर में कहा कि ‘बेशक यही है. पर आप देर हो चुके हैं. यह पाँच बजे बंद हो जाती है.’
हमारे चेहरे पर आए निराशा के भाव को पढ़ कर उन्होंने पूछा आप कहाँ से आए हैं?
मैं भारत से हूँ और ये ऑस्ट्रिया से आई हैं...
कोई नहीं, आप फिर कल आ जाइएगा...
विवियन ने कहा कि क्यों ना हम मार्क्स के नाम एक संदेश छोड़ जाएँ. मैनें कहा जरूर..
‘कामरेड मार्क्स, हृदय के अंतकरण से हमारी श्रद्धांजलि! दुनिया बदल गई है पर इस बदली हुई दुनिया में तुम्हारे सिद्धांतों की जरुरत कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई है!’
विवियन ने कपड़े के एक छोटे से टुकड़े में इस संदेश को लपेट कर कब्रगाह के दरवाजे पर बांध दिया...
(चित्र में, टेम्स पर बने मिलेनिएम ब्रिज से सेंट पॉल कैथिडरल का नजारा, हाईगेट सेमिटेरी के गेट पर विवियन)
Posted by Arvind Das (noreply@blogger.com) on September 22, 2011 11:42 AM· permalink
एक बुरी ख़बर आई है। जाने-माने क़व्वाल मक़बूल अहमद साबरी का बुधवार 21 सितंबर को साउथ अफ्रीक़ा में इंतकाल हो गया है। अफ़सोस की बात ये है कि वो बहुत जल्दी चले गए। महज़ 66 की उम्र में।
मेरे बचपन की कई यादें मक़बूल अहमद साबरी से जुड़ी हुई हैं। जिस पृष्ठभूमि और बुंदेलखंड के जिस इलाक़े से मैं आता हूं--वहां के गांवों में...मेरे अपने पैतृक गांव में पिछली कुछ पीढियां 'साबरी ब्रदर्स' की क़व्वालियां सुनते सुनते बड़ी हुई हैं। क़व्वालियों से मेरा निजी तौर पर इतना गहरा नाता नहीं रहा है। पर फिर भी ये मेरे बचपन का एक अहम हिस्सा थीं। आप समझ सकते हैं कि वो फिलिप्स के ''लेटे हुए रिकॉर्डर'' का ज़माना था। बाद में टू-इन-वन का आगमन भी हुआ। और तब जब भी हिंडोरिया गांव जाना होता--तो वहां घरों में साबरी ब्रदर्स बजते। सुबह-सुबह भी बजते। दोपहर को भी और रात को भी। लोग 'दमोह', 'छतरपुर' और 'जबलपुर' जैसे शहरों में जाकर ये कैसेट जमा करते। उनकी कॉपीज़ करवाते। उन दिनों ये सब बहुत मुश्किल काम थे। टेप-रिकॉर्डर तक सबके पास नहीं होता था।
हम भोपाल में रहा करते थे। जो गांवों की तुलना में ज़रा आगे था। अस्सी के दशक में तो यहां से सऊदी अरब जाकर नौकरियां करने का चलन शुरू हो भी चुका था। पैसा बढ़ रहा था। पहली बार सोनी और पैनासॉनिक के बड़े सिस्टम्स उन्हीं दिनों देखे गये। सऊदी से लाए गए। उनके ग्राफिक इक्वालाईज़र में झिलमिलाती एल.ई.डी. किसी जादूनगरी की रोशनियां लगतीं। और साउंड बैलेन्स करना किसी जादू की पुडिया का करिश्मा। सऊदी से ही साब्ररी ब्रदर्स के कैसेट भी लाए जाते। और पास पड़ोस में बांटे जाते। तब एक क़व्वाली बड़ी मशहूर हआ करती थी--'इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं किस क़दर चोट खाए हुए हैं'। इस क़व्वाली को बाद में काफी लोगों ने गाया। इसका एक शेर बहुत बाद में समझ आया--'ऐ लहद(क्रब्र) अपनी मिट्टी से कह दे, दाग़ लगने ना पाए कफ़न में/ आज ही हमने बदले हैं कपड़े, आज ही हम नहाए हुए हैं'। शुरूआती खोजबीन में फिल्हाल ये क़व्वाली कहीं मिली नहीं। वरना यहां आपको सुनवाते।
एक और याद है साबरी ब्रदर्स को 'लाइव' सुनने की। दमोह में हम नानी के घर गर्मियों की छुट्टियां मनाने गए थे। उन्हीं दिनों मुर्शीद बाबा की मज़ार पर उर्स होना था। और बड़ा हल्ला था कि पाकिस्तान से साब्ररी ब्रदर्स को बुलवाया जा रहा है। मुझे याद है कि आसपास के शहरों और गांवों से लोग इस मौक़े के लिए पहुंचे थे। इतनी जबर्दस्त भीड़। वो मंजर अब तक आंखों में ठहरा हुआ है। साबरी ब्रदर्स देर से आए थे। लेकिन एक मिनी-बस में जब उनका कारवां पहुंचा और कुछ ही मिनिटों में जब आसमानी पोशाक वाली उनकी टोली ने अपने साज़ मिलाने शुरू किए तभी से लोग 'अश अश' करने लगे। क़व्वालियों की उस महफिल में उन्होंने क्या गया, ये तो याद नहीं है पर ये ज़रूर याद है कि जिन लोगों ने उन्हें सुना, वो आज तक उस रात को याद करते हैं।
मक़बूल साबरी ने एक ख़ास चलन शुरू किया था। बीच में एकदम ठोस आवाज़ में 'अल्लाह' कहने का। बाद में ये उनका ब्रांड बन गया था। क़व्वालियां की दुनिया में जो मिलावटें हुई हैं और जिस तरह क़व्वालियों को ख़राब किया गया है, ऐसे दौर में साब्ररी ब्रदर्स की अहमियत बहुत बढ़ जाती है। जो लोग साबरी ब्रदर्स को ठीक से नहीं पहचानते उन्हें बता दें कि साबरी ब्रदर्स में बड़े भाई हाजी गुलाम फ़रीद साबरी और हाजी मकबूल अहमद साबरी शामिल थे। गुलाम फ़रीद साबरी का निधन 1994 में हो चुका है। मकबूल अहमद साबरी के निधन के बाद क़व्वाली की दुनिया से 'साबरी ब्रदर्स' का सूरज डूबा ही समझिए।
उन्हें श्रद्धांजली देते हुए आज रेडियोवाणी पर उनकी कुछ क़व्वालियां।
भर दे झोली या मुहम्मद मेरी
हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचना 'जिहाले मिस्किन'
घुंघरू टूट गए।
Posted by yunus.radiojockey@gmail.com on September 22, 2011 07:01 AM· permalink
सितम्बर १७, २०११ सियैटल, संयुक्त राज्य अमेरिका. पिछले वर्ष सियैटल में हुए कवि सम्मेलन को मिली आशातीत सफलता को देखते हुए नगरी की सांस्कृतिक संस्था प्रतिध्वनि इस वर्ष पुनः हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया. हिंदी भाषा का जो स्वरुप कविताओं में उजागर होता है वह अत्यंत आनंद प्रदान करने वाला होता है. सधे हुए कवि सम्मेलनों में प्रस्तुतिकरण के कौशल द्वारा कविताओं की मिठास में चार चाँद लग जाते हैं. यदि बात हास्य कविताओं की हो रही हो तो फिर मिठास और आनंद का एक नाभकीय विस्फोट होता है. सियैटल नगरी में 'झिलमिल २०११ - हास्य कवि सम्मेलन' का आयोजन १७ सितम्बर २०११ को हुआ. सांस्कृतिक संस्था प्रतिध्वनि की ओर से प्रस्तुत इस कार्यक्रम में दो सौ श्रोताओं नें लगभग चार घंटे तक अनेक चटपटी और झिलमिलाती हुई हास्य कविताओं का रसास्वादन किया.
शहाना नें मां सरस्वती की वंदना कर कार्यक्रम को प्रारंभ किया. इस कवि सम्मेलन में सन फ्रांसिस्को से पधारी अर्चना पंडा, वैंकुवर कनाडा से आये आचार्य श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी तथा उनकी धर्म पत्नी कांति द्विवेदी. सियैटल नगरी से अंकुर गुप्त, निहित कौल, ज्योति राज, अनु अमलेकर, कृष्णन कोलाड़ी एवं अभिनव शुक्ल नें अपनी कविताओं का पाठ किया. कार्यक्रम का संचालन अभिनव शुक्ल नें किया. लगातार दूसरे वर्ष आयोजित 'झिलमिल' कवि सम्मेलन में श्रोताओं नें जम कर ठहाके लगाये और श्रेष्ठ कविताओं को भी सराहा. इस आशा के साथ की आने वाले वर्षों में हिंदी भाषा एवं कविताओं की झिलमिलाहट और भी अनेक चेहरों पर मुस्कराहट लेकर आएगी झिलमिल २०११ संपन्न हुआ.
कुछ दिन पहले मितुल ने बताया कि हिंदी विकिपीडिया के लेखों की संख्या एक लाख से अधिक हो गयी है। मितुल चिट्ठों की दुनिया से जुड़े हैं। लेकिन शायद उन्होंने अपना ब्लाग आजतक नहीं बनाया। [मितुल का परिचय यहां देखें। ] शुरुआती दिनों में चिट्ठों पर मितुल की टिप्पणियां दिखतीं थीं लेकिन इधर काफ़ी दिनों से कम दिखीं। लेकिन हिंदी विकिपीडिया से वे जुड़े रहे। उन्होंने जब यह सूचना दी कि हिंदी विकिपीडिया के चिट्ठों की संख्या एक लाख के पार हो गयी तो बहुत खुशी हुई।
मितुल ने आज से पांच साल पहले निरंतर पत्रिका के लिये लेख लिखा था – विकिपीडिया: हिन्दी की समृद्धि की राह । इससे प्रेरणा लेकर हमने भी हिंदी विकिपीडिया को समृद्ध करने का मन बनाया था और शुरुआत भी की थी। लेकिन फ़िर ज्यादा कुछ कर नहीं पाये। केवल एक लेख लिखकर रह गये जिसमें हिंदी विकिपीडिया का मुखपृ्ष्ठ, हिन्दीविकि पर अपना खाता कैसे खोंले और अपना गांव-शहर कैसे जोड़े इससे संबंधित लिंक दी गयीं थीं। इतना योगदान करके हमने हिदी विकिपीडिया को नमस्ते सा कर लिया।
लेकिन सब हम जैसे नहीं हैं। कई लोगों ने अपने योगदान जारी रखे। इनमें प्रमुख नाम पूर्णिमा वर्मन, अनुनाद सिंह, देबाशीष , मितुल आदि के अलावा और बहुत से लोग हैं जिनके बारे में मुझे अच्छी तरह से पता नहीं। पूर्णिमा जी के बारे में मेरा मानना है कि नेट पर अगर हिंदी प्रचार-प्रसार के लिये सबसे अधिक योगदान करने वालों की अगर कोई सूची बनायी जाये तो उनका नाम सबसे ऊपर के लोगों में होगा। विकिपीडिया में महादेवी वर्मा और अन्य साहित्यकारों से जुड़े पेजों की शुरुआत उन्होंने ही की थी। इसके पहले अभिव्यक्ति, अनुभूति (अभि-अनु ) के माध्यम से उन्होंने नेट पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बहुत काम किया। लेखकों को पहचानकर उनको लिखने के लिये प्रेरित करना और अभि-अनु की निरंतरता बनाये रखना एक अद्भुत काम है जिसे पूर्णिमा जी अपने साथियों के साथ पिछले ग्यारह से अधिक वर्षों से कर रहीं हैं। निरंतर पर लिखे एक लेख में उन्होंने अभि-अनु की शुरुआत और बाद की यात्रा के बारे में जानकारी दी थी।
इसके अलावा उन्मुक्तजी ने एक बार जानकारी दी थी कि वे अपने लेख विकिपीडिया पर डालते रहते हैं। आशीष तो अब शायद विकि के लिये ही लिखते हैं। उनके विज्ञान श्रंखला के जानकारी से भरे-पूरे लेख देखकर बहुत अच्छा लगता है। शुरुआत में आशीष खाली-पीली नाम से ब्लाग से लिखते थे और उनका ब्लाग सबसे लोकप्रिय ब्लागों में से था। अब अपनी कल्लो बेगम का साथ छोड़कर (?) वे पूरी तरह से विज्ञान विश्व के माध्यम से विज्ञान की जानकारी देने वाले लेख लिखने में जुट गये हैं और आज चिट्ठाकार पर Quantum entanglement का हिंदी पर्याय पूछते पाये गये। आशीष का परिचय पाने के लिये देखें- बहुमुखी प्रतिभा वाले हैं झालिया नरेश !
हिन्दी विकि के समाचार बाद के दिनों में देबाशीष से मिलते रहते थे। यह जानकारी भी कि उसमें योगदान देने वालों में भी आपस में विचारधारात्मक द्वंद चलता रहता था। एक विचारधारा के लोग दूसरी सोच के लेखों पर वीटो सरीखा करके अपने मनमाफ़िक जानकारी फ़्रीज कर देते हैं। आदि-इत्यादि। लेकिन यह सहज-स्वाभाविक मानव व्यवहार है। हर जानकारी को लोग अपने चश्मे से हमेशा से देख सकते हैं। यह सब तो तब होगा जब वहां सामग्री होगी। अभी तो सामग्री के लिहाज से बहुत काम बाकी है!
हिन्दी विकिपीडिया का प्रवेशद्वार देखकर लगता है कि इसमें जानकारियां पिछले तीन साल से अपडेट नहीं हो रहीं हैं। वजह इससे जुड़े लोग बता सकें शायद!
हिंदी विकि पर आज तमाम लोग अपना योगदान दे रहे होंगे। हम और आप भी दे सकते हैं।
हिन्दी विकिपीडिया पर लेखों की संख्या एक लाख के पार होना एक खुशी का मौका है। इस प्रयास में योगदान देने वाले लोगों को बधाई!
शायरों और न्यूज चैनलों में एक समानता होती है। दोनों किसी भी घटना को सबसे पहले बयान करने की बेकली से पीड़ित होते हैं! उनको लगता है कि अगर किसी घटना को सबसे पहले न दिखाया/बयान किया तो इतिहास उनको भले माफ़ कर दे लेकिन उनके पेशे का भूगोल बिगड़ जायेगा।
पेट्रोल के दाम बढ़े तो टीवी चैनलों ने घर-घर जाकर जनता के बयान लिये कि उनका बजट कैसे गड़बढ़ाया। कैसे उनका जीना दुश्वार हो गया है। कैसे उनकी गृहस्थी की गाड़ी पटरी से उतर गयी है। एक संवाददाता ने तो जनता की प्रतिक्रिया सबसे पहले दिखाने के चक्कर में हड़बड़ाकर इतनी तेजी से माइक उसके मुंह से सटाया कि उसके आगे के दो दांत बिना ’मे आई कम आउट’ कहे ही निकल कर बाहर आ गये।
यह सब देखकर शायर लोग भी उचके और दनादन शेर दागने लगे। प्रख्यात शायर ’कट्टा कानपुरी’ ने शुरुआत ही इंटरनेशनल शेर से की और अर्ज किया:
निकल रहा है अमरीका, ईराक औ अफ़गान से,
तेल निकाल देती हैं, तेल की कीमतें हर एक का।
’कट्टा कानपुरी’ के लिये अंतर्राष्ट्रीय होने का मतलब अमेरिका, ईरान और अफ़गान हो जाना होता है। किसी भी मसले पर शेर लिखना हो वे हांक लगाते -चलो बेटा अमरीका, ईरान और अफ़गान। अमरीका बेटे चलो तुम पहली लाइन में लग लो और बेटे ईराक अपने भाई अफ़गान के साथ खड़े हो जाओ दूसरी लाइन में। शेर पूरा करना है।
कभी-कभी ईरान और अफ़गान एतराज करते कि अमरीका के लिये पूरी लाइन और हमारे लिये आधी-आधी। ये क्या मजाक है शायर साहब! इस पर ’कट्टा कानपुरी’ उनको प्यार से समझाते -बेटे, अमरीका की बात और है तुम्हारी और। उसका मंगल तेज है। वो किसी के साथ कभी खड़ा नहीं हो सकता। तुम दोनों हो सकते हो। वैसे भी तुम सताये हुये हो। साथ रहो तो एक दूसरे का दुख-दर्द कह सुनकर हल्का कर लोगे। हिंदी के अजीम शाइर सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन’ अज्ञेय’ ने फ़रमाया भी है- दुख मनुष्य को मांजता है।
लेकिन इस बार ’कट्टा कानपुरी’ जी ने सबको एक लाइन में खड़ा करके शेर निकाला तो सबको हैरत हुई! लेकिन शाइर ने बताया कि वो इस शेर के जरिये यह बताना चाहता है कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के चलते सब लोग बराबर हलकान हैं।
शायर साहब की देखा-देखी और तमाम परेशानियां भी सामने आकर खड़ी हो गयीं और बोली -हमको भी डिस्क्राइब करिये न जी! देखिये क्या हैं वे समस्यायें:-
विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के छात्रों ने तेल की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर कहावतों/मुहावरों में संसोधन करने का सुझाव दिया है। “खून-पसीना एक कर देना” की जगह ’पेट्रोल-डीजल एक कर देना” रखने का सुझाव दिया है। ’खून के आंसू’ की जगह ‘तेल के आंसू ‘ तो बच्चों ने इस्तेमाल करना भी शुरू कर दिया है।
आधुनिक समय में होने वाली हर घटना को अपने गौरव शाली अतीत से जोड़कर देखने की आदत से लाचार एक इतिहासकार ने बयान जारी किया:
रावण की मौत राम के हाथों नहीं हुई थी। रावण बेचारा तेल की बढ़ती कीमतों के सदमें में मरा। उसने एक तो पहले हनुमान की पूंछ जलाने के चक्कर में बहुत तेल बरबाद कर दिया। इसके बाद उसके हाइटेक रथ के तेल का खर्चा बहुत था जबकि राम पैदल लड़ते थे। तेल की बढ़ती कीमतों ने उसकी कमर तोड़ दी। कंगाली में आटा तब गीला हो गया जब राम ने उसकी नाभि में गाढ़े समय के लिये बचाकर रखा गया तेल भी जला दिया (लोगों की यह धारणा गलत है कि रावण की नाभि में अमृत था। वस्तुत: वह एक बोतल पेट्रोल था जिसे उसने गाढ़े समय के लिये बचाकर रखा था जैसा कि आजकल अमरीका करता है कि वह दूसरों का पेट्रोल लूटता है पर अपना बचाकर रखता है) !
इसी घराने के एक मानस मर्मज्ञ ने ताव में आकर मानस की चौपाई :
रावण रथी विरथ रघुवीरा। देखि विभीषण भयहु अधीरा ॥
चौपाई की पुनर्व्याख्या करके डाल दी और बताया- रावण रथ पर सवार है जबकि राम बिना रथ के हैं। रावण की मौत तो निश्चित है। उसके बाद विभीषण को ही गद्दी संभालनी है। लेकिन रावण मरने के पहले हवापानी के चक्कर रथ पर चढ़कर लड़ते हुये लंका का पेट्रोल फ़ूंक रहा है। विभीषण को लग रहा है कि मरने के पहले रावण लंका का खजाना खाली कर देगा। यह देखकर उसका दिल बैठ रहा था।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अमेरिका दौरे की अनुमति की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उनको पता है कि जब वे वहां जायेंगे तो पैसे भले पाकिस्तान दूतावास के लगें लेकिन तेल तो उनके देश का ही ठुकेगा।
एक ही कन्या के लिये कल तक भारत-पाकिस्तान हो रहे लड़के अब पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के चलते एक हो गये हैं और कन्या का पूल-पीछा करने लगे हैं। दोनों अब पेट्रोल का खर्चा शेयर करके एक ही बाइक पर कन्या के घर तक आने जाने लगे हैं।
कल तक जो कन्यायें मोटर बाइक के माडल पर फ़िदा होकर लड़कों को भाव देतीं थीं अब उन्होंने माडल के झांसे में आकर हां कहने की बजाय बाइक हिलाकर टंकी का पेट्रोल देखना शुरु कर दिया है। जिसकी टंकी में पेट्रोल ज्यादा होता है उसके नंबर बढ़ा देती हैं जैसे स्कूलों में खुद से ट्यूशन पढ़ने वालों के नंबर गुरुजी प्रैक्टिकल में बढ़ा देते हैं।
कल तक जो भाई अलग-अलग गाड़ी में लदकर मुकदमा लड़ने जाते थे वे अब एक ही गाड़ी को शेयर करके जाने लगे हैं। पेट्रोल की कीमतों ने उनके मुकदमा लड़ने की पारिवारिक परम्परा के निर्वाह में चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब वे असहाय होकर आपस में समझौते की बात तक सोचने लगे हैं।
एक प्रसिद्ध कथावाचक ने भगवानों की समझदारी और दूरदर्शिता के किस्से सुनाते हुये बताया कि भगवान लोग इसीलिये किसी ऐसे वाहन की सवारी नहीं करते जिसमें तेल की खपत होती हो। सब भगवान लोग पशु-पक्षियों को अपना वाहन बनाये हुये हैं। उनको पता था कि जब तेल के दाम बढ़ेंगे तो उनकी भगवानगिरी को खतरे में पड जायेगी।
कल्पवृक्ष जिसके नीचे खड़े होकर कुछ भी मांगने पर वह सामान मिल जाता था वहां भी नोटिस लग गयी है- यह सुविधा पेट्रोल/डीजल के लिये लागू नहीं है।
पहले भगवान लोग भक्त की तपस्या से प्रसन्न होकर कुछ भी वरदान दे देते थे। आज हर भगवान वरदान स्वीकृत करने के पहले देखता है –कहीं इसने तेल तो नहीं मांगा है। तेल वरदान मांगने पर भगवान आजकल साफ़ मना कर देते हैं।
दहेज की कमी के कारण तमाम बहुओं जलने से बच गयीं हैं। लोग बहुओं को जलाने का सस्ता तरीका खोज रहे हैं।
तेल की कीमत का असर इतना व्यापक हुआ कि इस पर लोगों ने चुटकुले तक गढ़ लिये। एक चुटकुले के अनुसार पेट्रोल की खपत घटाने के लिये संता ने एक कार और खरीद ली है। एक से वह घर से आफ़िस जाता है , दूसरी से दफ़्तर से वापस घर आता है। इस तरह प्रति कार उसकी तेल की खपत आधी हो गयी है। इससे उत्साहित होकर वह दो कारें और खरीदने की सोच रहा है ताकि उसका प्रति कार पेट्रोल का खर्चा एक चौथाई हो जाये।
इसके अलावा भी और न जाने कित्ते साइड इफ़ेक्ट हुये कीमतें बढ़ने के! कहां -कहां तक गिनायें उनको। आप भी हलकान हो जाओगे। अभी भी आप काम भर का बोर हो चुके होंगे। इसलिये श्रम को भुलाने के ’कट्टा कानपुरी’ के कुछ शेर पढ़ डालिये अगर मन करे:
तू जो कहे वो सब कर गुजरूंगा तुम्हारे लिये
पर खुदा के लिये पुराने दाम पर पेट्रोल न मांग!
देवता तो भाई सच में इस्मार्ट होते हैं,
किसी की सवारी में पेट्रोल नहीं लगता।
तपस्या से खुश हो भगवान ,पैदल पहुंचे औ बोले,
मांग ले वत्स जो तेरा जी चाहे, सिरफ़ पेट्रोल के सिवा!
तेल के दाम बढ़ने से ,कई बहुओं की जिंदगी बच गई,
सोच रहे हैं ससुराल वाले, सस्ता तरीका निपटाने का।
जवान गुस्सैल मर्द के एक बार फ़िर से होश उड़ गये,
ठसके से ज्योंही कहा इंस्पेक्टर ने , मेरे पास पेट्रोल है।
वसीयत में बाप ने अभी -अभी ये जोड़ा है,
कार की टंकी का पेट्रोल बच्चों में आधा-आधा ।
ये पेट्रोल भी देखो ,क्या शान से बैठा है म्यूजियम में,
सौ रुपल्ली में बिकता था, कभी ये गली -गली!
पेट्रोल के दाम बढ़े सुनकर उनको बहुत इत्मिनान आया
दीवालिया हो जायेंगे मेरे ’रकीब’ मेरे यार की गली आते-जाते!
हिलते पर्दे से छनकर रौशनी आती है , शीशे के बोल में अरालिया की एक लतर , किताबों की टांड में एक ग्रॉसमन , रिल्के की ना समझी कोई कविता की एक अदद पंक्ति, चाय की दुकान पर आधी पी गई एक टूटी चीनी मिट्टी की प्याली , झगड़ालू बत्तखों के कैंक कैंक के बीच ज़रा सा (जो होना ही था ऐसी संगत में ) गुस्सा और मेहताब मियाँ के नमाज़ के वक्त देर कराते पर्दे की बहस करते हँसते कहते , दोस्त ?
कोल्ताई की फिल्म पर धीमे बात करते , इतवार की उदास दोपहर दो बूँद आँसू की संगत में याद करते बारिश की एक नम सुबह , बरसों पहले कीसूखी घास पर रेंगते चींटे , हवा में उड़ते पतंगे , अलसाये भुनभुनाते भौंरे , कहते सन डैप्पल्ड , एक भुतहा काल्पनिक रेल जो जाने किस शहर लिये जाता मुझे ,वक्त में सुन्न जँगलात , हरी वादी , माँ के घने काले केश , आड़ी तिरछी कहानियाँ , सूनी सड़कें , छापे की वही रंगीन बचपन की फ्रॉक , एक मीठी गोली चूसता लड़का देखता है मुड़ कर अब भी , जाने कहाँ चला गया , किस अजाने भूगोल , बँद होती एक खिड़की के पीछे का धुँधलाता संसार , सुनसान स्टेशन पर रुकी हुई है रेल अब भी हज़ारों साल
Posted by Pratyaksha (noreply@blogger.com) on September 20, 2011 03:03 AM· permalink
In the last decade, a number of carbocyclic nucleoside analogs have been reported to posses interesting anti viral and anti cancer properties. We have communicated an article with the aforesaid title which would be available soon.
Posted by RC Mishra on September 19, 2011 03:11 PM· permalink
कु दरती तौर पर नज़र आने वाली ज्यादातर चीज़ों के पैदा होने का एक ख़ास तरीका होता है मगर भाषा के बदलने और शब्दों के जन्म लेने के पीछे तयशुदा सिलसिला नहीं है। कोई शब्द आज जिस रूप में है, उसका कल क्या रूप होगा, कहा नहीं जा सकता। यही नहीं, बदले रूप में उसका क़िरदार क्या होगा इसका भी कुछ ठिकाना नहीं। हिन्दी में “चीज़”बड़ा आमफ़हम शब्द है। “चीज़” की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। सूक्ष्म से लेकर दीर्घकाय वस्तुएँ इसमें शामिल है। मामूली से लेकर बेशक़ीमती पदार्थ तक इसमें आते हैं। बेजान वस्तुओं से लेकर प्राणी तक इसके दायरे में शामिल हैं। क़ुदरत की बनाई नायाब चीज़ों में हीरा भी है और हीरे की खदान भी है। नदी भी है तो सागर भी। सहरा भी है और जंगल भी। हवा, पानी, पेड़, फूल, पत्ती, सोना, चांदी सब कुछ उन चीज़ों में शामिल है जिन्हें कुदरत ने बनाया है। इनसान भी इन्हीं में से एक चीज़ है। आशिकमिज़ाज लोग दिल को “चीज़” कहते हैं विनम्रतावश शरीफ़ लोग खुद को भी “नाचीज़” कहते हैं। चीज़ दरअसल फ़ारसी से बरास्ता उर्दू ज़बान, हिन्दी में दाखिल हुआ। हिन्दी की बोलियों में चीज़बस्त शब्दयुग्म भी प्रचलित है जिसका अर्थ है रोज़मर्रा के काम की वस्तुएँ। चीज़ में स्थूल रूप से पदार्थ का भाव है। इसमें चल-अचल सम्पत्ति, सामान, मालमत्ता, असबाब, सामग्री आदि सब कुछ शामिल है। जॉन शेक्सपियर के कोश के मुताबिक इसमें सरंजाम, डंडा-डेरा, साज़ो-सामान, घर-बार, झोला-तम्बू सब आ जाता है।
“चीज़” की व्युत्पत्ति के जन्मसूत्र इंडो-ईरानी भाषा परिवार के प्रश्नवाची सर्वनाम से जुड़े हैं। सृष्ठि में जो कुछ भी दृश्यमान है, सब “पदार्थ” की श्रेणी में आता है। वैशैषिक दर्शन में विश्व को छह पदार्थों (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) में समेट दिया गया है। मनुष्य का मूल स्वभाव है अस्तित्व के प्रति जिज्ञासु होना। यह बहुत महत्वपूर्ण है। जागृत विश्व में अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा प्रकट करने के लिए छह प्रकार के ककार हैं। हिन्दी में इन्हें प्रश्नवाची सर्वनाम अर्थात क्या, क्यों, कहाँ, कब, कैसे, कौन कहा जाता है। इन्हें ककार इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें “क” वर्ण या ध्वनि है। इसी तरह अंग्रेजी में फाईव डब्ल्यू और वन एच में भी यही बात हैं। गौरतलब है कि हमारे यहाँ "क" की महिमा है तो अंग्रेजी में "डब्ल्यू" की। इनमें रिश्तेदारी है, जिसकी चर्चा आगे। संस्कृत के “क” (कः) वर्ण में जिज्ञासा का भाव महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि “चीज़” के मूल में भी इसी ‘क’ की माया है। हिन्दी की अनेक बोलियों में जानने के लिए, प्रश्नवाचक “की/ki” (की?) शब्द बोला जाता है। अभिप्राय “क्या” से होता है। “की” में “क्यों” का भाव भी है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में इस “की” का रूपान्तर “ची” में भी होता है। लोक बोली में मुख-सुख के आधार पर “क्यों” के “चों” या “च्यों” जैसे रूप भी सुनने को मिलते हैं। तुतलाने वाले भी “क्यों” की एवज में “च्यों” का उच्चार करते हैं।
बहरहाल “की/ki” का प्रयोग “क्या” अथवा “कौन” के लिए होता है, यह स्थापित सत्य है। प्रश्नवाची सर्वनाम “किस” पर विचार करते हुए भाषाविज्ञानी भोलानाथ तिवारी संस्कृत के “कस्य” शब्द के आदिरूप “किस्य” की कल्पना करते हैं। इसमें संस्कृत के “किम्” का पुरानी फ़ारसी में “चिम्” रूप बतलाते हैं। इसी तरह डॉ फ्रिट्ज़ रोज़ेन भी फ़ारसी में कौन के लिए “की ki” और क्या के लिए “ची chi” शब्द में अंतर्संबंध बताते हैं। बात को और स्पष्ट करने के लिए एक और सर्वनाम की मिसाल देखते हैं। हिन्दी का अनिश्चयवाची सर्वनाम है “कुछ”। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में इसके “कुच्छो, कछू, किछु” जैसे रूप भी मिलते हैं। इसका प्रयोग निर्जीव पदार्थों के अस्तित्व को उजागर करने के लिए होता है। उदयनारायण तिवारी समेत अनेक विद्वानों ने कुछ की व्युत्पत्ति किं-चिद् से मानी है जिसका हिन्दी रूप किंचित् है। पदार्थ के अस्तित्व का यही भाव “की/ki” के फ़ारसी रूपान्तर “ची” में भी देखने को मिलता है और इसी वज़ह से वस्तु या पदार्थ के अर्थ में ही प्रश्नवाची सर्वनाम “ची” का रूपान्तर “चीज़” हो गया। अलबत्ता पदार्थ के प्रति कुछ में जो तुच्छता का भाव है, वैसा “चीज़” में नहीं है। “चीज़” में जब तुच्छता प्रकट की जाती है तो उसके आगे विलोमार्थक “ना” उपसर्ग लगाकर “नाचीज़” शब्द बनाया जाता है अर्थात जो तुच्छ हो। तुच्छ वही है जो हीन है, क्षीण है या महीन है। जाहिर है चीज़ में महत्व निहित है। यह भी कि किं-चिद् से अगर “कुछ” बनता है तो “ची”(की) से “चीज़” बनना तार्किक है।
चीज़ में ज्यादातर वैशिष्ट्य, महत्वपूर्ण जैसी अर्थवत्ता है। कोई खास वस्तु, कीमती पदार्थ, मालमत्ता, माल-असबाब, सम्पत्ति, खास आदमी वगैरह चीज़ के दायरे में आते हैं। मराठी में भी “चीज़” और “चीज़बस्त” शब्द का अर्थ कीमती पदार्थ, खास बात या कोई पदार्थ, टुकड़ा, पीस piece ही है। जेटी मोल्सवर्थ अपने मराठी कोश में चीज़ का अर्थ स्पष्ट करते हुए मिसाल देते हैं कि गायन जैसी कोई चीज़ नहीं ( गायना सारखी दुसरी चीज नाहीं) ज़ाहिर है यहाँ चीज़ का अभिप्राय कला से है। यानी पदार्थ की श्रेणी में गुण भी शामिल है। इसके विपरीत मराठी में कभी कभी तुच्छता का भाव प्रकट करने के लिए भी चीज़ का प्रयोग होता है जैसे- इस लड़के ने तो मेरी मेहनत की “चीज़” कर दी (ह्या पोराने माझ्या श्रमाचे चीज केले) यहाँ आशय मेहनत पर पानी फेरने से ही है। खानोलकर और सरमोकदम के मुताबिक बखानने योग्य बात, सराहने योग्य बात भी “चीज़” हैं मसलन किसी कविता की पंक्ति, कोई उक्ति या श्लोक आदि। संगीत घरानों में पुरानी घरानेदार बंदिश को चीज़ कहने की रिवायत रही है जैसे-राग दरबारी की एक चीज़ पेश है।
इंडो-ईरानी परिवार का “चीज़” शब्द अंग्रेजी में भी गया और वहाँ इसका रूप हुआ Cheese. पश्चिमी भाषाविज्ञानियों के अनुसार अंग्रेजी का चीज़ Cheese भी उर्दू-फ़ारसी के चीज़ से ही गया है जिसका अर्थ है पदार्थ, कुछ आदि। भाषा विज्ञानियों के मुताबिक पुरानी फ़ारसी में “किस-की” जैसे शब्दों का अर्थ वही था जो संस्कृत के “कस्य” या “किस्य” का था। यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि बाद के दौर में किस-की के “चिस-ची” जैसे रूप बने होंगे तभी “ची” से “चीज़” जैसे सूप सामने आए। “किस” में भी “कौन” का ही भाव है। एटिमऑनलाइन के मुताबिक इसका रिश्ता प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु kwo- से ही जिससे ही अंग्रेजी का “हू who” (कौन) बना है। गौर करें संस्कृत में भी प्रश्नवाचक सर्वनाम “क/ka” से शुरू होते है और भारोपीय भाषाओं में भी जैसे अवेस्ता में को, रूसी में क्तो, लिथुआनी में कस, लैटिन में क्वी, क्वे, क्वोद, स्लोवानी में कुतो ( संस्कृत के कुतः से साम्यता देखें) आदि। बात यहाँ भी प्रश्नवाची सर्वनाम से ही जुड़ रही है। अंग्रेजी के चीज़ की अर्थवत्ता भी महत्वपूर्ण है। औपनिवैशिक काल के शुरुआती दौर में इसकी अर्थवत्ता में तुच्छता का भाव था मगर बाद में असली माल, बड़ी बात या ऐसी कोई भी चीज़ जो खास हो, के अर्थ में चीज़ का मुहावरेदार प्रयोग होने लगा। हॉब्सन जॉब्सन के कोश से इसका पता चलता है।
अब आते हैं चीज़बस्त पर। दरअसल यह सामासिक पद है और “चीज़” तथा “बस्त” से मिल कर बना है। फ़ारसी में “बस्त” में भी वस्तु का ही भाव है। वस्तु का एक रूपान्तर बत्तू भी होता है। चीज़ भी पदार्थ है और वस्तु भी पदार्थ है। समान अर्थ वाले शब्दों के मेल से बने सामासिक पद अकसर लोकभाषा में मुखसुख के आधार पर बनते हैं जैसे सामान-सुमान। भारोपीय भाषाओं में “व” का रूपान्तर “ब” में होना आम बात है सो संस्कृत की वस्तु फ़ारसी में “बस्त” हो जाती है। वस्तु बना है “वस्” धातु से। संस्कृत की वस् धातु में रहने का भाव है। गौरतलब है कि वस्तु यानी पदार्थ के रूप में “वस्” धातु का अर्थ अवस्थिति, उपस्थिति या मौजूदगी से है। भाव अस्तित्व का ही है। वासः यानी मकान के अर्थ में निवास, आवास जैसे शब्द भी इसी मूल से आ रहे हैं। परिधान के अर्थ में कपड़ों के लिए वस्त्र शब्द भी इसी मूल से निकला है। वस् अर्थात जिसमें वास किया जाए। यह दिलचस्प है कि काया जिस आवरण में निवास करती है, उसे वस्त्र कहा जाए। वस् धातु का अर्थ होता है ढकना, रहना, डटे रहना आदि। यही नहीं, गाँव देहात में आज भी घरों के संकुल या मौहल्ले के लिए बास या बासा (गिरधर जी का बासा) शब्द काफी प्रचलित है। वस् से ही बना है वसति जिससे निवास या रहने का भाव है। हिन्दी का बस्ती शब्द इससे ही बना है। इस तरह वस्तु का अर्थ हुआ कोई चल या अचल पदार्थ।
कुछ लोग इस बस्त को बंदोबस्त या बस्तोबंद वाले बस्त से जोड़ कर देखते हैं। इस दूसरे बस्त का अर्थ होता है बांध कर रखा हुआ या बांधा हुआ। संस्कृत का “बद्ध” अवेस्ता में बस्तः हुआ जिसका मतलब हुआ जिसे बांधकर, जमा कर, तह कर या गठरी बांधकर रखा गया हो। इसी से बना फारसी-उर्दू में बस्ता यानी स्कूल बैग या पोथी-पोटली। पुराने जमाने में विद्याध्ययन के लिए छात्रों को दूर दूर तक जाना पड़ता था और वे घर से कई तरह का सामान साथ ले जाया करते थे। तब सफर भी पैदल या घोड़ों पर ही तय किया जाता था जाहिर है सामान को सुरक्षित रखने के लिए उसे बेहद विश्वसनीय तरीके से बांधकर या जकड़ कर रखा जाता था। यह क्रिया पहले बद्ध कहलाई फिर इससे बस्तः शब्द बना। इसमें गठरी बैडिंग या पुलंदे का भाव था। बाद में बस्ता के रूप में स्कूलबैग के अर्थ में सिमट कर रह गया।
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Posted by अजित वडनेरकर (wadnerkar.ajit@gmail.com) on September 19, 2011 08:36 AM· permalink
The review article titled “Discovery and Development of Anti-HBV Agents and Their Resistance“ is open access and can be downloaded by clicking the link on preview image of the article.
Posted by RC Mishra on September 19, 2011 04:07 AM· permalink
स्टार ट्रेक की कहानी एक अंतरिक्षयान यु एस एस एन्टरप्रायज के यात्राओं पर आधारित होती है। यह अंतरिक्षयान ब्रह्माण्ड की अनंत गहराईयों मे जीवन की खोज मे घूमता रहता है। जब इस की कहानी लिखी जा रही थी, तब अंतरिक्ष यान से किसी ग्रह पर जाने और वापिस आने के तरिको पर विचार किया जा रहा था। [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on September 19, 2011 01:30 AM· permalink
पिछले 14 दिनों से लगातार (लगातार को लगातार ही पढ़ें) चल रहे भाषणों के बीच जब एकरसता-सी आ रही थी तो सड़क के उस पार एक बस से ज़ोर-ज़ोर से आ रही क्रांतिकारी नारों की आवाज़ ने मज़दूरों में कौतूहल जगा दी. पहले बस से उतरते कुछ पैर नीचे दिखे, फिर दो-एक चेहरे और फिर 50 से ज़्यादा ऐसे चेहरे जिसे देखकर मज़दूरों ने किलकारी मारनी शुरू कर दी. उनके हाथ में तख़्तियां थीं जिनमें मज़दूरों के समर्थन वाले हर्फ़ लिखे थे. सड़क के इस पार अब यह साफ़ हो गया था कि जेएनयू से यह बस आई है और मज़दूरों के इस सवाल पर वे उनका साथ देने आए हैं. बहुत देर तक तालियां बजती रही. फिर छात्र-मज़दूर एकता ज़िदाबाद के नारे. डीयू और जामिया से भी छात्र-छात्राओं के कुछ समूह वहां मौजूद थे. नौजवान से दिखने वाले मज़दूरों के उत्साही नेता सोनू गुज्जर ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘जिस आंदोलन में स्टूडेंट घुस जाए. समझो वो लड़ाई जीत ली गई.’ मानेसर और गुड़गांव के बाकी कंपनियों के मज़दूर यूनियनों से मिलने वाले समर्थन के बाद दिल्ली के विश्वविद्यालयों से आ रहे विद्यार्थियों ने सबके भीतर उत्साह और जीत की नई उमंग भर दी.
सफ़ेद और लाल रंग के पंडाल के नीचे पिछले 14 दिनों से जमा मज़दूरों के लिए दिन के मायने ख़त्म हो गए हैं. 15, 16 या 17 महज एक संख्या है और वे इन्हें जीत के रास्ते में आने वाले पड़ाव की तरह देख रहे हैं. आईएमटी मानेसर में 750 एकड़ में फैले मारुति-सुजुकी के प्लांट के गेट संख्या 2 के ठीक सामने मज़दूरों के जमावड़े के बीच आप जाएंगे तो यक़ीन मानिए आप अपनी उस दकियानूसी धारणा से मुक्त हो जाएंगे कि दिन गुजरने के साथ उत्साह में गिरावट आती है. कंपनियों और सत्ता प्रतिष्ठानों ने पिछले कुछ वर्षों में ‘इग्नोर’ करने को बड़े हथियार के तहत भांजा है. मारुति-सुजुकी भी उसी रास्ते मज़दूरों को हतोत्साहित करने की फिराक़ में है. प्रबंधन की तरफ़ से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं हुई है. लेकिन आईटीआई करने के बाद ऑटोमोबाइल कारखाना में नौकरी बजाने वाले सारे मज़दूर यह अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें ‘इग्नोर’ नहीं किया जा रहा. वे ब्रांड, विज्ञापन और मार्केटिंग के फंडे को समझते हैं. पिछले चार सालों से कंपनी में काम करने वाले अजय कहते हैं, ‘हां यह ज़रूर है कि वो (प्रबंधन) सीधे-सीधे हमसे बात करने अब तक नहीं आए हैं, लेकिन अख़बारों में वो लगातार अपना विज्ञापन बढ़ा रहे हैं. इससे यह साबित होता है कि उन पर दबाव है.’
अजय की बात को बीच में ही काटते हुए विजय कहते हैं, ‘ज़्यादातर मीडिया के जरिए ही हम कंपनी का पक्ष जान पाते हैं. दैनिक जागरण ने हमे बताया है कि सोमवार तक यदि हम लोगों ने प्रबंधन की मांग नहीं मानी तो स्थाई तौर पर हमें अंदर जाने से रोक दिया जाएगा.’ प्रबंधन की इन धमकियों से कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ रहा और मज़दूरों के बीच तक़रीबन एक तयशुदा सहमति है कि यदि उनकी मौजूदा एकता क़ायम रही तो प्रबंधन उनका कुछ नहीं कर सकता. वे यह जानते हैं कि मालिक सिर्फ़ पूंजी के बदौलत उत्पादन नहीं कर सकते. उत्पादन के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ मेहनत और मज़दूरी होती है और वो मज़दूरों के पास है.
अगर आप कई सारे अख़बारों में आ रही ख़बरों के सहारे मानेसर को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो मानेसर को समझना छोड़ दीजिए. अख़बारों ने तो बड़े-बड़े अक्षरों में यह लिखा है कि मारूति-सुजुकी प्लांट में मज़दूरों का हड़ताल चल रहा है, लेकिन यह ख़बर पूरी तरह झूठी है. यहां कोई हड़ताल नहीं चल रहा. मज़दूर अपने लोकतांत्रिक शर्तों के साथ काम करने को तैयार हैं, लेकिन मारूति ने ख़ुद तालाबंदी कर रखी है. मारूति का कहना है कि ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ को जो-जो मज़दूर भरेगा वो अंदर आकर काम शुरू करें और जो नहीं भरेगा उनके लिए यह दरवाज़ा बंद है. मज़दूर प्राथमिक तौर पर इसी ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ के ख़िलाफ़ है और सड़क पर डटे हुए हैं.
इस ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ के साथ-साथ मारूति-सुजुकी मज़दूर आंदोलन की संक्षिप्त कहानी से पहले मज़दूरों के उन मांगों को आप देख लीजिए जिनको पूरी करवाने के लिए वो आधे महीने से कंपनी के सामने विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और जिनको तोड़ने-मरोड़ने के लिए कंपनी मालिक से लेकर ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार तक के सुर एक हैं. ये चार मांगें हैं.-
1. मारुति सुजुकी इंप्लाइज यूनियन बहाल की जाए
2. निकाले गए मज़दूरों को वापस लिया जाए
3. सभी चार्ज शीट वापस लिए जाए
4. ग़ैरक़ानूनी तालाबंदी ख़त्म की जाए
पहली मांग काफी पुरानी है और मौजूदा गतिरोध की सबसे मज़बूत वजह है. दूसरी, तीसरी और चौथी मांग कंपनी द्वारा पहली मांग को ध्वस्त करने के लिए की गई कार्रवाई से उपजी हुई है. जून में जब यूनियन बनाने के लिए मज़दूरों ने अपनी मांग शुरू की तो मारुति सुजुकी प्रबंधन के कान खड़े हो गए. प्रबंधन एक-एक मज़दूर को अलग-अलग बुलाकर अनुशासन के नाम पर नौकरी छीनने की धमकी देने लगा. मज़दूरों से प्रबंधन का कहना था कि वो पहले से मौजूद यूनियन को ही वास्तविक यूनियन माने. असल में प्रबंधन चालित एक यूनियन कंपनी में पहले से अस्तित्व में थी/है, जिसमें चुनिंदा मज़दूरों को शामिल किया गया था और वे मज़दूर नीतियों का कम और प्रबंधन की नीतियों का ज़्यादा प्रचार करते है. फ़िलवक़्त चल रहे आंदोलन के बारे में भी मलाई काट रहे ‘वास्तविक यूनियन’ से जुड़े नेताओं का मानना है कि कंपनी में “अनुशासनहीनता’ नहीं चल सकती.
रेवाड़ी के रहने वाले मज़दूर आनंद हमें बताते हैं, ‘उस वक़्त मज़दूरों से एक पेपर पर हस्ताक्षर करने कहा गया जिसमें यह लिखा था कि मज़दूरों की तरफ़ से किसी नई यूनियन की कोई मांग नहीं है और भविष्य में भी उनकी इस तरह की कोई मांग नहीं होगी.’ प्रबंधन के उस बाध्यकारी हस्ताक्षर अभियान के ख़िलाफ़ मारूति कामगारों ने मोर्चा खोल दिया. मज़दूरों ने सोनू गुज्जर को अपना नेता मानते हुए प्रबंधन की नीतियों का विरोध किया. परिणामस्वरूप कंपनी ने 11 लोगों को नौकरी से बाहर निकाल दिया. मज़दूरों के इस दमनकारी निष्काषण के विरोध में मज़दूरों ने बेहतरीन एकता का प्रमाण देते हुए हड़ताल पर जाने का फ़ैसला किया और 13 दिनों तक चली उस हड़ताल के बाद समझौता हुआ. सभी 11 लोगों को वापस लिया गया. कंपनी ने उस समय यह भरोसा दिलाया कि अब वो किसी मज़दूर को नहीं धमकाएगी और न ही किसी को बाहर का रास्ता दिखाएगी. ये सब जून की कहानी है. एक तरह से शुरुआती लड़ाई में मज़दूर जीत चुके थे, लेकिन सवाल जहां से शुरू हुआ था वह वहीं पर ठहरा हुआ था. सवाल था- मज़दूर हितों की वास्तविक लड़ाई लड़ने वाली यूनियन का निर्माण! जून की टकराहट का नतीजा यह हुआ कि अब तक मशीन से बनी जली-कच्ची रोटियों और पतली दाल पहले के मुकाबले कुछ बेहतर हुई. हालांकि जेएनयू के एक छात्र से मज़दूर दिनेश सेठी का कहना था, ‘आप विद्यार्थी लोग आज भी उस रोटी को ताकेंगे नहीं. आपके कॉलेज (विश्वविद्यालय) में उस तरह की रोटियां एक दिन भी बन जाए तो आप लोग ऐसी कैंटीन वाले को बाहर कर देंगे.’
यूनियन की मांग जारी रही और साथ में कंपनी प्रबंधन की तरफ से मिलने वाली धौंस भी. हमेशा की तरह एक दिन 7 बजे जब मज़दूर काम करने कंपनी पहुंचे तो कंपनी पूरी तरह बदली हुई दिख रही थी. भीतर-बाहर पुलिस और निजी सुरक्षा गार्ड से अटी हुई कंपनी. बाहर गेट पर एक फॉर्म के साथ तैनात सुरक्षा गार्ड- जो मज़दूरों को यह हिदायत दे रहा है कि जो इस “गुड कंडक्ट फॉर्म’ को भरेगा वही काम करने अंदर जाएगा. मज़दूरों ने वह फॉर्म भरने से इंकार कर दिया. बैठक हुई और सोनू गुज्जर के नेतृत्व में सबने यह फैसला किया कि न तो यूनियन की मांग छोड़ेंगे और न ही यह फॉर्म भरेंगे और न ही कंपनी छोड़ के जाएंगे. यशवंत प्रजापति कहते हैं, ‘वह फॉर्म मज़दूर हितों के साथ बड़ा धोखा है. उसमें कंपनी कहती है कि मज़दूर कोई कंपनी विरोधी काम नहीं करेगा. प्रबंधन के साथ सही आचरण रखेगा......हां सही आचरण क्या है यह कंपनी ही तय करेगी.’
मारुति सुज़ुकी इस तालाबंदी के लिए पहले से माहौल बना रही थी. कुछ दिन पहले से ही वह लगातार मज़दूरों को धमका रही थी कि वो जानबूझकर काम ठीक से नहीं कर रहे हैं और सुपरवाइजर उनके कामों में लगातार खोट निकाल रहे थे. मज़दूरों का दावा है कि कंपनी जान-बूझ कर मैटिरियल में कमी लाई और मज़दूरों पर यह आरोप लगाया कि वे सुस्त गति से और सोच-समझकर ख़राब उत्पादन कर रहे हैं. इसी को आधार बनाते हुए कंपनी धीरे-धीरे मज़दूरों को बाहर करने लगी. निकाले गए मज़दूरों की संख्या अब तक 57 हो गई है. तालाबंदी के बाद भी कंपनी द्वारा मज़दूरों का निकाला जाना जारी है.
प्रदर्शन स्थल पर जिला प्रशासन और लेबर कमीशन के लोग स्थिति का जायजा लेने आए, लेकिन उनकी पक्षधरता साफ़ थी. सोनू गुज्जर ने लेबर कमिश्नर के साथ हुई बातचीत का मजमून रखते हुए कहा कि उन्होंने निकाले गए 57 मज़दूरों को पहले बिल्कुल भूल जाने को कहा, लेकिन बाद में कहा कि छह माह बाद निकाले गए मज़दूरों को वापस लिए जाने पर विचार किया जाएगा. उन्होंने यह भी समझाइश दी कि यूनियन बनाकर क्या होगा, पहले से मौजूद यूनियन के बैनर तले ही वे अपनी मांगों को मज़बूती से रखे. सोनू गुज्जर के साथ बातचीत से पहले लेबर कमिश्नर को शायद यह तथ्य पता नहीं होगा कि बीते 16 जुलाई को पुरानी यूनियन का चुनाव हुआ था और 2500 मज़दूर संख्या वाली इस कंपनी में 20 से भी कम लोगों ने मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया. प्रबंधन वाली यूनियन की असलियत ऊघर के सामने आ गई है.
राज्य सरकार को मारुति ने धमकाया है कि अगर समाधान उनके पक्ष में नहीं रहता है तो वे प्लांट को उठाकर गुजरात ले जाएंगे. मुख्यमंत्री हुड्डा साहब इस धमकी से घबराए हुए हैं. लेकिन, मारुति सुज़ुकी की पिछली कुछ घोषणाओं और कामों पर नज़र दौड़ाए तो यह साफ़ हो जाएगा कि उनकी धमकी में बहुत दम नहीं है. मारुति ने मानेसर में इस प्लांट के अलावा दो और नए प्लांट पर काम करना शुरू कर दिया है. कुछ दिन पहले तक गुड़गांव वाले प्लांट को भी वे मानेसर लाने की बात कह रहे थे. वह सिर्फ मज़दूर हड़ताल की वजह से गुजरात नहीं भाग सकती. यह दबाव बनाने का प्रोपगैंडा है. सोनू गुज्जर इस प्रचार की असलियत जानते हैं, ‘कंपनी कोई थाली नहीं है कि हाथ में उठाए और बस में सवार होकर गुजरात चल दिए. कंपनी कंपनी होती है.’
यूनियन बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन मारुति के भीतर जो स्थिति थी उससे निजात पाने के लिए इसका गठन होना बहुत ज़रूरी हो चला था. चार्ली चैपलिन की ‘मॉडर्न टाइम्स’ जिसने देखी है वो कंपनी के भीतर काम करने के तरीके को बेहतर समझ पाएंगे. एक मज़दूर अपना पसीना पोछने के लिए हाथ उठाए तो चलती पट्टी के दो नट-वोल्ट कसने बच जाएंगे और उस दो-तीन सेकेंड की भरपाई में उसे तेजी से हाथ-पैर मारने होंगे. मारुति सुजुकी हर 45 सेकेंड में एक कार तैयार करती है. दिनभर में यहां 1200 कारें बनती हैं. मज़दूरों को दो बार चाय पीने के लिए 7-7 मिनट का वक़्त मिलता है, जिसमें उन्हें हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और मशीनी औज़ार स्टोर में रखने भी होते हैं, फिर पंचिंग कार्ड के जरिए कैंटीन भी जाना होता है फिर कतार में खड़े होकर चाय भी लेनी होती है, पीनी भी होती है और फिर हेलमेट, गॉगल्स, दस्ताने और तमाम लाव-लश्कर से लैश होकर काम शुरू कर देना होता है. इसमे एक सेकेंड की भी देरी बर्दाश्त नहीं है. याद कीजिए कि ‘मॉडर्न टाइम्स’ में जब चार्ली को बीड़ी पीने की तलब होती है और वो छुपकर बीड़ी सुलगाता है तो सामने स्क्रीन पर उसका मैनेजर उसे रंगे हाथों पकड़ लेता है और ज़ोर से फटकारता है. बिल्कुल यही माहौल मारुति के भीतर भी है. लंच के लिए आधा घंटा दिया जाता है.
काम दो शिफ्ट में होता है. सुबह 7.30 से शाम 3.45 तक पहला शिफ्ट और शाम 3.45 से लेकर रात 12.30 तक दूसरा शिफ्ट. अगर मज़दूर 7.31 बजे सुबह पहुंचा तो उसका ‘हाफ डे’ लग जाएगा. रिसेप्शन पर बैठा व्यक्ति मज़दूरों को बताता है कि चूंकि पंचिंग कार्ड के जरिए अंदर आने और जाने का वक़्त नोट किया जाता है इसलिए एक सेकेंड की भी देरी होने पर कंप्यूटर उसे पकड़ लेता है और देरी से आने का खामियाजा मज़दूरों को भुगतना पड़ता है. कितनी मासूम दलील है! मशीन का अपने पक्ष में इस्तेमाल की इस बानगी के क्या कहने! एक दूसरा पक्ष सोचते हैं. पिछले कुछ महीनों की लड़ाई के बाद कंपनी में यह नियम बना कि मज़दूरों को ला रही बस में अगर देरी होती है तो उस देरी को ‘कन्सीडर’ नहीं किया जाएगा. बस लेट होने पर भी मज़दूर पंचिंग कार्ड के जरिए ही अंदर जाते हैं और कंप्यूटर में ही वो समय भी दर्ज होता है. कंप्यूटर इस देरी को नहीं पकड़ता? प्रबंधन की बेईमान व्याख्या की यह एक नज़ीर मात्र है. बस में होने वाली देरी का भी कंपनी खामियाजा वसूलती है, लेकिन भुक्तभोगी पहले शिफ्ट में काम कर रहे मज़दूर बनते हैं. अगर बस लेट हो गई तो पहले वाली शिफ्ट को उस समय तक काम करना पड़ेगा जब तक बस नहीं आ जाती और इसका कोई ओवरटाइम नहीं मिलेगा. ओवरटाइम सिर्फ तब मिलेगा जब बस आने के बाद भी मज़दूरों से कंपनी काम जारी रखे.
एक छुट्टी पर मज़दूरों के 1200 रुपए कट जाते हैं और तीन-चार छुट्टियों पर आधे महीने का पैसा. कोई सिक लिव नहीं. बीमार होने पर कुछ अस्पताल तय किए गए है सिर्फ उन्हीं में इलाज कराने के एवज में कुछ फ़ीसदी भुगतान किए जाते हैं. बाक़ी अस्पतालों में ईलाज पर कोई भुगतान नहीं होता. फिर अस्पताल बिल की गहरी जांच होती है कि बिल का पैसा कितना वास्तविक है कितना नहीं. मारुति को अगर लगे कि टायफाइड 1500 रुपए में ठीक हो सकता है तो डॉक्टरी चक्कर में 15,000 लुटाने के बावज़ूद मज़दूरों को 1500 रुपए का ही आधा या आधे से ज़्यादा पैसों का भुगतान किया जाएगा.
मज़दूरों को शुरुआती तीन साल प्रशिक्षण में गुजारने होते हैं और इस दौरान क्रमश: 7, 8 और 9 हज़ार का वेतन दिया जाता है. प्रशिक्षण ख़त्म होने पर वेतन 16,000 रुपए है. इसके बाद ही मज़दूरों को मतदान का अधिकार मिल पाता है. मौजूदा प्रतिरोध को हतोत्साहित करने के लिए मारुति ने यह दावा किया है कि यदि सोमवार तक सारे मज़दूर ‘गुड कंडक्ट फॉर्म’ भरने को तैयार नहीं होते तो सारे मज़दूरों को बर्खास्त कर दिया जाएगा और कंपनी नए मज़दूरों को बहाल करेगी. 2500 मज़दूरों में से अब तक सिर्फ 20-30 लोगों ने ही यह फॉर्म भरा है और अंदर जाने के हक़दार बने हैं. जाति-धर्म के आधार पर भी मज़दूरों को बांटने की कोशिश हो रही है. प्रबंधन के लोग ऐसे मज़दूरों की तलाश में रहते हैं जो समान जाति और धर्म वाले हों. उन्हें जाति का हवाला देकर पक्ष में करने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन मज़दूरों ने नारा बुलंद किया है कि वे ऐसी हर कोशिश को नाकाम करेंगे. उनका मानना है कि उनकी एक ही जाति और धर्म है और वो है उनका मज़दूर होना. मारुति ने दावा किया है कि बीते 1 सितंबर को उसने कुछ नए लोगों के सहारे 80 कार बनाकर बाज़ार में उतारा है. मज़दूरों का मानना है कि अव्वल तो यह मुश्किल है कि बिना ट्रेंड मज़दूरों के सहारे कंपनी इतनी कारें बना लें. दूसरा अगर कंपनी ने रिस्क लेते हुए यह काम किया भी है तो सड़क पर वे गाड़ियां दुर्घटना की बारंबारता को और बढ़ाने में मदद करेगी क्योंकि सही गुणवत्ता को परख पाना नए लोगों के लिए टेढ़ी खीर है. सड़क दुर्घटना की गंभीरता को दिखाती एक रिपोर्ट का मैं ज़िक्र करना चाहूंगा जिसमें कहा गया है कि बीती सदी में सबसे ज़्यादा मौत ऑटोमोबाइल से होने वाली दुर्घटनाओं से हुई है (रिपोर्ट मिलने पर उपलब्ध कराउंगा).
इस समय मानेसर का यह पंडाल मज़दूर आंदोलन का सबसे गरम पंडाल है. यहां के मज़दूरों में ग़ज़ब की ऊर्जा है. जब नारे लगते हैं और सड़क के उस पार मारुति-सुजुकी के प्लांट की भीतरी दीवारों से टकराकर आवाज़ वापस लौटती है तो उस गूंज को सुनकर मज़दूर और ज़ोर का हुंकार भरते हैं. एक थकता है तो दूसरा माइक थाम लेता है. इस तरह दो शिफ्ट में लोग लगातार जमे रहते हैं. कंपनी की तरह यहां भी एटैंडेंस लगता है ताकि मज़दूरों को पता चल सके कि कितने लोग सक्रिय तौर पर उनके साथ हैं और कितने टूट रहे हैं और कितने दलाल बन रहे हैं, बिक रहे हैं. यहां सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक एक शिफ्ट और शाम 7 से सुबह 7 तक दूसरी शिफ्ट में मज़दूर मोर्चा संभाले रहते हैं. यहां सोनू नाम के कई मज़दूर हैं. कम से कम तीन से तो मैं ही मिला. जो दूसरा सोनू है वह सोनू गुज्जर के भाषणों के बीच में लोगों के बीच जोश भरने के लिए जोरदार नारे लगाता रहता है. लगातार. बिना थके.
सोनू गुज्जर ने बताया है कि मानेसर और गुड़गांव के 40-50 कंपनियों की लीडरशिप ने इस आंदोलन को समर्थन दिया है और गुड़गांव चक्का जाम में वे उनके साथ आएंगे. कुछ सांसदों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. सोनू ने कहा कि उन लोगों ने 14 दिनों तक गांधी बन कर देख लिया है, अब ज़रूरत पड़ेगी तो भगत सिंह भी बनेगे. मज़दूरों को उन्होंने याद दिलाया कि भगत सिंह को 23 साल की उम्र में फांसी हो गई थी और उनके यहां तक़रीबन सारे मज़दूर 23 वर्ष से ज़्यादा के हैं. इसलिए इतिहास को यदि दोहराना होगा तो दोहराएंगे. झुकेंगे नहीं.
सोनू गुज्जर ने मज़दूरों और मज़दूर हित में रहने वाले सभी लोगों से यह आह्वान किया है - लड़ाई शुरू हो चुकी है सभी सेनानी तैयार हो जाएं.
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 18, 2011 07:41 PM· permalink
सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई ने जेएनयू में आजकल एक उन्माद का माहौल पैदा किया हुआ है- चुनाव कराने का. उनका नारा है कि वे किसी भी हालत में चुनाव कराएंगे. यानी लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को कबूल करके भी चुनाव कराएंगे. पिछले तीन सालों से जेएनयू के छात्रों ने एक आवाज में लिंगदोह को नकारा है और इसीलिए यहां चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लगी हुई है. लेकिन अब इस उन्माद की लहरों पर सवार होकर लिंगदोह को जेएनयू में लाने की तैयारी चल रही है. छात्रों के हितों के खिलाफ और देश भर के कैंपसों के कारपोरेटीकरण, निजीकरण, ब्राह्मणीकरण और अ-राजनीतिकरण की तरफ ले जाने वाले इस कदम में एसएफआई के साथ अब आइसा भी शामिल हो गया है. आइसा उसी भाकपा माले लिबरेशन का छात्र संगठन है, जो अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाते हुए देखा गया था. बल्कि उसने वर्ल्ड बैंक और आरएसएस समर्थिक अन्ना आंदोलन को साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन तक साबित करने की कोशिश की. यह भी याद रखना जरूरी है कि लिबरेशन की सांस्कृति ईकाई जसम के एक हिस्से ने नया ज्ञानोदय में विवादित इंटरव्यू के मामले में विभूतिनारायण राय का भरपूर समर्थन किया था. दोनों संगठनों द्वारा लिंगदोह को लाने की इस कोशिश का जेएनयू के कई संगठन और छात्र मजबूती से विरोध कर रहे हैं. इसी क्रम में आज कई जगह लिंगदोह के खिलाफ नाटक किए गए और कुछ छात्रों ने यह पर्चा वितरित किया. आप भी पढ़िए. यह मुद्दा इसलिए भी जरूरी है कि यह पूरे देश में चल रहे निजीकरण और कारपोरेटीकरण की प्रक्रिया से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है.
एसएफआई से आई आवाज, आईसा जिंदाबाद
( यहां विरोध ही वाजिब कदम है/हम समझते हैं/हम कदम कदम पर समझौता करते हैं/हम समझते हैं/हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं/ हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में पेश करते हैं/ हम समझते हैं/हम गोल-मटोल भाषा का तर्क भी समझते हैं-गोरख पाण्डेय, ‘ समझदारों [आइसा-एसएफआई] का गीत’)
परसों मंगलवार को एक ऐतिहासिक UGBM है. हम दूर-दराज के गांवों, छोटे कस्बों और शहरों से, मुसहरी और मुस्लिम बस्तियों से, जंगलों और घाटियों से आनेवाले छात्रों के लिए एक ऐतिहासिक मौका है, जब हम यह तय करने जा रहे हैं कि हमारे छात्रसंघ का चुनाव किस तरीके से होगा. यह एक ऐतिहासिक मौका है क्योंकि UGBM में शामिल होकर वोट डाल कर जब हम यह तय करेंगे कि रेफरेंडम किन विकल्पों के साथ होनेवाला है तो साथ में हम यह भी तय करेंगे कि यूनिवर्सिटी में हमारी फीस सस्ती रहेगी या महंगी हो जाएगी. हमें हॉस्टल और मेस की सब्सीडियां मिलती रहेंगी या बंद हो जाएंगी. हम यह भी तय करेंगे कि हमारे कैंपस में छात्रों को हासिल जनवादी अधिकार, असहमति व्यक्त करने और संघर्ष करने का अधिकार, पब्लिक मीटिंग करने, परचा लाने और पोस्टर लगाने का अधिकार रहेगा या नहीं. क्योंकि ये सारे मामले इस बात से जुड़े हुए हैं कि हम रेफरेंडम के लिए कौन-से विकल्प चुनते हैं और अपना छात्र संघ चुनाव किस तरीके से कराते हैं. पिछले तीन सालों से इस कैंपस के छात्रों ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को एक आवाज में नकारा है. लिंगदोह का मकसद निजीकरण को बढ़ावा देना और फीस बढ़ाना है. यह हमारे संघर्षों और छात्रसंघ संविधान द्वारा हासिल हमारे अधिकारों को कुचल देगा. साथ ही लिंगदोह कमेटी का एजेंडा यह भी है कि छात्र अपने आस-पास में क्या हो रहा है, इससे कट जाएं, सारी दुनिया में क्या हो रहा है इससे वो मतलब नहीं रखें. वे कैंपस से बाहर की राजनीति से कोई संबंध नहीं रखें और कारपोरेट कंपनियों के चाकर बन जाएं. साथियो, यह ऐतिहासिक मौका इसलिए भी है कि तीन साल तक लगातार लिंगदोह को बाहर रखने की कोशिशों को नाकाम करते हुए इस कैंपस के दो संगठन AISA और SFI लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं.
इस कैंपस में लिंगदोह की हिमायत में पहली आवाज ब्राह्मणवादी Youth For Equality ने उठाई थी. लेकिन लिंगदोह और ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए छात्रों ने YFE की कमर तोड़ दी है. वह उठ नहीं पा रहा है. इसलिए उसका जिम्मा पहले SFI ने अपने कंधे पर उठाया और पिछले दो महीनों से वह कैंपस में लगातार लिंगदोह को एक विकल्प के रूप में प्रचारित कर रहा है. इसे वो हर हालत में चुनाव चाहिए के नारे की ओट में पेश कर रहा है. यह लिंगदोह के खिलाफ छात्रों के लतागार जारी संघर्षों और जनमत का ही नतीजा है कि एसएफआई खुल कर लिंगदोह का समर्थन नहीं कर पा रहा है.
लेकिन लिंगदोह को मान कर चुनाव कराने की SFI की कोशिशों को AISA ने पछाड़ दिया है. वो छात्रों में भ्रम फैलाने वाली अपनी ‘ग्रे एरिया’ (बीच के रास्ते वाली) राजनीति को लेकर छात्रों के सामने आया है. मजे की बात यह है कि उसका बीच का रास्ता लिंगदोह की दलदल से होकर गुजरता है. छात्रों को पता होगा कि रेफरेंडम के लिए SFI के दो विकल्पों की जगह DSU ने एक दूसरा प्रस्ताव सामने रखा है, जिसमें लिंगदोह के लिए कोई जगह नहीं है. AISA ने इन दोनों विकल्पों की एक खिचड़ी बनाई है और रेफरेंडम के लिए तीन विकल्पों को लेकर सामने आया है. उसके विकल्प हैं: कोर्ट ऑर्डर को नकारते हुए JNUSU संविधान के तहत चुनाव कराना, Joint Struggle Committee का चुनाव कराना और लिंगदोह को मानकर चुनाव कराना. अपनी इस चालाकी भरी तरकीब के जरिए AISA ने लिंगदोह के लिए रास्ता साफ करने की कोशिश की है. इन तीन विकल्पों में पहले दोनों विकल्प लिंगदोह को नकारते हैं और अगर AISA के प्रस्ताव के मुताबिक रेफरेंडम होता है तो लिंगदोह विरोधी वोट बंट जाएंगे और इस तरह लिंगदोह के तहत चुनाव कराना और आसान हो जाएगा. AISA ने अपनी धूर्तता में SFI को बहुत पीछे छोड़ दिया है. इस तरह कैंपस में लिंगदोह को लाने का सेहरा अपने सिर बांधने के लिए AISA और SFI में जो होड़ चल रही है, उसमें AISA फिलहाल SFI से बहुत आगे निकलता दिख रहा है. वह अपने कंधे पर लिंगदोह की पालकी ढोने को बेकरार है.
साथियो, हमें AISA और SFI के लिंगदोह के विकल्प वाले प्रस्तावों के पीछे की राजनीति समझनी होगी. ये दोनों कह रहे हैं कि वे चुनाव कराने के तरीकों पर एक विचार-विमर्श के तहत ऐसा कर रहे हैं. लेकिन विचार-विमर्श तो तब होता है, जब सभी पक्ष अपना स्टैंड साफ-साफ रखें. AISA और SFI सिर्फ चुनाव कराने का नारा दे रहे हैं. वे लिंगदोह को मंजूर करने या न करने पर अपनी कोई राय नहीं रख रहे हैं. लेकिन साथ ही वे लिंगदोह के खिलाफ विकल्पों पर छात्रों को धमका भी रहे हैं. इस तरह वे ऐसी स्थितियां बना रहे हैं कि लिंगदोह को लाने का इलजाम उनके सिर न आए और बाद में वो इसका ठीकरा आम छात्रों के सिर पर फोड़ सकें. यहां तक कि AISA ने कल अपने पर्चे में लिंगदोह के तहत चुनाव कराने के फायदे भी गिनाए हैं. उन्हें अब लिंगदोह में फायदे भी नजर आने लगे हैं. चालाकी देखिए कि वे झूठ बोलने और छात्रों को बरगलाने से भी नहीं चूकते. AISA ने एक फायदा यह बताया है कि लिंगदोह को मान कर अभी चुनाव करा लेने से लिंगदोह के खिलाफ हमारे संघर्ष और कोर्ट में केस पर कोई उल्टा असर नहीं पड़ेगा. लेकिन सच तो यह है कि एक बार लिंगदोह को मान कर चुनाव करा लेने के बाद कोर्ट में हमारा केस खत्म हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस लड़ रहे वकील का भी यही कहना है.
साथियो, AISA आइसा का धोखेबाजी और गद्दारी भरा असली चरित्र बार-बार सामने आता रहा है. इसकी पैरेंट पार्टी भाकपा माले लिबरेशन को संघर्षरत किसान-मजदूर जनता ने खदेड़ कर भगा दिया है. वे अब इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने का इंतजार कर रहे हैं. यह वही थकी, बिखरी, पतित और पराजित ताकत है, जो संघर्ष के मोर्चे के बजाय हमेशा बीच का रास्ता अपनाती है. जब जनता आर-पार की लड़ाई लड़ रही होती है तो वे ग्रे एरिया खोजते हैं और लोगों में कन्फयूजन फैलाते हैं. इस तरह वे जनता के दुश्मनों का पलड़ा ही भारी करते हैं. लड़ाई के मोर्चों पर वे कहीं नहीं दिखते. इसके बजाय वे समझौते के हर मंच पर दिखते हैं. उन्होंने रामलीला मैदान में वर्ल्ड बैंक और RSS द्वारा प्रायोजित अन्ना के फासीवादी आंदोलन के लिए लोगों को जुटाया. कारपोरेट लूट से लड़ने के नाम पर वे कारपोरेट फंडेड आंदोलनों में शामिल होते हैं और ब्राह्मणवाद से लड़ने के नाम पर ब्राह्मणवादी चालबाजियों को जगह देते हैं. कारपोरेट समर्थित ब्राह्मणवादी लिंगदोह आयोग की सिफारिशों के पक्ष में खड़ा होना इसकी सबसे ताजा मिसाल है. साथियो, संघर्ष में ही लोगों के चेहरे पहचाने जाते हैं, रंगे सियारों का भेद खुलता है. AISA बेनकाब हो चुका है. लिंगदोह को लाकर चुनाव कराने की उनकी बेकरारी को हम समझते हैं. वे लिंगदोह को मंजूर कर सकते हैं क्योंकि उनको संघर्ष और संघर्ष की राजनीति से कोई मतलब नहीं है. वे एनजीओ फंडेड ‘क्रांतिकारियों’ का गिरोह हैं, जिन्हें समझौतों और सौदेबाजियों की मलाई से मतलब है. लिंगदोह आ जाने से उनका काम आसान हो जाएगा.
इसलिए साथियों दांव पर बहुत कुछ लगा है. चालीस साल के हमारे संघर्षों से हासिल अधिकारों और तीन साल से लिंगदोह के खिलाफ हमारी कामयाबियां दांव पर हैं. हमारा डेमोक्रेटिक स्पेस और राजनीतिक बहस-मुबाहिसे और देश-दुनिया की राजनीति से हमारा जुड़ाव दांव पर है. संघर्ष की हमारी विरासत दांव पर है. यह हमें तय करना है कि अपनी राजनीति को हम खुद तय करेंगे या ब्राह्मणवादी और कारपोरेटों के दलाल प्रशासन और गृह मंत्रालय. AISA और SFI हमारे कैंपस की राजनीति और छात्रों के अधिकारों को इनके हाथ बंधक रखने को बेकरार हैं. क्या हम उन्हें ऐसा करने देंगे? हमारे सामने कोई बीच का रास्ता नहीं है. बस दो ही रास्ते हैं: या तो लिंगदोह को मंजूर करना या उसे पूरी तरह खारिज करना. अब तक हमने अपने संघर्षों से इसे खारिज किया है. इसे कैंपस में दाखिल न होने दें.
For three years now, every Eid, a Salman Khan movie has become one of the rewards of the festival. Whereas last year we had "Dabangg", which despite its simplicity had layers into it, this year we are treated to "The Bodyguard" which isn't a patch on "Dabangg". Despite this, it has enough to hold the attention of festive audiences.
Bodyguard Lovely Singh (Salman Khan) is a nice, honest man of steel who is faithful to Sartaj (Raj Babbar). Sartaj, asks Lovely to guard his daughter Divya (Kareena Kapoor) day and night.
Lovely does his job diligently, but is unawares that Divya serenades him under a pseudonym Chhaya over the phone, and has fallen in love with him. Things get out of control when Sartaj's enemies try to kill Divya while Sartaj thinks Lovely is trying to kidnap his daughter.
"Bodyguard", conceptually, is based on the type of stories that have made Imtiaz Ali popular - sweet, gentle love stories, where the underlying theme being sacrifice for the sake of love. Yet whereas Imtiaz Ali reveals in a certain quaint subtlety despite the melodramatic nature of his films, "Bodyguard" director Siddique does not have that much of skills to pull that off.
The result is a film that has its few funny, slapstick moments but the problem area is the surprise twist in the end. It is an end that does not gel with the pace of the rest of the film and seems cooked up. That is especially true because director Siddique gives no foreshadowing or inclination before of a possibility of a character doing what she does in the end.
However, that would be a problem with urban audiences. As far as rural viewers go, the ending, fantastic as it may be, might actually work for the film. After all isn't there enough elements of fantasy in the rest of the film like when Salman going in the opposite direction in a train, simply jumps on to a running train in another direction. If one can digest that, one can do the same for the ending.
A little more effort on the editing table would have eased a lot of things.
Salman fans, however, have much to cheer. They not only get to see their favourite star beating enemies to pulp, but also get to see his well toned torso, that in the end is revealed after jets of water blow away his shirt, much like the subway wind blew away Marilyn Monroe's skirt.
Debutante Rajat Rawail provides comic relief to the film not just with his antics but also the funny messages on his t-shirts like '6 Pack Coming Soon' pasted over his fat belly.
Salman is his well-chiseled self, and Kareena is as good as the script demands of her, which isn't much. The music is catchy, especially Himmesh Reshamiya composed song "I Love You".
Overall, "Bodyguard" may not have the chutzpah of a "Dabangg", but it pulls itself through to entertain viewers during the festive season.
Posted by IndiBlogs (noreply@blogger.com) on September 18, 2011 12:07 PM· permalink
”पहले वे आए यहूदियों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं यहूदी
नहीं था/ फिर वे आए कम्यूनिस्टों के लिए और मैं कुछ नहीं बोला,
क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नही था/ फिर वे आए मजदूरों के लिए और मैं कुछ
नहीं बोला क्योंकि मैं मजदूर नही था/ फिर वे आए मेरे लिए, और कोई नहीं
बचा था, जो मेरे लिए बोलता..।” - पास्टएर निमोलर, हिटलर काल का एक जर्मन पादरी )
बिहार में पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ हो रहा है, वह भयावह है। विरोध
में जाने वाली हर आवाज को राजग सरकार क्रूरता से कुचलती जा रही है। आपसी
राग-द्वेष में डूबे और जाति -बिरादरी में बंटे बिहार के बुद्धिजीवियों के
सामने तानाशाही के इस नंगे नाच को देखते हुए चुप रहने के अलावा शायद कोई
चारा भी नहीं बचा है।
आज (16 सितंबर, 2011) को बिहार विधान परिषद ने अपने दो कर्मचारियों को
फेसबुक पर सरकार के खिलाफ लिखने के कारण निलंबित कर दिया। ये दो कर्मचारी
हैं कवि मुसाफिर बैठा और युवा आलोचक अरूण नारायण।
मुसाफिर बैठा को दिया गया निलंबन पत्र इस प्रकार है – ” श्री मुसाफिर
बैठा, सहायक, बिहार विधान परिषद सचिवालय को परिषद के अधिकारियों के
विरूद्ध असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने तथा - ‘दीपक तले अंधेरा, यह
लोकोक्ति जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर
लागू होती है। बिहार विधान परिषद, जिसकी मैं नौकरी करता हूं, वहां
विधानों की धज्जियां उडायी जाती हैं’- इस तरह की टिप्पणी करने के कारण
तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है।”
अरूण नारायण को दिये गये निलंबल पत्र के पहले पैराग्राफ में उनके द्वारा
कथित रूप से परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम आए चेक की हेराफेरी करने का
आरोप लगाया गया है, जबकि इसी पत्र के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि
परिषद में सहायक पद पर कार्यरत अरूण कुमार (अरूण नारायण) को
”प्रेमकुमार मणि की सदस्यरता समाप्त करने के संबंध में सरकार एवं
सभापति के विरूद्ध असंवैधानिक टिप्पाणी देने के कारण तत्कासल प्रभाव से
निलंबित किया जाता है’‘। इन दोनों पत्रों को बिहार विधान परिषद के सभापति
व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठि नेता ताराकांत झा ”के आदेश से” जारी
किया गया है।
हिंदी फेसबुक की दुनिया में भी कवि मुसाफिर बैठा अपनी बेबाक टिप्पिणियों
के लिए जाने जाते हैं। अरूण नारायण ने अभी लगभग एक महीने पहले ही फेसबुक
पर एकांउट बनाया था। उपरोक्तण जिन टिप्पीणियों का जिक्र इन दोनों को
निलंबित करते हुए किया गया है, वे फेसबुक पर ही की गयीं थीं।
फेस बुक पर टिप्पणी करने के कारण सरकारी कर्मचारी को निलंबित करने का
संभवत: यह कम से कम किसी हिंदी प्रदेश का पहला उदाहरण है और इसके पीछे के
उद्देश्य गहरे हैं।
हिंदी साहित्य की दुनिया के लिए मुसाफिर और
अरूण के नाम अपरिचित नहीं हैं। मुसाफिर बैठा का एक कविता संग्रह ‘बीमार
मानस का गेह’ पिछले दिनों ही प्रकाशित हुआ है। मुसाफिर ने ‘हिंदी की
दलित कहानी’ पर पीएचडी की है। अरूण नारायण लगातार पत्र पत्रिकाओं में
लिखते रहते हैं, इसके अलावा बिहार की पत्रकारिता पर उनका एक महत्वरपूर्ण
शोध कार्य भी है।
मुसाफिर और अरूण को निलंबित करने के तीन-चार महीने पहले बिहार विधान परिषद ने
उर्दू के कहानीकार सैयद जावेद हसन को नौकरी से निकाल दिया था। विधान
परिषद में उर्दू रिपोर्टर के पद पर कार्यरत रहे जावेद का एक कहानी संग्रह
(दोआतशा) तथा एक उपन्या्स प्रकाशित है। वे ‘ये पल’ नाम से एक छोटी से
पत्रिका भी निकालते रहे हैं।
आखिर बिहार सरकार की इन कार्रवाइयों का उद्देश्य क्या है ?
बिहार का मुख्यधारा का मीडिया अनेक निहित कारणों से राजग सरकार के चारण की भूमिका
निभा रहा है। बिहार सरकार के विरोध में प्रिंट मीडिया में कोई खबर
प्रकाशित नहीं होती, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विरले कोई खबर चल जाती
है, तो उनका मुंह विज्ञापन की थैली देकर या फिर विज्ञापन बंद करने की
धमकी देकर बंद कर दिया जाता है। लेकिन समाचार के वैकल्पिक माध्य्मों ने
नीतीश सरकार की नाक में दम कर रखा है। कुछ छोटी पत्रिकाएं, पुस्तिकाएं
आदि के माध्यम से सरकार की सच्चाटईयां सामने आ जा रही हैं। पिछले कुछ
समय से फेस बुक की भी इसमें बडी भूमिका हो गयी है। वे समाचार, जो
मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में से बडी मेहनत और काफी खर्च करके सुनियोजित तरीके से गायब कर दिये जा रहे हैं, उनका
जिक्र, उनका विश्लेषण फेसबुक पर मौजूद लोग कर रहे हैं। नीतीश सरकार के
खिलाफ लिखने वाले अधिकांश लोग फेसबुक पर हिंदी में काम कर रहे हैं,
जिनमें हिंदी के युवा लेखक प्रमुख हैं।
वस्तुत: इन दो लेखक कर्मचारियों का निलंबन, पत्रकारों को खरीद लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा अब लेखकों पर काबू करने के लिए की गयी कार्रवाई है। बडी पूंजी के सहारे चलने वाले अखबारों और चैनलों पर लगाम लगाना तो सरकार के
लिए बहुत मुश्किल नहीं था लेकिन अपनी मर्जी के मालिक, बिंदास लेखकों पर नकेल कसना संभव
नहीं हो रहा था। वह भी तब, जब मुसाफिर और अरूण जैसे लेखक सामाजिक परिवर्तन की
लडाई में अपने योगादान के प्रति प्रतिबद्ध हों।
ऐसे ही एक और लेखक प्रेमकुमार मणि भी काफी समय से राजग सरकार के लिए
परेशानी का सबब बने हुए थे। मणि नीतीश कुमार के मित्र हैं और जदयू के
संस्थापक सदस्यों में से हैं। उन्हें पार्टी ने साहित्य के (राज्यपाल के) कोटे से
बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया था। लेकिन उन्होंने समान स्कूल
शिक्षा प्रणाली आयोग, भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों को माने जाने की मांग
की तथा इस वर्ष फरवरी में नीतीश सरकार द्वारा गठित सवर्ण आयोग का विरोध
किया। वे राज्य में बढ रहे जातीय उत्पीडन, महिलाओं पर बढ रही हिंसा तथा
बढती असमानता के विरोध में लगातार बोल रहे थे। नीतीश कुमार ने मणि को पहले पार्टी से 6 साल के लिए निलंबित करवाया। उसके कुछ दिन बाद उनकेघर रात में कुछ अज्ञात लोगों ने घुस कर उनकी जान लेने की कोशिश की। उस
समय भी बिहार के अखबारों ने इस खबर को बुरी तरह दबाया। (देखें, फारवर्ड
प्रेस, जून, 2011 में प्रकाशित समाचार ‘ प्रेमकुमार मणि, एमएलसी पर हमला
: बस एक कॉलम की खबर’ ) गत 14 सितंबर को नीतीश कुमार के ईशारे पर इन्हीं
ताराकांत झा ने एक अधिसूचना जारी कर प्रेमकुमार मणि की बिहार विधान परिषद
की सदस्यता समाप्त कर दी है। मणि पर अपने दल की नीतियों (सवर्ण आयोग के
गठन) का विरोध करने का आरोप है।
राजनीतिक रूप से देखें तो नीतीश के नेतृत्व वाली राजग सरकार एक डरी हुई
सरकार है। नीतीश कुमार की न कोई अपनी विचारधारा है, न कोई अपना बडा वोट
बैंक ही है। भारत में चुनाव जातियों के आधार पर लडे जाते हैं। बिहार में
नीतीश कुमार की स्वेजातीय आबादी 2 फीसदी से भी कम है। कैडर आधारित भाजपा
के बूते उन्हें पिछले दो विधान सभा चुनावों में बडी लगने वाली जीत हासलि
हुई है। इस जीत का एक पहलू यह भी है कि वर्ष 2010 के विधान सभा चुनाव में
लालू प्रसाद के राष्ट्रीलय जनता को 20 फीसदी वोट मिले जबकि नीतीश कुमार
के जदयू को 22 फीसदी। यानी दोनों के वोटो के प्रतिशत में महज 2 फीसदी का
अंतर था।
नीतीश कुमार पिछले छह सालों से अतिपिछडों और अगडों का एक अजीब सा पंचमेल
बनाते हुए सवर्ण तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं। इसके बावजूद
मीडिया द्वारा गढी गयी कद्दावर राजनेता की उनकी छवि हवाई ही है। वे एक
ऐसे राजनेता हैं, जिनका कोई वास्तविक जनाधार नहीं है। यही जमीनी स्थिति,
एक सनकी तानाशाह के रूप में उन्हें काम करने के लिए मजबूर करती है। इसके
अलावा, कुछ मामलों में वे ‘अपनी आदत से भी लाचार’ हैं। दिनकर ने कहा है -
‘क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो/ उसे क्या जो विषहीन, दंतहीन,
विनित सरल हो’।
कमजोर और भयभीत ही अक्सर आक्रमक होता है। इसी के दूसरे पक्ष के
रूप में हम प्रचंड जनाधार वाले लालू प्रसाद के कार्यकाल को देख सकते हैं।
लालू प्रसाद के दल में कई बार विरोध के स्वर फूटे लेकिन उन्होंने कभी
भी किसी को अपनी ओर से पार्टी से बाहर नहीं किया। मुख्यमंत्री की
कुर्सी पर नजर गडाने वाले रंजन यादव तक को उन्होंने सिर्फ पार्टी के पद
से ही हटाया था। दरअसल, लालू प्रसाद अपने जनाधार (12 फीसदी यादव और 13
फीसदी मुसलमान) के प्रति आश्वपस्त रहते थे।
इसके विपरीत भयभीत नीतीश कुमार बिहार में लोकतंत्र की भावना के लिए
खतरनाक साबित हो रहे हैं। वे अपना विरोध करने वाले का ही नहीं, विरोधी का
साथ देने वाले के खिलाफ जाने में भी सरकारी मशीनरी का हरसंभव दुरूपयोग कर
रहे हैं। लोकतंत्र को उन्होंने नौकरशाही में बदल दिया है, जिसमें अब
राजशाही और तानाशाही के भी स्पष्ट लक्षण दिखने लगे हैं।
बिहार को देखते हुए क्या यह प्रश्न अप्रासंगिक होगा कि
भारतीय जनता पार्टी के ब्राह्मण (वादी) नेता, वकील और परिषद के वर्तमान
सभापति ताराकांत झा ने जिन तीन लोगों को परिषद से बाहर किया है वे किन
सामाजिक समुदायों से आते हैं ? सैयद जावेद हसन (अशराफ मुसलमान), मुसाफिर
बैठा (धोबी, अनुसूचित जाति ) और अरूण नारायण (यादव, अन्य पिछडा वर्ग )। मुसलमान, दलित और पिछडा।
क्या यह संयोग मात्र है ? क्या यह भी संयोग है कि बिहार विधान
परिषद में 1995 में प्रो. जाबिर हुसेन के सभापति बनने से पहले तक पिछडे
वर्गों के लिए नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था तथा अनुसचित जातियों के
लिए प्रोन्निति में आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं थी ? जाबिर हुसेन के
सभापतित्व् काल में पहली बार अल्पसंख्यक, पिछडे और दलित समुदाय के
युवाओं की परिषद सचिवालय में नियुक्तियां हुईं। इससे पहले यह सचिवालय
नियुक्तियों के मामले में उंची जाति के रसूख वाले लोगों के बेटे-बेटियों,
रिश्तेतदारों की चारागाह रहा था। क्या आप इसे भी संयोग मान लेंगे कि
जाबिर हुसेन के सभापति पद से हटने के बाद जब नीतीश कुमार के इशारे पर
कांग्रेस के अरूण कुमार 2006 में कार्यकारी सभापति बनाए गये तो उन्होंने
जाबिर हुसेन द्वारा नियुक्ते किये गये 78 लोगों को बर्खास्त कर दिया और
इनमें से 60 से अधिक लोग वंचित तबकों से आते थे ? (देखें, फारवर्ड प्रेस,
अगस्त , 2011 में प्रकाशित रिपोर्ट -’बिहार विधान परिषद सचिवालय में
नौकरयिों की सवर्ण लूट’) क्या हम इसे भी संयोग ही मान लें कि सैयद
जावेद हसन, मुसाफिर बैठा और अरूण नारायण की भी नियुक्तियां इन्हीं जाबिर
हुसेन के द्वारा की गयीं थीं ?
जाहिर है, बिहार में जो कुछ हो रहा है, उसके संकेत बहुत बुरे हैं। मैं
बिहार के पत्रकारों, लेखक मित्रों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आह्वान
करना चाहूंगा कि जाति और समुदाय के दायरे तोड कर एक बार विचार करें कि हम
कहां जा रहे हैं ? और इस नियति से बचने का रास्ता क्या है ?
भारत मे मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) सुविधा को 20 जनवरी 2011 से लागू किया गया। मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) सुविधा उपयोगकर्ताओं को एक ही लाइसेंस सेवा क्षेत्र में अपने मौजूदा मोबाइल नंबर के साथ किसी नए मोबाइल सेवा प्रदाता का उपयोग करने की अनुमति प्रदान करती है। नई मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी एक नया सिम कार्ड प्रदान करेगी।
मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की सुविधा ग्राहक एक अरसे से प्रतीक्षा कर रहे थे क्योकि वह अपनी मौजूदा कम्पनी की सेवा से संतुष्ट न होकर भी वर्तमान नम्बर को बंद करके ही नई कम्पनी मे जा सकते थे किन्तु मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी के कारण अब उपभोक्ताओ को नई कम्पनी मे जाने के लिये वर्तमान नम्बर को बदलने की जरूरत नही होगी और वर्तमान नम्बर को जारी रखते हुये नई नये सेवा प्रदाताओ की सेवा का उपयोग कर सकते है। पोर्टेबिलिटी संबंधी कार्य सात कार्य दिवसों के अंदर पूरा हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर पूर्व सेवा क्षेत्रों में इस काम के लिए 15 दिन का समय निर्धारित किया गया है।
मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी को लेकर आम जन मे कुछ धारणाऍं है जिसे निम्न प्रश्नो के अंतर्गत दूर किया जा सकता है।
एमएनपी सुविधा का लाभ कौन ले सकता है?
कोई भी मोबाइल फोन उपयोगकर्ता, जो प्री-पेड या पोस्ट-पेड (जीएसम/सीडीएमए) सेवा का उपयोग कर रहा है, किसी अन्य सेवा प्रदाता कंपनी का उपयोग कर सकता है।
पोर्टिंग के लिए आवेदन करने की तिथि से पहले किसी भी मामले में सामान्य बिलिंग चक्र के अनुसार उपयोगकर्ता का कोई भी बकाया बिल या बकाया राशि शेष नहीं रहनी चाहिए।
किसी भी पोर्टिंग के लिए अनुरोध एक नए कनेक्शन की सक्रियता की तारीख या अंतिम पोर्टिंग की समाप्ति के 90 दिनों के भीतर प्रभावी होगा।
मोबाइल नंबर के स्वामित्व में परिवर्तन के लिए कोई भी अनुरोध प्रक्रिया में नहीं होना चाहिए।
उपयोगकर्ता ने लाइसेंस सेवा क्षेत्र के भीतर पोर्टिंग के लिए आवेदन किया हो।
संबंधित मोबाइल नंबर के पोर्टिंग को न्यायालय के किसी भी कानून द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया हो।
पोर्टिंग अनुरोध में वर्णित अद्वितीय पोर्टिंग कोड मोबाइल की मांग की संख्या के लिए दाता संचालक द्वारा आवंटित अद्वितीय पोर्टिंग कोड से मिलना चाहिए।
उपयोगकर्ता ने वर्तमान कनेक्शन से बाहर निकलने के लिए दिए गए नियमों का पालन किया है।
मैं कैसे एक नए मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी के लिए पोर्ट कर सकता हूं?
प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्न प्रकार हैं:-
उपयोगकर्ता को अपने मोबाइल नंबर की पोर्टिंग के लिए नएमोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी के सेवा केन्द्र या अधिकृत विक्रेता के पास जाना होगा। इसके पश्चात एक सेवा पंजीकरण फार्म भरें एवं प्रक्रिया के लिए पोर्टिंग शुल्क का भुगतान करें।
उपयोगकर्ता को अपने यूपीसी (अद्वितीय पोर्टिंग कोड) को प्राप्त करने के लिए अपने मोबाइल नंबर से, जिसे वह पोर्ट करवाना चाहता है, दाता संचालक को 1900 पर एक संदेश भेजना होगा।
एमएनपी सुविधा का लाभ लेने के लिए उपयोगकगर्ता को पोर्ट लिखकर संदेश अपने दस अंकों के मोबाइल नंबर के साथ 1900 पर भेजना होगा और इसके पश्चात उपयोगकर्ता संदेश के माध्यम से ही अपना यूपीसी पोर्टिंग कोड प्राप्त करेगा। (उदाहरण के लिए PORT 9999999999 लिखें और फिर इसे 1900 पर भेज दें)
संदेश प्राप्त होने पर दाता संचालक एक स्वचालित प्रणाली के माध्यम से उपयोगकर्ता का अद्वितीय पोर्टिंग कोड तुरंत संदेश के द्वारा उसे भेजेगा। उपयोगकर्ता को यह अद्वितीय पोर्टिंग कोड पोर्टिंग के लिए आवेदन करने समय आवेदन पत्र में भरना होगा।
किसी मामले में अगर उपभोक्ता का कॉलर लाइन पहचान (सीएलआई) दस अंकों के मोबाइल नंबर के साथ मेल नहीं खाता है, तो उसे अद्वितीय पोर्टिंग कोड आवंटित नहीं किया जा सकता लेकिन एक संदेश के माध्यम से उपयोगकर्ता को यह सूचित किया जाता है कि उसका कॉलर लाइन पहचान (सीएलआई) दस अंकों के मोबाइल नंबर के साथ मेल नहीं हो रहा है।
अद्वितीय पोर्टिंग कोड जो कि उपयोगकर्ता को आवंटित किया जाता है आवेदन की तिथि से पंद्रह दिनों तक या कई बार नंबर जो पोर्ट हो चुका है, जो भी पहले हो, तक मान्य होता है।
जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर पूर्व के सेवा क्षेत्रों में अद्वितीय पोर्टिंग कोड की वैद्यता आवेदन की तिथि से तीस दिनों तक या कई बार नंबर जो पोर्ट हो चुका हो, जो भी पहले हो, तक होगी, चाहे अनुरोधों की संख्या उपयोगकर्ता के द्वारा बनाई गई हो।
नई सेवा प्रदाता कंपनी द्वारा उपयोगकर्ता को एक नया सिम कार्ड जारी किया जायेगा।
पोर्टिंग अनुरोध के अनुमोदन के पश्चात नएमोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को सूचित किया जाएगा।
पोर्टिंग शुल्क
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के अनुसार एक नए नेटवर्क पर पलायन की लागत 19 रुपए है। बहरहाल, नए ऑपरेटरों के पास उपयोगकर्ताओं को फीस माफ करने या छूट देने का विकल्प मौजूद होगा। भारत संचार निगम लिमिटेड व एयरसेल ने संभावित ग्राहकों के लिए शुल्क माफ किया है।
नए मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को पोर्ट करने में कितना समय लगता है?
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के अनुसार, किन्ही भी 7 कार्यदिवस के अंदर पोर्टिंग का कार्य पूरा हो जाएगा। जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर पूर्व सेवा क्षेत्रों में 15 दिनों की समय सीमा निर्धारित की गई है।
बाधित सेवा अवधि क्या है?
यह 2 घंटे की वह अवधि है जब आपकी मोबाइल सेवाओं को बाधित किया जायेगा। वास्तविक समय आपको हमारे द्वारा संदेश के माध्यम से बताया जायेगा।
क्या मैं पोर्टिंग के लिए आवेदन करने के पश्चात अपने अनुरोध को रद्द कर सकता हूं? क्या मुझे भुगतान की गई राशि वापस मिलेगी?
हां, आप पोर्ट के लिए आवेदन करने के 24 घंटों के भीतर अपने नएमोबाइल सेवा प्रदाता के साथ अपना अनुरोध रद्द कर सकते हैं।
क्या मुझे नए मोबाइल सेवा प्रदाता के पास पोर्ट करने से पहले अपनी मौजूदा सेवाओं को बंद कराने की आवश्यकता है?
नहीं, आपको अपनी मौजूदा सेवाओं को रद्द करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर आप एक बार सफलता से नएमोबाइल सेवा प्रदाता के पास पोर्ट कर लेते हैं तो आपकी अपने मौजूदा मोबाइल सेवा प्रदाता की सेवाएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।
पोर्टिंग प्रक्रिया के दौरान क्या मैं वर्तमान सेवाओं का उपयोग कर सकता हूं?
हां, आप इस प्रक्रिया के दौरान आप अपनी सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं, सिर्फ अंतरराष्ट्रीय रोमिंग सेवा को छोड़कर, जो आपके पोर्टिंग अनुरोध के पश्चात आपके वर्तमान मोबाइल सेवा प्रदाता के द्वारा निलंबित कर दी जाती है।
मैं एमएनपी के लिए कहां आवेदन कर सकता हूं?
इसके लिए आपको मोबाइल सेवा प्रदाता के सेवा केंद्र अथवा प्राधिकृत डीलर के पास जाकर पोर्टिंग के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए सेवा पंजीकरण फॉर्म भरकर आगे की प्रक्रिया के लिए पोर्टिंग शुल्क का भुगतान करें।
एमएनपी के लिए मुझे कितना भुगतान करने की आवश्यकता होगी?
एक नेटवर्क से दूसरे नेटवर्क पर अपना नंबर स्थानांतरित करने की लागत 19 रुपए है। हालांकि, नए ऑपरेटर के पास शुल्क माफ करने अथवा अन्य छूट देने का विकल्प होगा। भारतीय संचार निगम लिमिटेड ने अपने संभावित ग्राहकों के लिए यह शुल्क माफ किया है।
समय पर सेवा ना मिलने पर अपनी शिकायत कहां कर सकते हैं?
भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
क्या मैं अपने नंबर को एक से अधिक बार पोर्ट कर सकता हूं?
आप एक से अधिक मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों को एक ही समय में पोर्टिंग का अनुरोध नहीं कर सकते। इसके अलावा आपको वर्तमान मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी की 90 दिनों की सदस्यता के साथ पात्रता की सभी शर्तों को पूरा करना चाहिए।
Posted by महाशक्ति (pramendraps@gmail.com) on September 16, 2011 04:08 AM· permalink
इस चिट्ठी में, अंग्रेजी फिल्म 'लव हैपेन्स्' की समीक्षा है।
फिल्म का भावपूर्ण दृश्य
पॉन्डचेरी से लौटते समय हम दिल्ली रुके थे। हमारे पास कुछ समय था हम लोग वसंत कुंज की, डी.टी. स्टार पॉमेनेड मॉल में 'लव हैपंस्' फिल्म देखने चले गये। जब पीवीआर में फिल्म देखने पहुंचे तब दरवाजे पर, सिक्योरिटी गार्ड ने बड़े अदब से स्वागत किया और कहा,
'गुड आफटर नून, सर।'
मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा कर नमस्ते कह कर उसका जवाब दिया। वह समझ नहीं पाया कि क्या और क्यों कह रहा हूं। मैंने फिर उससे कहा
'नमस्ते।'
विधुर - पत्नी की मृत्य के दुख से नहीं उभरा
उसके बगल में एक युवती खड़ी हुई थी। वह बता रही थी कि आने वाले लोग किधर जाए। उसने मुस्कुरा कर मुझसे नमस्ते कहा। तब गार्ड के समझ में आया कि मैं क्या कहना चाहता हूं। तब गार्ड ने भी मुझसे नमस्ते किया। मैंने उसे याद दिलाया कि यह भारत है और जब अगली बार कोई आये तो पहले नमस्ते करना। उसने वायदा किया कि वह ऐसा ही करेगा।
'लव हैपेनस्' एक विधुर की प्यारी सी, भावनात्मक प्रेम कहानी है। इसकी पत्नी की मृत्यु, तीन साल पहले एक कार दुर्घटना में हो जाती है। उसने उस दुख से उभर ने के लिए, अपनी सहायता करने वाली पुस्तक (Self help book) लिखी है। वे बहुत अच्छा बोलते हैं और उस पुस्तक की बिक्री के लिए बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए वे सीएटल जाते हैं।
सीएटल में, उनका सम्मेलन होटल में है। वहां लोग हैं। वे उनको यह बताते हैं कि लोग अपने दुखों को कैसे दूर करें। वे लोगों को इसके लिये प्रेरित करते हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह अपनी पत्नी की मृत्यु के दुख से नहीं उभर पाये थे।
इलॉयस
विधुर की पत्नी सीएटल की थी और उसके माता पिता वहीं रहते थे। उनकी सास, ससुर उससे क्रोधित रहते थे। विधुर को लगता था कि वह इसलिए गुस्सा रहते हैं कि उनकी पत्नी की मृत्यु कार दुर्घटना में हो गयी है जिसमें वह स्वयं भी था और शायद उसके सास-ससुर, उसे इस घटना के लिये जिम्मेवार मानते हैं। लेकिन वास्तव में, उसके सास-ससुर इसलिए गुस्सा रहते थे कि उसने अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद, उनसें कोई सम्बंध नहीं रखा था।
होटल में, उसकी मुलाकात एक इलॉयस नाम की महिला से होती है जो फूल बेचने वाली है और वह उससे प्यार करने लगता है। वह महिला उसे इस बात के लिए उत्साहित करती है कि वह अपने दुख से उभरे। बस यही कहानी है कि दूसरों को दुख को उभरने की सलाह एवं प्रेरणा देने वाला, क्या अपने दुख से उभर पाया?
यह एक रोमानी कहानी है और इसमें कोई ऐसा दृश्य नहीं है जिसे आप अपने बेटे या बेटी के साथ नहीं देख सकते। यह परिपक्व लोगों के लिए फिल्म है। मेरे विचार से यदि आप किशोरावस्था से गुजर चुके हों तो इसे अवश्य देखें।
फिल्म देखने के बाद, शाम को गाड़ी पकड़ कर, हम अपने कस्बे में आ गये। बहुत जल्द ही, हम लोग मथुरा चलेंगे।
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सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
टीम अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक सशक्त लोकपाल पद का सृजन करने और जन लोकपाल कानून बनाने को लेकर चल रहा आंदोलन 28 अगस्त की सुबह 10 बजे अन्ना हजारे द्वारा ‘आमरण अनशन’ तोड़ने के साथ समाप्त हो गया. आंदोलन के नेतृत्व ने यह घोषणा की थी कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने सहित अपनी किसी भी मांग से वे पीछे नहीं हटेंगे और जन लोकपाल बिल संसद में पारित होने तक अन्ना का अनशन जारी रहेगा. इसके लिए सरकार को 1 सितम्बर तक का समय दिया गया था. लेकिन सुलह-समझौते और नाटकीय घटनाक्रम के बाद आखिरकार कम महत्व वाली तीन मांगो पर सहमति को आधार बनाकर एक भव्य आयोजन के साथ अनशन समाप्त हो गया. अपने जन लोकपाल बिल के समर्थन में अन्ना हजारे ने 16 अगस्त से दिल्ली में आमरण अनशन करने कि घोषणा की थी. सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी और 16 अगस्त की सुबह अनशन शुरू करने से पहले ही अन्ना हजारे और उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया. इस घटना ने आग में घी का काम किया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटने की इस कुकृत्य ने सरकार के प्रति लोगों में व्याप्त आक्रोश को और अधिक तीव्र कर दिया. टीवी चैनलों ने इस पूरे प्रकरण का सीधा प्रसारण किया. छोटी से छोटी घटना को लगातार दिखाने और आन्दोलन का बढ़-चढकर प्रचार-प्रसार करने से शहरी मध्यम वर्ग प्रभावित हुआ. लोग उद्वेलित होकर खुद-ब-खुद सड़कों पर उतरने लगे. इस घटना में जल्दी ही एक नाटकीय मोड़ आया जब कुछ ही घंटो के भीतर अन्ना टीम और उनके समर्थकों को सरकार ने रिहा कर दिया. लेकिन तिहाड़ जेल से बाहर आने के बजाय अन्ना ने जेल के अंदर ही अनशन शुरू कर दिया. 16 अगस्त कि रात और 17 अगस्त को दिनभर दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ अन्ना टीम की समझौता वार्ता चलती रही. आखिरकार सरकार ने 21 दिन के लिए रामलीला मैदान में अनशन और प्रदर्शन की इजाजत भी दे दी. दिल्ली नगर निगम ने दिन-रात एक करके रामलीला मैदान की सफाई और अस्थायी शौचालय की व्यवस्था की और वहाँ सुरक्षा का भी विशेष इंतजाम किया. (याद रहे कि इसी रामलीला मैदान में अपने खर्चे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे स्वामी रामदेव और उनके समर्थकों पर पुलिस ने आधी रात को अचानक हमला किया था.) बाद की हर एक घटना से अधिकांश परिचित हैं क्योंकि अन्ना की गिरफ़्तारी के बाद से ही सारे के सारे समाचार चैनल पूरे देश की बाकी ख़बरों को किनारे लगते हुए अन्ना आन्दोलन की हर छोटी-बड़ी घटना का 24*7 घन्टे सीधा प्रसारण करते रहे. इस आन्दोलन को ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’, ‘व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई’, और ऐसे ही प्रचंड और पाखंडपूर्ण उद्घोष करने के लिए टीवी चैंनलों और अखबारों में होड़ लग गयी. रामलीला मैदान के मंच पर नामी-गिरामी लोगों, फ़िल्मी सितारों, खिलाड़ियों, गायकों, कवियों, धर्मगुरुओं और समाज सेवियों का जमावड़ा तथा उत्तेजनापरक, अतिशयोक्तिपूर्ण और लोकलुभावन भाषण का क्रम अविरल जारी था. उधर सरकार और अन्ना टीम के बीच समझौता वार्ता और कई स्तर पर मंत्रणाएं चलती रहीं. कई मध्यस्थ आये और गए जिनमें धर्मगुरु, पार्टियों के नेता, एनजीओ मठाधीश और यहाँ तक कि आदर्श घोटाले के आरोपी विलास राव देशमुख जैसे लोग प्रमुख भूमिका में रहे. और जैसा कि पहले ही तय था कि आन्दोलन का पटाक्षेप भ्रष्टाचार विरोधी कानून और एक पद सृजन के लिए आपसी समझौते में होगा, अंततः हुआ भी वही. इस बीच आन्दोलन के नेतृत्व की संरचना और उसके समर्थकों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, भ्रष्टाचार के प्रति नेतृत्वकारी लोगों का दृष्टिकोण, आन्दोलन का तौर-तरीका और यहाँ तक कि उनके आर्थिक स्रोत, राजनीतिक पार्टियों के साथ उनके सम्बन्ध और प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ संश्रय को लेकर भी बहुत सारे प्रश्न उठे. लेकिन जनता के एक खास तबके की स्वतःस्फूर्त पहलकदमी देखकर कई संगठन और व्यक्ति इतने अभिभूत और भाव विह्वल हो गए कि उन्होंने उपरोक्त सवालों को जनता से कटे निष्क्रिय बुद्धिजीवियों का प्रलाप कहकर ख़ारिज कर दिया. कारपोरेट मीडिया के अहर्निश प्रचार-प्रसार से जो बवंडर उठा, उसने कई विवेकशील, विचारवान और जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, संगठनों को भी असमंजस में डाल दिया. अब, जबकि यह तूफ़ान थम गया है और अन्ना आन्दोलन ‘आधी जीत’ की अपनी चरम परिणति तक पहुँच गया है, इस पूरी परिघटना पर विचार करना जरूरी है ताकि भविष्य के लिए जरूरी सबक और कार्यभार निकाले जा सकें. अन्ना टीम की मुहिम यदि केवल एक कानून बनवाने और एक लोकपाल पद के सृजन तक ही सीमित होती तो इसे गंभीरता से लेने की जरुरत नहीं थी. पूंजीवादी लोकतंत्र में ऐसे दबाव समूह और पैरोकार (लौबिस्ट) होते हैं जो किसी खास मामले में सरकार पर दबाव बनाते रहते हैं. उनके उद्देश्य बहुत सीमित होते हैं. लेकिन रामलीला मैदान के मंच से जिस तरह ‘व्यवस्था परिवर्तन’, ’संपूर्ण क्रांति’, ’लोकतंत्र की पुनर्बहाली’ और ‘दूसरी आजादी’ का शब्द-जाल फैलाया गया, उसने कई सारे लोगों के मन में फर्जी उम्मीद जगायी और भ्रम फैलाया है. लोग इस व्यवस्था से त्रस्त हैं और अपनी रोज-बरोज की समस्याओं से मुक्ति चाहते हैं. अपनी इन्हीं आकांक्षाओं और भावनाओं के साथ लोग अन्ना की ओर आकर्षित हुए. और अब अन्ना आन्दोलन को महिमामंडित करके उसे जनांदोलनों के एक आदर्श नमूने के रूप में स्थापित करने का प्रयास चल रहा है. ऐसी स्थिति में यह जरूरी है कि इस पूरे प्रकरण का तथ्यपरक विश्लेषण किया जाय और देखा जाय कि यह समूह अपने बड़े-बड़े दावों को पूरा करने लायक है भी या नहीं. इसके लिए हम मुख्यतः छ: मानदंडों पर अन्ना टीम और उसके लोकपाल आन्दोलन को जांचने कि कोशिश करेंगे. (1- विचारधारा और राजनीति (2- उद्देश्य, कार्यक्रम और मांग (3- सांगठनिक उसूल और कार्य प्रणाली (4- नेतृत्व की संरचना (5- समर्थक और जनाधार (6- मीडिया की भूमिका और (7- आर्थिक स्रोत. शब्दाडम्बरों से नहीं बल्कि इन्हीं मानदंडों से हम किसी भी संगठन या आन्दोलन को परख सकते हैं कि वह वास्तव में किन वर्गों या तबकों की नुमाइंदगी करता है.
विचारधारा और राजनीति
अन्ना टीम कि कोई सुसंगत, सुनिश्चित और समान विचारधारा नहीं है. इसमें परम्परावादी और आधुनिकतावादी, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष, तरह-तरह के विचारों वाले लोग शामिल हैं. एक बात सबमें साझा है कि इनमें से कोई भी बुनियादी बदलाव (रेडिकल चेंज) का समर्थक नहीं है. अधिक से अधिक इन्हें सुधारवादी माना जा सकता है. इसमें परस्पर विरोधी आस्थाओं वाले धार्मिक समूह हैं, सीमित उद्देश्य के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) हैं और कुछ महत्वाकांक्षी लोग हैं जिनकी कोई सुसंगत सोच नहीं है. मुस्लिम समाज के प्रति विष-वमन करने वाले वरुण गाँधी और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों से इस टीम को कोई गुरेज नहीं है. आरक्षण विरोधी ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ से भी इन्हें कोई परहेज नहीं है. खुद अन्ना हजारे गुजरात नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी और गैरमराठी ‘बाहरी लोगों’ के विरुद्ध नफरत फ़ैलाने वाले राज ठाकरे के प्रसंशक हैं. वे ‘नोट के बदले वोट’ के आरोपियों को फांसी देने कि मांग करते हैं, लेकिन यह साजिश किसने और क्यों की, इस पर वह मौन रहते हैं . अन्ना हजारे ने अपने गाँव रालेगण सिद्धि में जो आदर्श गाँव का मॉडल बनाया है, वह प्रतिगामी विचारों पर आधारित है. वहाँ जातिगत पेशे में लगे लोगों को अपना-अपना काम निष्ठापूर्वक करना जरुरी है. उनका मानना है कि हर आदर्श गाँव में एक लोहार, एक सुनार, एक कुम्हार और एक चमार परिवार का होना जरूरी है, ताकि गाँव आत्मनिर्भर बने. वहाँ पंचायत और कॉपरेटिव का चुनाव नहीं होता. दारू पीने और अन्य सामाजिक बुराइयां करने वालों की सार्वजनिक रूप से पिटाई की जाती है. जहिर है कि इन सब के पीछे अलोकतांत्रिक, वर्णाश्रम आधारित, ब्राह्मणवादी, सामंती सोच है. जन लोकपाल आन्दोलन की व्यावहारिक कार्यवाहियों के दौरान भी विभिन्न रूपों में इसका इजहार हुआ.. नवउदारवादी आर्थिक ‘सुधार’ हमारे देश का सबसे बुनियादी मसला है. इसने भारतीय समाज में पहले से मौजूद समस्याओं को तीखा किया है और नयी-नयी समस्याओं को जन्म दिया है (विराट और बेलगाम भ्रष्टाचार भी इनमें से एक है). उदारीकरण-निजीकरण की इन नीतियों के परिणामस्वरूप लाखों मजदूरों-किसानों ने आत्महत्या की है और अधिकांश जनता की जिंदगी नरक से भी बदतर हो गयी है. लेकिन अन्ना टीम का इन नीतियों से कोई विरोध नहीं है. कोई भी विचार या नीति यदि बहुसंख्य मेहनतकश जनता के हित में नहीं है, उनके जीवन में खुशहाली लाने वाली नहीं है तो वह ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का वाहक नहीं हो सकती. अन्ना टीम मेहनतकश जनता के प्रति पक्षधर और प्रतिबद्ध नहीं है. जिन राजनीतिक पार्टियों ने जनविरोधी, नवउदारवादी नीतियों को बढ़-चढ़ कर लागू किया, उनके सहयोग और समर्थन से ही वे जन लोकपाल कि मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं. अनशन की समाप्ति और ‘आधी जीत’ के लिए उन्होंने उन सबका आभार भी व्यक्त किया. विचारों की इस पंचमेल खिचड़ी के भरोसे सरकारी सहयोग से कोई कानून तो बनवाया जा सकता है, लेकिन क्या इसके दम पर ‘व्यवस्था परिवर्तन’ और ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ लड़ना संभव है?
सांगठनिक उसूल और कार्य-प्रणाली
अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन का संचालन कई ढीले-ढाले संगठनों और व्यक्तियों के तदर्थ गठबंधन द्वारा किया गया जिसमें शुरू से आखिर तक मतभेद और कलह मौजूद रहे हैं. इसके नेतृत्व का करिश्माई और मसीहाई अंदाज ही इसकी सामर्थ्य और सीमा थी, जिसके केंद्र में अन्ना हजारे थे. इसमें कर्ता अन्ना और उनकी टीम थी, आन्दोलन में शामिल भीड़ का काम उनकी हौसला अफजाई करना, उनकी ताकत बढ़ाना था ताकि सरकार उनके साथ समझौता करने पर राजी हो जाये. मध्यम वर्ग को हमेशा ही किसी महानायक या मसीहा का इन्तजार रहता है जो अपने चमत्कारी प्रभाव से बड़ा से बड़ा बदलाव लाने में समर्थ हो. अपनी पहल पर अनुशासित और योजनाबद्ध सांगठनिक कार्रवाई से उसे एलर्जी होती है. जन लोकपाल ने इस मध्यम वर्गीय प्रवृत्ति का भरपूर लाभ उठाया. आज का दौर सचेत रूप से इतिहास निर्माण का दौर है जहाँ समाज की हर गतिविधि संगठित शक्तियां संचालित करती हैं. राज्य खुद ही ऊपर से नीचे तक पूरी तरह सुसंगठित और वर्गीय शासन को चलाने वाले हर तरह के अश्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है. इसका सामना करने के लिए एक केंद्रीकृत, अनुशासित और मजबूत संगठन का होना अनिवार्य है. यह किसी की व्यक्तिगत इच्छा से स्वतंत्र, एक ऐतिहासिक तथ्य है. भीड़ के सामने इस हवाई घोषणा का कोई मतलब नहीं कि ‘हम लोग’ संप्रभु हैं और सरकार जनता की नौकर है. ‘हम लोग’ अपनी संप्रभुता का इजहार और उसकी दावेदारी संगठन और अनुशासन के माध्यम से ही करते हैं. अगर ऐसा न हो तो ‘हम लोग’ किन्हीं खास लोगों को सत्ता के गलियारे तक पहुंचाने का जरिया हो सकते हैं, चाहे मतदान से या किसी अभियान से. ‘जनतंत्र के आदर्शों का आनंदोत्सव’ और लोकतंत्र के क्रियान्वयन में जमीन-आसमान का फर्क है. विभिन्न तबकों और वर्गों के जन संगठनों में रोज-बरोज के व्यावहारिक कामों के दौरान उससे जुड़े लोगों का जनवादीकरण और लोकतंत्र का क्रियान्वयन होता है. ऐसे संगठनों में समूह की इच्छा और बहुमत की राय सर्वोपरि होती है और व्यक्ति समूह के अधीन होता है, चाहे वह कितने भी अलौकिक गुणों और विलक्षण प्रतिभा से संपन्न क्यों न हो. नेता का कर्त्तव्य आन्दोलन और संगठन के उद्देश्य और कार्यक्रम से अपनी कतारों को परिचित कराना, उनकी चेतना बढ़ाना, उनके माध्यम से जनगण को गोलबंद और संगठित करना तथा आन्दोलन को सही दिशा में संचालित करना होता है. लेकिन जनता ही वास्तविक कर्ता होती है. अन्ना कि मुहिम जिन एनजीओ के हाथों में थी उनमें इस प्रकार का कोई संगठन नहीं है. वहाँ कार्यकारी टीम और वेतनभोगी कर्मचारी होते हैं जो निश्चित अवधि और इलाके के लिए निर्धारित और वित्तपोषित, सुधारात्मक परियोजनाओं का संचालन करते हैं. ऐसे संगठन अपने दानकर्ताओं की मदद से जनता के कल्याण और भलाई के लिए काम करते हैं, उन्हें गोलबंद और संगठित नहीं करते. इतिहास का निर्माण कोटि-कोटि जनता के सचेत प्रयासों से होता है, किसी मसीहा या महानायक के चमत्कार से नहीं. लेकिन हमारे समाज में लोकतान्त्रिक चेतना के आभाव तथा अतीत से चली आ रही नायक-पूजा और अंधश्रद्धा के गहरे प्रभाव के कारण अक्सर किसी उद्धारक के पीछे भीड़ उमड़ पड़ती है. अन्ना कि मुहिम के दौरान भी ऐसा ही हुआ. रामलीला मैदान में उपस्थित जनसमूह की चेतना बढ़ाने के बजाय उनकी भावनाओं को उकसाने और अंधभक्ति को बढ़ावा देने के लिए आपातकाल के दौरान दिए गए ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ की पैरोडी बनाकर ‘अन्ना इज इंडिया, इंडिया इज अन्ना’ का नारा दिया गया. अन्ना टीम कि मुहिम में शामिल नाना प्रकार के सुधारवादियों का ढीला-ढाला मोर्चा जन लोकपाल कानून बनवाले, वही बहुत है. इतिहास का सबक है कि बुनियादी बदलाव के लिए वर्गों और तबकों के संगठित, सचेतन और धैर्यपूर्व संघर्ष कि जरूरत होती है.
अन्ना टीम का उद्देश्य और उनकी मांग
लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने वाली टीम अन्ना का उद्देश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत और स्वतंत्र कानून बनवाना, विदेशों से काले धन की वापसी तथा चुनाव प्रणाली और न्याय व्यवस्था में सुधार लाना है. अन्ना टीम भ्रष्टाचार को देश कि सबसे बड़ी समस्या मानती है. और इस समस्या के समाधान के लिए वह एक कठोर कानून और शक्तिशाली लोकपाल के गठन को अनिवार्य मानती है. अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे के पहले अनशन के बाद सरकार ने अन्ना टीम के 5 प्रतिनिधियों को मिला कर लोकपाल कानून की ड्राफ्टिंग कमेटी बनायी, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले कई दूसरे एनजीओ और रामदेव जैसे लोगों को उससे अलग ही रखा गया. बाद में सरकार ने अन्ना टीम के कई सुझावों को उसमें शामिल नहीं किया. उसने एक बेहद कमजोर लोकपाल का मसौदा तैयार किया जिसमे भ्रष्टाचारी के लिए न्यूनतम 6 माह और अधिकतम 10 वर्ष कि सजा तथा भ्रष्टाचार का आरोप गलत साबित होने पर शिकायतकर्ता को दो साल की सजा का प्रावधान है. अन्ना टीम की मांग थी कि प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाया जाय. साथ ही लोकपाल कानून को क्रियान्वित करने के लिए 10 लोगों की ऐसी टीम बनायी जाय जो पुलिस, जांच एजेंसी और न्यायाधीश तीनों की भूमिका निभाने के लिए अधिकृत हो और सर्वशक्तिमान हो. अन्ना टीम का मानना है कि अगर उनके मसौदे के आधार पर लोकपाल बिल बन गया तो देश में 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार कम हो जाएगा. दरअसल भ्रष्टाचार के प्रति अन्ना टीम का नजरिया सतही और भ्रामक है. उनकी निगाह में देश कि सारी समस्याओं के मूल में भ्रष्टाचार है जिसके खत्म होते ही सभी मुसीबतें दूर हों जाएँगी. इस तरह वे लक्षण को रोग बताते हैं और उसे जड़ से मिटाने के बजाय निमहकीमी इलाज तजबीज करते हैं तथा महंगाई, बेरोजगारी, शोषण और लूट-खसोट से लोगों का ध्यान हटाने का प्रयास करते हैं. दूसरे, वे केवल कानून का उलंघन करके कला धन कमाने को ही भ्रष्टाचार मानते हैं. पिछले 20 वर्षों से सरकार कानून में फेर-बदल कर के श्रम और सार्वजनिक संपत्ति की लूट को बेलगाम करती जा रही है, 1991 के पहले जो जो भ्रष्टाचार था उन सब को शिष्टाचार में बदलती जा रही है, उससे उन्हें कोई उज्र नहीं. जो लोग बेलगाम लूट-खसोट से निजात पाने के लिए अन्ना टीम के समर्थन में बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे, उनकी चाहत जायज है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के बने रहते हुए एक कानून, एक संस्था और एक सर्वसत्ता सम्पन्न लोकपाल पद का सृजन कर देने से भ्रष्टाचार पर रोक लग जायेगा? आजादी के बाद से अब तक भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए पांच दर्जन से ज्यादा कानून बने और कई जांच समितियों का गठन किया गया जिनमें से एक है केन्द्रीय सतर्कता आयोग जिसे 1998 और 2004 में कानून बनाकर पहले से ज्यादा अधिकार दे दिये गये. लेकिन कहावत है कि कानून बनते ही तोड़ने के लिए हैं. हर नये कानून के साथ भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक विकराल रूप धारण करता गया. यही हाल दूसरे कानूनों का भी है. क्या कठोर कानून के बावजूद दहेज उत्पीडन आज भी जारी नहीं है? क्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध कानून बना दिए जाने से भ्रूण हत्या बंद हो गयी? क्या बाल श्रम कानून बनने से बच्चों से काम लेने पर लगाम लगी? क्या दलित उत्पीडन के खिलाफ कानून बन जाने से दलितों का उत्पीडन समाप्त हुआ? सच तो यह है कि जब भी किसी समस्या के प्रति लोगों का आक्रोश और असंतोष बढ़ता है तो सरकार खुद ही उसके लिए कानून बना कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है. भ्रष्टाचार के मामले में भी वह यही कर रही है. क्या अन्ना टीम अपने इस कानूनवादी, सुधारवादी मांग के जरिये सरकार के इसी पुराने, आजमाए हुए पैंतरे में सहयोगी भूमिका नहीं निभा रही है? कहावत है ‘प्रभुता पाई काहि मद नाहीं.’ अंग्रेजी कहावत है कि ‘पावर करप्ट्स एंड एब्सलूट पावर करप्ट्स एब्सलूटली’. सर्वाधिकार संपन्न लोकपाल भी भ्रष्ट नहीं होगा इसकी क्या गारंटी है? मजेदार बात यह है कि अन्ना टीम ने पूंजीपतियों, व्यापारियों, सटोरियों, काला बाजारियों, एनजीओ चलाने वालों, धार्मिक संस्थाओं और मीडिया को अपने लोकपाल की गिरफ्त से बाहर रखा है. ए. राजा आज बिना लोकपाल के भी जेल में हैं, जबकि 1,75,000 करोड़ डकार जाने वाले मोबाइल कंपनियों के मालिक देशी-विदेशी पूंजीपतियों का लोकपाल कानून भी कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. पिछले दिनों नीरा राडिया कांड ने पूंजीपति और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को सामने ला दिया था. लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के छोटे कर्मचारियों तक को लोकपाल के दायरे में लाने पर बजिद अन्ना टीम ने अपने जन लोकपाल से उन्हें बेलाग रखा. क्या अन्ना टीम की मांग पूरी हो गयी! अनशन समाप्ति के बाद के विजयोल्लास और मीडिया के अन्धाधुंध प्रचार से तो ऐसा ही जान पड़ता है, लेकिन हकीकत कुछ और है. रामलीला मैदान के मंच से अन्ना ने घोषणा की थी कि सरकार लोकपाल का अपना मसौदा वापस ले और उसकी जगह जन लोकपाल बिल संसद में पेश करे. कानून बनाने के लिए अन्ना टीम ने सरकार को 30 अगस्त तक का समय दिया था और उदघोष किया था कि कानून बनने तक अन्ना का अनशन और आंदोलन जारी रहेगा. लगातार वार्तालापों का जोर चला और अंततः अन्ना टीम ने प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को जन लोकपाल के दायरे में लाने सहित कई मांगों को छोड़ते हुए केवल कम महत्व वाले तीन मुद्दों पर संसद में प्रस्ताव पेश करने की शर्त रखी – 1. राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति, 2. सिटिजन चार्टर के जरिये सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए निश्चित समय का निर्धारण और 3. राज्य के सभी कर्मचारियों को लोकपाल के अधीन लाना. सरकार ने न तो संसद में कोई प्रस्ताव पास किया और न ही कानून बनाने के लिए कोई समय सीमा तय की. केवल संसद की भावना व्यक्त करते हुए कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने एक संयुक्त वक्तव्य दिया. अन्ना टीम ने सम्मानपूर्वक पीछे हटने के लिए उसी वक्तव्य को आधार बना कर आंदोलन वापस ले लिया और इसे ‘आधी जीत’ बताते हुए अपनी पीठ थपथपा ली. जन लोकपाल आंदोलन ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि वैचारिक उहापोह और सांगठनिक अफरातफरी के बल पर मामूली सुधारवादी और सतही मांगों को पूरा करवाना भी सम्भव नहीं.
आंदोलन के नेतृत्व की संरचना
अन्ना टीम की भ्रष्टाचार मुहिम के साथ ही सिविल सोसाइटी (भद्रलोक समाज) एक बहुचर्चित शब्द हो गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- भद्र, शिष्ट, सुसभ्य, परिष्कृत, नगरवासी. जाहिर है कि 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और शहरों की आधी गरीब आबादी इस श्रेणी में नहीं आती. जन लोकपाल आन्दोलन का नेतृत्व और उनके समर्थक इसी ‘सिविल सोसायटी’ के लोग हैं. सिविल सोसाइटी या भद्रलोक की अवधारणा कोई नयी नहीं है. प्राचीन रोमन साम्राज्य में गुलामों को मनुष्य की श्रेणी में नहीं माना जाता था. गुलामों के मालिक अभिजात वर्ग के अलावा स्वतंत्र नागरिकों का समूह इसी श्रेणी में आता था जो अपनी सामाजिक हैसियत और पक्षधरता में कुलीन वर्ग के करीब था. आधुनिक युग में यह सभ्य, सुसंस्कृत और खुशहाल भद्रलोक पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी व्यवस्था का परम हितैषी है. विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार ‘‘सिविल सोसाइटी पद का सम्बन्ध गैर-सरकारी संगठन और बिना मुनाफे वाले संगठनों के व्यापक विन्यास से है जो अपने सदस्यों तथा दूसरों के हितों एवं मूल्यों को नैतिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक या लोकोपकारी विचारों के आधार पर अभिव्यक्त करने वाले के रूप में सार्वजानिक जीवन में अपनी उपस्थिती दर्ज करा चुके हैं. इस तरह सिविल सोसाइटी संगठन, संगठनों के एक व्यापक विन्यास को दिखाते हैं- सामुदायिक समूह, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), श्रमिक संघ, मूल निवासी समूह, दानकर्ता संगठन, धार्मिक संगठन, पेशेवर लोगों के ट्रस्ट.’’ विश्व बैंक सिविल सोसाइटी शब्द का प्रयोग एनजीओ के स्थान पर करता है जिन्हें अपनी योजनाओं में शामिल करने के लिए वह 70 के दशक से ही प्रयासरत रहा है और 1990 के बाद उसने इस प्रयास को तेज किया है. उसका मानना है कि “वैश्वीकरण की प्रक्रिया तथा लोकतान्त्रिक शासन, संचार माध्यम और आर्थिक एकीकरण के विस्तृत होने की सहायता से पिछले दशक में विश्व स्तर पर सिविल सोसाइटी के आकार, कार्य क्षेत्र और क्षमता में नाटकीय विस्तार हुआ है. अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की वार्षिकी के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ की संख्या 1990 में 6000 से बढ़कर 2006 में 50,000 हो गयी. सिविल सोसाइटी संगठन आज वैश्विक विकास सहायता कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण खिलाड़ी हो चुके हैं. ओईसीडी का अनुमान है कि 2006 में इन संगठनों ने 15 अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध करने में सहयोग किया. विश्व बैंक के मुताबिक इन संगठनों ने दुनिया भर में अपने विभिन्न हिमायती अभियानों (एडवोकेसी कैम्पेन) के दौरान हजारों समर्थकों को गोलबंद किया. ‘वैश्विक सिविल सोसाइटी की अनुगूँज’ की ताजा अभिव्यक्ति विश्व सामाजिक मंच (डब्लूएसएफ) है जिसका वार्षिक आयोजन 2001 से विभिन्न महाद्वीपों में किया जा रहा है और जिसने वैश्विक विकास के मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए अपने हजारों कार्यकर्ताओं को एक साथ ला खड़ा किया. दूसरा उदाहरण ‘गरीबी के खिलाफ कार्रवाई का वैश्विक आह्वान’ (जीसीएपी) के तहत गरीब देशों की कर्ज माफ़ी और ज्यादा बड़ी सहायता की हिमायत करने के लिए चलाया गया अभियान है I 2008 में दुनिया भर के शहरों में आयोजित कार्यक्रमों में 1.6 करोड़ नागरिकों ने भाग लिया.’’ भ्रष्टाचार के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान भी विश्व बैंक की कार्यसूची में शामिल है. 1990 में बर्लिन की दीवार गिराए जाने और रूसी खेमे के विघटन के साथ विश्व शक्ति संतुलन में भरी बदलाव आया. अमेरिका के नेतृत्व में ‘वाशिंगटन आम सहमति’ के आधार पर पूरी दुनिया में नवउदारवादी, नग्न पूंजीवादी विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ बनाने का अभियान शुरू हुआ. पूरी दुनिया में पूंजीवादी शोषण के सम्बन्ध कायम किये गए. पूंजी की निर्मम लूट और मुनाफाखोरी के रास्ते से सारे अवरोध हटा दिए गए. पूंजीवाद के इस नए बर्बर दौर को एक मात्र विकल्प बताने और न्यायसंगत ठहराने के लिए विचारों की आंधी चलाई गयी, मीडिया द्वारा लोगों के मन-मस्तिष्क को पूंजीवाद के अनुरूप ढालने का चौतरफा और अधाधुंध प्रयास शुरू हुआ. इस अंधी लूट-खसोट का विनाशकारी प्रभाव होना तय था. इन चौतरफा दुष्परिणामों पर पर्दा डालने के लिए साम्राज्यवादी समूह ने तरह-तरह के उपाय किये. साथ ही, ‘सिविल सोसाइटी’ और एनजीओ को भरपूर भौतिक मदद देकर खड़ा किया. नवउदारवादी पूंजीवाद अपने अन्तर्निहित कारणों से जो नयी-नयी सामाजिक बीमारियां उत्पन्न करता है. उनके खिलाफ आन्दोलन चलाकर उनमें कुछ हद तक सुधार लाने का काम इन संगठनों को सौंपा गया. गरीबी, पर्यावरण विनाश, कर्ज संकट, तानाशाही और भुखमरी से लेकर वैश्वीकरण के घातक परिणामों तक, तरह-तरह के मुद्दों पर एनजीओ ने दुनिया भर में हिमायत अभियान (एड्वोकेसी कम्पेन) चलाये, जिनका उपरोक्त उद्धरण में विश्व बैंक ने जिक्र किया है. इस पूरी परिघटना का सार है-- राजनीतिक आन्दोलन की जगह सामाजिक आन्दोलन, वर्गों और तबकों के संगठनों की जगह एनजीओ के सामाजिक अभियान और सुधारवादी-कानूनवादी-वर्गेतर संगठन, आम तौर पर हर तरह की राजनीति का विरोध, पूंजीवाद का विकल्प प्रस्तुत करने की जगह उससे पल-प्रतिपल पैदा होने वाली समस्याओं को लेकर मुद्देवार, स्थानीय और तात्कालिक आन्दोलन. जुझारू संघर्ष की जगह जनहित याचिका, मोमबत्ती जुलूस, मानव श्रृंखला, भूख हड़ताल और गांधीगिरी जैसे नये ढंग के आन्दोलन, लोगों की व्यापक गोलबंदी और दीर्घकालिक निर्णायक लड़ाई की जगह भद्रजनों, मीडिया, एनजीओ कर्मियों द्वारा प्रतीकात्मक आन्दोलन, यानी रोग को मिटाने की जगह लक्षण को दबाना. साम्राज्यवादी समूह ने रूस और पूर्वी यूरोप में राजकीय पूंजीवाद की जगह नग्न पूंजीवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए गुलाबी, बैंगनी, नारंगी और चमेली क्रांतियों में सहयोग करने के लिए ‘नागरिक समाज’ और एनजीओ को एक रणनीति के रूप में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और फंडिंग एजेंसियों के जरिये उन्हें भरपूर धन मुहैया कराया गया था. अब तो यह नवउदारवाद का आजमाया हुआ राजनीतिक उपकरण बन गया है. 1990 के बाद दुनिया भर में एनजीओ परिघटना और उनकी संख्या में तेजी से विकास हुआ है. साम्राज्यवादी देशों में तो इसे अर्थव्यवस्था के तीसरे क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया है. सरकार द्वारा सामाजिक सेवाओं का निजीकरण करके उनसे हाँथ खीचने के बाद, जब निजी पूंजीपतियों ने शिक्षा-चिकित्सा जैसी सरकारी सेवाओं को मुनाफे का धंधा बनाकर गरीब जनता को उनसे वंचित किया तो अभावग्रस्त लोगों के लिए एनजीओ को मानवतावादी चेहरे के साथ मैदान में उतारा गया. इस परिघटना को आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने नागरिक समाज के लिए एक पैनल का गठन किया. विश्व बैंक ने भी इस दिशा में कई परियोजनाएं शुरू की और हर देश में एनजीओ और नागरिक समाज का भरपूर सहयोग लिया. भारत में 1991 में नवउदारवादी नीतियां लागू होने के बाद एनजीओ का तेजी से विस्तार हुआ है. मजदूर आन्दोलन की कमजोरी और बिखराव ने एनजीओ के लिए अनुकूल अवसर प्रदान किया. वामपंथ के खिलाफ पूंजीवादी मीडिया के विश्वव्यापी अधाधुंध प्रचार से उन्हें वैचारिक आधार मिला जिसने हर तरह के प्रतिगामी मूल्यों का महिमामंडन किया और मुक्त बाजारवाद को एक मात्र विकल्प के रूप में स्थापित किया. आज भारत में 15 लाख नागरिक समाज संगठन या एनजीओ हैं जिनमें 1.9 करोड़ स्वयंसेवकों को रोजगार मिला हुआ है. ये संगठन पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार और सहयोगी हैं और उसी के दायरे में काम करते हैं. इनका काम पूंजीवाद को दीर्घायु बनाने के लिए उसकी बुराइयों से लड़ना है. भ्रष्टाचार भी पूंजीवाद की ऐसी ही एक अन्तर्निहित बुराई है जिसके खिलाफ टीम अन्ना ने मुहिम छेड़ी है. पूंजीवादी लोकतंत्र के मौजूदा दौर में जब संसद और विधान सभाओं में नीतिगत मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष जैसा कोई बंटवारा रह नहीं गया है और नवउदारवादी नीतियों के चलते जनता का आक्रोश सभी हदें पर करता जा रहा है, तब नागरिक समाज संगठनों को सुरक्षा कवच के रूप में सामने लाया जा रहा है. जन भागीदारी, समावेशी विकास, जनता की जागरूकता, सरकार की जवाबदेही, विकास में सहभागिता, प्रशासनिक सुधार जैसे मनभावन नारों का निहितार्थ यही है. पूंजीवादी लोकतंत्र को कारगार बनाने और जनाक्रोश को नियंत्रित रखने के लिए नागरिक समाज के आन्दोलन और प्रतिपक्ष की छद्म रचना जरुरी है. नागरिक समाज के कुछ अभिजात लोग किसी मुद्दे पर इकठ्ठा होते हैं और किसी लोकतांतिक प्रक्रिया के बिना ही वे राजनीतिक शक्ति सम्पन्न, स्वयंभू जन प्रतिनिधि और ‘जनता की आवाज’ बन जाते हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं उन्हें पुरुस्कृत करके जल पुरुष, थल पुरुष या नभ पुरुष बनाती हैं, अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियां उनका खर्चा उठाती हैं, मीडिया उनके लिए सहमति गढ़ता है, उन्हें स्थापित करता है और सरकार उन्हें स्वीकार कर लेती है. यह जन आंदोलनों के भावी तूफानों से बचने की तमाम तैयारियों में से एक है. विश्व बैंक के एक अधिकारी ने पिछले दिनों अपने एक साक्षात्कार में नागरिक संगठनों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था कि “मंदी का सामना कर रही वर्त्तमान विश्व अर्थव्यवस्था और अरब देशों में उथल-पुथल को देखते हुए विभिन्न देशों में ऐसे सगठनों को अपनी ओर आकर्षित करना जरुरी है. विश्व बैंक ने इसके लिए एक मुक्कमिल योजना तैयार की है जिसमें विभिन्न स्तरों पर संपर्क, सम्मलेन, शिक्षण-प्रशिक्षण और वित्तपोषण सब शामिल है.” भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान भी विश्व बैंक की एक परियोजना है जिसमें हेरिटेज फाउन्डेशन, फोर्ड फाउन्डेशन, ट्रांसपिरेन्सी इंटरनेशनल सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और फंडिंग एजेंसियां सहयोगी भूमिका निभा रही हैं. कैसी विडंबना है कि तीसरी दुनिया के शासकों के साथ मिली-भगत करके उन्हें भ्रष्ट बनाने के लिए जिम्मेदार अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी संस्थाएं ही भद्रलोक को साथ लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रही हैं. कुछ साल पहले विश्व बैंक से इस्तीफा देने वाले उसके एक उच्च अधिकारी डेविसन एल. बुधु ने एक किताब लिखी थी- एनफ इज एनफ जिसमें उसने विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाले अभियानों का कच्चा चिट्ठा खोला था. उसका कहना था कि हमारे हाथ से इतने अपराध हुए हैं कि उनके खून के धब्बे सात समुन्दर के पानी से भी नहीं धुल पाएंगे. अन्ना टीम में शामिल सभी भद्रलोक किसी न किसी एनजीओ का संचालन करते हैं. वे इस नवउदारवादी पूँजीवादी व्यवस्था के समर्थक हैं तथा उसे कारगर और बेहतर बनाने के लिए उसकी बुराइयों को दूर करना चाहते हैं. जनता से पूरी तरह कटा हुआ यह भद्रलोक यदि चाहे भी तो किसी सही जनान्दोलन का नेतृत्व करने, राज्य का दमन झेलने और कष्ट सहने में असमर्थ है. कानून-व्यवस्था के दायरे में रहकर यह प्रतीकात्मक, प्रायोजित आन्दोलन या जनहित याचिका दायर कर सकता है. इससे आगे जाना इस समूह के लिए सम्भव नहीं है.
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के अनुयायी कौन और क्यों?
अन्ना टीम की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शहरी मध्यम वर्ग ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. इस आन्दोलन का समर्थक और जनाधार यही वर्ग था. समाज का मुखर तबका होने के कारण यह किसी मुद्दे पर राय बनाने में आम तौर पर सबसे प्रभावी भूमिका निभाता है. मीडियाकर्मी जब भी किसी विचार पर मत संग्रह करते हैं या पैनल डिसकशन आयोजित करते हैं तो वे ‘सिविल सोसाइटी’ यानी मध्यम वर्ग की ही राय लेते हैं, जैसे- एनजीओ चलाने वाले, पत्रकार, खिलाड़ी, अभिनेता, विभिन्न पेशों से जुड़े लोग, प्रतिष्ठित संस्थानों के छात्र, बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता और अन्य लोग. मध्यम वर्ग के अधिकांश लोग सक्रिय राजनीति से दूर रहना ही पसंद करते हैं. ‘नो पोलिटिक्स प्लीज’, ‘विचार और जूते दरवाजे पर उतार कर आयें’ और ‘पोलिटिक्स इज लास्ट रिफ्यूज ऑफ स्काउनड्रेल्स’ उनके प्रिय नारे हैं. इसीलिए अन्ना के मीडिया प्रेरित आन्दोलन में मध्यम वर्ग की भारी पैमाने पर हिस्सेदारी ने बहुतेरे लोगों को चकित, भ्रमित और भाव विह्वल किया. इसे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक महत्व की घटना बताया गया जो काफी हद तक सही भी है. इस मुहिम में मध्यम वर्ग की अति सक्रियता को पिछले बीस वर्षों के दौरान उसके आकार, सामाजिक, आर्थिक स्थिति और चारित्रिक बदलाव से अलग करके नहीं समझा जा सकता है. 1991 में नवउदारवादी आर्थिक नीति लागू होने के बाद से ही आर्थिक विमर्श में मध्यम वर्ग को काफी महत्व दिया जाने लगा था. विदेशी निवेशकों को रिझाने के लिए सरकार और मीडिया ने मध्यम वर्ग की संख्या को बढ़ा-चढ़ा कर बताना शुरू किया था. सही संख्या का पता लगाने के लिए कई देशी-विदेशी संस्थाओं ने सर्वेक्षण किये और एक ही साथ 5 करोड़ से लेकर 30 करोड़ तक के आँकडे सामने आये. इन प्रयासों के पीछे क्रय-शक्ति और उपभोग-क्षमता का पता लगाना था ताकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल और सेवाओं के उपभोक्ताओं का सही-सही अंदाजा लगा सकें. यह काफी कठिन काम था क्योंकि उस दौरान सीमित आमदनी के चलते मध्यम वर्ग के जीवन स्तर और उपभोग पैटर्न में काफी भिन्नता थी.I 25 साल पहले वास्तविक जीवन में और फिल्मों में भी ठेठ मध्यम वर्गीय चरित्र (अमोल पालेकर या संजीव कुमार) का जीवनस्तर आज की तुलना में भला क्या था? कितने मध्यम वर्गीय परिवार वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव ओवन, कार और होली डे पैकेज का उपभोग करते थे? लेकिन आज स्थिति भिन्न है. मध्यम वर्ग की संख्या में वृद्धि और उनकी खुशहाली के लिए शासक वर्ग अपनी पीठ थपथपाते हैं और इसे अपनी नीतियों की सफलता का प्रमाण बताते हैं तो यह ठीक ही है. विजय सुपर स्कूटर से लेकर नए मॉडल की गाड़ियों तक, पलस्तर झड़ते किराये के मकान से आलीशान अपार्टमेंट के मालिकाने तक तथा सरकारी स्कूलों-अस्पतालों से संपन्न पांच सितारा स्कूलों-अस्पतालों तक की यात्रा जितनी तेजी से पूरी हुई, उसके बारे में 1990 से पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. बाजार अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाने के लिए थोड़ी संख्या वाले पहले से मौजूद मध्यम वर्ग की तादाद और आमदनी बढ़ाना जरूरी था. साथ ही अगर शासकों ने अपनी नीतियों के समर्थक और सहयोगी तथा अपने जनाधार का विस्तार नहीं किया होता तो समाज का मुखर तबका होने के नाते मध्यम वर्ग इन नीतियों के खिलाफ निरंतर जारी जनांदोलनों को तेज करने में भूमिका निभाता रहता. मध्यम वर्ग के विभिन्न हिस्सों ने ‘90 के दशक के पूर्वार्ध में नयी आर्थिक नीतियों का प्रबल विरोध किया था, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी विभागों के कर्मचारी, व्यापारी, शिक्षक, छात्र तथा पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और पेशेवरों का एक हिस्सा शामिल था. आज मध्यम वर्ग में विरोध का वह स्वर कहीं दूर-दूर तक सुनाई नहीं पड़ता है. उसकी जगह अब वहाँ से ‘शाइनिंग इंडिया’, ’अतुल्य भारत’, ‘मेरा भारत महान’, ‘आई लव माई इंडिया’, ‘जय हो’ की अनुगूँज आ रही है. पिछले बीस वर्षों के दौरान देश कि कुल आय का बंटवारा इस तरह पुनर्गठित किया गया कि शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच, वास्तविक उत्पादन और उस पर निर्भर सेवा क्षेत्र के बीच की तथा गाँव और शहर के बीच खाई लगातार चौड़ी होती गयी. पांचवें और छठे वेतन आयोग ने केंद्र, राज्य और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों के वेतन भत्तों में भारी वृद्धि की तथा न्यूनतम तथा अधिकतम वेतनमान में भारी अंतर पैदा किया. निजी क्षेत्र के प्रबंधकों और मानसिक श्रम करने वालों के वेतन में तो काफी तेजी से वृद्धि हुई, लेकिन वहाँ प्रत्यक्ष उत्पादन और शारीरिक श्रम करने वालों की न्यूनतम मजदूरी भी तय नहीं है. इन सभी उपायों से ऊँची आय और क्रय-शक्ति वाला माध्यम वर्ग का एक छोटा तबका पैदा हुआ जबकि बड़ी संख्या में लोगों को बाजार से बहिष्कृत कर दिया गया. यह यात्रा उतनी ही विकृतिपूर्ण और असंगत रही है जितनी वास्तविक उत्पादन वाले कृषि और उद्योग की कीमत पर सेवा क्षेत्र का असमान्य और गैर अनुपातिक विस्तार. निश्चय ही यह सहज स्वाभाविक प्रक्रिया में नहीं बल्कि सरकार के सचेत प्रयास और उदारीकरण-निजीकरण की उन्हीं नीतियों के चलते घटित हुआ है जिनके कारण देश की बहुसंख्य मेहनतकश जनता आज तबाही की चपेट में आकर कराह रही है. उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के चलते सेवा क्षेत्र- आईटी, कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, रियल इस्टेट, फाइनांस, शेयर बाजार, बीपीओ, केपीओ तथा निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए जिससे आबादी के एक छोटे से हिस्से की आय में काफी वृद्धि हुई. देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की घुसपैठ से भी शहरों में खास तरह के रोजगार और मध्यम वर्ग कि एक नयी जमात तैयार हुई. इस तरह निजीकरण, बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग की आमदनी और तादाद में इजाफा हुआ. इसका ऊपरी हिस्सा आम तौर पर इन नीतियों का प्रबल समर्थक है और आर्थिक नवउपनिवेशवादी मौजूदा ढांचे का सामाजिक अवलंब है. भारत में नवउदारवादी नीतियों के प्रस्तोता और प्रवर्तक पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक नुमाइंदे थे लेकिन उच्च मध्यम वर्ग भी शुरू से ही इसका प्रबल समर्थक था. इस वर्ग का सपना था कि वैश्वीकरण-उदारीकरण भारत को विकसित देशों कि क़तार में ला खड़ा करेगा, भारत को महाशक्ति बना देगा, यहाँ की हर चीज विश्वस्तरीय हो जायेगी और भारत स्वर्ग बन जायेगा. भारत को महाशक्ति बनाने में यह वर्ग कैसे अपना योगदान कर सकता है, इसकी झलक स्वदेश और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में दिखाई गयी है. लेकिन उच्च मध्यम वर्ग जब वर्तमान यथार्थ पर निगाह डालता है तो उसे नवउदारवादी सपना साकार होते नहीं दीखता. उन नीतियों का अन्धभक्त होने के कारण वह उनमें कोई कमी नहीं देखता. उसे लगता है कि सारी बुराई भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों, यानी सरकार में है जो अपना काम ठीक से नहीं करती. ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’, आरक्षण, गरीबों के लिए सस्ता अनाज, रोजगार गारंटी जैसी नीतियों को वह नेताओं की वोट बैंक की राजनीति और नवउदारवादी/बाजारवादी नीतियों के रास्ते का रोड़ा मानकर आलोचना करता है. भ्रष्टाचार को भी वह ऐसी ही बाधा मानता है जो कुछ भ्रष्ट और स्वार्थी नेताओं द्वारा खड़ी की गयी है. उसका मानना है कि भ्रष्टाचार ही सारी समस्याओं की जड़ है जिसे दूर करना कोई मुश्किल काम नहीं है. इसका एक ही सरल उपाय है कि कठोर कानून बनाओ. उधर सरकार की मज़बूरी यह है कि उसे वोट लेने के लिए कुछ लोक-लुभावन कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं व्यवस्था को चलाने और चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार को बनाए रखना होता है जबकि भद्रलोक के सामने ऐसी कोई मज़बूरी नहीं. अन्ना टीम के आन्दोलन का आधार यही उच्च मध्यम वर्ग है. ऊपर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर यह उसी थाली में छेद कर रहा है जिसमें खाता है. लेकिन वास्तव में यह मुहिम शासक वर्गों के विरुद्ध नहीं बल्कि भ्रष्टाचार मिटा कर नवउदारवादी बाजार अर्थव्यवस्था को दीर्घायु बनाने के लिए है. अन्ना आन्दोलन ने यह साबित कर दिया है कि सरकार और भद्रलोक के बीच का टकराव मित्रवत है. यह आन्दोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं, मूल ढांचे के खिलाफ नहीं. भद्रलोक इस भ्रष्टतंत्र को समाप्त करने की बातें नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त करके उसे और बेहतर बनाने में मदद करना चाहता है. वह इस सड़ते, बदबू फैलाते लोकतंत्र की सफाई करना चाहता है ताकि देशी-विदेशी पूंजीपति कारगर तरीके अपना कर लूटतंत्र जारी रखें और भद्रलोक के स्वर्ग का वैभव बढ़ाते रहें.
अन्ना आंदोलन और मुख्यधारा की मीडिया
अन्ना टीम के जनलोकपाल आन्दोलन में मीडिया की भूमिका को लेकर भी काफी सवाल उठे. इसमें संदेह नहीं कि दिन-रात सीधा प्रसारण के लिए अपने क्रेन और क्रू के साथ अगर टीवी चैनल सक्रिय नहीं होते, तो इस आन्दोलन में स्वतःस्फूर्त तरीके से इतने लोग शामिल नहीं होते. जन आंदोलनों के प्रति मीडिया के परंपरागत रवैये को देखते हुए यह सक्रियता भले ही अचम्भे में डालने वाली लगती हो लेकिन आन्दोलन के चरित्र और मीडिया की प्राथमिकता पर गौर करें तो उसकी भूमिका अस्वाभाविक नहीं लगेगी. अपने एक अध्ययन में पत्रकार विपुल मुदगल (सीएसडीएस) ने सर्वाधिक प्रसार वाले अंग्रेजी और हिंदी के तीन-तीन अख़बारों के 48 अंकों का विश्लेषण किया. इन अख़बारों ने अपने सम्पादकीय पन्ने का केवल 2 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में रहने वाली दो तिहाई जनता की समस्यों पर खर्च किया. इन अख़बारों में छपने वाली 100 से 200 सामग्री में से औसतन तीन सामग्री ग्रामीण मुद्दों पर थी. इनमें भी अधिकांश सामग्री अपराध, हिंसा और दुर्घटनाओं से सम्बंधित थी. समाचारों के चुनाव के मामलों में हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों के चरित्र में कोई खास फर्क नहीं पाया था, जबकि हिंदी अख़बारों के अधिकांश पाठक ग्रामीण क्षेत्र के लोग होते हैं. इन अख़बारों का झुकाव उपभोक्ता केंद्रित होता है और उनकी निगाह ऊपर उठते पढ़े-लिखे शहरी उपभोक्ताओं पर होती है जिनकी दुनिया में गरीबी और पिछड़ेपन के लिए कोई जगह नहीं होती. इस मामले में टीवी चैनलों का रिकॉर्ड तो और भी खराब है. वहाँ तो सब कुछ नवधनाड्य उपभोक्ता वर्ग के लोगों के मनोरंजन के लिए है. मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है. नवउदारवादी दौर में लोकतंत्र के अन्य स्तंभों की तरह मीडिया भी बुरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त है. नीरा राडिया प्रकरण ने पूंजीपति, नेता और मीडिया के अपवित्र गठबंधन को उजागर किया. इसके पहले नोट के बदले समाचार लिखने का मामला देश भर में चर्चा का विषय बना था. पहले भी सरकार और पूंजीपतियों से प्राप्त होने वाले विज्ञापन और सुविधाओं से मीडिया का चरित्र प्रभावित होता था. लेकिन मौजूदा दौर में देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा भारी पूंजी निवेश ने मीडिया को विराट पूंजी प्रतिष्ठानों में बदल दिया. इसकी प्राथमिकता पूंजीवाद की हिफाजत करना और साथ ही अपनी पूंजी का विस्तार करना रह गया है. ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ होने का मुखौटा भी अब नहीं रहा. उसने अपने आप को जनता से पूरी तरह काट लिया है. ख्यातिलब्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने इग्नू में एक व्याख्यान देते हुए मीडिया के इस बदले चरित्र को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया – ‘‘“आज अख़बारों में कोई श्रमिक संवाददाता नहीं है, आवास और प्राथमिक शिक्षा का कोई संवाददाता नहीं है. इस देश की 70 प्रतिशत आबादी से हम साफ़ कह रहे हैं कि हमें उनसे कोई लेना-देना नहीं है.’’ उनका कहना था कि ““ निजी सुलहनामों के खंडहर पर जरखरीद खबरें उठ खड़ी हुई हैं. निजी सुलहनामों ने मीडिया कंपनियों को अपनी कंपनियों में शेयर दिए थे जो 2008-09 के शेयर बाजार के डूबने के साथ ही रद्दी में बदल गए. जरखरीद ख़बरों ने इन भ्रष्ट कंपनियों और राजनेताओं को विधानसभा और आम चुनावों के दौरान इस लायक बनाया कि वे मीडिया के साथ बेनामी लेन-देन कर सकें.’’ मीडिया के चरित्र पर इस संक्षिप्त चर्चा की पृष्ठभूमि में यह समझना कठिन नहीं कि अन्ना के जन लोकपाल आन्दोलन के दौरान मीडिया ने इतनी सक्रियता क्यों दिखाई और क्यों सातों दिन चौबीस घंटे हर छोटी-छोटी बातों का भी ग्राफिक चित्रण करती रही. यह अकारण नहीं कि प्रधानमंत्री को जन लोकपाल बिल के दायरे में लाने के लिए बजिद टीम अन्ना मीडिया को उससे अछूता रखने का हामी है. मीडिया के मालिकों, पत्रकारों, विज्ञापन दाताओं और लक्षित दर्शकों-पाठकों तथा अन्ना आंदोलन के नेताओं-समर्थकों के बीच अद्भुत वैचारिक और वर्गीय एकरूपता है. दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुस्लिम संगठनों का यह आरोप बिलकुल सही है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण हिंदू मानसिकता के लोग हावी हैं. मीडिया पर भी इसी तबके का वर्चस्व है जो काफी हद तक मीडिया की प्राथमिकता और पक्षधरता तय करता है. अन्ना आन्दोलन के समानांतर उसी समय दिल्ली में दलित, पिछडों, अल्पसंख्यकों की एक रैली हुई थी जिसे मीडिया ने तरजीह नहीं दी. इससे पहले आरक्षण विरोधी आन्दोलन के समर्थन में भी मीडिया ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था. दिल्ली में मजदूरों-किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों की रैलियों और प्रदर्शनों के प्रति मीडिया का रुख या तो अनदेखी करने का या उसे बदनाम करने का ही रहा है. इसी वर्ष फरवरी में देश की 9 प्रमुख ट्रेड यूनियनों की रैली के प्रति मीडिया ने ऐसा ही रवैया अपनाया. उसने आन्दोलन को अपेक्षित स्थान नहीं दिया और कहीं चर्चा भी की तो इस रूप में कि इसके चलते दिल्ली में यातायात को कितना व्यवधान पहुंचा और दिल्लीवासियों को कितनी परेशानी झेलनी पड़ी. मीडिया का मुख्य उद्देश्य अब भव्य आयोजनों की दिलचस्प और ब्योरेवार रिपोर्टिंग करके लोगों को रिझाना और अपनी टीआरपी बढ़ाना ही रह गया है. अन्ना आन्दोलन की रिपोर्टिंग के साथ भी ऐसा ही हुआ. मीडिया ने रोचक और चटपटे ब्योरे, उत्सुकता और सनसनी जगाने वाले तथ्यों तथा उत्सव, उमंग और छिछली भावुकता वाले दृश्यों को खूब बढ़-चढ़ कर प्रस्तुत किया. लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को गंभीरता से सामने लाने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, लोकपाल बिल के अलग-अलग मसौदों की तुलनात्मक रूप से व्याख्या करने, लोकपाल के लाभ-हानि पर विभिन्न पक्षों की राय बताने, कुल मिलाकर दर्शकों-पाठकों को शिक्षित करने की जहमत मोल नहीं ली. इसके बजाय किसने अपने नवजात बच्चे का नाम अन्ना रखा, कौन नंगे पैर चलकर अन्ना के चरण छूने पहुंचा, किसने कितने आकर्षक गोदने-टैटू रचाए, लोगों में कितना उमंग था, जैसी बातों पर ही ध्यान केंद्रित किया, बीच-बीच में उच्च मध्यवर्गीय वस्तुओं और सेवाओं का विज्ञापन भी चलता रहा. आन्दोलन को तेज करने और उसका टेम्पो ऊँचा रखने और अन्ना को शोहरत दिलाने में मीडिया की भूमिका असंधिग्ध है. अप्रैल में आन्दोलन की घोषणा करने से पहले अन्ना के नाम के साथ गूगल सर्च में अन्ना कोर्निकोवा का सन्दर्भ आता था और अन्ना हजारे के नाम पर केवल चार या पांच परिणाम दिखते थे, जबकि प्रधानमंत्री द्वारा ड्राफ्टिंग कमिटी में उन्हें शामिल किये जाने के बाद उनके हजारों संदर्भ आने लगे. 28 अगस्त को एनडीटीवी ने घोषणा की कि यह संख्या 2 करोड़ 90 लाख से भी ज्यादा हो गयी है और भारत के वेब जगत में उनकी लोकप्रियता लेडी गागा से तो कम, लेकिन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अधिक है. अन्ना हजारे और उनकी लोकपाल मुहिम की छवि बनाने के अलावा मीडिया ने 13 दिनों के इस आन्दोलन के दौरान यह प्रयोग भी सफलतापूर्वक आजमाया कि शासक वर्गों द्वारा किस हद तक मीडिया का इस्तेमाल किया जा सकता है. नोम चोम्श्की ने तो मीडिया द्वारा सहमति गढ़े जाने का ही विश्लेषण किया था. आज मीडिया उससे आगे बढ़कर ‘असहमति गढ़ने’ में भी सफल रहा है. यानि वह मन चाहे मुद्दे गढ़ सकता है और उन्हें लोगों के मष्तिस्क में रोप कर उन्हें उद्वेलित कर सकता है तथा उस उद्वेलित समूह को मनचाहे तरीके से नियंत्रित और संचालित कर सकता है. इस घटना चक्र के दौरान इसे आजमाया जा चुका है. निश्चय ही यह अन्य सभी बातों से कहीं अधिक गम्भीर और विचारणीय मामला है.
सिविल सोसायटी और एनजीओ के आर्थिक स्रोत
अन्ना के जन लोकपाल का नेतृत्व करने वाले सिविल सोसायटी के लोग किसी न किसी एनजीओ से जुड़े हुए हैं. आम तौर पर गैर-सरकारी संगठनों का काम ग़रीबों की सहायता, जिन जिम्मेदारियों से सरकार ने हाथ खींच लिया है उन कल्याणकारी कार्यक्रमों का संचालन और सरकारी योजनाओं को लागू करवाने में मदद करना होता है. लेकिन आज राजनीतिक गतिविधियों में भी वे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे हैं. विश्व सामाजिक मंच के माध्यम से वैश्वीकरण और विश्व व्यापार संगठन का विरोध इसका एक प्रमुख उदाहरण है. अन्ना का आंदोलन भी इसी श्रेणी में आता है.राजनीतिक और आंदोलनात्मक कार्रवाइयों में लगे किसी भी संगठन के लिए आर्थिक स्रोत का सवाल एक नीतिगत सवाल है. हमारे समाज में अलग-अलग वर्गों की पार्टियाँ और संगठन हैं. जो संगठन जिनके लिए काम करते हैं, उनसे आर्थिक सहयोग लेते हैं. किसी संगठन के मददगार उसे आर्थिक सहयोग तभी देती हैं जब उसके उद्देश्य और कार्यक्रम उसके हित में हों. यदि ऐसा न हो तो वे उल्टे उसका हर तरह से विरोध करेंगे. संगठन भी अपने आर्थिक सहयोगियों के प्रति जवाबदेह होते हैं. कहावत है जिसका खायेंगे, उसका गायेंगे. चुनाव लड़ने वाली पार्टियाँ पूंजीपतियों से चन्दा लेती हैं और उनके लिए काम करती हैं. यह एक खुली सच्चाई है. इसी तरह ट्रेड यूनियन अपने सदस्यों और समर्थकों से चंदा लेते हैं. सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक संगठन भी अपने उदेश्यों से सहमति रखने वाले समर्थकों के आर्थिक सहयोग से संचालित होते हैं. संगठनों के सहयोगी उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और यदि संतुष्ट न हों तो वे संगठन को सहयोग देना बंद कर देते हैं. यही बात एनजीओ पर भी लागू होती है. पैसा देने वाली संस्थाओं के स्वार्थ और गैर-सरकारी संगठनों के उद्देश्य और कार्यक्रम में मेल होना जरूरी है. विश्व बैंक, फोर्ड फाउंडेशन (जिसके अमरीकी गुप्तचर संस्था सीआईए से सम्बन्ध जगजाहिर हैं) या औक्सफेम जैसी संस्थाएं जिन संगठनों को पैसा देती हैं उन्हें अपनी ओर से कार्यक्रम भी देती हैं, जैसे- विश्व बैंक द्वारा दुनिया भर में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की योजना. यही नहीं, वे उन संगठनों की पारदर्शिता और जवाबदेही का भी लेखा-जोखा लेती हैं. वर्ग विभाजित समाज में वर्गेतर बातें करना, सबके हित कि बात करना केवल लोगों को बेवकूफ बनाने का जरिया है. हर वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखता है. यहाँ तक कि तटस्थता और सर्वजन हिताय की आड़ में राज्य भी कुछ वर्गों की कीमत पर किन्हीं दूसरे वर्गों के स्वार्थों की पूर्ति करता है और इस पर पर्दा डालने के लिए उसके कर्ताधर्ता झूठ का अम्बार खड़ा करते रहते हैं. अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल और अरुणा रॉय आदि ने सूचना के अधिकार की लड़ाई लड़ी. सिविल सोसायटी के शीर्षस्थ लोगों ने ‘अहिंसक’ प्रयासों से कानून बनवाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली. लेकिन वर्ग समाज में शक्तिशाली, सम्पत्तिवान लोग अपना नुकसान होने पर हिंसा का सहारा लेना बंद नहीं करेंगे. अब तक सूचना अधिकार से जुड़े दो दर्जन एनजीओ कार्यकर्ताओं कि हत्या हो चुकी है. 16 अगस्त को अन्ना मुहिम के पहले ही दिन भोपाल में सूचना अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़ी एक महिला कार्यकर्त्ता सेहला मसूद की दिन दहाड़े हत्या हुई. अन्ना टीम के अहिंसक आंदोलन के शोर-सराबे में जघन्य हिंसा की यह घटना गुम हो गयी. सच तो यह है कि इस कानून से सबसे अधिक लाभ देशी-विदेशी पूँजीपतियों को हुआ है जो घर बैठे इन्टरनेट के जरिये सही समय पर वे सभी सरकारी सूचनायें प्राप्त कर लेते हैं, जिनके लिए पहले उन्हें महीनों चक्कर काटना पड़ता था. लेकिन ऐसी धारणा फैलायी जाती है, जैसे कि सूचना अधिकार कानून आम जनता की भलाई के लिए है, ताकि वर्ग-भेद पर पर्दा पड़ा रहे. क्या लोकपाल कानून इस वर्ग-भेद से ऊपर काम कर पायेगा? आर्थिक-सामाजिक विषमता के रहते क्या यह सम्भव है?एनजीओ परिघटना का उद्भव सहज स्वाभाविक रूप से या खुद ब खुद नहीं हुआ है. इसके तार साम्राज्यवाद से जुड़े हैं. साम्राज्यवादी संस्थाएं सचेत रूप से इन्हें बढ़ावा दे रही हैं. विश्व बैंक की विकास रिपोर्ट 2000-2001 में बताया गया है कि 1999 में विश्व बैंक द्वारा स्वीकृत योजनाओं में से 70 प्रतिशत एनजीओ और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों की भागीदारी से पूरी हुई. इनमें से केवल एक प्रोजेक्ट 4500 करोड़ रुपये का था जो नौ देशों में एनजीओ और सिविल सोसायटी के मार्फ़त लागू करवाया गया. यह कोई खैरात नहीं है, क्योंकि इस नवउदारवादी दौर में साम्राज्यवादी संस्थाएं और विदेशी फंडिंग एजेन्सियां जितना धन खर्च कर रही, बहुराष्ट्रीय हैं कम्पनियां उससे कई गुना अधिक लूट रही हैं. निजीकरण के चलते सरकार ने जिन सामाजिक सेवाओं की जिम्मेदारी त्याग दी, उन्हें पूरा करने के लिए एनजीओ अब निजी ठेकेदारों की भूमिका में उतर आये हैं. इसके चलते सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है और जनता का सारा ध्यान एनजीओ पर टिक जाता है, वह भी अपने अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि दानी की कृपा-दृष्टि पाने के लिए. जो जनता का अधिकार है वह उसे दान में आधा-अधूरा दिया जाता है. एनजीओ के जरिये 2000-2001 में 970 करोड़ रूपये का विदेशी फंड सार्वजानिक सेवाओं की मद में खर्च किया गया जो सरकार की जिम्मेदारी है साथ ही निजी पूंजीपति अब इन सेवाओं का व्यापार करके भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं. विश्व बैंक और मुद्रा कोष के इशारे पर ही सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं की मद में बजट कटौती की थी, जिसके कारण गरीबी, भुखमरी और महामारी तेजी से बढ़ी. 1985-90 में राज्य और केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण विकास पर सकल घरेलू उत्पाद का 14.5 प्रतिशत खर्च किया गया था जो 2000-2001 में घटकर 5.9 प्रतिशत रह गया. यदि सरकार पहले के बराबर खर्च करती तो यह राशि वर्तमान बजट से 2,30,000 करोड़ रूपए अधिक होती, जबकि एनजीओ के मार्फत इसका हजारवां हिस्सा खर्च करके सरकार निश्चिन्त है. समझना कठिन नहीं कि एनजीओ वास्तव में किसकी सेवा करते हैं. एनजीओ का कार्यक्षेत्र अब केवल लोक कल्याण कार्यक्रम तक ही सीमित नहीं है. वे स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में भी एक खास तरह का हस्तक्षेप करते हैं जिसका मकसद जाहिरा तौर पर अपने दानदाताओं के स्वार्थों की पूर्ति करना होता है. इसके लिए वे स्थानीय लोगों के बीच से अपने कर्मचारियों की भर्ती करते हैं. हालाँकि उन्हें अपेक्षतया बहुत कम वेतन दिया जाता है लेकिन बेरोजगारी की हालत को देखते हुए यह भी उनके लिए बड़ी चीज होती है. उनके एहसान से दबे ऐसे ही लोग स्थानीय स्तर पर उनका राजनीतिक प्रभाव ज़माने में मदद करते हैं और जलसे-जुलूसों में भीड़ जुटाते हैं. जिन मुद्दों पर रेडिकल बदलाव के लिए जुझारू आन्दोलन होने की सम्भावना होती है, व्यवस्थापोषक एनजीओ उन पर सुधारवादी, समझौतावादी और नरमपंथी मुहिम छेड़ देते हैं. यथास्थितिवादी राजनीतिक पार्टियाँ और मीडिया उनके इस काम में भरपूर मदद करते हैं. विश्व बैंक ने एनजीओ को बढ़ावा देने के पीछे अपना राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट करते हुए विकास रिपोर्ट 2000-2001 में कहा था कि ““औपचारिक या अनौपचारिक तरीकों से सभी राजनीतिक विरोधियों को एक ही मंच पर लाकर तथा उनकी ऊर्जा को राजनीतिक प्रक्रियाओं की ओर मोड़कर सामाजिक तनाव और बंटवारों को काफी शांत किया जा सकता है, बजाय इसके कि उस आक्रोश का शमन करने के लिए टकराव को ही एकमात्र रास्ता मान लिया जाय.” यही कारण है कि जन आंदोलनों के इलाकों में ही एनजीओ का फैलाव ज्यादा है. पारम्परिक जनसंगठन और जनआंदोलन अपने खुद के आर्थिक स्रोतों के ऊपर निर्भर होते हैं और उनके नेता और कार्यकर्ता आम जनता के बीच से आने वाले जनसामान्य होते हैं, जो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह होता है. ऐसे कार्यकर्ताओं की जगह एनजीओ के जिन विशेषज्ञों और प्रशिक्षित (सोशल वर्क और मैनेजमेंट की डिग्री लिए) स्वयंसेवकों को उतारा गया है वे अपने अधिकारियों और दानदाताओं के द्वारा ऊपर से नियंत्रित होते हैं. उनके लिए जनता की सहमति या असहमति कोई मायने नहीं रखती. वे मुलाजिम की तरह काम करते हैं और उनका किसी भी समय तबादला हो सकता है. उनके आर्थिक स्रोत भी जनता से नहीं बल्कि बाहर से आते हैं और वे अपने दान दाताओं के प्रति ही जवाबदेह होते हैं. जनता के साथ उनका सम्बन्ध पानी और मछली की तरह नहीं, बल्कि कल्याण करने के लिए आये हुए महापुरुष जैसा होता है. उनकी परनिर्भरता का आलम यह है कि जिस दिन सरकारी-गैर-सरकारी, देशी-विदेशी फंडिंग बंद हो जाए उसी दिन सारे एनजीओ ध्वस्त हो जायेंगे. मजदूर आंदोलन में ठहराव, बिखराव और भटकावों के कारण जनता के जुझारू जनसंगठनों की परम्परा और निरंतरता बाधित हुई है. इससे एनजीओ के लिए खुला मैदान मिल गया. अब कई एनजीओ आदीवासियों, दलितों, महिलाओं और खेत मजदूरों का संगठन, मानवाधिकार संगठन और सांस्कृतिक संगठन चलाते हैं, सबसे पहले आगे बढ़कर वे ही किसी राजनीतिक सामाजिक मुद्दे को भी उठाते हैं. देश की राजनीतिक पार्टियाँ भी इसी संस्कृति में ढल चुकी है. उनका नेतृत्व जनता से पूरी तरह कटा हुआ है और वे जनता के ऊपर सवारी गाँठने वाले लाटसाहब में बदल गए हैं. पक्ष-विपक्ष की राजनीतिक पार्टियों में जनता का कोई प्रतिनिधित्व या हिस्सेदारी नहीं है. इसीलिए उनके नेतागण एनजीओ के साथ सांठ-गांठ करते हैं और उन्हें बढ़ावा देते हैं. इस विकट स्थिति से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, मेहनतकश वर्गों और तबकों की चेतना बढ़ाना और सही उसूलों पर आधारित उनके अपने संगठन बनाना, जिनकी गहरी जड़ें अपने लोगों के बीच हों और उन्हीं से वे जीवनी शक्ति ग्रहण करते हों।
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 15, 2011 08:44 PM· permalink
The objective of the HR Tour is to enable the participants grasp the fundamentals of select elements of world class HR Practices for long term organizational building.
Tour Destination:
The Tour is going to visit the establishments ofLarsen and Toubro (L&T Knowledge City) (www.larsentoubro.com),Essar Steel Ltd (www.essar.com),General Motors (www.gm.com)andGujarat Alkalis and Chemicals Ltd (GACL) (www.gacl.com).These companies will share their best practices of HR for which they are well known.
Tour Structure:
The tour will comprise of half day Visit to the company whereas half day capacity building session on the specific domain of HR.
Tour Contents:
Visit & showcase of HR practices by the companies
Date
Suggested Capacity Building Sessions by Prominent Practioners
Larsen and Toubro Ltd
(L&T Knowledge City)
21 September 2011
Relevance of Psycho tests for (I) Recruitment and (II) Career enhancement
Essar Steel Ltd, Hazira
04 October 2011
IT and Finance-a must skill set for new age HR
General Motors, Halol
25 November 2011
Understanding Cross Cultural Sensitivity and values
Gujarat Alkalis and Chemicals Ltd
(GACL)
07 December 2011
Employee engagement: a tool for Talent retention
Participant Profile:
The tour is designed to benefit HR professionals and practitioners willing to adopt best practices in HR. Also for companies keen on accepting HR as a tool for bringing positive change to their organization. Business owners and HR managers from MSMEs are encouraged to attend.
Registration Details:
(including Service Tax)
CII Members
(Small Scale)*
Rs 7,500/- per person
CII Members
(Medium & Large)
Rs 8,500/- per person
Non CII Members
Rs 10,000/- per person
(Fees is for all the 4 sessions)
You may kindly confirm your nomination by returning the attached Reply Form, duly filled-in along with the fee mentioned in the form. Please note that the last date of receiving registration is 12 September 2011 along with the details requested in the reply form. Since the maximum size of the mission would not exceed 25 people, registration is purely on first-come-first-serve basis.
*Limited Seats for CII Small Scale Members only based on first-come-first-serve.
---------------------------------------------------------- FOR FURTHER DETAILS, CONTACT: ---------------------------------------------------------- Ms Nida Faruqui Confederation of Indian Industry 201-203, Abhishek Complex Akshar Chowk, Old Padra Road Vadodara- 390 020 Phone: 0265-6532016 /17; 2341771 Email: nidafaruqui@cii.in
·To thoroughly understand the rights, duties, liabilities of the Principal Employer and the Contractor.
·To discuss viable systems to avoid any trouble while being within the permits of law.
·To share case histories and to refresh the knowledge of laws related to contract labour
Pedagogy:
The program will comprise of interactive sessions, case studies and slide presentation.
Attendees Profile:
Training will benefit a wide range of audiences such as
Senior and middle level managers from
·Human Resource,
·Industrial Relations
·labour contractors and principal employers
Training Curriculum:
·Importance of the contract labour
·Who is contractor, principal employer, contract labour and appropriate government.
·Registration of principal employer and contracting of contractor
·Rights of contract labour
·Duties and obligations of principal employer and contractor
·Provisions to regulate the contract labour
·Prohibition to appoint contract labour
·Inspector and Inspection of Contract labour
·Prosecution
·Problem of Payment to Contract labour
Trainers Profile:
Prof Madan Lal Jand is a retired Senior Class I Officer from the Indian Railways. He belonged to IRPS Cadre. He is an MA, LLB Gold Medalist, MICA and ITS (London). After retirement in 1991 from the prestigious Railway Staff College, Vadodara, he has been actively involved in training managers, executives and officers for almost all the PSU’s in the country. He has imparted training to around 40,000 gazetted officers of Indian Railways and other Govt. Organizations and more than 15000 officers of other Public and Private Sector companies on various aspects of labour laws. He is the editor of All India Services Law Journal and also work as an arbitrator.
Participation Fees:
CII Members: Rs 2500 (Inclusive of Service Tax)
Non CII Members: Rs 3300 (Inclusive of Service Tax)
To register please fill in the enclosed reply form and send it to the undersigned before 26 September 2011
सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी। आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।
सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ
असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे। कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।
उच्चतम न्यायालय ने २००२ के गुजरात में हुए नरसंहार के लिए मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जिम्मेदार हैं कि नहीं इस बात की जांच अहमदाबाद के मेजिस्ट्रेट की अदालत को सुपुर्द कर दी है. उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि इस जांच में उसके द्वारा नियुक्त स्पेशियल इन्वेस्टिगेशन टीम एवं एमिकस क्यूरी (वरिष्ट अधिवक्ता) की रपट को ध्यान में रखा जाए. साथ ही नरसंहार में जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है उनके द्वारा अतिरिक्त गवाही एवं सबूतों को भी सुना और देखा जाए.
भारतीय जनता पार्टी ने उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश को मोदी को निर्दोष घोषित किए जाना बतलाया है, जो कि अर्ध सत्य ही नहीं बल्कि सरासर झूठ है. उच्चतम न्यायालय ने मोदी के खिलाफ़ लगाए गए आरोपों का कोई खंडन नहीं किया है. बल्कि, २००२ में हुए दंगों में उनकी भूमिका की मेजिस्ट्रेट की अदालत में जांच करने के आदेश ही दिए हैं. अब यह मामला निचली अदालत में चलेगा, और शायद यह एक लंबी प्रक्रिया होगी. गौर तलब है कि उच्चतम न्यायालय में किसी भी फ़ौजदारी केस की सुनवाई नहीं होती, वहां सिर्फ़ निचली अदालतों के फ़ैसलों पर सुनवाई होती है और उन पर अंतिम फ़ैसला सुनाया जाता है.
लेकिन इस तथ्य को छुपा कर, भाजपा नेता इस भ्रामक प्रचार में जुट गए हैं कि उच्च अदालत ने मोदी को तमाम आरोपों से बरी कर दिया है और यह कि विपक्ष तथा नागरिक अधिकार संगठन पिछले ११ सालों से मोदी को बदनाम करने की कोशिश में लगे हैं. स्वयं मोदी ने उच्चतम न्यायालय के निर्देश को ’विवादों का अंत’ बतलाया है और अपने खिलाफ़ लगे आरोपों को गुजरात की ६ करोड़ जनता को बदनाम करने की साजिश कहा है. मोदी ने २००२ के नरसंहार को ’एक क्रिया की प्रतिक्रिया’ कहा था, जब कि तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने गोआ के भाजपा अधिवेशन में मोदी सरकार की आलोचना यह कह कर की थी कि मोदी अपना राजधर्म भूल गए हैं.
जो मोदी करण थापर के टीवी चैट शो के बीच से तब भाग खडे हो गए जब उन्हें २००२ के नरसंहार के कारण धूमिल हुई उनकी छवि को सुधार ने लिए सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने को कहा गया था, अब उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद १७ सितम्बर से तीन दिन का उपवास कर रहे हैं इस घोषित उद्देश्य के साथ की गुजरात में सद्भाव का वातावरण बने. अपने दस वर्ष के कार्यकाल में पहली बार मोदी ने जनता के नाम एक खुला पत्र भी लिखा जिसमें उन्होंने कहा कि सर्वोच्च अदालत ने अब तक उठाए सभी विवादों का अंत कर दिया है और इसलिए वे अब समाज में सद्भावना अभियान चलाना चाहते हैं.
उनकी मुसलमान विरोधी छवि के कारण बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने मोदी को विधान सभा चुनाव प्रचार से दूर रखा था. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के कई घटक दल मोदी के अतिवादी सांप्रदायिक तेवर के कारण उनसे कतराते रहे हैं. दूसरी ओर, भाजपा कई युवा नेता मोदी को भावी प्रधान मंत्री के रूप में प्रचारित कर रहे हैं. अब जब २००२ के नरसंहार में उनकी भूमिका का मामला निचली अदालत में चलाए जाने में एक लंबा समय लगने की संभावना है तब मोदी अपने आप को एक सेक्यूलर राष्ट्रीय नेता के रूप में साबित करना चाह रहे हैं. जब तक उन पर लगाए आरोप साबित या खारिज नहीं होते, साबरमती नदी में बहुत पानी बह चुका होगा और राष्ट्रीय राजनीति भी किसी अनिश्चित मोड़ पर पहुंच चुकी होगी.
भाजपा के वरिष्ट नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में संभावित भूमिका के बारे में अटकलों को यह कह कर बढावा दिया कि देश को मोदी जैसे बहु प्रतिभावान एवं प्रभावी नेता की आवश्यकता है. लेकिन गुजरात में मोदी की मौजूदा हालत नाजुक प्रतीत हो रही है. एक ओर जहां उनकी २००२ के नरसंहार में भूमिका को लेकर वरिष्ट पुलिस अधिकारी जैसे संजीव भट्ट, राहुल शर्मा और रजनीश राय ने हलफ़नामा देकर सवालिया निशान खड़े कर रखे हैं, जिसको निचली अदालत अनदेखा नहीं कर सकती, वहीं दूसरी ओर राज्यपाल श्रीमती कमला बेनीवाल द्वारा गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश आर ए मेहता की लोकपाल के पद पर की गई नियुक्ति को राज्य सरकार द्वार चुनौती देने से मोदी पेंचीदी परिस्थिति में फ़ंस गए हैं.
लोकपाल के लिए पूर्व न्यायाधीश मेहता के नाम का सुझाव गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं दिया था. तदुपरांत, वर्तमान कानून में लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल को ही है, न कि राज्य के मुख्यमंत्री को. लोकपाल का पद पिछले सात साल से खाली पड़ा था जिसे मोदी सरकार ने अपनी आपत्ति जता कर भरने नहीं दिया था. इस पर उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के दाखिल करने पर, राज्य सरकार ने एक अध्यादेश जारी करने के प्रयास किए जिसमें लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री को दिए जाने का प्रावधान था. इस अध्यादेश पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया और तत्काल न्यायाधीश मेहता की नियुक्ति की घोषणा कर दी.
राज्यपाल द्वारा मेहता की नियुक्ति की घोषणा के दूसरे ही दिन मोदी सरकार ने लोकपाल कार्यालय पर ताला लगा दिया और उनकी नियुक्ति को उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी. उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्यपाल को प्रतिवादी बनाने से इनकार कर दिया और मोदी सरकार को एक नोटिस भेजी कि वह इस बात की सफ़ाई दे कि कैसे मोदी द्वारा प्रधान मंत्री को लिखा गया पत्र अखबारों तक पहुंच गया जिसमें मोदी ने न्यायाधीश मेहता के खिलाफ़ सरकार के प्रति द्वेषपूर्ण भावना रखने का आरोप लगाया गया था.
इस से पूर्व राज्य कोंग्रेस के एक प्रतिनिधि दल ने राष्ट्रपति को मिल कर मोदी सरकार के खिलाफ़ एक प्रतिवेदन दिया गया था जिसमें गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे. कोंग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने कई औद्योगिक घरानों को करोडों रुपए की जमीन माटी के मोल बेच दी है जिसमे सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान पहुंचा है.
इन आरोपों की जांच लोकपाल न कर सके इस उद्देश्य से मोदी सरकार ने एक जांच आयोग की घोषणा कर दी. जब कोई जांच आयोग किसी मामले में जांच कर रहा हो उस परिस्थि्ति में लोकपाल उस पर कोई कार्रवाही नहीं कर सकता ऐसा लोकपाल कानून में प्रावधान है.
ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम से शुरू हुए अभियान को दो साल से अधिक का समय हो रहा है. इस दौरान छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के साथ-साथ दूसरे कई राज्यों में अर्धसैनिक बलों और सेना की तैनाती की गई है. ये बल खनिज संपदा से समृद्ध इलाकों को टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, रिलायंस, वेदांता जैसी कारपोरेट कंपनियों के लिए दलितों-आदिवासियों के गांवों खाली कराने और जनता के प्रतिरोध आंदोलनों को कुचलने के मकसद से भेजे गए हैं. प्रतिरोध के लिए संगठित जनता के बीच से लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मारा जा रहा है, उनके गांव जलाए जा रहे हैं, उनकी महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा है. देशी-विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवा में जुटा भारत का शासक वर्ग खनिज और वन संपदा की खुली लूट के लिए अधिक से अधिक फौजी ताकत और काले कानूनों का सहारा ले रहा है. कारपोरेट मीडिया में इस युद्ध की कोई खबर आप तब तक नहीं पाएंगे, जब तक इसमें कारपोरेट कंपनियों की तरफ से लड़ रही भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों और हरमाद वाहिनी, सलवा जुडूम, कोबरा जैसे हत्यारे गिरोहों का कोई जवान नहीं मारा जाता. इसके बाद शुरू होता है टीवी चैनलों पर राष्ट्र, लोकतंत्र और विकास के नाम पर उन्मादी आह्वानों का दौर. लेकिन सदियों से सताए जा रहे मेहनत कशों की न तो पीड़ा वहां कभी जगह पाती है और न उनका संघर्ष.
कठोर दमन और शानदार संघर्षों के इस दौर में उन मेहनतकशों, दलितों, आदिवासियों की पीड़ा को और उनके संघर्षों को आवाज देने वाले लोगों और संगठनों को खामोश करने की लगातार कोशिश सत्ता द्वारा की जा रही है. जो लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता कारपोरेट लूट और राजकीय दमन के खिलाफ बोलते हैं, उन्हें गिरफ्तार कर जेलों में डाला जा रहा है. संगठनों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं. डॉ विनायक सेन, लेखक- संपादक सुधीर ढवले, पत्रकार सीमा आजाद, पत्रकार प्रशांत राही उनमें से कुछ उदाहरण भर है. इसी तरह पीयूसीएल, पीयूडीआर जैसे संगठनों पर निशाना साधने की भी कोशिश बार बार होती रही है.
सबसे हालिया उदाहरण जेएनयू में ग्रीन हंट के खिलाफ ढाई साल पहले बने एक फोरम ‘जेएनयू फोरम अगेंस्ट वार ऑन पीपुल’ की गतिविधियों पर प्रशासन द्वारा रोक लगाए जाने का है. ‘विकास की अवधारणा और भारतीय लोकतंत्र की हकीकत’ के विषय पर अप्रैल में हुए एक कार्यक्रम की सूचना देने के लिए बंटी एक पर्ची में छपे चित्र का बहाना बना कर इस संगठन की गतिविधि पर मई के तीसरे हफ्ते में रोक लगा दी गई. यह चित्र कई वर्षों से इंटरनेट पर मौजूद है और यह भारत में चल रहे राजकीय दमन और जनता के प्रतिरोध का कलात्मक चित्रण करता है. इस रोक को छात्रों ने मानने से इनकार किया. वे छुट्टियों के दिन थे, इसके बावजूद 1100 से अधिक छात्रों ने अपने जनवादी अधिकारों पर हुए इस हमले के खिलाफ हस्ताक्षर किया और इस रोक को हटाने की मांग की. इसके अलावा जेएनयू 40 से अधिक प्राध्यापकों और देश के सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने भी इस रोक को हटाने की मांग की. लेकिन जेएनयू प्रशासन ने अब तक रोक नहीं हटाई है. खुद वीसी एसके सोपोरी का कहना है कि उन्हें छात्रों की लोकतांत्रिक गतिविधियों पर नजर और नियंत्रण रखने के निर्देश गृह मंत्रालय से मिले हैं.
फोरम को निशाना बनाने के निहितार्थ साफ हैं. फोरम पिछले ढाई सालों से ग्रीन हंट का विरोध करने के अपने मकसद पर मजबूती से खड़ा है. उसने लगातार शासक वर्ग के कारपोरेटपरस्त चरित्र को उजागर किया है और उसकी मुखालिफत की है. उसने हमेशा दमन का प्रतिरोध करते हुए और अपना जल, जंगल, जमीन बचाने के लिए लड़ रही जनता की हिमायत की है. पूरे देश में असहमति और प्रतिरोध की आवाजों को दबाने की प्रक्रिया के तहत ही फोरम पर भी प्रतिबंध लगाया गया है. लेकिन छात्रों के पूरे समर्थन से फोरम अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए है और उसने मई के बाद से कई कार्यक्रम किए हैं.
फोरम की गतिविधियों पर लगी रोक हटाने के संघर्ष के तहत फोरम ने कल शाम को जेएनयू में सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार दयामनि बारलाको आमंत्रित किया. ऑपरेशन ग्रीन हंट और राजकीय दमन के मुद्दे पर बोलते हुए बारला ने झारखंड समेत देश भर के आदिवासी इलाकों में संसाधनों की कारपोरेट लूट और जनता के उत्पीड़न-दमन के ब्योरे पेश किए. आप भी सुनिए.
वैकल्पिक फाइल
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 14, 2011 07:07 PM· permalink
विज्ञान फतांसी कथायें सामान्यतः ऐसी कल्पित कहानियाँ होती है,जिसकी घटनाये वैज्ञानिक आधार पर संभव होती हैं और वे विज्ञान के मूलभूत नियमो का उल्लंघन नही करती हैं। इन कथाओं का घटनाक्रम भविष्य, भविष्य का विज्ञान और तकनिकी ज्ञान, अंतरिक्ष यात्रा अथवा परग्रही प्राणीयों पर केन्द्रित होता है। कभी कभी वैज्ञानिक आविष्कारों के परिणामो का अध्ययन भी इन [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on September 14, 2011 03:38 AM· permalink
रेल की पांतों पर धड़धड़ाती हुई सी आई एक धुंध चीरती हुई खामोशियों की और मुझमें समा गई एक कहानी बन कर,जिसे मैं कोई शब्द न दे सका चाह कर भी. ... मेरी कविता बन जाने की अभिलाषा को कितनी ही बार मैने कहानियों में उकेरा है. इतना सजीव चित्रण कि गद्य भी पद्य होने का भ्रम पैदा कर देने में सक्षम. मगर तुम, जो कि समाई हो मेरे भीतर.....क्यूँ नहीं उतर पाती कागज पर. भावों को शब्द रुप देने की कला ही तो एक ऐसी कला है जो मैं समझता था कि मुझे आती है. परन्तु मैं गलत था..... हार गई मेरी यह एक मात्र योग्यता भी......... कलाकार होने की. साधारण इन्सानों की तरह मैं जी नहीं पाता. सांस इन्कार करती है लौटने को. दम घुटता है मेरा--भीड़ का हिस्सा बनकर. एक विशिष्ट मुकाम होने की चाहत अलग-थलग कर देती है मुझे, हर उस चीज से जिसमें तनिक भी जुड़ाव की क्षमता हो.
याद है चाहतों के बदलते रंग??? बदलते वक्त के साथ. चाहा था कि अगर वक्त थम नहीं सकता तो कम से कम कुछ सुस्त कदम मेरे आंगन में ही ले ले. .....तब चाहता था कि झील हो जाऊँ. तब तुम साथ होती थी. एक सौम्य ठहराव की दरकार....... मन भावन खामोशी के बीच चन्द पत्ते साज बनते देखे थे. पेड़ हो जाने की इच्छा बस इसी साज की धुन तोड़ती आई.
पेड़ बहुत उदास देखे हैं मैने पत्ते हो गये साज देखे हैं मैने जिन्दगी की बुझती नहीं प्यास जाने कैसे ज़ज्बात देखे हैं मैने.
गंगा जी में स्नान कर नदी बन जाने के बदले रामायण बन जाने का ख्वाब पाल बैठा. तुम्हें निहारते जाने कब पन्ने पन्ने बिखर गई पूरी पुस्तक. धार्मिक पुस्तकों का इस तरह उधड़ कर बिखर जाना, उड़ जाना, बह जाना- दादी कहती थी अपशगुन होता है. दादी की बात ख्याल आई जब तुम्हें खोया. सोचता रहा कि क्यूँ बन बैठा रामायण-सपने में ही सही. धर्म तो प्रेम पर आकर रुक जाता है. मोहब्बत सिलेबस के बाहर की बात है..पुस्तक को तो बिखरना ही था.
झरना बन कर ऊँचाई से गिरना और नदी में समा जाना कभी मन को भाया नहीं तो पहाड़ बना और फिसलता हुआ आ गिरा उसी की तलहटी में. एक गहरी अँधेरी खाई. कुछ सुझाई नहीं देता यहाँ तक कि पहाड़ भी नहीं. ऐसा क्या बन जाने की कोशिश कि खुद को ही न देख पाये.
दम तोड़ते एक के बाद एक चाहतों के सिलसिले. कभी आईना बन खुद को झाँका खुद में. एक नफरत के भाव उभरे जो बदले दयनीयता में हालात का अक्स ओह!! इतना दयनीय.....तोड़ दिया खुद ही खुद को..आईना चकनाचूर हो फर्श पर फैल गया. हर तरफ आईने ही आईने बच रहे.बाँधने वाला कोई नहीं.
गुलाब बनता मगर कांटों की चुभन से गुरेज. यूँ नहीं कि मेरे जेहन में कांटें नहीं मगर वो किसी को मेरे पास आने से रोकते नहीं. किसी को लहुलुहान नहीं करते. वो उगे हैं भीतर की ओर..आज जब तुम आकर समा गई और उतरती नहीं कहानी बनकर शब्दों में तो सहम सा गया हूँ मैं कि कहीं तुम घायल तो नहीं..कहीं उन कांटो ने तुम्हें लहुलुहान तो नहीं कर दिया.
आंसू उतर आये हैं यही सोच कर और लुढ़क गये उन पन्नों पर जिन पर उतरना था मेरे शब्दों को एक कहानी बन कर..तुम्हारी कहानी..जो मुझमें समाई है.
Posted by Udan Tashtari (sameer.lal@gmail.com) on September 14, 2011 01:00 AM· permalink
इस कड़ी के पिछले भाग में आपने जाना कि किस तरह रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की सफल जोड़ी की शुरुआत हुई। दिन बीतते गए और इन दोनों कलाकारों के बीच की समझ बढ़ती चली गई।
1967 में शम्मी साहब की एक फिल्म आई 'An Evening in Paris'. फिल्म के संगीतकार थे एक बार फिर शम्मी के चहेते शंकर जयकिशन । पर संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जब निर्माता निर्देशक शंकर सामंत इस फिल्म के गीत की रिकार्डिंग करवा रहे थे तब शम्मी कपूर को भारत
(अगर ये विषय आपकी पसंद का है तो पूरा लेख पढ़ने के लिए आप लेख के शीर्षक की लिंक पर क्लिक कर पूरा लेख पढ़ सकते हैं। लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया आप जवाबी ई मेल या वेब साइट पर जाकर दे सकते हैं।आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा!)
Posted by Manish Kumar (manish_kmr1111@yahoo.com) on September 13, 2011 03:39 PM· permalink
…..और मजाक-मजाक में हमारी चिट्ठाकारी के सात साल निकल लिये! कोई गड़बड़ नहीं भाई इसके पहले एक , दो ,तीन , और चार , पांच और छह भी निकले इज्जत के साथ!
इन सात सालों के अनुभव मजेदार रहे। झन्नाटेदार भी। याद करते हैं कि विन्डॊ 98 के जमाने में, जयहनुमान सुविधा के सहारे, छहरी की-बोर्ड के जमाने में डायल अप इंटरनेट कनेक्शन के दिनों से शुरु हुये थे। जब भी नेट लगाते तो किर्र-किर्र करके घर भर को पता चल जाता कि नेट-बाजी हो रही है। आये दिन सुनने को मिलता -तुम्हारी ब्लागिंग के चलते फ़ोन बिजी रहता है। लोग शिकायत करते हैं फोन हमेशा बिजी रहता है। कट-पेस्ट करके लिखने और टाइप करके कमेंट करने के जमाने थे वे। ई-स्वामी ने हिंदी में सीधे टिप्पणी करने का जुगाड़ आज से छह साल पहले लगाया था। उस पोस्ट पर आई प्रतिक्रियाओं से उस समय की कठिनाइओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।
ब्लागिंग अपने आप में अभिव्यक्ति का अद्भुत माध्यम है। हर एक को अभिव्यक्ति का प्लेटफ़ार्म मुहैया कराती है यह सुविधा। क्या रेंज है जी! शानदार से शानदार लेखन से लेखन से लेकर चिरकुट से चिरकुट विचार के लिये भी यहां दरवज्जे खुले हैं। यही इस माध्यम की ताकत है। बड़े से बड़ा लेखक/कवि/पत्रकार भी अंतत: प्रथमत: और अंतत: एक इंसान ही होता है। उसका लेखन भले शानदार हो लेकिन एक सीमा के बाद वह टाइप्ड हो जाता है। ब्लागिंग के जरिये आम आदमी की एकदम ताजा स्वत:स्फ़ूर्त अभिव्यक्तियां सामने आती हैं। यह सुविधा अद्भुत है।
ब्लागिंग के बारे में अलग-अलग लोग अपने-अपने हिसाब से धारणायें बनाते हैं। अपन को तो यह बहुत भली मासूम सी विधा लगती है। आप जैसे हो उसई तरह का आपके पेश कर देती है नेट पर। कभी-कभी क्या अक्सर ही लोग ब्लागिंग के स्तर को लेकर हलकान होते हैं। पोस्टें लिखते हैं। लेकिन ब्लागिंग में नित-नये लोग जुड़ते जाते हैं। झमाझम पोस्टें आती रहती हैं। हू केयर्स फ़ार स्तर? हेल विद इट! स्तर की चिंता करें कि मन का रेडियो बजायें।
संकलक के निपटने से तमाम लोगों को असुविधा हुई है लोगों को। लोग लिखते हैं पता नहीं चलता लोगों को। लेकिन अब दूसरे जुगाड़ फ़ेसबुक, गूगल बज , ट्विटर हैं अपनी पोस्टें पढ़वाने के लिये। लेकिन इत्ता पक्का है कि अगर किसी ने कुछ अच्छा लिखा है या काम भर का विवादास्पद तो वह देर-सबेर पढ़ ही लिया जाता है।
टिप्पणियां हिंदी ब्लागजगत की चंद्रमुखी/मृगलोचनियां हमेशा से रही हैं। ज्यादातर ब्लागर केशवदास बने इनको हसरत से निहारते रहते हैं। टिप्पणियों का अपना गणित है। अच्छे लेखन के अलावा नेटवर्किंग, मेहनत, पाठक के साथ व्यवहार, इमेज पर इनका संख्या निर्भर करती है। कुछ भाई लोग तो ऐसी टिप्पणियां करते हैं कि उनका मतलब निकालना उनके लिये ही मुश्किल हो!
ब्लागिंग में हमने देखा है कि लोग आमतौर पर अपनी आलोचना के प्रति असहनशील हैं। किसी की बात के खिलाफ़ कोई बात लिखी जाये तो सबसे पहली धारणा वह यही बनाता है जरूर उससे जलन के चलते यह बात लिखी है। यह प्रवृत्ति आमप्रवृत्ति है हिंदी ब्लागिंग के मामले में। पहलवान टाइप के ब्लागरों छोड़िये यहां तो सामाजिक समरसता , अच्छाई, भलाई के लिये हलकान रहने वाले लोग भी अपने लेखन और व्यवहार की आलोचना पर ’ पड़सान ’ हो जाते हैं। घूम-घूम कर अपने घाव दिखाते हैं सबको! ऐसा करते हुये वे इत्ते मासूम लगते हैं कि उनसे “हाऊ स्वीट , हाऊ क्यूट ” कहने का मन करता है। लेकिन कहते नहीं फ़िर इस डर से कि वे और ज्यादा “स्वीट और क्यूट ” हो जायेंगे -हिंदी ब्लागिंग में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने का इल्जाम लगेगा सो अलग!
बीते सालों में समय के साथ ब्लागिंग की पहचान बढ़ी है। सात साल पहले -ब्लागर -ये कौंची होता है? की स्थिति थी। आज यह स्थिति है कि कुछ दिन पहले एक टी.वी. चैनल में एक वार्ताकार के नाम के साथ ब्लागर की पट्टी लगी थी। हिंदी अखबार और किताबों में ब्लागर बहुतायत में छपने लगे हैं। अब ब्लागिंग अनजान विधा नहीं रही जी।
ब्लागिंग के जरिये लोगों का मिलने-मिलाने का सिलसिला भी बढ़ा है। हमारे तमाम जानने वालों में ब्लागर बढ़ते जा रहे हैं। हर शहर में कोई न कोई ब्लागर दोस्त है। यह मजेदार सुकून है भाई!
पिछले सालों में हमारा लिखना-लिखाना कम हुआ है। आज देखा तो गये साल में कुछ जमा 37 लेख लिखे। उसमें से आधे से ज्यादा रिठेलित हैं। यह हालत उन कवियों की तरह है जो पांच साल कवितायें लिखकर पचास साल तक सुनाते हैं। वो तो कहिये कि हमारे कुछ पाठक भले हैं और हमारा रिठेला हुआ पढ़े भले न लेकिन यह जरूर लिख देते हैं -दोबारा पढ़ा और उतना ही मजा आया। अब बताइये भला किसी और माध्यम में इतने भले पाठक-प्रशंसक मिलते हैं।
ब्लागिंग में कमी का कारण और कारणों के अलावा फ़ेसबुक जैसे तुरंता माध्यमों का अवतरण भी रहा। आजकल तो फ़ेसबुक पर वह भी ठेलने लगे हैं जिसे भले लोग शायरी के नाम से जानते हैं। एकाध शेर आप भी वो फ़र्माइये जिसे शायर लोग मुलाहिजा के नाम से जानते हैं:
दबोच लिया अंधेरे में, सीने से कट्टा सटा दिया,
दांत पीसकर गुर्राया – खामोशी से शेर सुन, दाद दे।
वही घिसी-पिटी बातें, वही ख्याल- कुछ भी तो नया नही,
चल बहर में कह, तरन्नुम में पढ -गजल में खप जायेगा।
मै कोई अदना शायर नहीं मेरे चाहने का वो वाला मतलब मत निकाल
मैंने तो तुझे सिर्फ़ ’लाइक किया है’ किसी फ़ेसबुक के स्टेटस की तरह।
वो अपने इश्क के किस्से बहुत सुनाता है,
शायद जिन्दगी में मोहब्बत की कमी छिपाता है
आप कहते हो कि बहुत झूठ बोलता है माना
लेकिन वो तो कभी हसीं सोहबतों में रहा ही नहीं!
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह ,
कि भीग तो पूरा गये पर हौसला बना रहा।
ये आखिरी वाला तो हमने अपनी श्रीमती जी का छतरी लिये हुये फोटो देखने के बाद लिखा। इससे एक पंथ दो काज हो गये। एक शेर का शेर निकल आया और उधर श्रीमती जी को यह जता भी दिया कि हम उनके लिये भी शेर लिख सकते हैं।
शेर लेखन में हमारी रुचि देखकर आलोक पुराणिक ने हमको सलाह दी कि हमको कनपुरिया भाषा में शेर लिखने चाहिये । तखल्लुस भी तय हो गया -’कट्टा’कानपुरी। शाम को देखा उधर से शिव बाबू- ’कट्टा’ कानपुरी के नाम से चालू हो गये। हमारा तखल्लुस लुट गया। हमने आलोक पुराणिक को बताया तो उन्होंने सलाह दी -शायरों/कवियों से अपने आइडिया शेयर नहीं करने चाहिये।
बाद में हमने सोचा कि हम अपना तखल्लुस ’ कट्टा ’ कानपुरी असली वाले धर लें। साथ में नोट लगा दें- नक्कालों से सावधान होने की कौनौ जरूरत नहीं- वे भी अपने ही भाई बंधु हैं।
और ये देखिये एक ठो शेर भी उछल के आ गया मैदाने-जेहन में! अब सुन ही लीजिये:
शाइर से गुफ़्तगू हुई , उसने तखल्लुस उड़ा लिया
दुनिया में भले आदमियों की, अभी कोई कमीं नहीं!
हां भाई यह भलमनसाहत ही है। जैसे पहली बार चिलम आपके हाथ में देखकर कोई भला आदमी उसे आपके हाथ से छीनकर खुद सुट्टा लगाने लगे ताकि आपको नशे की गिरफ़्त से बचा सके। और ये जो शाइर लिखा है न वो इसलिये कि गुलजार साहब शाइर ही लिखते हैं शायर को। हमारे तमाम पाठक गुलजार भक्त हैं। उनको अच्छा लगेगा!
खैर शायरी-वायरी अलग की बात! यहां मामला ब्लागिंग का है। सात साल पूरे हुये थे बीस अगस्त को। आज यह पोस्ट लिख रहा हूं। ब्लागिंग के माध्यम से जुड़े अपने तमाम साथियों को याद करके खुश हो रहा हूं कि इस माध्यम के चलते मजाक-मजाक में लिखना शुरु किया और की-बोर्ड के फ़जल से अभी तक ठेल और रिठेल मिलाकर छह सौ पोस्टें निकलकर सामने आ गयीं। हमारे साथ के लोगों को भी इससे सहूलियत हुई है। हमारे बारे में और कुछ समझ न आने पर अचकचा के कह उठते हैं -ये ब्लागिंग करते हैं। इनका ब्लाग कम्प्यूटर पर छपता है। इनके ब्लाग का नाम फ़ुरसतिया डाट काम है!
आज के दिन डा.अमर कुमार भी बहुत याद आ रहे हैं। उनका न होना बहुत खल रहा है। उनके बारे में सोचते हुये काशीनाथ सिंह का लिखा याद आता है जो उन्होंने धूमिल के न रहने पर लिखा था- उसके जाने के बाद तो ऐसा लगा घर से बेटी की डोली उठ गयी। आंगन सूना हो गया।
आज एक बार फ़िर अभिव्यक्ति का नये माध्यम : ब्लॉग से परिचय कराने वाले रविरतलामी और इस ब्लाग में लिखने के अलावा बाकी सब मामलों के पीर-बाबर्ची-भिस्ती-खर ईस्वामी का शुक्रिया कर रहा हूं। उस सभी साथियों का भी आभार जो हमें पढ़ते रहे और यह एहसास दिलाते रहे कि हमारा लिखा पढ़ने वाले भी हैं कुछ लोग!
शांतिजब दरवाज़ा खोलकर अन्दर घुसीतो उसकी उम्मीद थी कि दोनोंबच्चे सो चुके होंगे। बहुतहौले से अजय और शांति घर मेंदाख़िल हुए। अजय ने अपने कपड़ेउतार कर किनारे कर दिए और नहानेचला गया। उसी दौरान दोनोंबच्चे कमरे में आ गए। हलकीआहटों से बचपन की गाढ़ी नींदनहीं खुला करती। शांति समझगई वो पहले से जगे हुए थे औरशायद उनका इंतज़ार कर रहे थे। एक रोज़ पहले शांति के नानाका देहांत हो गया। और वो अजयके साथ दफ़्तर से सीधे अपनेननिहाल चली गई थी। शांति नेबच्चों को बता दिया था औरबीच-बीचमें उनकी ख़बर भी लेती रही थी।बच्चे शांति के नाना से एक बारमिले थे। उनसे भावना का कोईजुड़ाव नहीं था पर उनके बारेमें जानने को उत्सुक ज़रूरथे। शायद ये समझना चाह रहेंहों कि जिस झुर्रीदार चेहरेऔर जर्जर काया को उन्होने देखाथा- क्याथा उसमें ऐसा कि उनके माँ-बापदोनों भागे-भागेचले गए। शुरुआत अचरज ने की-
नानामर गए..?
हाँबेटा..
कितनेसाल के थे नाना..?
बानबेसाल के..
बानबे..?
बानबेमतलब नाइन्टी टू..
क्याहुआ था उनको..?
बीमारीतो कोई नहीं थी..बस बूढ़ेहो गए थे..
क्यासचमुच उन्हे कोई बीमारी नहींथी, अबपाखी ने पूछा।
न..दवा खाकरठीक होने वाली कोई बीमारी नहींथी..
तोफिर मर क्यों गए..? अचरज नेपूछा।
यहमुश्किल सवाल था। क्यों मरजाते हैं लोग?नाना बहुतमेहनती थे। अस्सी साल की उमरतक अपने सारे काम अपने आप करतेथे। अपने कपड़े भी आप धोते थे। घूरकर देख देते थे तो सामनेवाला घबराकर भाग खड़ा होताथा। कड़कती आवाज़ में किसीको डाँट देते थे तो उसका पेशाबनिकल जाता था। चलते थे तो ऐसालगता था कि सरपट दौड़ रहे हों।उन्होने न तो कभी अंग्रेजीदवा खाई और न कभी हस्पताल कामुँह देखा। हमेशा हाज़मादुरुस्त रहा। रोज़ नियम सेदो घंटे पूजा करते थे और पूजाकरके ही खाते थे। दिन में एकही बार टट्टी जाते और अगर कभीसंयोग से दूसरी बार गए भी तोचाहे पूस की आधी रात हो और आसमानसे बरफ बरस रही हो-नहाते ज़रूरथे। पर पचासी आते-आतेनाना की देह ने जवाब देना शुरुकर दिया। आवाज़ में थरथराहटआ गई। हाथ की पकड़ ढीली पड़गई। पैर डगमगाने लगे। एक हाथसे दूर के आदमी को पहचानने मेंधोखा खाने लगे। फिर भी दिल,कलेजे औरगुर्दे पर कोई असर न हुआ। सबकुछ खा कर पचाते रहे। फिर भीमर गए। क्यों मर गए -येतो शांति को भी ठीक-ठीकनहीं मालूम।
शांतिके पैर को थपथपाकर अचरज ने फिरसे पूछा- ममा बताओन क्यों मर गए नाना..?
मुर्देसवाल नहीं करते। जीवित लोगही सवाल करते हैं। चूंकि जीवितलोगों के लिए जीवन सहज अवस्थाहै और मर जाना उस सहजता सेविक्षेप -एक अपवाद।इसीलिए हम कभी सवाल नहीं करतेकि हम क्यों जी रहे हैं। येसवाल भले कर लें कि बच्चे कहाँसे आते हैं पर ये सवाल नहींकरते कि बच्चे क्यों पैदा होतेजा रहे हैं। और हर पैदा होनेवाला बच्चा कभी न कभी ये सवालपूछ ही लेता है जो अचरज शांतिसे पूछ रहा था-वो क्योंमर गए।
वोमर गए क्योंकि एक दिन सबकोमरना होता है-शांति नेएक आर्यसत्य दोहराया।
वोकह सकती थी कि मरने के एक-दोमहीने पहले से नाना को खानेमें बहुत तकलीफ़ होने लगी थी।कुछ भी उनके गले से उतरता नहींथा। रोटी,बिस्कुट,फल, हर चीज़वो मुँह में डालकर चूसकर उगलदेते थे। उनके गले की नली सूखगई थी। उन्हे हस्पताल ले जाकरभर्ती करने की कोशिश की गई-वो नहींमाने। गले में प्लास्टिक कीनली डालकर खाना खाने को भी वेराजी नहीं हुए। धीरे-धीरेउनका सारा बदन सिकुड़ता चलागया। हड्डियो से जो मांस झूलतारहता था- वोसब सूख गया। नाना के नाम परमुरझाई हुई खाल में लिपटा हुआएक कंकाल भर रह गया। अगर वोअचरज को ये सब बताती तो शायदवो कहता कि नाना भूख से मर गएथे। पर कहा ये भी जा सकता थाकि उन्होने किसी तपस्वी कीतरह अनशन करके अपने शरीर कोछोड़ दिया था।
मरनेके बाद लोग स्वर्ग में जातेहैं न? अचरजने पूछा।
सबलोग नहीं..कुछ लोगनरक में भी जाते हैं-पाखी नेउसकी बात को छाँटा।
तोनाना जी स्वर्ग में गए कि नरकमें? अचरजके प्रश्न हनुमान जी की पूँछकी तरह थे।
शांतिके पास उसके सवाल का कोई भीसच्चा और संतोषजनक जवाब नहींथा। बहुत सारे संतोषजनक जवाबथे पर वो सारे के सारे झूठेथे। एक सच्चा जवाब था मगरसंतोषजनक न था-मृत्यु केक्षण के बाद अज्ञात का एक अनन्तअंधेरा था। वो अंधेरा इस क़दरबेचैन करने वाला था कि कोई उसेस्वीकार करने को राजी नहींथा। दुनिया की हर संस्कृतिने इस सवाल से जूझने के बादउसके आगे घुटने टेक दिये हैंऔर मृत्यु के बाद के अनन्तअंधेरे पर अपनी कल्पना कीपच्चीकारी की है। स्वर्ग औरनरक के विचार में मृत्यु केबाद जीवन की कल्पना छिपी है।ऐसी ही दूसरी कल्पनाएं हरसंस्कृति ने मृत्यु पर आरोपितकी हैं। किसी में सालोंसालक़ब्र में दबे रहने के बाद एकरोज़ सारे मुर्दों का उठाकरहिसाब कर दिया जाता है और अनन्तकाल तक जन्नत या अनन्तकाल केलिए दोज़ख़ में धकेल दिया जाताहै। तो किसी संस्कृति में देहके मर जाने के बाद भी एक अंगूठेके आकार का प्रेत बचा रहता हैजो खा-पीकुछ भी नहीं सकता मगर भूख औरप्यास से पीड़ित रहता है औरयमदूतों के साथ यमलोक की यात्राकरता है। अगर उसके प्रियजनउसके लिए तर्पण और श्राद्ध नकरें तो इधर-उधरभटकता फिरता है। कुछ मानतेहैं कि शरीर के साथ आत्मा नामका जो अज्ञेय तत्व होता है वोरौशनी के एक मैदान में जाकरअपनी थकान मिटाता है और फिरएक नया शरीर धारण कर फिर सेजन्म लेता है।
नानाजी कहीं नहीं गए..वो हमारेआस-पासही हैं.. हमेंदेख रहे हैं और हमारी रक्षाकर रहे हैं-शांति नेसंतोषजनक झूठ का विकल्प चुना।यह एक विचित्र झूठ था। इस झूठमें किसी भी चेष्टा और प्रतिक्रियासे हीन हो जाने पर जिसे मरामान लिया गया,वही मरनेवाला मरकर इतना शक्तिशाली होजाता है कि अपने प्रियजनोंकी हिफ़ाज़त करने लगता है।अचरज के लिए यह थोड़ी मज़ेदारबात थी और थोड़ी डरावनी। उसनेअगला सवाल नहीं पूछा और चुपचापकमरे के भीतर एक अदृश्य आदमीकी कल्पना से रोमांचित होनेलगा।
आदमीके भीतर जीने की कितनी तगड़ीवासना है कि मृत्यु की इतनीविविध और विचित्र कल्पनाओंमें आदमी ने कहीं भी मृत्युके विचार को कोई मान नहीं दिया।मरनेवाले को मरकर भी जीवन कीरक्षा करनी पड़ती है।
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(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on September 13, 2011 04:48 AM· permalink
दो दिनों पहले जहानाबाद में एक थोक व्यापारी ने तीसी का भाव अट्ठाईस रुपये किलो बताया था और कल मैंने दिल्ली में रोहिणी के एक दुकानदार के यहां तीसी सत्तर रुपये खरीदी। संसद में महंगाई पर जो बहस हुई उसमें सासंदों ने अपने-अपने हिस्से के अनुभव सुनाए। संसद में बताया गया कि किसान तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल दाल बेचता है और वह व्यापारी के यहां से होकर दुकानदार के यहां नब्बे रुपये किलो बिकता है। किसान के यहां का सात सौ रुपये का चावल दो हजार रुपये में बिकता है। बिहार के गांवों में दो रुपये किलो की सब्जी पटना के बाजार में 15 रुपये किलो और दिल्ली के बाजार में 15 रुपये पाव बिकती है।
मौजूदा सरकार के कार्यकाल में संसद में बारह बार महंगाई पर बहस हो चुकी है और सरकार ने मंहगाई को रोकने में अपनी लाचारी जाहिर कर दी है। अन्ना हजारे के आंदोलन के जवाब में सरकार का यह कहना कि यह संसद और संविधान की सर्वोच्चता को चुनौती है, तो शायद ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा झूठ है। कई ऐसे विषयों की गिनती करायी जा सकती है जिसमें सरकार ने संसद की प्रासंगिकता को कटघरे में खड़ा किया है। परमाणु समझौते के खिलाफ पिछले सदन की आम राय थी। जातिवार गणना को लेकर सदन की आम राय थी। नागरिकों पर एक पहचान पत्र लादने के फैसले को बिना सदन की अनुमति के लागू की कर दिया गया। संसद और संविधान को चुनौती अंदर से है। प्रधानमंत्री की यह सफाई कि मैं कमजोर नहीं हूं, यह लाचारी कि वे ज्योतिषी नहीं होने की वजह से महंगाई को रोकने की अवधि नहीं बता सकते और लाचारी के तौर पर यह प्रस्तुति कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जादू की छड़ी नहीं बना सकते ये संसद की ताकत के कमजोर होने की ही घोषणाएं हैं। लोकतंत्र में मतदान का ऊपरी ढांचा ही संविधान की समाजवादी भावनाओं की रक्षा को सुनिश्चित नहीं करता है। चुनाव के आवरण के अलावा पूरी प्रक्रिया में क्या बचा है जहां संसद कमजोर नहीं की गई है। जिस देश में 20 रुपये से आठ रुपये तक रोजाना की कमाई पर 77 प्रतिशत आबादी जीवन काटती हो वहां सांसद को चुनाव लड़ने के लिए वैधानिक तौर पर कम से कम पच्चीस लाख रुपये चाहिए। सांसद दलबदल कानून से बंधा है उसे अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर ही यह कानून बना था। संसद की राजनीति बुरी तरह कुंठित हुई है। दरअसल सरकार और संसदीय पार्टियों ने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरोध में जन लोकपाल को एक मात्र हथियार बनाने के आंदोलन के खिलाफ जो रास्ते तैयार किए उनमें तो कोई दम नहीं है।
इसमें भी दो राय नहीं होनी चाहिए कि गांधीवादी छवि के अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में के एक तरह की सोच वाले लोगों को एकजुट किया है। जो वर्ग अपने आप में सिमटा हुआ था और रात को इंडिया गेट पर टहलने निकलता था वह रामलीला मैदान में भी दिखा। युवाओं तक आंदोलनों की जरूरत पहुंची। भूमंडलीकरण के दौर में पहले के मुकाबले बेहतर जीवन जीने वाले वर्ग ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भागीदारी की है। एक चेतना का विस्फोट हुआ है। उसने समाज के दूसरे वर्गों को भी प्रभावित किया है। वैसे भी भूमंडलीकरण का दौर शुरू होने के बाद अलग अलग मुद्दों के प्रति जागरूक करने का ही अभियान चला है। शायद ही कोई ऐसा मुद्दा होगा जिसे लेकर सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने अलग अलग आंदोलन नहीं किया होगा और जन समर्थन नहीं बटोरा हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह इस किस्म का पहला ऐसा आंदोलन है लिहाजा उसने भी सत्ता के स्तंभों के भ्रष्टाचार की तरफ लोगों को जागरूक किया है। समाज के प्रति समग्रता में जागरूकता मुक्कमल राजनीतिक चेतना विकसित करती है। उपनिवेशवाद का विरोध एक मुक्कमल राजनीतिक चेतना का विस्तार करता है। लेकिन भ्रष्टाचार उपनिवेशवाद नहीं है। अन्ना केवल भ्रष्टाचार के विरोधी नेता के रूप में उभरे हैं। यह ध्यान रखना होगा।
इस अभियान ने आंदोलनों के लिए कई सवालों को हल किया है। मसलन आंदोलन का रूप महत्वपूर्ण नहीं होता है। आंदोलन के मुद्दे और उसके समर्थक शक्तियां महत्वपूर्ण होती हैं। मणिपुर में इरोम शर्मिला दस वर्षों से ज्यादा समय से बंदूकधारी सैनिकों को यमराज जैसे प्राप्त अधिकारों के खिलाफ सत्याग्रह कर रही है। लेकिन प्रधानमंत्री के आश्वासन के बावजूद सैनिकों के अधिकार बने हुए हैं। दूसरा कि भगवा लिबास में भूमंडलीकरण के दौर के राष्ट्रवाद को खड़ा नहीं किया जा सकता है। योग व्यापारी बाबा रामदेव को उनके आंदोलन के दमन के बाद वह समर्थन हासिल नहीं हुआ जो अन्ना को हुआ। यह स्थापित हुआ है कि उपनिवेशवाद के दौर में गांधी की जो वेशभूषा प्रतिष्ठित हुई उसी रंग-रोगन में ही भूमंडलीकरण के दौर का नया राष्ट्रवाद खड़ा किया जा सकता है। भूमंडलीकरण की नीतियों के आधार में जो समर्थक वर्ग रहा है वही प्रभावशाली रूप में दिल्ली में अन्ना के आंदोलन के समर्थन में उतरा इसीलिए सरकार का रूख दुविधाग्रस्त दिखाई देता रहा। मीडिया को दुविधा नहीं हुई क्योंकि हर लिहाज से अन्ना का आंदोलन उसके हित में रहा। मीडिया की इस समय बहुत बड़ी भूमिका हो गई है। महंगाई के खिलाफ कई बार विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने आंदोलन करने की कोशिश की। भ्रष्टाचार के खिलाफ भी विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन करने की कोशिश की है। लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ गैर राजनीतिक नेतृत्व के आंदोलन को ही समर्थन हासिल होते क्यों देखा जा रहा है? क्या यह माना जाए कि किसी मुद्दे पर अब राजनीतिक आंदोलन का समय चला गया? या फिर यह माना जाए कि देश की राजनीति एक नई शक्ल अख्तियार कर रही है ?
दुनिया भर में शासन चलाने के लिए आधुनिक राजनीतिक व्यवस्थाएं ही बनी हुई हैं। इसीलिए राजनीतिक रास्तों से ही इन व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सकता है। राजनीतिक पार्टियां संसदीय व्यवस्था में चाहें सत्ता में हो या विरोध में रही हो वे कमोबेश भूमंडलीकरण की व्यवस्था की पक्षधर रही हैं। संसद अब शायद उसी के लिए चलने का एहसास कराती है। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर तो सरकार जाने के जोखिम से ज्यादा इस बात को लेकर ज्यादा भरोसा दिखा कि संसदीय परंपराएं और मर्यादाएं नहीं भूमंडलीकरण की पक्षधर शक्तियां सरकार को बचा ले जाएंगी। यह भरोसा इसीलिए बना क्योंकि अपनी अंतर्धारा में संसद भूमंडलीकरण की हो चुकी है। यह अंतर्धारा कैसे मजबूत होती चली गई है, इसे समझने की कोशिश की जा सकती है। क्या आंदोलन, मीडिया और पार्टियों के भीतर एक ऐसी अंतरधारा विस्तारित हुई है जो विभिन्न रूपों में अलग-अलग या विरोधी दिखने के बावजूद एक होती है? नई आर्थिक नीतियों को लागू करने वाली सरकारों पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वह देश में बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए दरवाजे और खोल दें। सरकार में वैसे लोग बड़ी तादाद में है जो इस किस्म का बहाना ढूंढ़ रहे हैं कि वे उसकी आड़ में कंपनी राज के हितों में फैसले लेने की मजबूरी जाहिर कर दें। अभी योजना आयोग ने भविष्य के लिए अपने नजरिये को इसी तरह पेश किया है। योजना आयोग का ये कहना है कि लाइसेंस परमिट राज खत्म करने से भ्रष्टाचार खत्म हो गया। जबकि हकीकत तो यह है कि जिन अफसरों और विभागों और राजनीतिक नेताओं को परमिट लाइसेंस देने के लिए घूस देना पड़ता था वे बिना परमिट लाइसेंस के समाज को ज्यादा लूट रहे हैं। उन पर किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं है। वे लोग ज्यादा लूट के लिए पहले के मुकाबले विभाग, अफसर और राजनीतिक नेताओं को ज्यादा घूस दे रहे हैं। यही वजह है कि भ्रष्टाचार का दायरा बढ़ा है। ज्यादा से ज्यादा लूटने के लाइसेंस खरीदने की होड़ मची है और वह विकास का मानक बना हुआ है।
एक तरफ अन्ना हजारे का अभियान इस बात को लेकर ही अड़ा हुआ है कि लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री, संसद सदस्यों और न्यायपालिका को भी शामिल किया जाना चाहिए। ये राजनीतिक व्यवस्था को चलाने वाले तंत्र के हिस्से हैं। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल का जो तंत्र बनाने की वकालत की जा रही है उसका जनता से कोई सरोकार नहीं होगा। भ्रष्टाचार के अर्थ आंदोलन में खुल नहीं रहे हैं। बड़ी बड़ी कंपनियों के मालिक बीसेक वर्षों में हजारों हजार करोड़ के मालिक बन गए है। यह सही बात है कि इन कंपनियों का राज बनाने वाली यही संसद और उसके नेतागण रहे हैं। दरअसल राजनीति जब एक बार पूंजीवाद की गिरफ्त में चली जाती है तो फिर राजनीति को उसके दबाव में ही रहना पड़ता है। जनता की भलाई करने वाली राजनीति को परछाई और पूंजीवाद की शक्ल अख्तियार करनी पड़ती है। अभी पूंजीवाद की राजनीति पर गिरफ्त इतनी ज्यादा है कि उसके समर्थक ही सरकार के कर्ताधर्ता बने हुए हैं। देश में आम लोगों की भलाई के लिए चलने वाली राजनीति दोराहे पर खड़ी हो गई है।
अन्ना हजारे का अभियान इस रूप में जागरूक करने की कोशिश रहा है कि उनके द्वारा बनाया गया लोकपाल बिल यदि संसद से पारित कर दिया गया तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। दूसरा कोई नारा भी नहीं है। वंदे मातरम, भारत माता की जय और अन्ना का करिश्मा ही नारे की शक्ल में सामने आ रहा है। यह बहुत संभव है कि अन्ना पैसे-कौड़ी के मामले में ईमानदार व्यक्ति हों। मनमोहन सिंह के बारे में भी कहा जाता रहा है कि वे बेहद ईमानदार प्रधानमंत्री है। अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में भी यही बात कहीं जाती रही है। ईमानदार व्यक्ति ईमानदार के अलावा वो बहुत कुछ हो सकता है जो समाज और लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं हो। सवाल यह है कि ईमानदार व्यक्ति की ऊर्जा कहां लग रही है। ईमानदारी और व्यक्तिगत त्याग किसके काम आ रहा है। दरअसल किसी आंदोलन में मुद्दा ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि किसी भी आंदोलन की अंतरधारा में क्या है वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। अन्ना के आंदोलन में जो अंतरधाराएं हैं वे वंदे मातरम, भारत माता की जय की शक्ल में भी हैं। जय प्रकाश ने जब आंदोलन शुरू किया था तो ऊपर से वह दूसरी आजादी की लड़ाई दिख रही थी। लेकिन अंदर जाति, धर्म, पूंजीवादी , धार्मिक राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार आदि भी बने हुए थे। इसीलिए उस आंदोलन के बाद ये सारी धाराएं बहुत मजबूती से उभरकर सामने आईं। इतिहास में कई बार होता है कि जब राजनीतिक तौर पर अपनी ताकत बढ़ाना संभव नहीं होता है तो विभिन्न तरह की धाराएं किसी मुद्दे के जरिये अपनी हैसियत बढ़ाने की कोशिश करती है। भूमंडलीकरण के शुरू होने के बाद जिस तरह की धाराएं राजनीतिक तौर पर कमजोर व पराजित हुई है, वे लगातार अपनी जमीन को मजबूत करने की कोशिश में लगी है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी धारा में कितनी तरह की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक धाराएं सक्रिय हैं, इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। यह सच है कि समाज का हर हिस्सा भ्रष्टाचार की एक धारा के दमन का शिकार है लेकिन केवल वही एका का आधार बन सकता है?
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 12, 2011 07:11 AM· permalink
शम्मी कपूर को गुजरे तीन हफ्ते हो चुके हैं। शम्मी कपूर व मोहम्मद रफ़ी ने मिलकर हिंदी फिल्म संगीत का जो अद्भुत अध्याय रचा है उस पर लिखने की बहुत दिनों से इच्छा थी। पर पहले अन्ना के आंदोलन को लेकर ये इच्छा जाती रही और फिर कार्यालय की व्यस्तताओं ने कंप्यूटर के कुंजीपटल के सामने बैठने नहीं दिया। दरअसल मैं जब भी शम्मी कपूर के बारे में सोचता हूँ तो मुझे सत्तर और अस्सी के दशक का श्वेत श्याम और बाद का
(अगर ये विषय आपकी पसंद का है तो पूरा लेख पढ़ने के लिए आप लेख के शीर्षक की लिंक पर क्लिक कर पूरा लेख पढ़ सकते हैं। लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया आप जवाबी ई मेल या वेब साइट पर जाकर दे सकते हैं।आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा!)
Posted by Manish Kumar (manish_kmr1111@yahoo.com) on September 11, 2011 08:42 AM· permalink
समयसे दफ़्तर पहुँचने के इरादेमें शांति की सुबहें काफ़ीहड़बड़ी से गुज़रती हैं।हड़बड़ी की उस अपवित्र नदीमें रोज़-रोज़उतरने से बचने का नया तरीक़ाशांति ने यह निकाला कि पूरेघर की घड़ियाँ दस मिनट आगे करदीं। अपने आप को बुद्धू बनानेकी इस मासूम कोशिश में शांतिलगभग कामयाब हो ही गई थी। सबकुछ जानते हुए भी उस ने सुबहके सारे काम दस मिनट पहले करलिए और दस मिनट पहले दरवाज़ेके बाहर भी हो गई। वो बिना किसीहड़बड़ी के दफ़्तर पहुँच हीगई होती मगर एक आवाज़ ने उसेरोक लिया।
‘हलोजी.. मैंमीना हूँ..’ शांतिने देखा कि एक छरहरी और सलोनीमहिला सामने के फ़्लैट मेंसे उस की ओर मुख़ातिब है। जिसतरह के मुख़्तसर अंदाज़ सेजिस संवाद की शुरुआत हुई,उसीतरह पर क़ायम नहीं रहा। मीनाने अगले आठ मिनटों को अपनेपरिचय के नाम किया। शांति अपनेतेज-तरार्रछवि के बावजूद किसी दोस्तानाअजनबी से बदतमीज़ी करने कासाहस नहीं रखती थी। अपना परिचयहो जाने के बाद मीना ने उसे नईदोस्ती की शुरुआत माना औरदोस्ती में शक्कर जैसी मामूलीचीज़ को आड़े नहीं आने देनेका ऐलान भी कर दिया-आपकेपास थोड़ी सी शक्कर होगी क्या..?भलाभारत का ऐसा कौन सा बदनसीब घरहोगा जिसके अन्दर थोड़ी सीशक्कर रखने की भी गरिमा न हो।मदद शब्द के आगे बेबस होकरतत्पर हो जाने वाली शांति कोशक्कर ला कर देने में पूरेडेढ़ मिनट लगे। और अगले साढ़ेचार मिनट मीना ने शांति काधन्यवाद करने में लगाए जिसकेआदान-प्रदानसे दो पड़ोसियों की दोस्तीकी बड़ी मीठी शुरुआत हुई थी।अपनी मीठी पड़ोसन से मुक्तिपाने के क्षण में शांति अपनीघड़ी के अनुसार पूरे चौदह मिनटलेट हो चुकी थी और उसके भीतररोज़ से कहीं ज़्यादा हड़बड़ीमची हुई थी। हालांकि ये ख़यालउसे दफ़्तर जाकर ही आया किउसने घड़ी दस मिनट आगे कर दीथी।
उसदिन जब शांति लौटकर आई तो मीनाउसे बाहर ही मिल गई। इस बारउसने अपने बारे में कम बात की।सात मिनट उसने दूसरे पड़ोसियोंके जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं कोअपने बयान से रौशन किया जिनकेविषय में शांति को कई साल केपरिचय के बाद भी कुछ हवा नहींथी। शांति ने माना कि उसकीनौकरी ही इस ग़फ़लत के लिएज़िम्मेदार थी। और इस क्षेत्रमें अपनी प्रतिभाहीनता कीबात को पूरे तौर पर छिपा लेगई। अगले तीन मिनट मीना नेशांति की नौकरी की बारीक़ियोंको समझने में समर्पित किए।और शांति ने बिना ये ख़याल किएकि मीना उन सूचनाओं को एकख़ुराक़ की तरह ग्रहण कर रहीहै। और मुलाक़ात शेष होने ठीकपहले मीना ने एक आलू माँगकरपड़ोसी धर्म की नींव को औरपुख़्ता किया।
फिरतो रोज़ सुबह-शाम,दफ़्तरआते-जातेयही क्रम हो गया। शांति इस बातका फ़ैसला कर ही नहीं पाती थीकि चीज़े माँगने के लिए मीनाबातों की भूमिका बनाती है याफिर बतरस की तलब में चीज़ेमाँगने का बहाना करती है।क्योंकि न तो कभी उसकी बातेशेष होतीं और न ही छोटी-मोटीचीज़ों की माँग। उसके घर मेंकभी धनिया नहीं होता,कभीअदरक, कभीमिरचा, तोकभी दही। एक दो शांति ने यह भीसोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं किवो कुछ खरीदती ही नहीं,सिर्फ़माँगकर ही काम चलाती है-शांतिको क्या पता.. औरकिसके घर से वो क्या-क्यामाँगती है। लेकिन फिर शांतिको अपनी ही सोच पर कोफ़्त हुई।
फिरएक सुबह मीना आ गई ‘शांति,बड़ीमुसीबत है.. मुझेतो ये फ़ोन ही समझ नहीं आता..नम्बरकिसी को कैसे भेजते हैं?’बसहो गई पन्द्रह मिनट की छुट्टी।जब तक शांति उसे एक सरल और सुलभतरीक़ा समझाती, मीनाअपने प्रचार उपकरण में अटकीहुई सूचनाओं से अपने को ख़ालीकरती रही। फ़ोन की समस्यासुलझी तो सीडी में उलझ गई।‘देखो न, नजाने क्या हो गया है इस सीडीको.. ज़राचेक तो करो मेरे यहाँ चल हीनहीं रही.. मेरीबड़ी फ़ेवरिट सीडी है,मेरेभगवान के भजन है इसमें..सुनतीरहती हूँ इसे..’ वैसेबड़ी भक्त क़िस्म की औरत हैमीना। सवेरे शाम पूजा करतीहै। हफ़्ते में दो दिन उपवासरखती है और तीन दिन मन्दिरजाती है। और जब भी मन्दिर जातीहै शांति को प्रसाद देना नहींभूलती। अगर उस दिन शांति नमिले तो अगली बार मिलने परसारे प्रसाद चुकता कर देतीहै।
एकदिन शांति नीबू लेने नुक्कड़की दुकान तक जा रही थी कि दरवाज़ाखोलते ही मीना दिख गई। शांतिको लगा कि ज़रूर कुछ माँगेगीऔर माँगा भी- ‘आपकेपास बाम होगा क्या..बड़ासरदर्द हो रहा है दोपहर से..’शांतिके पास बाम नहीं था। वो चलनेलगी।
‘किधरजा रही हो..’
‘नुक्कड़तक.. नींबूलाने..’
‘नींबू..?तोउसके लिए नुक्कड़ तक क्योंजा रहे हो.. हमक्या मर गए हैं..’
मीनाके स्वर में एक विचित्र तल्ख़ीथी। शांति को अचानक एहसास हुआकि उसने अलिखित पड़ोसी धर्मके विरुद्ध आचरण किया। किसीतरह उसने बात को सम्हाला औरमीना की आहत भावनाओं की रक्षाकी। उस दिन के बाद से शांतिकिसी चीज़ की अचानक ज़रूरतखड़ी होने पर पहले मीना केबारे में सोचती, बादमें किसी और के बारे में। मगरपरस्पर प्रेम के ये भले दिनज़्यादा दिन नहीं टिके। मीनाके मकान की लीज़ ख़त्म हो गईऔर वो दूसरे मुहल्ले में रहनेचली गई। जब से वो गई है शांतिको दफ़्तर से आते-जातेकोई नहीं टोकता, कोईनहीं रोकता। मुहल्ले में क्याहो रहा है शांति को पता चलनाबंद हो गया। शांति का जीवनपुराने ढर्रे पर लौट गया।
एकशाम शांति ने देखा कि दाल मेंछौंक लगाने के लिए लहसुन नहींहै। बेख़याली में दरवाज़ाखोल कर मीना के दरवाज़े तक चलीआई और उसकी फ़्लैट की घंटी परउंगली रखकर अचानक याद आया किमीना तो चली गई। वहाँ कोई औररहने आ गया है। मीना होती तोबेहिचक घंटी बजाकर दोस्ती करलेती और लहसुन भी माँग लेती।पर शांति सकुचा गई और शांतिको पहली बार मीना जैसा बिंदासन होने पर अफ़सोस हुआ।
क़रीबदो हफ़्ते बाद शांति दफ़्तरसे लौटकर साँस ले ही रही थी किघंटी बजी। देखा तो मीना थी।एक पल के लिए शांति भूल ही गईकि मीना अब उसकी पड़ोसी नहींहै। उसने सोचा कि मीना शक्करया नमक या ऐसी ही कोई चीज़माँगने आई है। जैसे ही उसकीनज़र मीना के कपड़ों और मेकपपर गई शांति अपने कालभँवर सेउबर आई। मीना कुछ माँगने नहीं,ख़ासउससे मिलने आई है। और दो मिनटबाद जैसे ही मीना ने अपने नएमुहल्ले की सारी खट्टी-मीठीऔर नमकीन ख़बरें उसे बतानाशुरू किया शांति की समझ आयाकि वो नमक लेने नहीं,नमकदेने आई थी। शांति अपने मुहल्लेकी तमाम ख़बरों से अवश्य महरूमहो गई थी पर किसी और मुहल्लेकी सारी ख़बरें उसे मिलनेलगीं।
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(28 अगस्त को दैनिक भास्कर में शाया हुई)
Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on September 10, 2011 11:18 AM· permalink
कभी मंजिलो पे हम पहुंचे ही नहीं कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं || जिंदगी के झमेले ,झमेलों के मेले, झमेलों के मेले, उलझनों में उलझ कर सुलझे ही नहीं| कभी तुम नहीं तो कभी हम नहीं | जो चाहा था कहना ,कह न सके हम कह न सके हम , कभी सुन सके [...]
Posted by ramadwivedi on September 10, 2011 09:17 AM· permalink
शामके समय दफ़्तर सिर्फ़ सन्नाटेसे गूँज रहा था। शांति को दीवारकी ओर मुँह करके सौ तक गिनतीगिननी थी पर उसने नहीं गिनीथी। फिर भी अचरज छुप गया था।शांति को उसे खोजना था पर शांतिका मन खेल में नहीं था। दफ़्तरख़त्म हो गया था पर शांति काकाम ख़त्म नहीं हुआ था। छूटेहुए कामों ने उसके मन को उलझारखा था। अचरज ऐसी किसी उलझनमें नहीं था। वह शुद्ध प्रतीक्षाकर रहा था ख़ुद को खोज लिए जानेकी। यह जैसे शिकारी और शिकारका एक खेल था। शांति को शिकारीहोना था और अचरज शिकार की भूमिकामें था। वो जो महसूस कर रहा थावो शायद एक आदिम रोमांच थाजिसने उसके शरीर की सारीइंद्रियों को अपने चरम सामर्थ्यतक खींच डाला था। आँखों और काननिहायत चौकन्ने, हाथ-पैरकिसी भी पल हरकत में आ जाने केलिए तत्पर और दिल पूरे शरीरमें ख़ून को तेज़ी से फेंकनेके लिए धौंकनी सा धौंक रहा था।एक-एक पल के प्रतिसचेत था वो। जब बहुत लम्बे-लम्बेढेर सारे पल यूँ ही बीत गए तोउसने बहुत हौले से झांक करदेखा उस दिशा में जिधर से शांतिको आना था। शांति वहीं अपनीमेज़ के पीछे अपने लैपटॉप मेंसर सटाए बैठी थी।
ममा,मैं छुप गया हूँ..आओ! अचरजवापस अपने छुपने की जगह जाकरउत्तेजना में उतराने लगा।
अचरजस्कूल से सीधे शांति के दफ़्तरआ गया था क्योंकि घर पर न तोसासू माँ थीं और न ही पाखी। औरदफ़्तर अचरज के लिए एक अनोखासंसार था। उसका विस्तार,उसकी ऊँची छत,छोटे-छोटेचौकोर हिस्सों में विभाजितलम्बे काउन्टर, औरहर कुछ का सलेटी-नीलीरंगत में रंगा होना भी अचरजके लिए एक भूलभुलैया सा है।चमचमाती रौशनी से जगमगाने केबावजूद वो सारा कुछ अचरज केलिए एक रहस्य के खोल से ढकाहुआ है। उस रहस्य का अनजानापनअचरज के लिए भय और उत्तेजनाका आधार है।
इसीभय और उत्तेजना की राह सेगुज़रकर उसने सबसे पहले घरके अनजानेपन का अनुसंधान कियाथा। फिर घर से निकलकर जिस-जिसइमारत में रहे उन इमारतों काअनुसंधान किया था। और फिरस्कूल में भर्ती हो जाने केबाद स्कूल में सहज रूप से नदिखने वाले कोनों और अँतरोंमें छुपे हुए आयामों का भीअपने साथियों के साथ अन्वेषणकिया था- बिना यहजाने कि स्कूल में दाख़िलालेने वाली हर पीढ़ी उन्हीकोनों का बार-बारअन्वेषण करती है और उसके रोमांचसे गुज़रती है।
अचरजकी आशा थी कि उसके शिकार काचरम किसी दबोच लिए जाने वालीचेष्टा या फिर चौंका देनेवाले सुर से होगा। पर शांतिने जो किया वो बिलकुल भी उसस्वभाव का नहीं था। अपनी उलझनोंको लपेटती हुई सी शांति आई औरसिर्फ़ यह कहकर उसके बग़ल सेगुज़र गई – चलो! नकोई हमला, न कोई चीख,न जक़ड़ने की जल्दीऔर न बच निकलने की हड़बड़ी -शिकार के किसी तत्वका कुछ भी नहीं मज़ा नहीं मिलाअचरज को। वो मायूस हो गया।अपनी जगह से हिला भी नहीं।शांति खीजकर उलटे पाँव लौटीऔर लगभग उसे घसीटते हुए सीअपने साथ नीचे ले गई।
परममा, तुमने प्रौमिसकिया था..
हाँकिया था.. पर अभीटाईम नहीं है बेटा.. घरभी तो जाना है..
प्लीज़ममा.. चलो खेलो न..प्लीज़ ममी प्लीज़..
अचरजअपने बालहठ में उतरकर पैरपटकने लगा। हारकर शांति नेसमझौते की राह लेनी चाही-अच्छा ठीक है.. घरचलकर खेलेंगे..
घरपर तो मैं रोज़ खेलता हूँ..यहाँ खेलते हैं न ममा..कितनी बड़ी जगह है..यहाँ कितना मज़ा आएगा..
शांतिने उसे फिर से बहलाने की कोशिशकी पर अचरज ने ठुनकना शुरू करदिया। तब तक शांति उसका हाथपकड़ कर खींचते हुए पार्किंगतक ले आई थी। शांति ने उसे झांसादिया कि दफ़्तर में तो चौकीदारने ताला मार दिया होगा-तो वहाँ लौटनातो मुमकिन नहीं और अपनी नेकनीयतदिखाने के लिए उसे पार्किंगमें छुपन-छुपाईखेलने का प्रस्ताव दे डाला।अचरज ने नज़र उठाकर देखा-पार्किंग मेंअंधेरे और उजाले का एक अजबचितकबरा दृश्य फैला हुआ था।काफ़ी कुछ ख़ाली पार्किंगमें कहीं-कहींकारें और मोटरसाईकलें खड़ीहुई थीं। वो एक ऐसी जगह थी जोनन्हे अचरज के लिए बिलकुलअपरिचित और अनजान थी। उसेदेखकर ही अचरज के दिल में अज्ञातके भय की एक लहर सी थरथरानेलगी। उस भय की छायाओं को उसकेचेहरे पर देख शांति को यह उम्मीदहुई थी कि वो ना कर देगा। परअचरज ने हामी भर दी।
शांतिके पास अपने ही प्रस्ताव सेपलट जाने का विकल्प नहीं बचा।अचरज एक बार शिकार बन चुका था-अब शांति कीशिकार बनने की बारी थी। शांतिने सोचा- वोऐसी जगह छुपेगी जहाँ से उसेखोजने में अचरज को ज़रा भीमशक़्क़त न करनी पड़े। अचरजउसके स्कूटर के पास वाली दीवारमें मुँह गड़ाकर गिनती गिननेलगा और शांति उससे एक खम्बाछोड़कर दूसरे खम्बे के पीछेछुपकर खड़ी हो गई। लेकिन शांतिउस पल में मौजूद ही नहीं थी।वह दो घंटे पहले के पल में पैदाहुई किसी दफ़्तरी चिंता मेंबार-बारगोते खा रही थी।
वहींखड़े-खड़ेजब कुछ मिनट गुज़र गए और अचरजनहीं आया तो अचानक शांति कोफ़िक़्र हुई। उसने मुड़करदेखा -अचरजनहीं दिखा। खेल के नियम केअनुसार उसे हर सूरत में अपनेआपको छुपाए रखना चाहिए पर वोखेल भूल गई और खम्बे की आड़छोड़कर वो अचरज को देखने केलिए पार्किंग के बीचोबीच आखड़ी हुई। फिर भी अचरज उसेकहीं नहीं दिखाई दिया। शांतिने आवाज़ दी- अचरज!!कोई जवाब नहींआया। दो-तीनबार और पुकारा- कोईजवाब नहीं। फिर तो बुरीतरह घबरा गई शांति। हड़बड़ाएक़दमों से पहले पार्किंग केएक कोने तक दौड़ गई और फिर दूसरेकोने तक। अचरज कहीं भी नहींमिला। तरह-तरहके डर उसके मन में उमड़ने लगे।हथेलियों से पसीना छूटने लगा,मुँह सूख गया,सांसे उखड़नेलगीं। क्या करे - कुछसमझ नहीं पा रही थी। दिमाग़हज़ार दिशाओं में एक साथ दौड़नेलगा। उसे ऐसा लगने लगा जैसेकि पैरों में जान ही न हो-सारी शक्तिनिचुड़ के कहीं बह गई हो। लगाकि चक्कर खाके गिर पड़ेगी।तो खम्बे के सहारे जैसे हीअपनी देह को टिकाया एक तीखीआवाज़ ने उसे बुरी तरह चौंकादिया। एक पल वो आवाज़ भय की एकलहर बनकर उसके ह्रदय को चीरतीचली गई और कहीं गहरे जाकर चुभसी गई। वो अचरज था जो खम्बे केपीछे से आकर शिकार कर लेने काविजयघोष कर रहा था। अचरज कीउत्तेजना में एक शिकारी कीसफलता की ख़ुशी थी। पर शांतिख़ुश नहीं हुई, वोझुंझला गई और चिड़चिड़ानेलगी और किसी तरह से अचरज कोझापड़ मारने से ख़ुद को रोका।खो जाने और मिल जाने का जो आदिमखेल अचरज खेलना चाह रहा थाउसका कोई स्वाद था जो शांतिबड़े होने की कसरत में कहींभूल आई थी।
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Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on September 09, 2011 12:02 PM· permalink
नही !... हमे सिक्यूरिटी की कोई जरुरत है ही नहीं. हमारे साथ तो सारी जनता है. हम सरकार से जन लोकपाल बिल मांग रहे हैं, और आप हमें जेड सिक्यूरिटी दे रहे हैं?
सर, ये तो आपको लेना ही पड़ेगा, आपकी जान को खतरा है, और आपकी जिन्दगी सरकार की जिम्मेदारी है।
मुझे...खतरा..वो भला किससे?
सबसे पहले तो आप को सबसे बड़ा खतरा खुद से है...न उम्र देखते हैं, न बॉडी. बस, चार जवानों के बहकावे में आकर भूखे बैठ गए हैं। वो सब तो खाते पीते रहते हैं,और आप...बस, अड़े हैं वन्दे मातरम, इन्कलाब-जिन्दाबाद करते. कभी कुछ ऊँच नीच हो जाये तब वो तो सरकार पर थोप कर अलग हो जायेंगे. निपटोगे आप और फ़ँसेगी ---बेचारी सरकार.
अरे भाई, हमारा क्या है? हम तो यहाँ भी मंदिर में सोये हैं पंखे में..और वहाँ तो चैम्बर मिल गया था और बढि़या कूलर वगैरह लगा था,तो नींद भी ठीक से आ-जा रही थी. वो भी कह रहे थे कि एक दो दिन में सब सेट हो जायेगा फिर बढ़िया खाना खा लिजियेगा, तो रुके रहे. एक बार तो लगा भी था कि -सरकार और उनके चक्कर में हम पिस गये..१३ दिन निकल गये. मगर कम से कम यह बढ़िया रहा कि इस बहाने पूरा मेडिकल चैक अप- टॉप डॉक्टरों से और टॉप के अस्पताल में हो गया. शानदार गद्दे वाले बिस्तर पर तीन दिन सोये अनशन के बाद. अब कम से कम हेल्थ की तरफ से कुछ दिनों तक कोई टेंशन नहीं. ये तो पता ही था कि- उस समय कोई तो क्या अगर मैं खुद भी मरना चाहता तो भी वेदांता अस्पताल के डॉक्टर मुझे मरने न देते.
एक रात जब स्वास्थय को लेकर थोड़ा डाऊट था, तो पुलिस ने डिसाईड कर ही लिया था कि उठवा कर ग्लूकोज लगवा देंगे तो एक प्रकार से चिन्ता मुक्त ही था. ऐसे में मुझे जेड सिक्यूरिटी की क्या जरुरत?
देखिये अन्ना जी, आप समझ नहीं रहे, पिछले दिनों भी आपसे मिलने वाले छलनी होकर ही मिल रहे थे. जिन्हें आपके वो चार स्तंभ चाहते थे वो ही आपसे मिल सकते थे. तब जेड सिक्यूरिटी जैसा काम वो संभाले थे. अब उनका नाम और काम हो गया, वो अपने रास्ते पर चले गये हैं. फिर जब जरुरत पड़ेगी, तब फिर आवेंगे आपके पास. अभी उनको आपकी मेन टेंशन नहीं है, इसलिए सरकार को चिन्ता करनी पड़ रही है. सरकार तो आपका आभार भी कह चुकी है. प्लीज, ले लिजिये न जेड सिक्यूरिटी...ऐसी भी क्या नाराज़गी है सरकार से ...आखिर आपकी सो कॉल्ड जनता ने ही तो सरकार चुनी है...जब जनता आपकी है तो सरकार भी तो आपकी ही कहलाई..कभी हल्का मनमुटाव आपसी वालों में तो होता है, अब भूल भी जाईये उसे..ले लिजिये न प्लीज़ जेड सिक्यूरिटी. देखिये, मना मत करियेगा.
चलिये, अब आप इतनी चिन्ता जता रहे हैं, संबंधों की दुहाई दे रहे हैं तो आपका मान रख लेता हूँ. मगर पब्लिक को क्या कहूँगा कि तुम्हारा अपना मैं, तुम्हारे और मेरे बीच ऐसा बाड़ा क्यूँ बाँध रहा हूँ?
सर, आप अपनी शर्तें डाल दिजिये इस जेड सिक्यूरिटी को लेने में...
व्हाट एन आईडिया सर जी...आप तो मेरे भी अन्ना निकले ! ! तो ऐसा करो..जेड सिक्यूरिटी तो दो मगर सादी वेषभूशा में ----हैं भी है और नहीं भी. पब्लिक को पता भी न चले और मिल भी नहीं सकती. सादी वेशभूषा में ए के ४७ धारक.. सर्फ एक्सल की तरह काम भी बन जायेगा और वजह...बस ढूँढते रह जाओगे. यह बोलते वक्त न चाहते हुए भी जाने कैसे उनकी एक आँख चंचलता में दब ही गई और सुबह का समय था तो पोहा और केला खाने लगे.
बात आगे बढ़ाते हुए बोले कि एक बात ध्यान रखना कि जेड सिक्यूरिटी ले तो रहा हूँ मगर सिर्फ इतनी खबर और कर दो सरकार को...
क्या हुजूर..फरमायें?
देखो, अगले अनशन के लिए ऑफर लाल बत्ती की गाड़ी का चाहिए मगर कण्डीशन ये- कि उसमें लाल बत्ती न हो...आँख को दबाते वे बोले
हो जायेगा सर..
और उसके बाद वाले में दिल्ली में एक सरकारी बंगला..एयर कन्डिशन्ड...मगर स्प्लिट एसी..जो बाहर से न दिखें...
हो जायेगा, सर...
और फिर केबीनेट मिनिस्टर का दर्जा...मगर मैं कैबिनिट मिनिस्टर नहीं बनूँगा...
ठीक है सर...
और मंत्री वाली तनख्वाह और भत्ते भी...
वैसे ये अलग से बताने की जरूरत नहीं ये तो खैर दर्जे के साथ पैकेज डील में आयेगा ही... है न!!
और मुझे लोकपाल का पद....
चलिये, इस पर भी विचार कर लेंगे...आखिर कितने साल के लिए देना ही होगा ये पद आपको
क्यूँ...
सर, आप ७४ साल के हो चले हैं....तो ऐसे ही पूछ लिया ...
मगर जेड सिक्यूरिटी का फिर क्या फायदा?
सॉरी सर ...चलिए इस पर कमेटी बैठा देते हैं कि लोकपाल किस तरह नियुक्त किया जा सकता है...
ओके,...और मेरे लिए भोजन के लिए खानसामा मेरे गाँव से, वो ही दिल्ली जायेगी जो पिछले ३० साल से मेरा खाना बना रही है....
मगर सर, वैसा खाना तो कोई भी बना देगा ...एकदम सादा है....
नहीं ! ! कोई भी कैसे बना सकता है ??और फ़िर मुझे उसी के हाथ का खाना है..मेरी जिद्द...
सर, आप जिद्द बहुत करते हैं...चलिए कोशिश करेंगे वो भी हो जाए. वैसे .....आपकी डाईट तो आजकल दुबले होने की ख्वाहिश लिए युवाओं में अन्ना डाईट के नाम से पापुलर हो रही है...आपकी डाईट ने तो वाईब्रेशन क्रिएट कर दिया है फिटनेस फ्रीक्स में::
अन्ना डाईट...
सुबह एक कटोरी पोहा, दो केला दोपहर में दो सूखी रोटी, एक कटोरी दाल, एक कम मसाले की हरी सब्जी रात ७ बजे एक ग्लास फ्रेश फ्रूट ज्यूस....
बस!!!! अब आखिरी...
अब क्या?
एक इन्फोर्मेशन और निकलवा कर रख लेना बस, यूँ ही देखने के लिए चाहिये...
क्या?
ये स्विस बैंक में एकाऊन्ट कैसे खुलता है?
आप भी बहुत मजाकिया हैं सर जी...
हा हा!! चलो, कल से जेड सिक्यूरिटी भेज दो!!
ओके सर
याद आता है बचपन में बुजुर्गों से मिली नसीहत कि नशेड़ी पैदा नशेड़ी नहीं होते. शुरु में कोई मित्र हल्की सी चखवा देता है...फिर धीरे धीरे आदत लग जाती है. फिर उसके बिना रहा नहीं जाता. मात्रा भी बढ़ती जाती है और लो, बन गये नशेड़ी. अब वो उनकों ढूँढेगा, जहाँ से नशा मिल जाये...बस!!! और फिर सुविधाओं और पावर से बड़ा नशा और कौन सा?
ये भी याद है कि पहले पंखा लगा मिल जाये तो अच्छी खासी गरमी में भी सुकून से सो लेते थे और अब हालत यह है कि ए सी न मिले तो कुलर में भी रात करवट बदलते ही गुजरती है. यह सुविधाओं की प्रवृति है, जकड़ लेना उसका स्वभाव!!
डा.अंजना संधीर की कविता का अंश: ............ ............ इसीलिए कहता हूँ कि तुम नए हो, अमरीका जब साँसों में बसने लगे, तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार अपनों के चेहरे याद रखना। जब स्वाद में बसने लगे अमरीका, तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद करना । सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना। यहीं से जाग जाना..... संस्कृति की मशाल जलाए रखना अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना । अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में जम जाता है!
Posted by Udan Tashtari (sameer.lal@gmail.com) on September 09, 2011 01:00 AM· permalink
इस चिट्ठी में, वसन्तकुंज दिल्ली में स्थित, डी.टी. स्टार प्रॉमेनेड नामक मॉल में स्थित , ओम शांति की पुस्तकों की दुकान के साथ, तुषार राहेजा की 'एनीथिंग फार यू मैम' पुस्तक की चर्चा है।
पॉन्डचेरी यात्रा से लौटते समय, दिल्ली में भी रुकना हुआ। वहां पर हमारे पास कुछ समय था। सोचा कि कोई फिल्म देखी जाय।
हमारे कस्बे में अब अंग्रेजी फिल्म देखने को नहीं मिलती है। यदि मिलती है तो हिन्दी में डब की हुई। वह समझ में तो ज्यादा आती हैं पर मजा नहीं आता है। अंग्रेजों को, हिन्दी में बात करते हुए देख, अजीब सा लगता है। इसलिए कस्बे के बाहर, वह अंग्रेजी फिल्म देखना पसंद करता हूं जो कि हिन्दी में डब न की गयी हो। यानी, अंग्रेजी में हो।
हम लोगों ने 'लव हैपेनस्' (Love Happens) फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया। फिल्म देखने का मज़ा तो केवल पीवीआर में है। इसलिये हम, वसंतकुज की डी.टी. स्टार प्रॉमेनेड नामक मॉल में गये। हमने फिल्म का टिकट लिया और वहां एक रेस्त्रां में इटलियन खाना खाया। फिल्म शुरू होने में कुछ समय था। वहां पर, ओम शांति नाम की पुस्तकों की दुकान है। समय काटने के लिये, हम उसमें चले गये। मुझे अच्छा लगा कि वहां पर एक आलमारी में, हिन्दी की पुस्तकें थी।
तुशार राहेजा आई टी दिल्ली के पुरातन छात्र हैं। उन्होंने एक पुस्तक लिखी है 'एनीथिंग फार यू मैम' (Anything for you Ma'am)। यह पुस्तक भी वहां थी। मैंने इस पुस्तक को अंग्रेजी में खरीदने को सोचा पर हिन्दी पुस्तक आलमारी में, इसका हिन्दी अनुवाद भी था। मैंने उसे लिया और दुकान वाले से पूछा कि क्या आपकी हिन्दी में लिखी पुस्तकें बिकती हैं। उसने अंग्रेजी लहज़े में, हिन्दी बोलते हुए कहा कि बहुत कम बिकती हैं। मैंने पूछा,
'क्या यह पुस्तक बिकी?'
उसने बताया,
'बहुत ज्यादा बिकी है अंग्रेजी की लगभग ५० कापियां और हिन्दी में आप पहले व्यक्ति हैं जो इसे ख़रीद रहे हैं। यही कारण है कि हम हिन्दी की बहुत कम पुस्तकें रखते हैं।'
मैनें कहा,
'मैं हिन्दी की कॉपी लेता हूं। अगली बार हिन्दी की और पुस्तकें लूंगा। इससे आपकी हिन्दी की पुस्तकों की मांग बढ़ेगी।'
मालूम नहीं कि आगे यह हुआ कि नहीं।
मुझे चेतन भगत की 'फ़ाइव प्वाइंट समवन' पसन्द आयी थी पर यह यह पुस्तक कुछ साधारण सी लगी; कुछ खास पसन्द नहीं आयी। लगा कि 'फ़ाइव प्वाइंट समवन' की सफलता देख कर, लिखी गयी है। यह सच है कि पढ़ाई के साथ कुछ मस्ती भी होनी चाहिये। लेकिन, ऐसी मस्ती जो आपके विद्यालय को अच्छे प्रकाश में न दिखाये, वह किस काम की।
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में लव हैपन्स् फिल्म देखने चलेंगे।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
देश को आतंक के ऐसे खौफ़ नाक चेहरे से हमेशा रूबरू होना पड़ रहा है। हम मूक दर्शक होकर अपनो को मरने दे रहे है, इससे बड़ा राष्ट्रीय शर्म और क्या हो सकता है। अभी दिल्ली धमाको के सदमे से ऊबरी भी नही थी कि मीडिया हाऊसो को भेजे ईमेल के द्वारा भारत सरकार फिर से आंतकी हमलो की खुली चुनौती दी गई किन्तु अभी भी हम विचार मंथन से अतिरिक्त कुछ भी कदम उठा पाने के असक्षम है।
हम ऐसे आतंकियो को रोक पाने मे क्यो असक्षम है जबकि अमेरिका और इग्लैंड जैसे राष्ट्र 2001 और 2005 के प्रथम आतंकी हमलो के बाद कोई बड़ा हमला नही देखा किन्तु हमने संसद पर हमले के बाद 50 से अधिक आतंकी हमले झेले है और आज भी झेल रहे है। इसका क्या कारण है कि अमेरिका और इंग्लैण्ड ने फिर ऐसे दर्द नाक मंजर नही क्यो नही देखा क्योकि उनके देश मे आंतकियो को धर्म नही देखा जाता, आतंकियो को आन द स्पॉट उसके अंजाम पर पर पहुँचा दिया जाता है। परन्तु भारत की स्थिति भिन्न है भारत को सेक्युलर देश दिखाने के लिये आंतकियो को धर्म के नाम पर संगरक्षण दिया जाता है यही कारण है कि संसद पर हमले का मुख्य आरोपी अफ़जल गुरू और मुम्बई हमलो का एक मात्र जिन्दा अभियुक्त को कोर्ट से सजा-ए-मौत हो जाने के बाद भी हमारी सरकार ऐसे खतरनाक आतंकी को सिर्फ इसलिये संरक्षण दे रही है क्योकि वह मुस्लिम है और सरकार खुलकर हिन्दूवादी संगठनो को आंतकी घोषित करने पर तुली है। आतंकी का कोई धर्म नही होता है किन्तु इसे भी इग्नोर नही किया जा सकता है कि जितने भी आतंकी भारत तथा विश्व के अन्य देशो पर हमले किये है उनमे मुस्लिम ही निकलते है और तो और जहाँ भी मुस्लिम बहुल्य इलाके है वहाँ आंतकी गतिविधिया होती रहती है इससे चीन भी अछूता नही है।
आजादी के वक़्त और फिर उसके बाद आज तक कांग्रेस की 'मुसलमानों के प्रति तुष्टीकरण नीति' ने इस देश की खूब दुर्दशा कराई है... उपर से सच्चर जैसी कमेटी और सपोलो को दुग्धपान करने की नीति को पोषण देने की है। जिन लोको को हम आरक्षण के देकर तकनीकि शिक्षा दे रहे है वही तो ऐसी शिक्षा का उपयोग आतंकी गतिविधियो मे कर रहे है। आज भारत के समक्ष जितनी भी आतंकी गतिविधिया होती है हम चाह कर के भी उन पर लगाम इसलिये नही लगा पा रहे है क्योकि हमारी सरकार की सोच ही विभेद पूर्ण है वह आतंक को नही देखती वह आतंकी का धर्म देखती है। इन सब का श्रेय सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की 'मुस्लिम तुष्टीकरण' की राजनीति को जाता है... कांग्रेस की सत्ता लोलुप्ता नीति का ही परिणाम है कि हम आंतकी की खूनी चेहरा दशकों से देख रहे हैं और न जाने अभी और कब तक भोगते रहेंगे।
दिल्ली हाईकोर्ट मे बम विस्फोट मे सिर्फ 12 वकील और नागरिक मारे गये दिल्ली सरकार ने मौत की कीमत 4 लाख रूपये घोषित कर दी है यदि कल की तरीख़ मे ऐसा कोई हमला एक मात्र प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी अथवा राहुल गांधी पर हुआ होता तो भारत के लिये आज का दिन सामान्य न होता, इन किसी की मौत पर आज भारत मे आपातकाल जैसी स्थिति देखने को मिल सकती थी। क्योकि इनकी जान की कीमत है और जनता तो कीड़े माकौड़े की तरह सिर्फ वोट देने के लिये बनी हुई है। राहुल गांधी को अस्पाताल मे राजनीति खेलते हुये शर्म नही आई कि जो परिवार मौत के सदमे मे थे वहाँ राहुल गांधी वोट बटोरने गये थे। गांधी परिवार की निजता निजता है और हम जनता को राहुल कभी भी किसी भी हालत मे देखने जा सकते है चाहे मरीज नग्न अवस्था मे ही क्यो न हो और देश की सुपर पीएम को क्या रोग है यह जानने का अधिकार जनता को नही है।
ढाका से आये हमारे प्रधानमंत्री का यह बयान कि हम आतंकियो से नही हारेगे जैसे आतंकियो और सरकार के बीच शतरंज का खेल हो रहा हो और जनता प्यादो की भाति पिटने के लिये है। अब समय है कि हम शासन को अपने हाथ मे ले क्योकि यह सरकार कही से भी किसी भी स्तर पर जन भावना के लिये काम करने के लिये विफल रही है। हमें सच स्वीकार करना होगा कि कांग्रेस नीत सरकार के हाथो मे आतंकी तो सुरक्षित है किन्तु भारतीय नही।
Posted by महाशक्ति (pramendraps@gmail.com) on September 08, 2011 02:46 PM· permalink
September 8, 2011 FOR IMMEDIATE RELEASE Re: Shifting of TAM Ratings for News Channels from Weekly to Monthly New Delhi: September 8, 2011……The NBA Board, in its effort to improve news broadcasting standards, has taken a decision to move from weekly to monthly ratings for all national news and business channels in Hindi and English. News channels being distinct from other genres, have a responsibility to inform and empower its viewers with quality programming and dissemination of news rather than providing content merely for garnering viewership. Coverage and reportage of news and programmes cannot always be linked to popularity or audience measurement. News broadcasting standards, the NBA Board believed, can only improve with time spent on strategic planning and research rather than knee jerk reactions taken on a weekly basis. This initiative taken by the News Broadcasters Association (NBA) would not in any way hamper the decision making of advertisers and advertising agencies. In the new monthly dispensation, advertisers would continue to get access to data broken down to a minute or a day-part or a specific programme in a manner similar to how data points are currently accessed in the weekly format. The NBA and TAM are in discussion on implementation of this initiative which is being proposed to be introduced initially for a period of two years. The changes are expected to be implemented from October, 2011. Eventually the monthly format is expected to be implemented for regional news channels as well. For further details on this initiative kindly send your queries by email to Mrs. Annie Joseph, Secretary General, NBA at nba@nbanewdelhi.com. Annie Joseph Secretary General
Posted by ravish kumar (noreply@blogger.com) on September 08, 2011 12:13 PM· permalink
प्रिय भारतवासियों, उत्तर प्रदेश के बिजनेसमेन (व्यापारीगण) अब स्वचालित आधुनिक मशीन से युक्त कत्लखाने गायों को काटने के लिए बहुत जल्द बनाने जा रहे है ताकि गायों को तीव्र गति से काटा जा सके, उनके मांस को विदेशों में भेजा जा सके और उन्हें बहुत बड़ा लाभ प्राप्त हो सके | अगर ये लोग इसमें कामयाब हो जाते है तो फिर इन कत्लखानो की संख्या पूरे भारत में बहुत तेजी से बढ़ेगी | पूरे देश के लोग इन कत्लखानो को खोलने का पुरजोर विरोध कर रहे है और उत्तर प्रदेश की सरकार ने कहा है कि अगर एक करोड़ लोग भी कत्लखाने खोलने का विरोध करें और इस आन्दोलन की हिमायत करें तो स्वचालित आधुनिक मशीन से युक्त कत्लखाने खोलने की इजाजत व्यापारियों को नहीं दी जाएगी|
हम गायों की पूजा करते है | भारतीय होने के नाते और मानवता के नाते हम ऐसा होते हुवे हरगिज नहीं देख सकते ................ कृपया आप अपना समर्थन अवश्य दें |
अगर आपको लगता है कि इस तरह के कत्लखाने नहीं खुलने चाहिए तो आप कृपा करके 0522-3095743 पर एक मिस कोल जरूर करे| एक घंटी बजने के बाद कोल अपने आप डिस-कनेक्ट हो जाएगी |
जिस तरह से आपने अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के आन्दोलन को सफल बनाया उसी तरह से आप अपना समर्थन दें | इसमें आपका कोई खर्चा नहीं है, बल्कि आपके इस एक मिस कोल से प्रतिदिन कटने वाली हजारों लाखों गायें बच जाएगी |कृपया आप अपने मोबाइल से मिस्कोल जरूर करें और इसे जितने लोगों तक पंहुचा सके पहुचाये |
मैने मिस कोल कर दिया है ........ अब आपकी बारी है क्योकि क्या आप अपनी माँओ को कटते देख सकते है ?
अभी मिस कोल करे - नंबर है - 05223095743
-- अच्छा लगा हो तो आगे प्रसार दीजिए, फॉरवर्ड कीजिये, और भारतीय भाषाओं में अनुवादित कीजिये, अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए, अपना नाम /मोबाईल नंबर डालिए| मुझे कोई आपत्ति नहीं है| मतलब बस इतना है कि ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये|
Posted by महाशक्ति (pramendraps@gmail.com) on September 08, 2011 05:13 AM· permalink
लिनेक्स फॉउंडेशन एक लाभ निरपक्ष संघ (non-profit consortium) है। यह लिनेक्स को बड़ावा देने के लिये समर्पित है। इसमें, लिनेक्स से सम्बन्धित विडियो भी दाखिल किये जा सकते हैं। इन्हें आप वहां पर या फिर यूट्यूब में देख सकते हैं। यह साल लिनक्स के बीस सालवां साल है। इस साल इसमें खास आयोजन हो रहा है। इस साल दाखिल किये गये एक विडियो में नीचे का वीडियो भी है। इसे माइक्रोसॉफ्ट जर्मनी—जैसा कि उसे दाखिल करने वाले के नाम में लिखा है —ने दाखिल किया है। इसे देखे – क्या ठंडी लड़ाई, प्यार में बदल रही है।
‘मुक्त मानक और वामन की वापसी’ श्रृंखला की अलग अलग कड़ियों को आप नीचे दिये गये लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं। इसकी कुछ कड़ियों को, आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये नीचे लिंक के बगल में ब्रैकेट ( ) के अन्दर लिखे ► चिन्ह पर चटका लगायें। यह ऑडियो फाइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इन्हें आप,
Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में,
सुन सकते हैं। ब्रैकेट के अन्दर चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें। इन्हें डिफॉल्ट करने के तरीके या फायरफॉक्स में सुनने के लिये मैंने यहां विस्तार से बताया है।
चुनावों के करीब जाति-संगठनों के सम्मेलनों में जो प्रस्ताव पारित किए जाते हैं उनमें – ‘हमारी जाति के लोगों को सभी दल अधिक-से-अधिक टिकट दें ‘ टाइप प्रस्ताव प्रमुख होता है । इन संगठनों का एक मुख्य दावा रहता है कि वे अराजनैतिक हैं । सभी दलों से बिरादरी के लोगों के लिए टिकट मांगना अराजनीति है । चुनावों में यह जाति-संगठन अलग-अलग दलों द्वारा उनकी जाति के कितने और किन्हें उम्मीदवार बनाया गया है इसका ऐलान भी करते हैं । विभिन्न दलों के कार्यकर्ता इन संगठनों में एक साथ शामिल रहते हैं ।
एक लक्ष्यीय ‘अराजनैतिक’ संगठनों की इन जाति-संगठनों से कितनी समानता है ! ‘राजनीति धोखा है , धक्का मारो मौका है ‘ का नारा भी लगायेंगे और यह भी कहेंगे , ‘ जो दल हमारी मांग मान लेगा उसे राजनैतिक फायदा मिलेगा ‘ । स्वयंसेवी संस्थाओं के कर्ता-धर्ता तमाम भ्रष्ट दलों के भ्रष्ट नेताओं से नाता रखते हैं । सत्ता के गलियारों में अब इनकी ‘ सलाहकार परिषद ‘ की कोठरियां भी बन गई हैं । इसी प्रकार शिक्षा पर केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड में भी स्वयंसेवी-अराजनैतिकों की नुमाइन्दगी होती है ।
जमीनी-स्तर पर काम करने वाली इन संस्थाओं का समाज-अर्थनीति की खूफियागिरी में किस प्रकार की भूमिका हो सकती है इसके कु्छ उदाहरण देखिए :
भारत में जब इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में तेज प्रगति हो रही थी तब एक विदेशी फन्डिंग एजेन्सी ने एक स्वयंसेवी संस्था को ‘इलेक्ट्रानिक्स उद्योग में महिलाओं की स्थिति ‘ पर एक प्रोजेक्ट दिया । महिलाओं के नाम पर मिले प्रोजेक्ट के बहाने फन्डिंग एजेन्सी को उद्योग से जुडे अन्य जमीनी तथ्य हासिल करने थे ।
७वें दशक की शुरुआत में गुजरात में पिछडे वर्गों को ’बक्शी-पंच’ (बक्शी आयोग) के आधार पर आरक्षण दिया गया। गुजरात के पटेलों के नेतृत्व में इसका विरोध हुआ। मेरे भाई अहमदाबाद में पत्रकार थे और अतिरिक्त आमदनी के लिए एक इंग्लैण्ड के पैसे से चलने वाली संस्था में अनुवाद का अंशकालिक काम कर रहे थे। यह संस्था उनसे गुजरात के छोटे कस्बों के अखबारों में छप रही आरक्षण विरोधी खबरों का अनुवाद करा के अपने दानदाताओं को भेज रहे थी । जो तथ्य और सूचनायें और रपट जमीनी-स्तर से मिलनी हैं उन्हें इन संस्थाओं की मदद से आसानी से हासिल किया जाता है ।
जिन बातों पर आम दिनों में ज्यादा ध्यान नहीं जाता है उन पर इस खास दौर में जाएगा , उम्मीद है ।
'द सन्डे- इन्डियन ' वीकली में वर्ष २०११ की सर्वश्रेष्ठ महिला लेखिकाओं का चयन किया गया जिसमें लगभग ५०० प्रतिभागी थे और १११ को चुना गया उनमें सौभाग्य से मुझे भी स्थान मिला जो वास्तव में मेरे लिए बहुत खुशी की बात है और ये खुशी मैं अपने प्रिय मित्रों के बिना कैसे मना सकती हूँ तो लीजिए ये केक खाईये और अपना स्नेह मुझे दीजिए इसे आप इस लिंक पर देख सकते हैं...
कादम्बिनी के सितम्बर, २०११ में प्रकाशित मेरी कहानी:
मधु और आरती- दो जिस्म मगर एक जान हैं हम, को चरितार्थ करती बचपन की सहेलियाँ.
शायद ही सिटी इंजीनियरिंग कॉलेज के केम्पस में कभी किसी ने दोनों को अलग अलग देखा हो. हॉस्टल से साथ निकलना, क्लास, लायब्रेरी में दिन भर साथ रहना, बाजार भी साथ-साथ और शाम को हॉस्टल भी साथ ही लौटना. डबल शेयरिंग वाले कमरे में रह्ती भी दोनों साथ साथ. सहेलियाँ उन्हें जब भी खोजती या उनके बारे में बात भी करतीं, तो एक का नाम न लेतीं- हमेशा पूछा करतीं कि-- मधु-आरती नहीं दिख रहीं?
इंजीनियरिंग के अंतिम साल में हॉस्टल की बजाय कैम्पस के बाहर कमरा लेकर रहना होता था, तब भी दोनों ने मिल कर किराये पर एक कमरा लिया. ऐसा नही कि उनमे या उनके स्वभाव में समानता ही थी दोनों में अंतर भी बहुत था. मधु घरेलु स्वभाव की लड़की थी. पढ़ाई के अलावा कमरा सजाना, साफ सफाई करना, मशीन में कपड़े धोना, इस्त्री करना, तरह-तरह का खाना बनाना आदि उसके शौक थे और वो यह सब बिना किसी शिकन के दोनों के लिए किया करती थी. वहीं आरती को पढ़ाई, किताबें, तरह-तरह की नई टेक्नालॉजी की बाते सीखते रहने की धुन थी. कैरियर ही उसके लिए सब कुछ था. मगर फिर भी दोनों में गाढ़ी दोस्ती थी.
इंजीनियरिंग खत्म हुई. कैम्पस इन्टरव्यू में ही आरती का सेलेक्शन एक मल्टी नेशनल के लिए हो गया था तो वह दिल्ली चली आई. मधु अपने शहर लौट गई और अपने घर पर रह कर ही उसी शहर में एक नौकरी करने लगी. शुर-शुरु में वादे के मुताबिक हर हफ्ते एक दूसरे को लम्बे लम्बे पत्र लिखती रहीं . दिन-दिन भर की गतिविधियों की जानकारी देती रहीं . धीरे-धीरे पत्रों की लम्बाई घटती गई और आवृति भी.
दोनों अपनी-अपनी जिन्दगियों में व्यस्त होती गई. मधु के घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी. लड़का मुम्बई में मल्टी नेशनल में काम करता था. आरती को खबर की. उसे उसी दौरान कम्पनी की मीटिंग में सिंगापुर जाना था, तो वह शादी में नहीं आ पाई.
मधु शादी के बाद पति के साथ मुम्बई आ बसी. नई दुनिया,नए लोगो के बीच समय उड़ता गया. दो प्यारे-प्यारे बच्चे भी हो गये.
उधर आरती अपना कैरियर आगे बढ़ाती रही. घर वालों ने अनेक रिश्ते दिखाये मगर उसे तो बस कैरियर की चिन्ता थी. सब ठुकराती चली गई. हर बार अम्मा उसे रिश्ता बताती तो यही कहती कि अभी उम्र ही क्या हुई है? अभी इन सब झंझटों मे मुझे नहीं पड़ना. अभी मुझे अपने कैरियर पर कन्सन्ट्रेट करने दो. माँ-बाप भी आखिर क्या कर सकते हैं? हार कर और मन मार कर चुप हो गये.
अपनी अपनी दुनिया की बसाहट. मधु अपने बच्चों को बड़ा करने में भूल भी गई कि वो भी इंजीनियर है. अब वो और उसकी दुनिया बस उसका पति और उसके बच्चे हैं. समय के साथ बच्चे अच्छे स्कूलों में जाने लगे और मधु घर परिवार में बेहद संतुष्ट और खुशमय जीवन बिताने लगी. इन्हीं सब में आरती से संपर्क भी नहीं रहा.
अब आरती अपनी कम्पनी की नेशनल हेड हो गई थी. कैरियर के लिए जो सपने संजोये थे, वो पूरे होने लगे. माता जी दो बरस पहले बिटिया की शादी के सपने दिल में ही लिए गुजर गईं और फिर कुछ माह पूर्व पिता जी भी. मृत्यु के एक माह पूर्व पिता जी को दिल्ली बुलवा लिया था. इलाज कराया बड़े अस्पताल में किन्तु बुढ़ापे का क्या इलाज और कौन सी दवा. असल दवा, बेटी का परिवार देखना, तो मिली ही नहीं, बाकी दवा क्या असर करती.
अब आरती इस दुनिया में अकेली थी अपने जुनून के साथ. सोचा कि एक दिन अपने शहर जाकर पिता जी वाला मकान बेच आयेगी और यूँ भी दिल्ली में तो उसने मकान ले ही लिया है. हाल फिलहाल चाचाजी को कहकर उसे किराये पर चढ़वा दिया था.
वक्त की रफ्तार कब रुकती है. उम्र भी बढ़ चली. दिन भर दफ्तर में बीत जाता और शाम जब घर लौटती तो एक खालीपन, एकाकीपन आ घेरता. शीशे में खुद को निहारती तो घबरा जाती कि एकाएक कितनी उम्र निकल गई. अब जब शादी के लिए रिश्ता लेकर आने वाला, शादी की याद दिलाने वाला भी कोई नहीं बचा तब उसे एक साथी की कमी महसूस होना शुरु हुई.
सोचा करती कि क्या इस कैरियर के पीछे भाग कर उसने जो पाया वही जिन्दगी है या मधु ने कैरियर दरकिनार कर जो पति, बच्चों के साथ जो सुख पाया, वो जिन्दगी है. या शायद कोई तीसरा विकल्प हो जिसमें कैरियर तो हो मगर उसके लिए वो दीवानापन नहीं और उस कैरियर के साथ ही सही वक्त पर शादी, परिवार, बच्चे और इस सबके बीच सहज सामन्जस्य बैठाता खुशमय जीवन. अब उसे मधु भी याद आ जाती कभी-कभी.लेकिन मधु से कोई सम्पर्क नहीं रहा. न फोन नम्बर, न पता. वो अपनी ही दुनिया में खुश और मगन थी.
एक दिन दफ्तर की एक मीटिंग में दूसरी कम्पनी से कुछ लोगों का आना हुआ. अजय भी उस टीम का सदस्य था. मीटिंग में काफी बातचीत हुई और शाम को जब निकलने लगी तो अजय ने उसे कॉफी पर चलने का निमंत्रण दे डाला. घर जाकर भी कोई काम तो था नहीं तो उसने उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया.
उस शाम देर तक कॉफी हाऊस में दोनों की बातें होती रहीं. अजय दिल्ली में ही एक बड़ी मल्टी नेशनल का हेड था, फिर एक दो मीटिंग और कॉफ़ी का निमंत्रण. आरती जल्दी ही उससे खुल गई. अजय से पता चला कि अजय की पत्नी शादी के एक साल बाद ही गुजर गई और तबसे उसे समय ही नहीं मिला कि फिर से शादी के बारे में सोचता. मगर उसने बताया कि अब उम्र के इस पड़ाव में उसे एक सच्चे साथी की जरुरत महसूस होने लगी है. घर पर खालीपन खाने दौड़ता है.
दोनों का दुख एक ही. जल्द ही करीब आ गये. अक्सर ही कभी लंच, कभी डिनर से होते हुए कब दोनों साथ ही कुल्लु मनाली भी छुट्टियाँ मना आये, पता ही नहीं चला. वक्त फिर पंख लगा कर उड़ने लगा. आरती को लगता कि जल्द ही अजय उससे शादी की बात करे. यूँ भी बचा क्या था शादी के लिए, सिर्फ एक औपचारिकता और मुहर.
अजय दफ्तर के काम से दो माह के लिए अमेरीका चला गया. आरती इस बीच अपने शहर जाकर पिता जी का घर भी बेच आई. मधु भी उसी शहर से थी तो किसी के माध्यम से उसका मुम्बई का फोन नम्बर और पता लेते आई. मधु का घर भी इन्हीं कुछ परिस्थियों में मधु के भाई ने बेच कर खुद को किसी और शहर में बसा लिया था.
दिल्ली लौटी, तब मधु को फोन लगाया. इतने साल बाद अपनी प्रिय सहेली की आवाज सुन कर मधु तो खुशी के मारे चीख ही पड़ी. बस, मधु की एक ही जिद्द कि तू जल्दी मुम्बई आ, तुझसे मिलना है. खूब बातें करनी हैं. बस, चली आ तुरंत.
अगले दिन ही ऑफिस के कार्य के सिलसिले में आरती को पूना जाना पड़ा. उसने तभी मन बना लिया कि हफ्ते भर की छुट्टी भी साथ ही ले लेती हूँ और पूना से ही मुम्बई जाकर मधु के साथ आराम से रहूँगी. खूब बात करुँगी और फिर वापस आऊँगी.
मधु को फोन पर सूचित कर दिया. पूना से काम खत्म कर शाम को ही टैक्सी से मधु के पास जाने के लिये निकल पड़ी. रास्ते में दो-दो बार मधु से बात हुई कि जल्दी आ, खाने पर हम सब तेरा इन्तजार कर रहे हैं.
दरवाजे पर मधु बाहर ही इन्तजार करते मिली. देखते ही लिपट गई. आसूँओं की अविरल धारा बह निकली. दोनों सहेलियाँ एक दूसरे से लिपटी देर तक रोती रही. टैक्सी वाले ने जब जाने के लिए आवाज दी तो तन्द्रा टूटी. दोनों मुस्कराईं टैक्सी वाले को विदा कर दोनों घर के भीतर आ गई. मधु ने दोनों बच्चों से मिलवाया.ये कहते हुए कि- बस, कालेज जाने वाले हैं इस साल से,छोटे साहबजादे भी. तुम फ्रेश हो लो कहते हुए आरती को अन्दर बेडरूम में ले गई मधु. मेरे पति देव भी आते ही होंगे, तीन दिन से बैंगलोर में थे टूर पर, बस, फ्लाईट आ गई है. एयरपोर्ट से रास्ते में ही है, अभी बताना शुरु ही किया था मधु ने कि दरवाजे पर घंटी बजी और उसके पति आ गये. मधु ने आरती को ड्राईंगरुम से आवाज देकर बुलाया और मिलवाया- ये हैं मेरे प्यारे पति, अजय!!!
आरती के तो पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई. अजय मधु का पति?? यहाँ मुम्बई में? वो तो अमेरीका गया हुआ था दो महिने के लिए.
अजय भी अवाक खड़ा था. आरती दोनों हाथ जोड़े नमस्ते की मुद्रा में सन्न!!!! उसे लगा कि वो मूर्छित हो कर गिर जायेगी और मधु, वो तो बस अपने बोलने में ही मस्त थी कि आजकल अजय भी तो अधिकतर दिल्ली में ही रहते हैं. कम्पनी का दिल्ली ऑफिस सेट अप कर रहे हैं. उस दिन जब तेरा फोन आया तो सोचा कि तुझे बताऊँ लेकिन तब अजय बैंगलोर गये थे और मै तुझे सरप्राईज देना चाहती थी.
किसी तरह आरती ने अपने आपको संभाला. अजय यह कह कर अंदर चला गया कि ’बहुत ज्यादा थक गया है. स्नैक्स बैंगलोर में ही खा चुका है. कुछ हैवी लग रहा है. शॉवर लेकर सोयेगा. सुबह उठ कर आराम से बातें करते हैं, कल मेरी छुट्टी भी है.’
मधु आरती के साथ ड्राईंगरुम में आ बैठी. आरती की हालत देख मधु ने उससे पूछा भी कि क्या बात है, तबीयत ठीक नहीं लग रही है क्या?
आरती सर दर्द का बहाना बना कर टाल गई. कब खाना लगा, बेमन से कब खा लिया, आरती को कुछ पता ही नहीं लगा. एकाएक उसने मन ही मन कुछ तय किया और मधु से कहा कि यार, दफ्तर का एस एम एस आया है, मुझे तुरंत दिल्ली जाना होगा. कल सुबह सुबह कोई अर्जेन्ट मीटिंग आ गई है जिसे टाला नहीं जा सकता .मधु तो अजय की वजह से मल्टी नेशनल के सीनियर एक्जूकेटिव्स की कार्य प्रणाली से वाकिफ थी ही. उसने भी बहुत जिद नहीं की. टैक्सी को फोन कर दिया और देर रात की फ्लाईट ले आरती वापस दिल्ली आ गई.
अगली सुबह ही दफ्तर जाकर आरती ने इस्तीफा दिया और एक ब्रोकर से बात कर घर जिस भाव में बिका, बिकवा दिया और निकल पड़ी एक अनजान शहर की ओर एक अनजान जिन्दगी बिताने. मधु का फोन नम्बर, पता, अजय का फोन नम्बर- ना सिर्फ उसने अपने फोन से बल्कि जेहन से भी मिटा दिया हमेशा हमेशा के लिए.
आज वो कहाँ है, कोई नहीं जानता.
मधु के अनुसार- उसका फोन नम्बर कहता है- ’यह नम्बर अब सेवा में नहीं है.’
धुँध को चीरती रेल
धड़धड़ाती हुई
रुकती हैं प्लेटफॉर्म पर
उतरते हैं कुछ यात्री
चढ़ते हैं कुछ यात्री
मचती है अफरा तफरी
और फिर धीरे धीरे
चल पड़ती है रेल
अपने पीछे छोड़ कर
एक सन्नाटा
खो जाती है
उसी धुँध में...
-जीवन के कुछ और भेद जाने हैं मैने!!!!!!!
-समीर लाल ’समीर’
Posted by Udan Tashtari (sameer.lal@gmail.com) on September 05, 2011 10:20 AM· permalink
मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है? बोल फिल्म का यह सवाल उठता तो एक मुल्क़,मज़हब विशेष में मगर हो जाता है कई मुल्क़ों,मज़हबों का। जिन्होंने शोएब मंसूर की खुदा के लिए देखी होगी वो इस फिल्म के ज़रिये निर्देशक के मन में चल रही कहानियों और बेचैनियों को महसूस कर सकते हैं। बोल में कथाओं का इतना संगम और टकराव है कि आप एक साथ कई तरह के समय और सवालों में उलझते चले जाते हैं। टेक्नॉलजी और एडिटिंग के दम पर यह फिल्म फिल्म नहीं बनती बल्कि अपनी कथाओं के सहारे फिल्म बनती चली जाती है। लाहौर की सड़कें,छतें और गलियों से निकलती कहानियां हिन्दुस्तान के सिनेमाघर में देखते हुए अपने शहरों की लगने लगती है। यह फिल्म एक हिन्दुस्तानी को जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, उसके समाज से परिचय कराती है। वर्ना मीडिया से जो पाकिस्तान हमें विरासत में मिला है उसमें सिर्फ हुक्मरानों,फौजियों,आतंकवादियों,क्रिकेटरों,गायकों की तस्वीरें हैं। घर और समाज नहीं है। बोल पाकिस्तान को लेकर हमारी चुप्पी को भी तोड़ देती है। यह फिल्म सहजता से ऐसे मुश्किल सवालों को अपने मुल्क के सामाजिक परिवेश में उठा देती है जिसकी आवाज़ हमें किसी और चैनल से इस तरफ नहीं सुनाई पड़ती। सच कहूं तो पहली बार किसी फिल्म को देखकर लगा कि इधर के हों या उधर के,मसले दोनों के एक हैं।
कहानी में हिन्दुस्तान का बंटवारा है तो दिल्ली से आया हकीम साहब का ख़ानदान। आधुनिक डाक्टरी के दौर में हकीम का पेशा छूटता जा रहा है और परिवार की आबादी बढ़ती जा रही है। जल्दी ही यह फिल्म इस्लामिक समाज में औरतों के बग़ावत की बुनियाद डालने का काम करने लगती है। पितृसत्तात्मक समाज के वालिद बने हकीम साहब सुन्नत के ठेकेदार के रूप में बेबस नज़र आते हैं। उनकी हवेली और उनमें हर साल पैदा होने वाली लड़कियां। लड़कियों का बढ़ना और एक भाई के रूप में सैफ़ी का घर आना। कहानी अपने ग्रैड नैरेटिव को छोड़ कर एक ट्रांस जेंडर बच्चे की परवरिश और उसके प्रति बहनों और बाप के नज़रिये से टकराने लगती है। सैफी का प्रसंग बहुत रूलाता है। ज़ार-ज़ार कर देता है। लगता है छाती पीट पीट कर दहाड़ने लगे। निर्देशक अपना धीरज नहीं खोता। कोई फास्ट कट नहीं है। सैफी अपनी रफ्तार से बड़ा होता है। ज़ैनब के सहारे दुनिया को देखने की कोशिश में उन हरकतों का शिकार होता है जिसके शिकार हमारे घरों में बच्चे रिश्तेदारों के हाथ होते रहे हैं। हिजड़ों की नज़र से बचाकर बहनों का उसे मर्द बनाना और मर्द न होने पर अपने बाप हकीम साहब से बचाना कहानी का ऐसा मोड़ है तो कलेजा फाड़ देता है। सैफी के साथ बलात्कार और फिर बाप के हाथों उसकी मौत। बलात्कार के बाद घर लौटना और उसकी मां का अपने बच्चे को गोद में लेकर रोना, निर्देशक मंसूर अपने दिलेर कैमरे से देखनेवालों की आंखों में आंखें मिलाकर पूछने लगता है। सैफ़ी को उसका बाप मार देता है और कहानी अपनी ग्रैंड नैरेटिव पर लौट आती है। बल्कि कहानियां ऐसी बुनी गईं कि कोई भी कहानी कभी भी किसी को नहीं छोड़ती। सब उलझती-सुलझती चलती हैं।
हकीम साहब की बेटियां बड़ी हो रही हैं। बेटियां मां के प्रति हमदर्द होने लगती हैं। उनमें साहस पैदा हो रहा है ज़ैनब के ज़रिये। दुनिया को औरतों की नज़र से देखने और बनाने का। हकीम साहब अहले सुन्नत के दरवाज़े पर खड़े वो पहरेदार हैं जिनकी दाढ़ी उस वक्त खिजाब से रंग जाती है जब वो हत्या के जुर्म से बचने के लिए कंजर समुदाय के हाथों बिक जाते हैं। मस्जिक की रकम चुकाने के लिए कंजर जाति की मीना से निकाह करते हैं। साथ ही साथ अपनी बेटी को पड़ोसी दोस्त के बेटे के हाथ देने से मना कर देते हैं क्योंकि वो शिया हैं। कहानी मज़हब का इम्तहान लेती है। बेटियां दुनियादारी के सवालों से मज़हबी ढकोसलनेपन को चुनौती देने लगती हैं। हकीम साहब बेटियां पैदा करने की मशीन बने मीना के साथ रात गुज़ारने लगते हैं। अहले सुन्नत की चौकीदारी छोड़ कंजरों के बच्चों को कुरान पढ़ाने लगते हैं। मगर उनके लिए अपना घर और बेटियां वो आखिरी मोर्चा हैं जिसकी सरहद पर खड़े होकर वो अपने पितृसत्तात्मक अहं की हिफ़ाज़त करने में जुटे रह जाते हैं। तब तक जब एक रात मीना अपनी बेटी उनकी चौखट पर नहीं छो़ड़ जाती है। घर में कोहराम मचता है और हकीम के भीतर का मज़हबी मर्द फिर वहशी होता है और वो एक तवायफ़ बीबी से पैदा हुई बेटी का गला घोंटने लगते हैं। ज़ैनब इस बार अपनी बेबसी तोड़ देती है और बाप को मार देती है। बेटियां यहां अपनी ज़ात के सवालों को नहीं छोड़तीं। वो बाप के क़त्ल के बीच मीना की उस बेटी को भी बचा लेती हैं जिसके होने की बात सामने आने पर हकीम साहब के मौत का संदर्भ बनता है। फिल्म बहुत मज़बूती से औरतों के हक़ और सवालों पर टिकी रहती है।
यह एक ह्रदयविदारक प्रसंग है। फिल्म कई बार क्लाईमैक्स पर चढ़ती है और उतरती है। तभी तो हकीम साहब का क्रिकेट प्रेम भी सामने आता है और बेटियों के तेंदुलकर प्रेम और भारत की हार से गुस्सा होकर रेडियो भी तोड़ देते हैं। फिल्म शुरू होती है जेल के दृश्य से। ज़ैनब अपनी बहनों के बुर्के को उखाड़ फेंकती है। कहती है अभी से फेंको इनको। फिर मां और बहनों से घिर कर रोने लगती है। फांसी के तख्ते तक ले जाए जाने से पहले का यह दृश्य साफ कर देता है कि इस फिल्म की दुनिया में औरतों ने एक दूसरे को नहीं छोड़ा है। ये औरतें सतायी हुई वो जमात है जो अपने घर में,अपने बाप से लड़ने का साहस हासिल करती हुईं मज़हबी दकियानूसी ख़्यालातों से लोहा लेती हैं। जवान और अनपढ़ लड़कियां अपनी दुनिया रचने की छोटी-छोटी कोशिशें करती रहती हैं। शुरू से लेकर अंत के पहले तक यह फिल्म हकीकत के सौ फीसदी करीब है। आखिरी पांच मिनट में सिनेमाई क्लपनालोक की तरह कामायाबी का मंज़र बनाना इसकी मजबूरी बन जाती है। बल्कि मंसूर बहुत सलीके से हर दर्दनाक हकीकत के क्लाईमैक्स पर पहुंचते ही कहानी में हल्के प्रसंग ले आते हैं ताकि आप एक साथ इस्लाम, समाज और मुल्क के कई सवालों से टकराते रहे हैं और भावुक होकर ज़िंदगी और मज़हब की जंग को देखते रहे। तभी यह फिल्म सिर्फ पाकिस्तान की नहीं रह जाती। हिन्दुस्तान की भी हो जाती है। हमारे समाजों में ग़रीबी और आबादी एक मज़हब का मसला नहीं है। सभी का है। यह फिल्म एक दिलेर फिल्म है बल्कि इतनी दिलेर की बोलती बंद कर देती है। देखने के लिए टिकट का पैसा नहीं बल्कि मज़बूत कलेजा चाहिए।
Posted by ravish kumar (noreply@blogger.com) on September 04, 2011 03:33 PM· permalink
पिछली पोस्ट आखिरकार कम्प्यूटर से वायरस निकलने को सहमत हुए के बाद सदन हरकत में आ गया और जैसे ही कम्प्यूटर को बिजली मिली और बूट हुआ, वैसे ही रैम ने ऑफ़िस सॉफ़्टवेयर पर आरोप लगाया कि कार्य धीमा होने का कारण रैम को करार दिया जा रहा है, जबकि रैम ने आरोप लगाया है कि ऑफ़िस सॉफ़्टवेयर का धीमा प्रदर्शन चलने का कारण वायरस है जो कि उसके अंदर घुसपैठ कर गया है और इसके लिये एन्टीवायरस की जरूरत है।
रैम ने अपने ऊपर आरोप लगाने पर सदन में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा और सदन में उसे पारित कर दिया गया नहीं तो कल नोटपैड और वर्डपैड्र जैसे छोटे सॉफ़्टवेयर जो कि खुद के ही घर के हैं वे भी आरोप लगाने लगेंगे।
तो सारे सॉफ़्टवेयरों सावधान, अगर किसी ने भी हार्डवेयर पर आरोप लगाया तो सदन में विशेषाधिकार का प्रस्ताव पारित किया जा सकता है।
ये अलग बात है कि कैश मैमोरी ने प्रोसेसर की कूलिंग पर ही सवाल खड़े कर दिये हैं, ज्ञात रहे कि प्रोसेसर कम्प्यूटर राष्ट्र के प्रथम नागरिक हैं, परंतु रैम की इतनी हिम्मत कहाँ कि कैश मेमोरी के खिलाफ़ प्रथम नागरिक को सफ़ेद हाथी कहने पर विशेषाधिकार हनन कर सदन में अवमानना का नोटिस जारी करने की हिम्मत हो।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on September 03, 2011 06:17 PM· permalink
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और उनकी टीम के कथित आंदोलन के फासीवादी चरित्र को समझने में बहुतों से चूक हुई है. यहां तक कि अपने नाम के साथ कम्युनिस्ट और मार्क्सवादी-लेनिनवादी पहचान जोड़नेवाले भी बुरी तरह चूके हैं. हम यह नहीं कहेंगे कि यह उनकी भूल है. उनकी राजनीति और रणनीतियों के इतिहास को देखते हुए यह साफ तौर से कहा जाना चाहिए कि यह उनकी बेईमानी और अवसरवाद है. जो वामपंथी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और जिन्होंने बाहर से इसे समर्थन दिया, उन सबने इस आंदोलन की मुखालिफत करनेवालों पर अपने ‘कागजी’ दुर्गों से ‘हवाई’ हमले करने की कोशिश की. यहां अंजनी कुमार ने इसका जायजा लेने की कोशिश की है.
अन्ना आंदोलन के भूत ने सत्ता में बैठे लोगों को सताया हो या नहीं, वामपंथ के एक हिस्से को वह खूब सता रहा है. वह वामपंथ के पूरे इतिहास व वर्तमान के गिरेबान में झांककर बोल रहा है कि जैसा अन्ना ने किया वैसा आज तक तुम न कर सके. कि तुम अपनी कमियों से चिपके रहे और देश की जनता की नब्ज को टटोल सकने में आज अक्षम बने रहे. कि यह तुम्हारी ही कमियां हैं जिनके चलते शासक वर्ग और मजबूत होता जा रहा है और जितना लोगों को तुम आज तक कुल जमा राजनीति सिखा पाए उससे कई गुना यह चंद दिनों का आंदोलन सिखा गया. कि तुम सीखने को तैयार नहीं हो और न ही सुधरने को. कि तुम देश के सबसे वाहियात और अकर्मण्य लोग हो. कि तुम्हें अपना यह अपराध स्वीकार करना चाहिए और नए तरह के उभर रहे आंदोलनों में खुद को समाहित कर देना चाहिए. वामपंथ के एक हिस्से ने इस झोंक में खुद को समाहित करने के लिए एड़ी-चोटी लगा दी. उसने इनकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे को अपना लिया. पर इससे भी बात बनी नहीं. धारा के बहाव में उनकी न तैरने की आवाज सुनाई दी और न ही डूबने की. जिस दिन अन्ना ने रामलीला मैदान से अस्पताल का रास्ता लिया. उस दिन से सड़कें खाली हो गईं और जनता नारों-तख्तियों के साथ नदारद हो गई. यह सब कुछ सिनेमा हाल में बैठ कर फिल्म देखने जैसा था. जब तक फिल्म चलती रही सभी दृश्य के मर्म के साथ उतराते बैठते रहे. फिल्म खत्म होने के साथ ही इसके असर के साथ एक दूसरी तरह की दुनिया में घुस जाने जैसा था. सारा दारोमदार एक बार फिर संसद के पास है कि वह जन लोकपाल बिल के कितने हिस्से को समाहित करेगा. बात नहीं बनी तो अन्ना एक बार फिर आएंगे. वामपंथियों का यह समूह बेहद स्वाभाविकता के साथ अन्ना आंदोलन के नारों, झंडों व कार्यक्रमों का हिस्सा बन गया. भारत माता की जय! वंदेमातरम! और तिरंगे को हथियार की तरह फहराने से उसके अंदर भी झुरझुरी उठी. इस नारे को देश की असली नब्ज की पकड़ के रूप में देखा. प्रगतिशील आवरण के लिए इनकलाब जिंदाबाद का नारा था. और जिस किसी ने अन्ना आंदोलन का विरोध किया, उसके खिलाफ इस नारे का धारदार हथियार तरह प्रयोग किया. जो सामाजिक-राजनीतिक समूह पूरे आंदोलन पर छाया रहा और कस्बों से लेकर दिल्ली के ठेठ संसद तक हो रहे प्रदर्शनों पर काबिज रहा, उसके साथ यह वामपंथी समूह स्वभाविक मित्रता महसूस कर रहा था. उसके साथ वह मजे ले रहा था. उसकी पीठ थपथपाकर फोटो खींच व खिंचा रहा था. यह उसके हमजोली का हिस्सा था और उनकी आकांक्षा को पूरा करने का असली हमसफर भी. यह समूह इन आंदोलनकारियों की आवाज में अपनी दबी आवाज को देख रहा था. वामपंथियों का यह समूह लगातार किसानों, मजदूरों, गरीबों को खोज रहा था, मानों इसके बिना यह आंदोलन वैध साबित नहीं हो पाएगा. वह इस देश के पायदान पर पड़े लोगों को लगातार खोज रहा था और नहीं मिलने पर बेचैन हो कम्युनिस्ट पार्टियों को लगातार गरिया रहा था कि वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं, कि इस आंदोलन में उनकी भी वैधता सिद्ध होगी, कि उन्हें भी इस देश का सही नेतृत्वकारी मान लिया जाएगा. इस समूह की यह बेचैनी दरअसल इस हिंदुत्व के जलसे में उसकी बनी स्वभाविक एकता को वैध बना लेने की छटपटाहट थी. यह किसी भी वामपंथ धड़े के छोटे से छोटे वाक्यांशों को अन्ना आंदोलन के समर्थन का नारा बना देने को उतावला हो उठा था. यह पूरे वक्तव्य को संदर्भ और समय से काट कर मचान का झंडा बना कर पेश कर रहा था. वह काट-पीट कर किसी भी तरह एक दुनिया गढ़ लेने के लिए उतावला हो रहा था, जो उसके मन मुताबिक हो, जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो. वामपंथियों का यह समूह अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि, इतिहास व राजनीतिक उद्देश्य, संगठन आदि किसी पक्ष को देखने-समझने व उसकी व्याख्या भी करने को तैयार नहीं था. हालांकि यह सबकुछ पिछले छह महीने के भीतर हुआ है और आंख के सामने घटित हुआ है. इसके लिए कोई मोटी किताब या किसी जांच-पड़ताल से भी नहीं गुजरना था. पर यह समूह इस आंदोलन के संदर्भ में उपरोक्त बातों को फालतू बता कर जयकारे में लग गया. इस समूह का मानना है कि इस तरह के विश्लेषण से अन्ना आंदोलन पर क्या फर्क पड़ जाएगा, कि जनता तो चल चुकी है और आप सिद्धांत बघार रहे हैं, कि यदि आप भागीदार नहीं हुए तो आप को कुत्ता तक नहीं पूछेगा. यह तर्कहीनता और राजनीति में दृष्टिहीनता यह समूह जान-बूझ कर अपना रहा था. वह इस पचड़े में पड़कर उमड़ रहे नवधनिकों से किसी भी स्तर पर अलग नहीं होना चाहता था. यह इस एकता की गुहार थी कि पुराने ढांचों व मूल्यों और दृष्टि को तोड़ कर फेंक दिया जाए. और उलट कर कम्युनिस्टों को इस बात की गाली दी जाये कि वे आज के समय को समझ नहीं पा रहे हैं. कि वे सत्तर साल के बूढ़े की मर्दानगी को समझ नहीं पा रहे हैं. कि वे अब कूड़ेदान में ही पड़े रहेंगे और अन्ना जैसा आंदोलन ही भविष्य का असल ‘मर्द’ आंदोलन होगा. इस आंदोलन की राजनीतिक इकाई का गठन, जिसे आज अन्ना टीम के नाम से जाना जा रहा है, को बने हुए बहुत दिन नहीं गुजरे. संसद के पिछले सत्र में प्रस्तावित लोकपाल बिल के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर एनजीओ से जुड़े लोगों ने बैठक किया था. उस बैठक को लेकर कारपोरेट सेक्टर काफी उत्साहित था. और सबसे ज्यादा उत्साहित थी भाजपा. उस सत्र में भाजपा की ओर से सुषमा स्वराज ने मनमोहन सरकार को नंगा कर देने की चुनौती दी थी. बाद के दिनों में भ्रष्टाचार की घटनाओं की बाढ़ में भाजपा खुद ही डूबने लगी. कांग्रेस और भाजपा दोनों एक ही नाव पर सवार हो किसी तरह पार हो जाने की जुगत में लग गए. संसद में अरुण जेतली और मनमोहन सिंह के बीच इस बात पर तनातनी हुई कि संसद में अन्ना को बुलाकर भाषण क्यों दिलाया गया. पर दोनों ही अन्ना को साधने में लगे रहे और सफल रहे. लोकपाल बिल के खिलाफ जन लोकपाल बिल का प्रस्ताव आया और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन अन्ना आंदोलन में बदल गया. इस बदलाव में उपरोक्त एनजीओ के कई भागीदार इस आंदोलन से अलग हो गए. कई नाराज हुए. और कई नयों की भर्ती हुई. कुछ दबे हुए चेहरे चमक उठे. इस पूरी प्रक्रिया में पार्टियों के प्रतिनिधि, एनजीओ, कारपोरेट सेक्टर के प्रबंधकों और मीडिया समूहों ने निर्णायक भूमिका को अंजाम दिया. यह एक आंदोलन की पूर्वपीठिका की एक राजनीतिक गोलबंदी थी. राजनीति सिद्धांत की शब्दावली में यह इस आंदोलन की नेतृत्वकारी इकाई थी जिसने बाद के दिनों में अपनी क्षमता व दिशा का प्रदर्शन किया. बाद के दिनों में बस इतना ही फर्क आया कि अन्ना के बिना अन्ना टीम अवैधानिक व्यवस्था जैसी बन चुकी थी. और आंदोलन ‘मैं अन्ना हूं’ में बदल गया. अन्ना व टीम अन्ना के बाद मीडिया घरानों से लेकर आरएसएस के विभिन्न संगठनकर्ता, नेता, विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि व दलाल और कारपोरेट प्रबंधन के एलीट हैं. मीडिया प्रसारण के तौर तरीकों और मुद्दों को उछालने की नीति तय करने में लगा है. भाजपा आरएसएस राष्ट्रवादियों के पुराने व नए घरानों को साधने में लगा है. कारपोरेट एलीट भ्रष्टाचार को नेता-नौकरशाह तक सीमित कर अपनी लूट और कब्जा की नीति को पूरी तरह मजबूत कर लेने के लिए प्रयासरत है. वह वहां उबल रहे राष्ट्रवाद में पैसा झोंक रहा है कि यह और भड़क उठे. उसे आर्थिक मंदी की मार सता रही है. उसे और अधिक लूट की नीतियां चाहिए. उसे अब दूसरे दौर के भूमंडलीकरण की जरूरत है. इसके लिए राष्ट्रव्यापी राष्ट्रवादी आंदोलन व माहौल चाहिए. इस घेरे के बाद 1990 के बाद उभरे नव धनाढ्य मध्यवर्ग अपने परिवारों और गैरसरकारी संगठनों के साथ सक्रिय भागीदार है. यह समूह सरकार में राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है. यह देश की कुल कमाई में हिस्सेदार होने के लिए राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से गठजोड़ कर एनजीओ के माध्यम से सक्रिय है. ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ से लेकर ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ जैसे संगठन अपने नारों संगठनों व आर्थिक स्रोतों की बदौलत मीडिया के सहयोग से रातोंरात इनकी हजारों नेतृत्वकारी ईकाइयां उभर आयी हैं. ये भाजपा नहीं है. ये आरएसएस नहीं है. ये राष्ट्रवादी ब्राहमणवाद का नया स्वायत्त समूह है. इन्हें भाजपा-आरएसएस का भरपूर समर्थन और इनके साथ स्वभाविक गठजोड़ है. इन्होंने 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' को 'मैं अन्ना हूं’ में बदल दिया है. इस आंदोलन के भागीदारों में सबसे निचले पायदान पर स्वतःस्फूर्त जनता का हिस्सा है जिनकी हिस्सेदारी कस्बों में अधिक पर दिल्ली के रामलीला मैदान में कम थी. यह समूह रोजमर्रा के भ्रघ्टाचार से लेकर वर्तमान फासिस्ट जनविरोधी मनमोहन सरकार व विभिन्न पार्टियों की राज्य स्तर के दमनकारी सरकारों के खिलाफ विरोध व अपने क्षोभ को दर्ज कराने के लिए भागीदार रहा. यह अन्ना आंदोलन का सबसे बाहरी हिस्सा है. इस समूह की न तो अन्ना टीम तक पहुंच थी और न ही इस टीम को अपनी हिस्सेदारी के एजेंडे को पहुंचा सकने के हालात थे. सच्चाई यह भी थी कि टीम अन्ना व उसके घेरे के एजेंडे पर यह समूह था ही नहीं. यद्यपि टीम अन्ना बीच-बीच में मीडिया से यह आग्रह करती रही कि कैमरे का मुंह इन तबाह हिस्सों की ओर भी कर लिया जाए. यह आग्रह इस समूह का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से नहीं बल्कि पूरे भारत के आम व खास सभी का अन्ना का आंदोलन में भागीदारी को वैधता देने के मद्देनजर ही किया जा रहा था. यह समूह उपरोक्त राजनीतिक गोलबंदी से बाहर था. यह समूह इस आंदोलन को प्रभावित करने के किसी भी टूल से वंचित था. ऐसी स्थिति में यह खुद उनका टूल बन रहा था और तेजी से उनके प्रभाव में आ रहा था. 1995 के बाद के दौर में वित्तीय पूंजी की खुली आवाजाही व तकनीक सेवा ओर प्रबंधन की संस्थाओं से पैदा हुए नवधनाढ्यों और सट्टेबाजों की दावेदारी ने पुनर्गठन की जरूरत को पैदा किया है. यह वर्ग इसके बदले में कारपोरेट सेक्टर को लूटने की खुली छूट दे रहा है. इस पुनर्गठन से शासक वर्ग के किसी भी हिस्से को नुकसान नहीं होना है. यह जनता की लूट, शोषण, शासन, दमन का फासिस्ट पुनर्गठन है. समाज में जीवन स्तर, आय और जरूरत के आधार पर बंटवारे की गति और तेज होगी. चंद लोगों के हाथ में अथाह संपत्ति होगी और देश की बहुसंख्य आबादी भोजन के लिए पहले से और अधिक मोहताज होगी. अन्ना का जनलोकपाल बिल, राष्ट्रवाद वर्तमान दमनकारी फासीवादी व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का प्रवर्तन है. इस आंदोलन में अल्पसंख्यक खासतौर से मुसलमान समुदाय की भागीदारी न होना, दलित व आदिवासी समुदाय का इससे दूरी बनाए रखने के पीछे आत्मगत से अधिक वस्तुगत कारण ही प्रमुख रहे हैं . भूमंडलीकरण का सबसे अधिक नुकसान इन्हीं समुदायों का हुआ. बैंकों ने मुसलमान समुदाय के खाता खोलने तक से कोताही बरती. इनके एनजीओ पर पचास तरह के जांच व रोक लगे. इनकी आजीविका के साधनों को नीतियां बनाकर नुकसान पहुंचाया गया. इसका विस्तार पूर्वक वर्णन सच्चर कमेटी ने प्रस्तुत किया है. यही हालात दलित व आदिवासी समुदाय का रहा. दलित समुदाय एक छोटा हिस्सा जरूर ऊपर गया है पर वह अन्ना आंदोलन के फासिस्ट हिंदूत्ववादी पुनर्गठन का हिस्सा नहीं बनना चाहता. अन्ना आंदोलन भारतीय समाज की एक प्रतिगामी परिघटना है. यह शासक वर्ग के फासिस्ट पुनर्गठन की मांग है. इसमें भागीदारी इसके दार्शनिक पहलू को आत्मसात करना है.
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on September 03, 2011 07:22 AM· permalink
कुछ वर्षो पहले के समाचारो के अनुसार अविख्यात ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी स्टीफन हाकिंग ने एक शर्त लगायी थी कि CERN का लार्ज हेड्रान कोलाइडर(LHC) हिग्स बोसान की खोज मे असफल रहेगा। हिग्स बोसान जिसे “ईश्वर कण(God particle)” भी कहा जाता है, को शुरुवाती ब्रह्माण्ड मे भारी कणो के द्रव्यमान के लिए उत्तरदायी माना जाता है। [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on September 02, 2011 01:30 AM· permalink
अन्तरजाल पर लेखन को कॉपीराइट से मुक्त रखने से क्या फायदा है; और
इससे कैसे पैसा कमाया जा सकता है।
'उन्मुक्त जी, आप भी बस।यह शीर्षक, सुन्दर सी महिला का चित्र, और इस चिट्ठी का सार—यह कितना बेमेल है। इनका इस विषय से क्या संबन्ध? हुंः।'
अरे मित्र, जरा ठहरिये।
मैं तीन चिट्ठे 'उन्मुक्त', 'छुटपुट', और 'लेख' लिखता हूं। कुछ साल पहले, इन पर एक वेबसाइट से लोग, मेरी चिट्ठियों को पढ़ने के लिये आने लगे। मेरी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है। देखने पर मालुम चला कि जिस वेबसाइट से लोग आ रहें हैं उसका नाम है उन्मुक्त – Unmukt: हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियाँ इसमें मेरे तीनों चिट्ठों की चिट्ठियां हैं। यह कौन व्यक्ति है; वह ऐसा क्यों करता है; इससे, उसे क्या फायदा है—मुझे नहीं मालुम पर वह ऐसा कुछ सालों से कर रहा है।
रवी जी ने, 'जरा सामने तो आओ छलिए...' नाम से एक चिट्ठी, उक्त व्यक्ति के लिये लिखी। लेकिन इसने न तो कोई जवाब दिया, न ही कुछ स्पष्ट किया। मैंने उस वेबसाइट पर कुछ टिप्पणियां भी की, पर न तो उसने जवाब दिया और न ही कभी ईमेल भेजा।
शायद, मुझे सजा देने का, इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता। क्योंकि, इसके अलावा कि मैं एक छोटे से कस्बे से हूं अन्य परिचय नहीं देता हूं। मैं अज्ञात होकर चिट्ठाकारी करता हूं। हांलाकि यह गैर बात है कि अन्तरजाल में कोई कैसे अज्ञात रह सकता है।
कुछ दिन पहले, मेरे इसी 'उन्मुक्त' चिट्ठे पर 'Interests Of Womens' नामक एक अन्य वेबसाइट से लोग आने लगे। मुझे कुछ आश्चर्य लगा। इस वेबसाइट पर जा कर देखने से मालुम हुआ कि मेरे उन्मुक्त चिट्ठे की शुरुवात यानि कि फरवरी २००६ से फरवरी २०११ तक की सारी चिट्ठियां इसमें हैं। उनके बीच, अंग्रेजी में, महिलाओं से सम्बन्धित चिट्ठियां भी हैं। इस चिट्ठी के सारे चित्र, ऊपर सुन्दर महिला के चित्र सहित, इसी वेबसाइट से हैं।
इस वेबसाइट में, महिलाओं के स्वास्थ, सुन्दरता, श्रृंगार, आभूषण से सम्बन्धित चिट्ठियां तो सब महिलाओं पर लागू होती हैं लेकिन महिलाओं के कपड़े पाश्चात्य हैं। इस तरह के कपड़ों का पहनावा अपने देश में नहीं है—कम से कम मेरे कस्बे की महिलायें तो नहीं पहनती हैं। हो सकता कि बड़े शहर में महिलायें पहनती हों।
इस चिट्ठे की मेरी चिट्ठियों पर, मेरा नाम नहीं है लेकिन वे उसी तरह हैं जैसे मेरी चिट्ठियां हैं। इस कारण मेरी अन्य चिट्ठियों का लिंक है। यदि आप उन पर चटका लगायें तो आप मेरे चिट्ठों या पॉडकास्ट 'बकबक' पर पहुंच जायेंगे।
मैं इस चिट्ठे को चलाने वाले को भी नहीं जानता। इससे मेरी कभी ईमेल से बात नहीं हुई। मैंने इस पर कुछ टिप्पणी भी की, पर इसने कोई जवाब नहीं दिया।
यह दोनो वेबसाइटें, मेरी चिट्ठियां को पुनः प्रकाशित कर, कोई गैरकानूनी कार्य नहीं कर रहीं हैं। क्योंकि, अन्तरजाल पर मेरा लेखन कॉपीराइट से मुक्त है। कोई भी मेरी चिट्ठियों को—संशोधन कर के, या बिना संशोधन किये—मेरे नाम से, या अपने नाम से, छाप सकता है।
मैं 'उन्मुक्त – Unmukt: हिन्दी चिट्ठाकार उन्मुक्त की चिट्ठियां' चिट्ठे का शुक्रगुज़ार हूं कि इसने अपना चिट्ठा मेरी चिट्ठियों का कह कर बनाया है। 'Interests Of Womens' चिट्ठे पर मेरी अन्य चिट्ठियों का लिंक है जिन पर चटका लगाने से वह मेरे चिट्ठों या पॉडकास्ट पर पहुंच सकता है। यह उन चिट्ठों से बेहतर है जो बिना इस तरह का लिंक दिये, मेरी चिट्ठियां के निहित विषय को अपने चिट्ठे पर छाप देते हैं। लेकिन उसमें भी कोई गलती नहीं है। क्योंकि मेरा लेखन कॉपीराइट की झंझटों से मुक्त हैं। इनसे मेरे अन्तरजाल पर लिखने का प्रयोजन भी सफल होता है जैसा कि शुभा ने यहां स्पष्ट किया है।
मेरे विचार से इन वेबसाइटों पर मेरी चिट्ठियां इसलिये हैं क्योंकि मेरा लेखन कॉपीराइट से मुक्त हैं।
कुछ साल पहले मैथली जी ने 'कैफे हिन्दी' नामक वेबसाइट पर लोगों की चिट्ठियां उनके नाम से प्रकाशित किये। उस समय विवाद उठा था। तब भी, मैंने अपने यही विचार 'डकैती, चोरी या जोश या केवल नादानी' नाम से लिखे थे। यह विवाद कुछ समय पहले फिर उठा। उस समय भी 'जिया धड़क धड़क जाये ' चिट्ठी पर अपनी बात रखी।
'उन्मुक्त जी लेकिन इससे फायद क्या होगा, क्या पैसे मिल सकेंगे?'
जरूर मिलेंगे। जब किसी लेखक की रचना पत्रिका या पुस्तक में छपती है तब पत्रिका के द्वारा कुछ पैसा लेखक को या पुस्तक के बिक्री पर मिले पैसे का अंश लेखक को मिलता है। यही उसकी आमदनी है। लेकिन अन्तरजाल पर ऐसा नहीं होता। कुछ वेबसाइट पर जाने के लिये पैसा देना होता है। लेकिन, लगभग सारी वेबसाइट मुफ्त ही हैं। अन्तरजाल पर पैसा विज्ञापनों से आता है। विज्ञापन तभी मिलते हैं जब लोग आपकी वेबसाइट पर आयें। इस बात की कुछ विस्तार से चर्चा, मैंने 'अंतरजाल की मायानगरी में' श्रृंखला की 'लिकिंग, क्या यह गलत है' कड़ी में किया है।
मेरे चिट्ठों पर, बहुत से लोग, इन वेबसाईटों से आते हैं। मेरे चिट्ठों पर कोई विज्ञापन नहीं हैं। क्योंकि मेरा उद्देश्य, पैसा कमाना न होकर अपनी बातें लोगों के सामने रखना और विचार फैलाना है। यदि मैं विज्ञापन रखूं हो सकता है कि उनसे कुछ पैसा मिले। यदि ऐसा हो तब उसमें इन दोनो वेबसाइट का योगदान रहेगा।
यदि आप चाहते हैं कि दूसरे व्यक्ति आपकी रचनाओं को बिना संशोधन या संशोधन कर,
आपके नाम के साथ प्रकाशित करे तब आप अपनी रचनाओं को, शुभा की तरह क्रिएटिव कॉमनस् ३.०लाइसेंस के अन्दर प्रकाशित करें।
दूसरों का, आपकी रचानयें छापना, अवश्य ही लोगों को आपके चिट्ठे पर लायेगा। यह विज्ञापनों को बढ़ायेगा और उनसे होने वाली आमदनी भी।
विकीपीडिया एक बेहतरीन वेबसाइट है। इसके बारे में कुछ तथ्य आप यहां पढ़ सकते हैं। विकिपपीडिया पर लेख डालने से भी, लोग आपके चिट्ठे पर आते हैं। है। विकिपीडिया पर मैंने कुछ लेख डालें हैं। वहां से लोग अक्सर मेरे चिट्ठों पर आते हैं। लेकिन आजकल समयाभाव के कारण, मैं लेख विकिपीडिया पर नहीं डाल पा रहा हूं। कोशिश करके, पुनः शुरू करूंगा।
यह तो हुआ, आमदनी बढ़ाने के तरीके और कॉपीलेफ्ट के बारे में बातें। मैंने यह चिट्ठी उस चिट्ठे के संदर्भ से शुरू की जिसके अधिकतर चिट्ठियां महिलाओं के सौंदर्य के बारे में है इसलिये कुछ बातें - खूबसूरती पर।
लेकिन, मुझे फैशन अच्छा लगता है। मैं कभी, कभी 'Iterest of Womens' वेबसाइट पर जाता हूं, इसकी चिट्ठियों पर एक नज़र डालता हूं। मुझे अच्छा लगेगा कि शुभा और परी कभी इस वेबसाईट पर नजर डालें। आप भी इसे देखें। शायद, आपको यह काम की वेबसाइट लगे।
हांलाकि, इस वेबसाइट की एक बात समझ में नहीं आयी यह Interest of Womens क्या होता है। शायद शीर्षक Women's interest या All that Interests Women होता, तो ठीक था।
इस चिट्ठी के सारे चित्र Interest of Womens चिट्ठे से हैं।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
होगेन्नाकल जलप्रपात अप्रितम प्राकृतिक सौंदर्य से ओत प्रोत है, कावेरी नदी की अथाह जलराशि देखते ही बनती है। चारों तरफ़ कल कल बहता जल, कहीं बिल्कुल शांत तो कहीं अपनी अल्हड़ जवानी से रंगा हुआ तेज धारा के साथ फ़ुहारों को आसमान में उड़ाता हुआ।
बैंगलोर से लगभग २२० किमी. की दूरी पर है होगेन्नाकल, जहाँ कृष्णागिरी, धरमपुरी होते हुए जाया जा सकता है। सड़क बहुत अच्छी है, केवल २ - ३ किमी ही ठीक नहीं है। सड़क मार्ग से जाते हुए दोनों तरफ़ प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है, कभी चावल के खेत तो कहीं मक्का याने के भुट्टे के, और हर तरफ़ नारियल के पेड़ों की छटा तो देखते ही बनती थी। दोनों ओर पहाड़ियों ने रास्ते को और सुंदर बना दिया था। जब हाईवे से होगेन्नाकल जलप्रपात के लिये मुड़ते हैं, तो थोड़े आगे ही एक चौराहे पर मशहूर तस्कर वीरप्पन को मुठभेड़ में मारा गया था, लगभग ४ घंटे में हम होगेन्नाकल जलप्रताप पहुँच गये। हमारे चालक महोदय को दक्षिण भारत की अच्छी खासी जानकारी थी।
होगेन्नाकल जलप्रपात का रास्ता तमिलनाडु से है, और कर्नाटक की तरफ़ वाले जलप्रपात के लिये वहाँ से खास तरह की नाव जो कि टोपले की तरह होती है, उससे जाना पड़ता है, बारिश के कारण कावेरी अपने भरपूर उफ़ान पर थी, और उस नाव पर हमें ज्यादा भरोसा नहीं था, इसलिये नाव की सवारी न करने का ही फ़ैसला किया।
हम मुख्य जलप्रपात की ओर बड़ चले जो कि तमिलनाडु राज्य की सीमा मॆं आता है और एक मुख्य जलप्रपात कर्नाटक की सीमा मॆं भी है, वैसे लगभग १५-२० जलप्रपात कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों की सीमा में आते हैं। एक साथ इतने सारे जलप्रपातों को एक साथ देखना सुखद अनुभूति देता है, प्राकृतिक सौंदर्य से लकदक पहाड़ी क्षैत्र घूमने में आनंदित थे और जलराशि का आनंद ले रहे थे।
जल अपनी रफ़्तार से जगह जगह हिलोरे मार रहा था और बीच में पत्थर के पहाड़ और बड़े बड़े पत्थर उन हिलोरों में बाधा बन रहे थे जो कि अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित कर रहा था। लोग अपने आप को उस अप्रितम जलराशि में जाने के लोभ का संवरण नहीं कर पा रहे थे और सभी लोग जलराशि की और खिंचे जा रहे थे, सभी अपने अपने तरह से जगह जगह जलक्रीड़ा में मग्न थे। हम भी अपने पैरों को कावेरी के जल में डूबोकर उस वातावरण के आनंद में डूब गये और बहती हुई जलराशि की मधुर ध्वनि अपनी और आकर्षित कर रही थी।
जलप्रपात को देखने के बाद और जलराशि के संपूर्ण रस का आस्वादन करने के बाद जब वापिस से किनारे जाने की बारी आई तो इस बार हमने नाव से जाना निश्चित किया और उसी विशेष नाव जो कि टोपले के आकार की थी, उसमें बैठकर गये। पहले बैठते समय डर लगा परंतु जब तक किनारे पहुँचे तब तक थोड़ा डर कम हो चुका था।
होगेन्नाकल में बहुत सारी छोटी छोटी रसोईयाँ बनी हुई हैं, और बैठने के लिये जगह भी बनी हुई हैं, रसोई से खाना खा सकते हैं, परंतु शुद्ध शाकाहारी की उम्मीद नहीं की जा सकती । यहाँ का मुख्य भॊजन मछली ही है, जहाँ देखो वहाँ तली हुई मछली मिल रही थी, लोग चख भी रहे थे। जैसे जैसे दोपहर होते जा रही थी, तमिलनाडु अपनी गर्मी का पूरा अहसास करवा रहा था।
होगेन्नाकल एक छोटा सा गाँव है, पर जलप्रपात ने इस क्षैत्र को पूर्ण व्यवसायिक बना दिया है और जहाँ देखो वहाँ छोटे छोटे टिकट लगा दिये हैं, होगेन्नाकल में एन्ट्री का ३० रूपये और पुलिस वाले को ५० रूपये देना ही होते हैं, वरना ये लोग गाड़ी को आगे जाने ही नहीं देते हैं। जलप्रपात पर जाने के लिये दो तीन जगह ५ रूपये प्रति व्यक्ति टिकट और कैमरे के लिये एक जगह १० रूपये का टिकट देना होता है।
होगेन्नाकल का विकास अभी जारी है और अभी वहाँ के गाँव वाले अभी मुनसिब दाम ही लगा रहे हैं, परंतु जिस तेजी से व्यवसायिकरण बड़ रहा है वे भी कब तक बचेंगे।
बैंगलोर लौटते समय अड्यार आनंद भवन में खाना खाया, जो कि असल तमिलनाडु का स्वाद है। आनंद भवन बैंगलोर से लगभग ८० किमी दूर है।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on September 01, 2011 06:24 PM· permalink
मेरे सबसे करीब मेरा जिगरी दोस्त अँधेरा... अक्सर मेरे पास आता है और छिपकर बैठ जाता है मेरे मन के एकल कोने में... घण्टों मुझसे बातें करता है अकेले में जब कोई नहीं होता... सुबह से शाम कैसे होती है पता ही नहीं चलता... और फिर अचानक... आहट सुन संध्या की आहट सुन दूर कहीं छिप जाता है झाडियों के पीछे... और इंतज़ार करता है सुबह होने का फिर... चिड़ियों की चहचहाट सुन दौड़कर आता है और खोज़ता है मेरे मन का वही कोना छिपकर बैठ जाने के लिए...
Bhawna
Posted by Dr.Bhawna (bhawnak2002@gmail.com) on September 01, 2011 04:52 AM· permalink
डा.अमर कुमार पिछले हफ़्ते हमसे हमेशा के लिये विदा हो गये। उनको गये हफ़्ता होने को आया लेकिन यकीन नहीं होता कि वे अब हमारे बीच नहीं रहे। इस बीच उनकी कई पोस्टें पढ़ीं। उनकी टिप्पणियां पढ़ीं। उनका इंटरव्यू पढ़ा। हर बार ऐसा लगा कि यहीं किसी मोड़ पर वे आकर कुछ ऐसा टिपियायेंगे जिससे लगेगा कि हां डा.साहब आ गये कोरम पूरा हुआ।
डा.अमर कुमार से पिछले तीन-चार साल से ब्लाग/टिप्पणियों और मेल के माध्यम से नियमित-अनियमित साथ बना रहा। शुरुआत के कुछ दिन बाद अक्सर फोन पर भी बातचीत होती रहती थी। कानपुर में उनकी पढ़ाई-लिखाई होने के चलते वे यहां के बोली-बानी और जुगराफ़िये से भली-भांति परिचित थे। शायद यही कारण रहा होगा कि वे हमारी पोस्टों, खासकर जिनका अंदाज कनपुरिया रहता था, कुछ पसंद करने लगे और बेलौस टिपियाते भी थे।
हमारे ब्लागिंग में आये तीन साल हो चुके थे तब डा.साब आये इस आभासी दुनिया में। उनकी बेबाक टिप्पणियों की चर्चा करते हुये एक चिट्ठाचर्चा में मैंने लिखा:
डा. अमर कुमार जैसी सहज चुटीली बातें कहने वाले ब्लाग जगत में बहुत कम हैं। उनसे इस पोस्ट के माध्यम से अनुरोध है के वे अपने एक ब्लाग पर ध्यान केंद्रित करें और नियमित लिखें। ये सलाह है वे इसके भी धुर्रे बिखेर दें तब भी हमें कोई कष्ट न होगा लेकिन मानेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा।
डा.अमर कुमार ने हमारे इस उलाहने पर जो पोस्ट लिखी उसके लिये ज्ञानदत्त जी ने लिखा:
आपकी भाषा में अद्भुत प्रवाह है। सपाट भी चलती है और भंवर भी बहुत हैं बीच में!
ब्लॉगिंग के प्रतिमान से अपने प्रकार की अनूठी पोस्ट।
इसी पोस्ट के बारे में ताऊ रामपुरिया ने लिखा:
गुरुदेव आज कबूल ही लेता हूँ की मैं आपकी इस पोस्ट को आज २३वी बार पढ़ रहा हूँ !मुझे ये पोस्ट लिखने की प्रेरणा देती है ! ये एक पूरा इन्साइक्लोपिडिया है ! हर नए नए कबूतर, मेरा मतलब नए मेरे जैसे, अपने आपको लेखक समझने की ख्वाइश रखने वाले को यह अवश्य आत्म सात कर लेना चाहिए ! आपकी यह पोस्ट अमूल्य निधि है !
इस अद्भुत पोस्ट को पढ़ने के बाद मेरा मन उनसे बात करने को हुड़कने लगा। फ़िर बात भी हुई। और बहुत दिन तक होती रही जब तक बीमारी के कारण उनका बात करना कम नहीं हो गया।
डा.अमर कुमार बेहतरीन जिंदादिल और उदारमन के बड़े दिलवाले इंसान थे। बहुत पढ़ाई लिखाई किये थे। कई भाषायें जानते थे। उर्दू जानने वालों को कभी-कभी उर्दू में टिपियाते थे। लिखाई-पढ़ाई की रेंज बहुत थी। एच.टी.एम.एल. सीखकर अपने ब्लाग का कलेवर बदलते रहते थे। तमाम तरह के हटमल प्रयोग वे अपने ब्लाग पर करते थे।
ब्लागजगत में डा. साहब का स्नेह बहुत लोगों को मिला। ब्लागजगत में वे भले एक बेबाक और कभी-कभी मुंहफ़ट से लगते थे लेकिन व्यक्तिगत व्यवहार में वे सभी के प्रति बेहद उदार, गर्मजोश थे। उनके व्यवहार से तमाम लोगों को यह एहसास होता था कि वे उनके बहुत खास हैं। यह उनकी खूबी थी। उनकी सहज उदारता और आत्मीयता एक साथ कई लोगों को एहसास दिलाने में सक्षम थी कि वो डा.साहब के बहुत नजदीक हैं।
डा.अमर कुमार हौसला लोगों की आफ़जाई में करने में बहुत उदार थे। जर्रे को आफ़ताब बताने में भी हिचकते नहीं थे। मुझे अभी भी यह सपना सरीखा लगता है कि वे कभी मुझसे कहा करते थे – गुरुदेव, जब मैं आपका लिखा पढ़ता हूं तो मेरा मन आपसे मिलने का होता है। मैं एक बार आपको छुकर देखना चाहता हूं। मुझे इस बारे में कोई शंका नहीं है कि वे इस तरह की हौसला आफ़जाई और तमाम साथियों की करते रहे होंगे। लोगों की खूबियां पहचानकर उसकी तारीफ़ करके स्नेह जताने का उनका अपना अंदाज था।
डा.साहब जिनसे स्नेह रखते थे उनके प्रति बेहद आत्मीय, उदार और अनौपचारिक हो जाते थे। उनका लगाव उमर दूरियां पाट देता था। आधिकारिक अंदाज। पिछले साल की ही बात है। हम ( मैं और कुश) लोग कुशीनगर से लौट रहे थे। कुश ने उनको फ़ोन करके जयपुर के लिये बस की टिकट बुक कराने के लिये कहा। उन्होंने टिकट तो जयपुर के लिये बुक करा दिया लेकिन कुश से कहा कि पहले रायबरेली में मुलाकात करके तब जयपुर जायें। कुश और मैं दो दिन से बाहर थे। तुरंत घर लौटना चाहते थे। डा.साहब से अनुमति लेकर और फ़िर मिलने का वायदा करके वापस चले आये। डा.साहब ने अपनी पकड़ें उदारतापूर्वक छोड़ दीं। लेकिन अब उनके चले जाने के बाद उनसे मिले बिना घर वापस चला जाना अफ़सोस के खाते में दर्ज हो गया- हमेशा के लिये।
अमर कुमार जी ब्लागजगत में काफ़ी देरी से आये। उनके पास कहने को बहुत कुछ था। इसलिये वे टिपियाते जमकर थे। देरी से लिखना शुरु करने की भरपाई वे जमकर टिपियाने और कई ब्लाग बनाकर लिखकर करते थे। अक्सर उनकी टिप्पणियां अमूर्त हो जातीं थीं। बहुतों को समझने में परेशानी होती थी। काफ़ी विद टू होस्ट में उन्होंने अपने बारे में काफ़ी कुछ कहा है। वे कहते हैं:
अपने को अभी तक डिस्कवर करने की मश्शकत में हूँ, बड़ा दुरूह है अभी कुछ बताना । एक छोटे उनींदे शहर के चिकित्सक को यहाँ से आकाश का जितना भी टुकड़ा दिख पाता है, उसी के कुछ रंग साझी करने की तलब यहाँ मेरे मौज़ूद होने का सबब है । साहित्य मेरा व्यसन है और संवेदनायें मेरी पूँजी ! कुल मिला कर एक बेचैन आत्मा… और कुछ ?
उनके बारे में अपनी राय जाहिर करते हुये मैंने लिखा था:
रात को दो-तीन बजे के बीच पोस्ट लिखने वाले डा.अमर कुमार गजब के टिप्पणीकार हैं। कभी मुंह देखी टिप्पणी नहीं करते। सच को सच कहने का हमेशा प्रयास करते हैं । अब यह अलग बात है कि अक्सर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता कि डा.अमर कुमार कह क्या रहे हैं। ऐसे में सच अबूझा रह जाता है। खासकर चिट्ठाचर्चा के मामले में उनके रहते यह खतरा कम रह जाता है कि इसका नोटिस नहीं लिया जा रहा। वे हमेशा चर्चाकारों की क्लास लिया करते हैं।
लिखना उनका नियमित रूप से अनियमित है। एच.टी.एम.एल. सीखकर अपने ब्लाग को जिस तरह इतना खूबसूरत बनाये हैं उससे तो लगता है कि उनके अन्दर एक खूबसूरत स्त्री की सौन्दर्य चेतना विद्यमान है जो उनसे उनके ब्लाग निरंतर श्रंगार करवाती रहती है।
डा.साहब चिट्ठाचर्चा के नियमित पाठक, प्रशंसक, आलोचक और खैरख्वाह थे। अपनी एक पोस्ट में उन्होंने लिखा -सुबह सुबह अख़बार पढ़ दिन ख़राब करने से बेहतर लत है, चिट्ठाचर्चा !
कुछ दिन चर्चा न होने पर उलाहना आ जाता था कि चर्चा क्यों नहीं हो रही है जी! चिट्ठाचर्चा में माडरेशन के सख्त खिलाफ़ थे वे। यह खिलाफ़त वे सरेब्लाग जाहिर भी करते रहते थे। चर्चा का पुरजोर विरोध भी करते थे। चिट्ठाचर्चा जब अपने ब्लागस्पाट से हटकर अपने डोमेन पर आ गयी तब भी टेम्पलेट के लफ़ड़े के चलते टिप्पणियां माडरेट करनी पड़ रहीं थीं जबकि माडरेशन हटाया हुआ था। व्यस्तता के चलते कुश से हुआ नहीं तो मैंने उनसे कहा- आपको चिट्ठाचर्चा के एडमिन अधिकार भेज रहे हैं। इसका माडरेशन हटाइये। इस पर वे बोले- गुरू हमको चर्चा में फ़ंसा रहे हो? बहरहाल बाद में टेम्पलेट बदला गया और अब चिट्ठाचर्चा में टिप्पणियां माडरेट नहीं करनी पड़ती लेकिन तब तक डा.साहब का ब्लागिंग से संपर्क सिर्फ़ पढ़ने का रह गया था शायद! अब डा.अमर कुमार नहीं हैं टिपियाने के लिये। शायद उलाहना देते हुये कह रहे हों- क्या गुरू हमारे जाते ही माडरेशन हटा दिया।
भाषा के मामले में वे आलराउंडर थे। ज्यादातर बोलचाल की भाषा में अपने को अभिव्यक्त करते। टिप्पणियों में अवधी/भोजपुरी और अन्य बोलियों का पल्ला थाम लेते। कभी-कभी चिट्ठाचर्चा में कविताजी के द्वारा प्रयुक्त भाषा के इस्तेमाल पर वे अपनी तरह से चुहल करते। लेकिन हमेशा फ़िर पलटकर या अगली टिप्पणी में ही वे उनकी मुक्तमन से तारीफ़ करके हिसाब बराबर कर देते। वे यह जाहिर भी करते चलते- कि यह जनभाषा हमका पसंद है वैसे हम कौनौ कम साहित्यिक नाईं हन!
अमरकुमार जी किसी से बहुत दिन तक नाराज नहीं रह पाते थे। संवादहीनता की स्थिति से जल्द से जल्द उबरने की कोशिश करते थे। इस मामले में वे बड़े दिल के आदमी थे। सामने वाले की गलती भूलकर अपनी तरफ़ से संवादहीनता खतम कर लेते थे। जब कोई उनकी टीप से ‘आहत’ होकर कोप-भवन में बैठा होता हो तब डॉ. साहब कोई बात ऐसी कह देते जिससे या तो वह झल्ला जाता या ऐसी गुदगुदी मचाते कि वह बरबस ही सहज हो जाता। परिणाम चाहे जो हो लेकिन ‘संवादहीनता को ख़त्म करने की उनकी ‘साज़िश’ सफल हो जाती थी’! उनकी नाराजगी का पैमाना यह था कि जिसके नाराज होते उसके प्रति ज्यादा औपचारिक हो जाते।
अपने साथ जुड़े लोगों की खैरखबर भी वे लेते रहते थे। पिछले दिनों खुशदीप ने एक बार फ़िर जब ब्लागिंग को अलविदा कहा तो उस समय (इलाज के बाद )उनके बोलने पर पाबंदी थी। उन्होंने मुझसे एस.एम.एस. करके कहा कि मैं खुशदीप को ब्लागिंग छोड़ने से रोकूं। मैंने डा.साहब का संदेशा और अनुरोध खुशदीप को बताया। बाद में जब खुशदीप ने फ़िर से ब्लाग लिखना शुरु कर दिया तो फ़िर डा.साहब ने मुझे शुक्रिया संदेश भेजा जैसे मेरे कहने पर ही खुशदीप वापस लिखने लगे हों।
डा.साहब कभी तटस्थ नहीं रहे। इस तरफ़ या उस तरफ़ या फ़िर किसी और तरफ़। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई बात छिड़े और उनका कोई मत न हो। वे जमकर बहसियाते थे। बहस करने में भाषा का संयम उन्होंने कहीं नहीं खोया और न बहस में व्यक्तिगत हमले कभी किये। अपनी बात रखने में उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि इससे कौन नाराज होगा और कौन खुश लेकिन मोटा-मोटी वे कमजोर के पक्ष में अपने तर्क रखने को ज्यादा तरजीह देते। अब यह अलग बात है कि कुछ ऐसे ही लोगों ने उनसे नाराज होकर उनके खिलाफ़ न जाने क्या-क्या कहा। उनको अपने ब्लाग पर बैन तक किया। लेकिन डा.अमर इससे बेपरवाह रहे।
लोग उनकी इस बेबाकी और साफ़गोई का चतुराई से इस्तेमाल भी करते थे। कहीं मामला फ़ंसा तो डा.साहब के दरबार में शरणागत अर्जी धांस दी। डा.साहब फ़ौरन शरणागतवत्सल होकर उसकी रक्षा करने निकल पड़ते। लेकिन बात समझने में आने पर वे अपने को सही भी करने में बहुत देर नहीं लगाते थे।
अपनी मां के बारे उन्होंने जो पोस्ट लिखी है वह एक ऐसे बेटे की अद्भुत पोस्ट है जो मां और बुजुर्गों के बारे में अश्रुविगलित पोस्टें नहीं लिखता लेकिन अपनी अम्मा को नर्सों के सहारे छोड़ने की बजाय खुद उनकी सेवा करना जानता है।
न जाने कितनी यादें हैं डा.अमर कुमार जी के साथ की। मैं उनसे कभी मिला नहीं लेकिन कभी ऐसा लगा नहीं कि उनसे मुलाकात नहीं है। उनके जाने के एक सप्ताह बाद भी लगता है कि अभी कोई मेल उनके यहां से आयेगी जिसमें उलाहना होगा कि बहुत दिन से मैंने कुछ लिखा क्यों नहीं! मेरे ब्लाग पर वे अलग-अलग नामों से टिपियाते थे। लेकिन उनके अंदाज से ही मैं यह समझ जाता था कि यह टिप्पणी डा.अमर कुमार की ही है।
उनके जाने के बाद उनके ब्लाग की तमाम पोस्टें मैं फ़िर से पढ़ीं। पिछले जन्मदिन पर लिखी उनकी पोस्ट, तेल का दाम बढ़ने पर बनाया गया एनीमेशन (जो कि जी न्यूज वालों उनके ब्लाग से लिया लेकिन उनका नाम पचा गये ), बीमारी से उबरने पर ब्लागिंग में लौटने की खबर देने वाली पोस्ट और भी न जाने कितनी पोस्टें उनकी जिंदादिली और खिलंदड़ेपन की अद्भुत मिसाल हैं।
आज इस वक्त आप हैं लेकिन,
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
समय की नदी में शायद हमारा उनका साथ इतना ही बदा हो। लेकिन मुझे अभी भी यह विश्वास नहीं होता कि वह बेहतरीन इंसान अब हमारे बीच नहीं है जो हमारे प्रति इतना स्नेह रखता था कि हमको छूकर देखने की बात कहता था। ( ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं हूं शायद। न जाने कितने स्नेह भाजन हैं डा.साहब के जिनको उनका अहेतुक स्नेह मिला और उनका असमय जाना सबके लिये विकट दुख का कारण है। )यह भरोसा नहीं होता अटकते हुये बेखटके अपनी बात कहने वाली स्नेहिल आवाज अब केवल स्मृतियों में ही सुनाई देगी।
आज मौका भी है, दस्तूर भी.. गरियाओ यारों.. इस निट्ठल्ले को जरा खुल कर गरियाओ मैं भी लौट कर आपका साथ देता हूँ, आज मैं भी ललकारता हूँ इन्हें कि, जरा अपने असली रूप में तो सामने आओ, महाधूर्त अमर कुमार !
डा.अमर कुमार को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
(बीच वाली फ़ोटो में डा. अमर कुमार , श्रीमती अमर कुमार अजीम शायर कैफ़ी आजमी के साथ! नीचे अमर कुमार द्वारा बनाया एनीमेशन !)
दोनों लड़कियों ने खुद को एक दूसरे से जकड़ लिया और हवा में हाथ उठाकर कैमरे के क्लिक होने का इंतज़ार करती रहीं। दोस्तों ने क्लिक किया और फिर कैमरा लड़कियों के हाथ में और लड़कों के हाथ इंकलाब की मुद्रा में लहराते हुए। रामलीला मैदान से लौटते दोस्तों की टोलियों में एक आंदोलन से लौटने का इतना उत्साह कभी नहीं देखा। भले ही ये तस्वीरें उनके लिए सर्टिफिकेट कोर्स की तरह प्रमाण बन जायेंगी लेकिन 74 साल के एक बूढ़े के प्रति नौजवानों का उत्साह और समर्थन सिर्फ तस्वीरें खींचाने तक ही सीमित नहीं था। वर्ना वो कई महीनों और कई दिनों तक अण्णा आंदोलन से जुड़े नहीं रहते।
अब एक दूसरी तस्वीर देखिये। 2009 का लोकसभा चुनाव। पंद्रहवी लोकसभा को अब तक का सबसे युवा लोकसभा करार दिया जाता है। हिन्दुस्तान की आबादी के तरुण होने की कितनी बातें लिखी जाती हैं,बोली जाती हैं। पत्रिकाओं के कवर में उच्चवर्गीय राजनीतिक परिवारों के वारिस सांसद बन कर युवाओं के भावी प्रतिनिधि के रूप में चमकने लगते हैं। अंग्रेज़ी के एक अखबार में तो नियमित कालम ही शुरू हो जाता है कि युवा सांसदों की दिनचर्या कैसे बीत रही है। कई पत्रिकाओं में उनके फैशन,शौक और गुड लुकिंग का राज पूछा और लिखा जाने लगता है। 66 सांसद ऐसे चुन कर आते हैं जिनकी उम्र 25 से 40 साल के बीच है। 41-50 साल के बीच की उम्र के सांसदों की संख्या १५० हो जाती है और लोकसभा के सांसदों की औसत उम्र 54.5 साल हो जाती है। मीडिया इन युवा सांसदों को चमक दमक के चश्में से देखने लगा।
लेकिन रामलीला मैदान से लेकर देश के तमाम शहरों और गांवों में क्या हुआ? छह महीने तक चले इस आंदोलन में कोई युवा सांसद नज़र नहीं आया। इन युवा सांसदों के आने से जिस राजनीति को नया और तरोताजा बताया जाने लगा वो पहली रोटी की तरह छिप कर कैसरोल के डिब्बे में बासी होने लगे। इनमें से किसी युवा सांसद ने अण्णा हज़ारे के पीछे जुटे युवाओं से संवाद कायम करने की कोशिश नहीं की। मेरे एक मित्र ने दक्षिण दिल्ली के कमला नेहरू कालेज से गुज़रते वक्त बड़ी संख्या में लड़कियों का एक वीडियो बनाया। जिसमें ये लड़कियां चिल्ला रही थीं कि कहां हैं राहुल गांधी। वो अब अपने युवा राहुल गांधी को खोज रही थीं जिनके स्टीवंस कालेज में जाने पर लड़कियों ने आई लव यू राहुल गांधी कहा था। राहुल गांधी भले ही पारिवारिक कारणों से चुप रह गए हों मगर तमाम युवा सांसदों को चुप्पी ने बता दिया कि सांसदों के युवा होने से राजनीति में साहस का नया संचार नहीं हो जाता। युवा सांसद तभी आगे आए जब राहुल गांधी लोकसभा में आकर बोल गए। उसके बाद टीवी चैनलों पर बोलने के लिए कांग्रेस के युवा सांसदों की भरमार हो गई। यानी राजनीति में कुछ नहीं बदला। जब सबको पार्टी लाइन पर ही चलना है तो सांसद के युवा या बुजुर्ग होने से क्या फर्क पड़ता है। एक तरह से देखें तो युवा सांसदों और नेताओं ने युवाओं की इस बेचैनी की आवाज़ बनने से इंकार कर दिया।
उधर अण्णा हज़ारे के पीछे जमा युवाओं की भीड़ को समझने में जानकारों ने भी चूक कर दी। फेसबुक,ट्विटर और मोबाइल से लैस ये युवा उस भारत के नागरिक हैं जो इनके बीच खुद की मार्केटिंग विश्व शक्ति के रूप में करता रहा है। इन युवाओं के जीवन की रफ्तार और धीरज की गति में काफी फर्क है। वो प्रायोजित तरीके से विश्व शक्ति के रूप में प्रचारित किये जा रहे भारत की जड़ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वो जीवन के कई क्षेत्रों मे दीवारें गिरा रहे हैं। राजीनीति की दीवार उनके लिए बाद में आकर खड़ी हुई है। जब सामने आई तो युवाओं ने चुनौती दी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी युवा आगे आए। इन युवाओं ने मीडिया और समाज की बनी बनाई छवि को तोड़ दिया। बड़ी संख्या में लड़के और लड़कियों ने घरों से निकल कर यह साबित कर दिया कि वो सिर्फ अपनी ज़िंदगी में ही नहीं जी रहे थे। जिन युवाओं के लिए हकीकत से काट कर फिल्में तक बनने लगीं, उन युवाओं ने देश की कुछ हकीकत से लड़ने का फैसला किया।
इसीलिए रामलीला ग्राउंड से लेकर तमाम जगहों पर हर धर्म और हर जाति के युवाओं की तादाद दिखी। उनकी एक राजनीतिक ट्रेनिंग का माहौल बना। यह सवाल भी उठा कि क्या यह सवर्णवादी युवा है जो देश की विषमता को नहीं समझता और आरक्षण का विरोध करता है। क्या यह वो युवा है जो सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा प्रायोजित आंदोलन में बिना किसी राजनीतिक समझ के उतर गया है? लोग यह भूल गए कि यह वही युवा है जिसने २००४ और २००९ में दो बार सांप्रदायिक शक्तियों को खारिज किया है। यह वो युवा है जो राजनीति के बनाए इन पूर्वाग्रहों को समझने लगा है मगर पूरी तरह से समझ रहा है इसके प्रमाण और ढूंढे जाने बाकी है। आखिर भ्रष्टाचार के विरोध में नारे लगाते लगाते भले ही कुछ लोगों ने आरक्षण के विरोध का नारा लगाया वो अन्य जातियों में पर्याप्त रूप से शंका पैदा कर सकता है। लेकिन इसके बाद भी इस आंदोलन में जाति और धर्म के हिसाब से युवाओं की विविधता की भागीदारी उल्लेखनीय रही। न सिर्फ भागीदारी के स्तर पर बल्कि आंदोलन को तैयार करने और जारी रखने के स्तर पर। इसके लिए इन युवाओं ने किसी फैशनपरस्त और गुडलुकिंग युवा सांसद को भ्रष्टाचार की लड़ाई का प्रतीक नहीं बनाया। बल्कि अपने घर के पिछवाड़े में धकेल दिये गए बुज़ुर्गों में से एक को ढूंढ लाए और उनमें उन्हीं नैतिक मान्यताओं की खोज की जो हमारी राजनीति का आधार रहे हैं। १९७४ में भी युवाओं ने जयप्रकाश नारायण को खोजा था। वो ढूंढ लाए थे पटना में बीमारी से लड़ रहे जयप्रकाश नारायण को। इस बार ढूंढ लाए रालेगण सिद्धी गांव में बैठे अण्णा हज़ारे को।
लेकिन सवाल यहां एक और है जिसपर आंदोलन से लौट कर युवाओं को सोचना होगा। भाषण और नारेबाज़ी के बीच के फर्क का। बेचैनियों को आवाज़ देने के उतावलेपन में सहनशीलता को छोड़ देने के ख़तरे का। सांप्रदायिकता के प्रति सचेत रहने का होश गंवा देने के खतरा का। एक आंदोलन तभी कामयाब माना जाता है जब ऐसी आशंकाएं हाशिये पर ही खत्म हो जाएं,मुख्यधारा में न आएं। वसीम बरेलवी का एक शेर है। उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है, नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है। युवाओं की भागीदारी ने राजनीति को समृद्ध बनाया है मगर इस डर को उन्हें ही ग़लत साबित करना होगा कि उनकी भागीदारी से चलने वाले आंदोलन आगे किसी मोड़ पर संकुचित नहीं होंगे।
(आज के राजस्थान पत्रिका में छपा है)
Posted by ravish kumar (noreply@blogger.com) on August 31, 2011 05:50 PM· permalink
” अन्ना हजारे के नेतृत्व में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में एक आशा का संचार किया है । सरकार और व्यवस्था परस्त राजनैतिक दलों को जन शक्ति के सामने झुकना पड़ा है । गत ४ दशकों से टाले जा रहे एक प्रभावी लोकपाल/लोकायुक्त संस्था के गठन संबंधी कानून को जन शक्ति के दबाव में संसद में पारित करने का फैसला करना पड़ा है । जन शक्ति की आवाज के संसद में प्रतिध्वनित होने की भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से यह एक ऐतिहासिक घटना है । “
समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पारित राजनैतिक प्रस्ताव में उपर्युक्त विचार व्यक्त करते हुए अन्ना हजारे द्वारा अनशन तोड़ने के बाद अपने वक्तव्यों उठाए गए व्यवस्था परिवर्तन संबंधी सवालों , जैसे मानव और प्रकृति के शोषण पर आधारित व्यवस्था , किसानों और मजदूरों का शोषण , विकेन्द्रीकरण , चुनाव – सुधार , ग्राम-सभा का अधिकार , शिक्षा का घोर व्यावसाईकरण आदि को लेकर आन्दोलन जारी रखने के संकल्प को दोहराया है ।
आगामी १० से १२ अक्टूबर को बिहार के सासाराम में दल का राष्त्रीय सम्मेलन आयोजित होगा ।बैठक में सम्मेलन में पेश होने वाले राजनैतिक , सामाजिक और आर्थिक प्रस्तावों पर व्यापक चर्चा हुई और उन्हें पूर्णांग रूप दिया गया । आगामी दिनों में समाजवादी जन परिषद की पहल पर ’व्यवस्था बदलो – देश बदलो’ के आह्वान के साथ ’परिवर्तन यात्रा निकाली जाएगी’।
गत २७ से २९ अगस्त को रांची में संपन्न समाजवादी जन परिषद की कार्यकारिणी की बैठक में सर्वश्री लिंगराज (अध्यक्ष ) , सोमनाथ त्रिपाठी (महमन्त्री ) , सुनील (उपाध्यक्ष) , अजीत झा,जोशी जेकब,चंचल मुखर्जी (तीनों सचिव),रमांकांत वर्मा ,चन्द्रभूषण चौधरी, शिवपूजन सिंह,सत्येन्द्र बर्मन,शिवजी,रामकेवल चौहान ,संतू भाई व अफ़लातून प्रमुख थे ।
ज़िन्दगी है रेशमी साड़ी जड़ी इक चौखटे ,में बुनकरों का ध्यान जिससे एक दम ही हट गया है पीर के अनुभव सभी हैं बस अधूरी बूटियों से रूठ कर जिनसे कशीदे का सिरा हर कट गया है
है महाजन सांस का लेकर बही द्वारे पुकारे और मन ये सोचता है किस तरह नजरें छुपाये आँख का आँसू निरन्तर चाहता है हो प्रकाशित शब्द की ये चाहना है गीत कोई नव सजाये गीत मन के सिन्धु से जो रोज उमड़े हैं लहर बन आज ऊपत आ नहीं पाते कहीं पर रुक गये हैं भावनाओं के हठीले देवदारों के सघन वन दण्डवत भूशायी हो कर यों पड़े ज्यों चुक गये हैं
दर्द के इक कुंड में जलता हुआ हर स्वप्न चाहे कोई आकर सामने स्वाहा स्वधा के मंत्र गाये पर न जाने यज्ञ के इस कुंड से जो उठ रहा था हो हविष नभ, को शुंआ वो लग रहा है छंट गया है
धड़कनें बन कर रकम, लिक्खी हुईं सारी , बकाया रह गईं जो शेष उनको नाम से जोड़ा गया है एक जो अवसाद में उलास के टांके लगाता रेशमी धागा, निरन्तर सूत कर तोड़ा गया है नीलकंठी कामनायें विल्वपत्रों की प्रतीक्षित पर सजाया है उन्हें आकर धतूरे आक ने ही राजगद्दी ने जिन्हें वनवास खुद ही दे दिया हो हो सके अभिषेक उनके, बस उमड़ती खाक से ही
कोस बिख्री सांस के अक्षम हुए लम्बाई नापें साढ़साती घूम कर फिर आई कितनी बार मापें उंगलियों पर आंकड़ों का अंक जितनी बार जोड़ा एक केवल शून्य हासिल, और सब कुछ घट गया है
कल्पना के पाखियों के पर निकलने से प्रथम ही कैद करने लग गया सय्याद से दिन जाल लेकर चाँद के तट तक पहुँचने की उमंगें लड़खड़ाती ले गई है सांझ वापस, रात की हर नाव खे कर खूँटिया दीवाल पर नभ की जड़ी थीं जगमगाती शिल्पियों ने फिर अमावस के, पलस्तर फेर डाला यामिनी के राज्य ने षड़यंत्र रच कर भोर के सँग पूर्व की गठरी बँधी में से चुरा डाला उजाला
आस पल पल जोड़ कर संचित करें कुछ आज अपना आँजने लगती पलक की कोर पर ला कोई सपना किन्तु मायावी समय के सूत्र की पेचीदगी में घिर, रहा जो पास में था, आज सारा बँट गया है
Posted by राकेश खंडेलवाल (noreply@blogger.com) on August 29, 2011 02:20 AM· permalink
पिछले ६४ वर्षों से कम्प्यूटर में वायरसों ने अपनी पैठ बना ली थी और घूस तंत्र जबरदस्त तरीके से तैयार कर लिया था, पर आखिर कार आम सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर की जबरदस्त माँग और अनशन के मद्देनजर सभी घूसखोर डिवाईसों ने आश्वासन दिया है कि इसके लिये एक एन्टीवायरस तैयार किया जायेगा।
जब कम्प्यूटर बनाया गया था तब उसमें बहुत कम चीजें थीं पर जैसे जैसे जरूरत पड़ती गई, वैसे वैसे नई डिवाइसों के अविष्कार होते गये जैसे सीडी, डीवीडी, पेनड्राईव, माऊस इत्यादि। अविष्कार तो इनका किया गया था कि ये आम आदमी की जरूरतों को पूरा करेंगे और कम्प्यूटर को पूर्ण सहयोग करेंगे, उस समय यह न सोचा गया था कि ये सभी घूस नामक वायरस से प्रभावित हो जायेंगे। सोचा गया था कि कोई सा भी ऑपरेटिंग सिस्टम होगा उनके साथ सहयोग करेंगे।
परंतु कालांतर में घूसखोरी बड़ती गई और अब ये हालात हो गये थे कि सीडी ड्राईव रीड करने के पहले घूस मांगती है, डीवीडी ड्राईव सीडी रीड करने से मना कर देती है, कह देती है कि लैंस ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, परंतु घूस पकड़ाते ही सारे लैंस अपने आप ठीक हो जाते हैं और फ़्लॉपी भी रीड करने को तैयार करने को हो जाती है ये डीवीडी ड्राईव । भले ही फ़्लॉपी लगाने की जगह नहीं हो परंतु फ़्लॉपी रीड करने का भी वादा कर लेगी ये डीवीडी ड्राईव। पेनड्राईव ने डाटा कॉपी करने से मना कर दिया, पेनड्राईव कहती है कि पहले घूस दो नहीं तो मैं कम्प्य़ूटर को करप्ट दिखने लगूँगी, तो हम कहते चिंता मत कर हम तुझे फ़ोर्मेट कर देंगे, तो पेनड्राइव हँसकर बोली कि तुम्हारा डाटा चला जायेगा जो पहले से तुमने मेरे अंदर स्टोर कर रखा है, चुपचाप घूस दे दो और अपना काम करो, नहीं तो करना फ़िर मेहनत, फ़िर डाटा के लिये भागते रहना इधर उधर।
वो तो भला हो रैम का जो आजकल घूस नहीं मांगती, रैम बेचारी को विन्डोज के भारीभरकम सॉफ़्टवेयरों ने इतना काम दे दिया है कि उसे सर उठाने की फ़ुरसत ही नहीं मिलती। यही हाल प्रोसेसर का है, बेचारा भाग भागकर कैलकुलेशन करता रहता है, और घूस के चक्कर में सोच ही नहीं पाता है, वैसे सही भी है जो मेहनत ज्यादा करता है उसी को ज्यादा काम भी दिया जाता है जिससे कम से कम संस्था की साख बची रहती है, ये तो मानेंगे कि रैम और प्रोसेसर के दम पर ही कम्प्यूटर संस्था की साख बची हुई है।
सबसे जबरद्स्त घूसखोर थी 1.44” की फ़्लॉपी ड्राईव, इतनी जबरदस्त कि अगर घूस न दी तो बिल्कुल काम ही नहीं करती थी यहाँ तक कि फ़्लॉपी अंदर तक लेने से मना कर देती थी, और तो और आलम यह था उसकी घूसखोरी का कि घूस खाने के बाद भी फ़्लॉपी पर रीड और राईट करने का अधिकार उसी का था, मर्जी होगी तो करेगी नहीं तो नमस्ते, पैसे भी गये और डाटा भी।
आखिरकार रैम और प्रोसेसर ने दम दिखाया और एकता जगाई और कम्प्य़ूटर के सारे आम पार्ट्स इकट्ठा हुए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया, परंतु कम्प्यूटर ने उनकी सुनने से मना कर दिया कह दिया कि हमारे पास एक्स्ट्रा रैम नहीं है हार्ड डिस्क नहीं है हम आपकी माँगे नहीं मान सकते और छोटे ब्यूरोक्रेट्स की तो बिल्कुल भी नहीं, पर कम्प्यूटर के आम पार्ट्स मानने को तैयार नहीं थे और उन्होंने मदरबोर्ड पर ही धरना देना शुरू कर दिया। कम्प्यूटर को लगा कि ये मान जायेंगे परंतु जब देखा कि प्रोसेसर से रैम तक निकलने वाले घूसखोरी मुहीम के आंदोलन में आम पार्ट्स की संख्या बड़ती ही जा रही है, तब जाकर कम्प्यूटर को चिंता हुई और उन्होंने अपने सदन को बुलाया और अनशनकारियों से बात करना शुरू की, तो कीबोर्ड और माऊस जो कि कम्प्यूटर की तरफ़ से बातें कर रहे थे वे जब मर्जी होती अनशनकारियों से बातचीत में धोखा देते, पर आम पार्ट्स के आंदोलनकारियों की संख्या देखकर आखिरकार कम्प्यूटर को झुकना ही पड़ा।
इसी बीच कई मध्यस्थ आये बहुत सारे व्यवसायी अपने अपने एन्टिवायरस लेकर आये परंतु अनशनकारियों की माँग थी कि ऐसा एन्टीवायरस बने जो कि किसी भी प्रकार के घूस के वायरस से निपटने में सक्षम हो, और आखिरकार कम्प्य़ूटर सदन में ध्वनिमत से घूस के एन्टीवायरस के लिये प्रस्ताव पारित हो गया है। अनशनकारियों का आंदोलन खत्म हो गया है। और चारों तरफ़ खुशियों का माहौल है, विन्डोज के सारे वर्शन खुश हैं कि अब मुझे काम करने के लिये ज्यादा जगह मिलेगी और इसी खुशी में विन्डोज ने अपना स्क्रीनसेवर चला दिया है जिसमें से रंगबिरंगी आतिशबाजी चालू है।
परंतु घूसखोरी चालू है, क्योंकि अभी तो एन्टीवायरस कौन सा हो और कैसे काम करेगा इस पर आखिरी मोहर कीबोर्ड और माऊस की समिती को लगाना है जो कि चारा, कैश रकम देना और २ जी जैसे बड़े बड़े घोटालों में लिप्त हैं। अब देखते हैं कि कौन सा एन्टीवायरस लाया जाता है और इस घूसतंत्र से निपटने में कितनी आसानी होती है और कम्प्यूटर अच्छी तरह से काम करने लगता है।
Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on August 29, 2011 01:37 AM· permalink
ठोस ईंधन वाले राकेट इंजिन ठोस ईंधन वाले राकेट इंजन मानव द्वार निर्मित प्रथम इंजन है। ये सैकड़ो वर्ष पूर्व चीन मे बनाये गये थे और तब से उपयोग मे है। युद्ध मे प्रक्षेपास्त्र के रूप मे इनका प्रयोग भारत मे टीपू सुल्तान ने किया था। ठोस ईंधन वाले राकेट इंजिन की कार्यप्रणाली जटिल नही है। इसे बनाने के [...]
Posted by आशीष श्रीवास्तव on August 29, 2011 01:30 AM· permalink
पिछले एक हफ्ते से मन अनमना सा है। अन्ना हजारे ने देश में जो अलख जगाई है उससे एक ओर तो मन अभिभूत है पर दूसरी ओर इस बात की चिंता भी है कि क्या अन्ना इस जन आंदोलन को उसके सही मुकाम तक पहुँचा पाएँगे । आज जबकि राजनेताओं पर अविश्वास चरम पर है लोकपाल पर पूर्ण समझौते के आसार कम हैं। अन्ना के समर्थकों को समझना होगा कि ये लड़ाई जल्द खत्म नहीं होने वाली। जनसमर्थन से जन लोकपाल बिल को संसद में पेश करवाना एक
(अगर ये विषय आपकी पसंद का है तो पूरा लेख पढ़ने के लिए आप लेख के शीर्षक की लिंक पर क्लिक कर पूरा लेख पढ़ सकते हैं। लेख आपको कैसा लगा इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया आप जवाबी ई मेल या वेब साइट पर जाकर दे सकते हैं।आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा!)
Posted by Manish Kumar (manish_kmr1111@yahoo.com) on August 28, 2011 03:14 PM· permalink
अन्ना बैठे हैं और ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के उन्माद से भरे नारों के बीच वे मुस्कुरा रहे हैं. आरक्षण के विरोध में सड़कें बहारने और जूते पालिश करने वालों की फौज उनके साथ है. उनका आंदोलन ‘अहिंसक’ है, भले ही इसकी रीढ़ वह संघ परिवार है, जिसका इतिहास अल्पसंख्यकों के खिलाफ दंगों और जनसंहारों का इतिहास है. अन्ना की भूख पर खर्च हो रहा एक-एक पैसा बहुराष्ट्रीय कारपोरेट कंपनियों की तरफ से आ रहा है. कारपोरेट मीडिया के चमकते हुए कैमरे अन्ना की मुस्कुराहट के चारों तरफ एक आभामंडल बुन रहे हैं. और अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. लाखों घरों में. टीवी के परदों पर.
अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. क्योंकि उन्होंने एक के बाद एक भ्रष्टाचार के खुलासों के बाद बुरी तरह घिर चुकी सरकार और कंपनियों को उबार लिया है. अपनी भ्रष्टाचार विरोधी बयानबाजी के जरिए वे दुनिया भर की साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्थाओं के गहरे आर्थिक संकट में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे भारतीय मध्यवर्ग को एक झूठी दिलासा दे रहे हैं. उनके पास भारत की सारी समस्याओं का अकेला समाधान है: भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका आंदोलन. वैश्विक पूंजीवाद के आर्थिक संकट के नतीजे में भारत के शासक वर्ग के अंतर्विरोध काफी बढ़ चुके हैं. जनता के संसाधनों की जबरदस्ती लूट और इसके खिलाफ संघर्षरत जनता पर बढ़ती दमनकारी हिंसा के साथ-साथ जीवनयापन की बुनियादी सुविधाओं और चीजों की कीमतें भी आसमान छू रही हैं. ऐसी स्थिति में अपनी वैधता खो चुके शासक वर्ग के सामने इसे हासिल करने का एकमात्र उपाय हमेशा से प्रतिक्रियावाद रहा है. अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी आंदोलन का उभार इसी का नतीजा है.
अन्ना और उनकी रहनुमाई में ‘बुद्धिजीवी समाज’ की सारी बहसें और समाधान सिरे से ही बेईमानी से भरे हुए हैं. ये वास्तविक वजहों की तरफ संकेत तक नहीं करते. घोटाले और भ्रष्टाचार भारतीय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं, मसलन सरकारी कामकाज में लॉबिंग की मौजूदगी. इसके जरिए कंपनियों द्वारा योजनाओं में हेर-फेर की जाती है, कंपनियों के हितों में नीतियां लागू करायी जाती हैं और कानून बनाए जाते हैं. कारपोरेट कंपनियों को सार्वजनिक पैसे से भारी रियायतें और करों में छूट देना तथा दूसरे फायदे पहुंचाना भ्रष्टाचार नहीं माना जाता. और न ही देश की खनिज संपदा और जमीन को कौड़ियों के मोल कंपनियों को बेचा जाना भ्रष्टाचार माना जाता है. मुट्ठी भर लोगों के पास बेशुमार धन का जमा है, जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी 20 रुपए रोजाना पर गुजर कर रही है. उसे जिस बाजार के भरोसे छोड़ा गया है, वह जनता को जीवनयापन के साधन मुहैया नहीं कर सकता. वह तो भ्रष्टाचार के जरिए बस असमानता को ही बढ़ा सकता है. इसलिए निजी पूंजी पर आधारित मुनाफे की व्यवस्था भ्रष्टाचार की जड़ में है. साम्राज्यवाद के तहत यह प्रक्रिया खुल कर सामने आ जाती है, जिसमें साम्राज्यवादी मालिकों के इशारे पर सरकारों को चलाने में भ्रष्टाचार मददगार होता है. जाहिर है, साम्राज्यवाद की सेवा में जुटे पूरे राजनीतिक-आर्थिक ढांचे को बदले बिना भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता. चूंकि मध्य वर्ग द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में इस बात की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती है, इसलिए यह बस एक बेकार और खोखले तमाशे के अलावा कुछ नहीं है. अन्ना बड़े गर्व से यह ऐलान करते हैं कि सेना और पुलिस का पूरा समर्थन उन्हें हासिल है. यह विडंबना ही है, क्योंकि इस देश के सबसे भ्रष्ट संस्थानों में सेना और पुलिस सबसे आगे हैं. जाहिर है कि लोकपाल इन दोनों के भ्रष्टाचार से आंखें मूंदे रहेगा. न ही लोकपाल का मकसद नीतियों और सरकारी योजनाओं के जरिए संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार को खत्म करना है. वह नरेगा और अंत्योदय जैसी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा सकता, जो भ्रष्टाचार को पाल-पोस रही हैं और ग्रामीण इलाकों में एक कुलीन तबके के हाथों में भारी रकम को जमा कर रही हैं. यही कुलीन तबका इस व्यवस्था का आधार है. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान की चमक-दमक के बाहर जीवन और मौत के सवालों से जूझते हुए मेहनतकश जनता गहरे तक पैठी कृषि संकट से जूझ रही है. वह अपनी बदतर होती जा रही जीवन स्थितियों के खिलाफ संघर्ष में एकजुट हो रही है. लेकिन इनका कोई जिक्र तक नहीं होता. जनता का बहुत बड़ा हिस्सा संसदीय व्यवस्था जैसे संस्थानों और शासक वर्ग को चुनौती दे रहा है, जिसे हजारे अपनी ‘गुलाबी क्रांति’ के जरिए थोड़ी राहत पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. अन्ना हजारे हमें उत्पीड़ित जनता के असली सवालों की तरफ से मोड़ना चाहते हैं. जबकि जनता पूरी मौजूदा व्यवस्था को बदलना चाहती है, क्योंकि वह जानती है कि यह व्यवस्था इतनी खुल्लम खुल्ला जनविरोधी है कि इसे परदों और मुखौटों से छुपाया नहीं जा सकता.
अन्ना मौजूदा उत्पीड़क व्यवस्था के लिए खतरा नहीं बल्कि मददगार हैं. यही वजह है कि राज्य उन्हें ‘विरोध’ करने की सारी सुविधाएं मुहैया कर रहा है. संघ परिवार उनके आंदोलन की रीढ़ है. वे नरेंद्र मोदी, राज ठाकरे और नीतीश कुमार जैसे प्रतिक्रियावादियों की तारीफ कर चुके हैं. महाराष्ट्र में उनके ‘आदर्श गांव’ रालेगान सीधी में इस नीति का सख्ती से पालन किया जाता है कि ‘हर गाँव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी. उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गाँव आत्म-निर्भर हो जाएगा.’ उनका यह दलित-पिछड़ा, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी सांप्रदायिक फासीवादी असली चेहरा जान-बूझ कर जनता से छुपाया जा रहा है. अन्ना के आंदोलन में लग रहे ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे उनके असली राजनीतिक चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं. इस खुलेआम फासीवादी आंदोलन में न केवल रामदेव, रवि शंकर और कारपोरेट कंपनियां शामिल हैं, बल्कि कुछ ‘मार्क्सवादी-लेनिनवादी’ नामधारी संगठन भी उनके सुर में सुर मिला रहे हैं.
इसीलिए अन्ना मुस्कुरा रहे हैं. वे मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि संकट में फंसे शासक वर्ग को फासीवाद की मदद चाहिए. इस समय, जब उनकी मुस्कुराहट परदे पर छाई हुई है और उसने बाकी सारी चीजों को ढंक रखा है, कंपनियों को जनता के जल, जंगल, जमीन पर कब्जा दिलाने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में सेना मार्च कर रही है, जिसका मकसद भारत में तेजी से बढ़ रहे क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचल देना है. इसलिए हमें फैसला करना होगा कि हम किस तरफ हैं. हम अन्ना हजारे के प्रतिक्रियावादी ‘आंदोलन’ का हिस्सा बनना चाहते हैं और उनके आरक्षण विरोधी ‘मेरिटोरियस’ चेहरों के साथ दिखना चाहते हैं या हम मजबूती से अपनी उत्पीड़ित मेहनतकश जनता के क्रांतिकारी आंदोलन के साथ खड़े होना चाहते हैं, ताकि इस सामाजिक ढांचे को पूरी तरह बदला जा सके?
(जेएनयू में वितरित DSU का पर्चा)
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on August 27, 2011 02:20 PM· permalink
ओबेराय होटल की मालिक कंपनी ईआईएच के शेयर में एक बार फिर जोरदार हलचल शुरु हो गई है। यह हलचल सेबी द्धारा टेकओवर कोड में परिवर्तन किए जाने के तत्काल बाद आईटीसी अध्यक्ष वाई सी देवेश्वर के बयान के बाद आई। वाई सी देवेश्वर ने साफ कहा है कि हम ईआईएच में निवेश बढ़ाने के बारे में सोच रहे हैं।
आईटीसी के चेयरमैन वाई सी देवेश्वर का कहना है कि ईआईएच में और निवेश पर हमारा ट्रेजरी विभाग फैसला करेगा लेकिन मौजूदा भाव पर हिस्सेदारी बढ़ाने का यह अच्छा मौका है, हम निवेश करेंगे। आईटीसी के पास चार हजार से पांच हजार करोड़ नकदी है। जब हम इसे निवेश करेंगे तो इक्विटी में ही होगा और कारोबार की बात की जाए तो आप जानते ही हैं कि यह होटल्स में होगा। सेबी ने नए टेकओवर कोड में कहा किसी कंपनी में निवेश 15 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी किया जा सकता है और इसके बाद ओपन ऑफर लाना होगा। आईटीसी के पास ईआईएच की 14.98 फीसदी इक्विटी है।
आईटीसी के पास ईआईएच के शेयर वर्ष 2000 से हैं और यह अटकल हमेशा रही है कि आईटीसी ईआईएच के शेयरधारकों के लिए ओपन ऑफर लाएगी लेकिन कंपनी ने अनेक बार इससे इनकार किया है। ईआईएच में रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष मुकेश अंबानी को भी रुचि है और उन्होंने इसके 14.8 फीसदी शेयर ले रखे हैं। जबकि, प्रमोटरों के पास 34.4 फीसदी शेयर हैं।
ईआईएच के तीन प्रमोटरों ने पिछले साल मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की पूर्ण स्वामित्ववाली सब्सिडियरी रिलायंस इंडस्ट्रीज इनवेस्टमेंट एंड होल्डिंग्स प्रा. लि. को 5.54 करोड़ शेयर बेचे थे जो कुल इक्विटी का 14.12 फीसदी हिस्सा थी। इक्विटी बेचने वाले ये तीन प्रमोटर ओबेराय होटल्स प्रा. लि., अरावली पॉलिमर्स प्रा. लि. और पृथ्वी राज सिंह ओबेराय हैं। मुकेश अंबानी की कंपनी ने 14.12 फीसदी इक्विटी के लिए एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा चुकाएं। बाद में आए राइट इश्यू से रिलायंस सब्सिडियरी का हिस्सा बढ़कर 14.8 फीसदी पहुंच गया।
हालांकि, सेबी के नए टेकओवर कोड के बाद रिलायंस ने ईआईएच में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के संबंध में कोई संकेत नहीं दिया है। लेकिन आईटीसी तैयारी कर रही है। आईटीसी पहले से ही होटल कारोबार में हैं लेकिन रिलायंस ने अब तक यह नहीं कहा है कि वह इस नए कारोबार में उतरेगी या यह केवल एक निवेश है।
आईटीसी के पास होटल लीला वेंचर के भी 13 फीसदी शेयर हैं। होटल लीला के प्रमोटरों के पास शेयरधारिता 54.6 फीसदी है इसलिए होटल लीला के अधिग्रहण का डर कम है। होटल लीला के प्रमोटर अपना 2800 करोड़ रुपए का कर्ज बोझ कम करने के लिए कुछ हिस्सा निजी इक्विटी खिलाडियों को बेचने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों होटल लीला के शेयर प्रमोटरों की ओर से बाजार से खरीदे गए हैं।
टेकओवर कोड का अन्य लाभ वायसराय होटल्स को होगा। शेयर निवेशक राकेश झुनझुनवाला के पास इसके 11.5 फीसदी शेयर हैं, जबकि प्रमोटरों के पास 32.2 फीसदी शेयर हैं। वायसराय के 5.9 फीसदी शेयर अनिल अंबानी समूह की कंपनी सोनाटा इनवेस्टमेंट के पास है।जो निवेशक धैर्यवान हैं और लंबे समय में बेहतर रिटर्न चाहते हैं उनके लिए ईआईएच बेहतर शेयर हो सकता है। ईआईएच के टेकओवर के लिए आईटीसी के इरादों का जवाब देने के लिए मुकेश अंबानी मैदान में उतरते हैं तो निवेशकों की पौ-बारह होने की संभावना है।
Posted by कमल शर्मा (noreply@blogger.com) on August 27, 2011 02:55 AM· permalink
"ख़ामोशी में निहाँ खूँगश्तः लाखों आरजुएँ हैं, चिराग़े-मुर्दः हूँ मैं बेज़बाँ गोरे गरीबाँ का ।"
"जिसप्रकार परदेसियों और पथिकों की क़ब्रों के बुझे हुए दीपक उनकी लाखोंकामनाओं को अपने कलेजे में छिपाए होते हैं वैसे ही मेरे मौन में भीरक्तरंजित लाखों कामनाएँ निहित है !"
क्यासोचा होगा गालिब ने कि उनका यह शेर कभी उनकी दिल्ली की ही दास्तानबयान करेगा.दिल्ली का नामलेतेही ,पर्यायवाची की सूची की तरहलालकिला,क़ुतुब मीनार, इण्डिया गेटतुरंत ज़हन में आ जाते हैं. परक्यादिलवालों की दिल्ली कावजूद बस इन्हींमें सिमटाहुआहै.? यहाँकी सडकों पर चलतेहुए यह एहसास सबको ज़रूर हुआ होगा जैसे इतिहास केपन्ने भी हम अपने वर्तमान के साथ साथ पलटते जा रहे हैं. तारीख केकितनेहीमुकाम इस शहर परअपनेनिशान छोड़ चुके हैं, हरमोड़परदिखतेखँडहरसे झांकती है कितने हीसुल्तानों, राजाओं, बादशाहों की रूहें.
सात शहरों के इतिहास को अपने दामन में समेटे आज कीदिल्ली ज़माने के साथबदलती भी है औरपुराने जामे को पहने भी रहती है. कैसे बसी दिल्ली, कहाँ सेआईंइसकी तहें दर तहें ? तुगलकाबाद, सिरी,शाहजहानाबाद , इनसे गुज़र करदिल्ली यहाँ तक पहुँची कैसे?
वैसे तो दिल्ली के आसपासबस्तीबहुतपहलेसे थीलेकिन तोमर वंश के राजपूत राजा अनंगपाल नेलाल कोट नाम का किला बनवाया , और इसी किले का विस्तार पृथ्वीराज चौहान नेकियाराय किला पिथौरा के रूप में किया. यहीं से शुरुआत हुई दिल्ली की.किला रायपिथौरा को माना जाता है पहला शहर .
वैसे दिल्ली कानाम कैसेपड़ा इसकी भी एक रोचक दास्तानहै .तोमर राजा अनंगपाल अपने पोते के जन्मका जश्न मनाना चाहते थे . एक महात्मासे पूछा तो उन्होंने उसी वक्त को सबसेशुभ माना और यह भी कहा कि अगर अभी किया तो आपका राज बहुत मज़बूत होगा औरज़मीन के नीचे बैठे शेषनाग तक इसकी जडें जायेंगी.राजा ने अविश्वास प्रकटकिया तो संतने एक खम्बा ज़मीन में गाड़ा और निकाल लिया.निकालनेपरखम्बा सांप के खून से लथपथ निकला. तोमर राज्य के लिए भविष्यवाणी हो गयी किराजा के टाल मटोल करने के कारण उनका राज्य भी इसी खम्बे की तरह ढीलाहोगा. "किल्ली तो ढिल्ली भाई, तोमर भया मतिहीन". इसी से इस जगह का नामदिल्ली पड़ा. वैसे तो इस लोहे के खम्बे को कई लोग उसी खम्बे से जोड़ते हैंजो सबने क़ुतुब मीनार के पास देखा होगा ! तो फिर देखिये क़ुतुब मीनार केपास पहली दिल्ली की यह निशानी ,
क़ुतुब मीनार को बनवाने वाले कुतुबदीन ऐबकने ही चौहान वंश को मात देकरभारत मेंगुलाम वंश की स्थापना की. महरौली की आसपास घूमते हुएमिलेगी बलबन की कब्र ,जमाली कमाली की कब्रें और वहां कीमशहूर फूलों कीमंडी .इसी जगह पर बसी थी दूसरीदिल्ली , महरौली की .
आगेहौज़ ख़ास की ओर बढ़ते हुए आप पहुंचेगे तीसरी दिल्लीके पास.खिलजी सुलतान अला-उ-द्दीन खिलजी ने मंगोलआक्रमणसेबचने केलिएएक शानदार किला और महल बनवाया .कहतेहैंइसकीडेढ़किमीलम्बीदीवारमें दसहज़ारमंगोल सैनिकोंकेसिरकाटकरदफ़नकियेगएहैं .इसकेकारणइसको नाम दिया सिरी . अबआपखेलगाँवऔरसिरीफोर्टइलाकेसेगुज़रेंतोइतिहासकेइसखूनी पन्ने पर भीगौरकरें .परइन्हींराजा नेअपनी प्रजा का ख्याल रखते हुए , निवासियोंकेलिएपानीकाइंतज़ामकियाऔर बंवायाहौज़ख़ास. खिलजीवंशकेबादसत्तापहुँचीतुगलकों केहाथमें औरगियासुद्दीनतुगलक नेबसाईचौथी दिल्ली . आजकेमहरौलीबदरपुर मार्ग परतुगलकाबादकिलेकेअवशेष हैं . बहुतहीऊंची किलेकीदीवारोंकेअन्दरएकपूराशहरबसा था. परदिल्लीकेप्रमुखरास्तोंसेथोडाअलगहोने केकारणयहाँदेखने वाले कमआतेहैं. तुगलाकाबाद में पानी की समस्या थी ,सो फिरोज़शाह तुगलक ने यमुना के पास अपने लिये एक शहर बसाया फिरोज़ाबाद. आज के आइ टी ओ और बहादरशाह ज़फर मार्ग के पास बसा यह था पांचवी दिल्ली,जिसका विस्तार पहले के शहरों से ज़्यादा था.क्रिकेटप्रेमी तो फिरोज़ शाह कोटला के नाम से परिचित होंगे.यह इन्हीं तुगलक की विरासत है.शानदारकिले के अब खंडहरके नाम पर बचे हैं जामीमस्जिद,एक बाओली,और अशोक स्तम्भ जो फिरोज़शाह अम्बाला से ले आये थे .
भारत के सबसे लम्बे समय तक राज करने वाले मुगल कैसे पीछे रह सकते थे . हुमायुँ ने बनायी अपनी रजधानी और नाम दिया दीनपनाह . शेरशाह सूरी ने सभी भवनों को नष्ट करके इसी जगह पर बनवाया था शेरगढ. आज के पुराना किला के इर्द गिर्द बसा यह शहर छठी दिल्ली था.पुराना किला तो आते जाते दिख जाता है ,पर अब यहाँ से गुज़रतेहुए सोचियेगा कि इतिहास के किस मुकाम के आप रूबरू हैं .
अकबर ने दिल्ली में नया शहर न बनवाकार राजधानी ही आगरा पहुंचा दी ! पर शाहजहाँ वापस दिल्ली आये और इसको दिया इसका सातवाँ अवतार ,शाह्जाहाँबाद के रूप में . लाल किला ,जामा मस्जिद ,चांदनी चौक सब इस इमारतों के शौकीन बादशाह की देन हैं.
आज की दिल्ली अपनी इन पुरानी पीढीयों की विरासत तो है ही पर नयी दिल्ली के रूप में हम जिसे जानते हैं वह देन है अंग्रेज़ों की. लुटयेंस दिल्ली के नाम से जाने जानावाला चौडी सडकों, भव्य कोठियों , कनाट प्लेस के अनोखे अन्दाज़ वाला यह आधुनिक शहर भारत का दिल है . आगे का रूप कैसा होग यह कह पाना मुश्किल है,पर इतना ज़रूर है कि दिल्ली है बडी निराली.
Posted by Poonam Misra (noreply@blogger.com) on August 26, 2011 07:48 AM· permalink
यह बात मैं शुरू ही में स्वीकार कर रहा हूं कि मैं अन्ना हज़ारे का प्रशंसक नहीं हूं, न उनका अथवा उनके आन्दोलन का समर्थक ही हूं. यह ठीक है कि अन्ना हज़ारे ने ऐसी दुखती हुई रग पर उंगली रखी है जो एक लम्बे अर्से से इलाज-उपचार की मांग करती रही है. भ्रष्टाचार किसी नासूर की तरह हमारे जीवन के हर क्षेत्र में घर करता चला गया है और इसके साथ ही हर क्षेत्र में - चाहे वह नितान्त निजी क्षेत्र हो या एकदम सार्वजनिक - जवाबदेही के अभाव ने इस नासूर को लगभग लाइलाज बना दिया है. इस बात से भी मुझे इनकार नहीं है कि जबसे अन्ना हज़ारे ने अपना अन्दोलन शुरू किया है, उन्हें आम जनता का, ख़ासकर शहरी और क़स्बाई मध्यवर्ग के लोगों का भरपूर समर्थन मिला है, यहां तक कि दूर-दूर के देशों में भी इसके समर्थन में लोग सामने आये हैं. यह इस बात का भी सबूत है कि एक तो हमारी जनता क़दम-क़दम पर भ्रष्ट आचरण का सामना करते-करते आजिज़ आ चुकी है, दूसरी ओर देश के सार्वजनिक पटल पर जिस तरह के घोटाले सामने आये हैं और उन्हें ले कर सत्ताधारी दलों में -- चाहे वह प्रान्तीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी हो या केन्द्रीय स्तर पर कान्ग्रेस पार्टी -- जैसा दुचित्तापन और लीपा-पोती करने की मानसिकता दिखाई दी है, उससे जनता को यक़ीन होने लगा है कि क़ानूनी और संवैधानिक तरीक़ों से अब बहुत कुछ सपरने वाला नहीं है. इस नासूर से निपटने के लिए कुछ और ही तरीक़े अपनाने होंगे. यह भी सही है कि अन्ना के आन्दोलन ने हमारी केन्द्रीय सरकार को किसी हद तक हिला कर भी रख दिया है. यह सब स्वीकार करने के बाद अगर मैं फिर अन्ना हज़ारे और उनके आन्दोलन की ओर लौटूं तो मैं यही कहना चाहता हूं कि इस सब को ले कर अभी बहुत आशा बंधती नहीं नज़र आती और मेरे ही नहीं बहुतों के मन में सवाल-ही-सवाल हैं.
पहली बात तो यह है कि अभी तक न तो अन्ना हज़ारे ने यह साफ़ किया है न उनके आन्दोलन में शामिल उनके साथियों ने कि उनकी नज़र में क्या भ्रष्टाचार कोई रोग है या रोग का लक्षण ? अगर तो यह रोग है, तब इस से लड़ने की रणनीति अलग होगी और अगर यह लक्षण है, जैसा कि अन्ना और उनके साथियों की अब तक की कार्रवाई से जान पड़ता है, तब भिन्न उपाय अपनाने होंगे और हमें समस्या की गहराई में उतर कर पहले यह तय करना होगा कि उस रोग का स्वरूप क्या है जिसका लक्षण भ्रष्टाचार के रूप में हमें दिखायी दे रहा है; वैसे ही जैसे बुख़ार अपने आप में रोग नहीं होता, बल्कि हम उसे दूर तभी कर पाते हैं जब हम रोग का निदान कर लेते हैं कि बुख़ार तपेदिक़ की वजह से है या मलेरिया अथवा और किसी गड़बड़ी के कारण.
सो, अभी तक अन्ना हज़ारे और उनके साथी भ्रष्टाचार को लक्षण मान कर ही चल रहे लगते हैं जैसा कि उनकी मांगों से भी अनुमान होता है. उन्होंने अब तक जो बयान दिये हैं उनसे लोगों में यही सन्देश गया है कि कुल मिला कर राजनैतिक/प्रशासनिक तन्त्र ही भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार है. उन्होंने अपने दायरे में स्वैच्छिक संस्थाओं, निजी क्षेत्र के उद्यमों-उद्योगों और ऐसे तमाम इलाक़ों को शामिल नहीं किया है जो इस देश-व्यापी भ्रष्टाचार का स्रोत भी हैं और हिस्सा भी. यही नहीं, फ़िलहाल अन्ना और उनके दल में शामिल लोगों में यही समझदारी काम करती जान पड़ती है कि भ्रष्टाचार का सम्बन्ध सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसे की अनुचित आवा-जाही से है. भ्रष्टाचार का एक और भी विराट सामाजिक परिप्रेक्ष्य हो सकता है या उसका उपचार हमारे समूचे देश की मनो-सामाजिक बनावट के उपचार में निहित है -- यह सोच फ़िलहाल अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में नज़र नहीं आती. इसके साथ-साथ अन्ना ने हमारे देश की बुनियादी अर्थ-व्यवस्था पर भी कुछ नहीं कहा है. मिसाल के लिए उदारीकरण की नीति, मुक्त अर्थ-व्यवस्था, आवारा पूंजी और बड़े कारपोरेट जगत का कितना और कैसा हाथ मौजूदा भ्रष्टाचार के पीछे है इस पर अन्ना और उनके साथी मौन हैं. विदेशी कम्पनियां किस बेरहमी से हमारे देश की प्राकृतिक और दूसरी सम्पदा को लूट रही हैं, कहां-कहां कहर ढा रही हैं और इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार कैसे पनप रहा है, इसका कोई उल्लेख अन्ना के चार्टर में नहीं है.उनकी दृष्टि में एक सख़्त, तानाशाह-सरीखा लोकपाल ही, जो राजनीतिक दायरे के बाहर रह कर काम करे, इस नासूर का इलाज है.
अगर यह भी मान लिया जाये कि उन्होंने लोकपाल या कहा जाये जनलोकपाल की मांग इसलिए उठायी है कि वे भ्रष्टाचार को रोग मान कर चल रहे हैं तो फिर दूसरा और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी भी सरकारी अधिनियम से, किसी सरकार-नियुक्त लोकपाल के माध्यम से अथवा जनलोकपाल के ज़रिये भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना सम्भव है ? सामान्य समझदारी के हिसाब से भी और अन्ना हज़ारे के वक्तव्यों से भी यही क़यास लगता है कि लोकपाल या जनलोकपाल अंकुश ही का काम करेगा जो भ्रष्टाचार को रोकेगा. इसमें प्रथमत: तो यह छिपी हुई स्वीकारोक्ति है कि भ्रष्टाचार तो मनुष्य की प्रकृति है और उसकी रोक-थाम ही की जा सकती है, यानी बाहरी उपाय से ही उस पर अंकुश लगाना सम्भव है. और इसी से दूसरी बात भी उभरती है कि लोकपाल ही समस्या का समाधान है. लेकिन जब भ्रष्ट होना मनुष्य की प्रकृति हो तब क्या लोकपाल भी किसी मुक़ाम पर भ्रष्ट नहीं हो सकता ? और अगर ऐसा हो तब लोकपाल पर अंकुश का काम कौन करेगा ? क्या ऐसा अचूक तरीक़ा या तन्त्र लागू किया जा सकता है जो भ्रष्टाचार की रोक-थाम करे, पर उससे दूषित अथवा प्रदूषित न हो ? कौन नहीं जानता है कि हमारे देश में क़ानूनों की कमी नहीं है. तो भी अपराध पर नियन्त्रण पाने में क़ानून किस हद तक सहायक होते हैं इसे ले कर लम्बी बहस चलती रही है. क्या यही हाल लोकपाल बिल का तो नहीं होने जा रहा है ?
तीसरा सवाल यह है कि यह सारी क़वायद यों की जा रही है जैसे कि पहले से कोई व्यवस्था देश में काम न कर रही हो. अगर अन्ना हज़ारे और उनके साथी यह मानते हैं कि देश में संसदीय लोकतन्त्र है, उसका एक संविधान है और उस संविधान द्वारा निर्वाचित और गठित लोकतान्त्रिक संस्थाएं भी हैं - मसलन न्यायपालिका, संसद अर्थात विधायिका और कार्यपालिका - तब ऐसा कोई प्रावधान या क़दम जो संविधान या इन लोकतान्त्रिक संस्थाओं का उल्लंघन करता हो, वह कैसे जनता को स्वीकार होगा ? अगर यह माना जाये कि पूरी व्यवस्था ही सड़ गयी है, तो फिर एक सड़ी हुई व्यवस्था से सिवा इसके कि वह विदा हो, कुछ भी मांगने का क्या तुक है ? वैसे भी अन्ना हज़ारे और उनके साथियों की तरफ़ से जो पर्चा बंटवाया गया है उसमें उन्होंने साफ़-साफ़ कहा है कि उनका उद्देश्य "व्यवस्था को बदलना" है. अगर ऐसा है तो फिर सरकार के सामने कोई मांग रखने का क्या औचित्य है ? इस समय हमारे देश में पूंजीवादी अएर्थ-व्यवस्था से युक्त संसदीय लोकतन्त्र है. कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना कभी की ख़ारिज कर दी गयी है. इस समय अगर पुराने गांधीवादी मुहावरे का प्रयोग करें तो "पैसे का राज" है. और वह भी निरुंकुश. हमारा सारा समाज, अगर मतसंग्रह किया जाये तो, एक स्वर से यही कहेगा कि पैसा ही ताक़त, ख़ुशहाली और उन्नति का स्रोत है. हमारे प्रधानमन्त्री जिनके वित्त-मन्त्रित्व काल में मौजूदा व्यवस्था का श्रीगणेश हुआ था, यह दोहराते नहीं थकते कि आर्थिक उन्नति ही उनकी सफलता का पैमाना माना जाये. इस अर्से में कितने लाख किसानों ने आत्म-हत्याएं की हैं, कितने आदिवासी पूंजीपतियों द्वारा बेघर हुए है, शरणार्थी बन कर बड़े शहरों में आदमी से कई दर्जे नीचे की ज़िन्दगी बसर करने को मजबूर हुए हैं, आम मध्यवर्गीय और विशेष रूप से निम्न मध्यवर्गीय जन कैसी मुसीबतें भुगत रहे हैं, मज़दूरों पर कितना कुठार चला है इसका लेखा-जोखा प्रधानमन्त्री के भाषणों में नहीं मिलता. और अचरज है कि अन्ना की भी नज़र इस पर नहीं गयी है. निजी सम्पत्ति की अवधारणा का कितना और कैसा सम्बन्ध भ्रष्टाचार से है, इस पर भी अन्ना की तरफ़ से कुछ सुनने को नहीं मिलता. यह ठीक है कि वे बार-बार कहते हैं कि उनके पास "अपना" कुछ भी नहीं है, लेकिन अपरिग्रह का जो विचार गांधी ने प्रचारित किया था और जिसके फलस्वरूप बड़े-बड़े लोगों ने अपनी निजी सम्पत्ति का त्याग कर दिया था, उसका कोई संकेत मौजूदा आन्दोलन में नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि अन्ना यह समझ बैठे हैं कि एक गांव को सफलता से आदर्श गांव में तब्दील करने की हिकमत से ही इस विशाल देश की बहुमुखी और बहुसंख्यक समस्याएं निपटा दी जा सकेंगी ?
जिस "सिविक सोसाइटी" का ज़िक्र वे बार-बार करते हैं वह कैसी है, उसमें कौन-कौन है, कौन-कौन नहीं है, इसका भी कोई स्पष्ट सा ख़ाका अन्ना के पर्चे से नहीं लगता. क्या पूंजीपति वर्ग इस सिविक सोसाइटी में है या नहीं ? अगर है तो फिर अन्ना भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को कैसे उस संस्था के पहरेदारों के रूप में कल्पित करते हैं जो वे जनलोकपाल बिल द्वारा बनाना चाहते है ?
अन्ना हज़ारे के आन्दोलन की तुलना गान्धी और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों से की गयी है. क्या सचमुच यह आन्दोलन उन आन्दोलनों जैसा है.?
सबसे पहली बात तो यह है कि गान्धी ने सत्याग्रह तो बुनियादी तौर पर आत्म-शुद्धि के, अपने विरोधी का हृदय परिवर्तन करने के, औज़ार के रूप में आविष्कृत किया था, इसलिए नहीं कि अनशन द्वारा अपने विरोधी को ज़बरदस्ती अपनी मांग मानने के लिए मजबूर किया जाये. उन्होंने बार-बार अंग्रेज़ी सरकार और उनके नुमाइन्दों से कहा था कि हिन्दुस्तान पर उनकी हुकूमत अनैतिक है. और वे उन्हें इस बात का बोध कराने के लिए सत्याग्रह का मार्ग अपना रहे हैं ताकि वे स्वेच्छा से हिन्दुस्तान छोड़ कर चले जायें. यहां लेकिन अन्ना का सारा ज़ोर इस बात पर है कि मौजूदा सरकार उनका जनलोकपाल बिल पारित कर दे या उसमें अमुक मांग जोड़ दे या हटा दे. उनके भाषणों में शान्ति और हिंस की अपीलों के साथ जो फ़्छ्पा हुआ उकसावा भी ध्वनित होता रहता है, वह भी संशय पैदा करता है.
अन्ना का निशाना भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं जान पड़ता, वरना उनका निशाना वे सारे लोग होते जो भ्रष्ट हैं और अन्ना सत्याग्रह इसलिए करते कि ये भ्रष्ट लोग भ्रष्टाचार से किनाराकशी कर लें, जो गांधी का लक्ष्य होता. अगर अन्ना हज़ारे यह कहते कि जो रिश्वत ले रहा है, ग़लत रास्ते पर चल रहा है, वह उससे बाज़ आये और जो रिश्वत दे रहा है या ग़लत बातें बर्दाश्त कर रहा है, वह इस से गुरेज़ करे चाहे कितना ही कष्ट क्यों न उठाना पड़े, तो ज़रूर उनका सत्याग्रह सत्याग्रह कहला सकता था. लेकिन अन्ना ने ऐसा कोई आह्वान नहीं दिया न अपने अनशन के पीछे ऐसी कोई शर्त रखी.
एक अन्तर और भी है. गांधी का आन्दोलन पूरे समाज को साथ ले कर चलता था. अन्ना के आन्दोलन का दायरा अब भी बहुत सीमित है. देश की बहुसंख्यक मेहनतकश किसान-मज़दूर आबादी अभी तक उनके पीछे नहीं आयी है. मुस्लिम बिरादरी के मन में अनेक शक-शुबहे हैं तो दलितों ने अपनी तरफ़ से एक लोकपाल बिल का प्रारूप पेश करने की बात कहते हुए अन्ना और सरकार, दोनों ही के लोकपाल बिलों से असहमति व्यक्त की है. बल्कि दलितों के कुछ संगठनों ने तो आरोप लगाया है कि अन्ना और उनके साथी एक बुनियादी सवर्ण. पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था के हामी हैं.
यही नहीं बल्कि गान्धी से अन्ना की तुलना करने वाले एक बुनियादी अन्तर भी भूल गये हैं. गान्धी जब सत्याग्रह करते थे तो अपने हर समर्थक से यह वादा कराते थे कि वह ऐसा कोई आचरण नहीं करेगा जिसमें हिंसा का लेश भी हो या जिस से उच्छॄंखलता की गन्ध भी आये. यही कारण है कि सब के बरजने के बावजूद गांधी ने चौरा चौरी की घटना के बाद अपना आन्दोलन वापस ले लिया था और उसके बाद भड़की हिंसा के "प्रायश्चित्त स्वरूप" अपना प्रसिद्ध इक्कीस दिन का उपवास शुरू किया था.
अन्ना हज़ारे का आन्दोलन हालांकि अभी तक बहुत हद तक अहिंसक ही रहा है, लेकिन जिस तरह के दृश्य जन्माष्टमी के दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में देखने को मिले, भीड़ का एक हिस्सा नशे की हालत में जिस तरह की गालियां देते हुए पुलिस को उकसाने लगा, मोटरसाइकिलों पर बिना हेल्मेट के सवार तीन-तीन चार-चार नौजवान झण्डे लहराते हुए यातायात के नियमों का उल्लंघन करते नज़र आये, जिस तरह इस आन्दोलन ने सामान्य नागरिकों, यहां तक कि अन्ना का समर्थन करने वालों के लिए भी मुसीबतें खड़ी कीं, और इस सब पर अन्ना हज़ारे और उनके साथी ख़ामोश रहे, उसे देख कर यह अन्दाज़ा करना मुश्किल नहीं कि अन्ना का यह आन्दोलन किसी भी वक़्त बेक़ाबू हो कर अराजकता की दिशा ग्रहण कर सकता है.
अख़बारों में ये ख़बरें भी छपी हैं कि अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में शामिल होने के लिए आये लोगों में महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ की घटनाएं भी इस मात्रा में नज़र आयीं कि महिलाओं के लिए अलग स्थान मुक़र्रर करना पड़ा. क्या गांधी के किसी भी आन्दोलन में ऐसा देखने में आया था ? यही नहीं इस आन्दोलन ने कुछ ऐसे नारे भी पैदा किये जो बुनियादी सभ्यता के ख़िलाफ़ हैं. मैंने और मिराण्डा हाउस के हिन्दी विभाग में पढ़ाने वाली सुश्री रमा यादव ने मेट्रो में सफ़र करते हुए चन्द "जोशीले" अन्नावादियों को "सोनिया जिसकी मम्मी है, वह सरकार निकम्मी है" का नारा लगाते सुना. यही नहीं सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए युवक गिरोह बना कर नारे लगाते और लोगों को भी नारे लगाने के लिए विवश करते दिखायी दिये. यह भी ग़ौर-तलब है कि जहां गांधी के आन्दोलन ने 1919 के बाद से ही बड़े पैमाने पर नारी-जागृति का काम किया था, महिलाएं खुल कर आन्दोलनों में हिस्सा लेती थीं, वहीं अन्ना के आन्दोलन में अगर महिलाएं शामिल हैं भी तो कम-से-कम नारी मुक्ति का वह पहलू उसमें से ग़ायब है उधर देहरादून से पुराने साथी धीरेन्द्र कुमार ने ख़बर दी की लोग सड़कों पर "जो नहीं है साथ में, चूड़ी पहने हाथ में" का नारा लगा रहे थे और इसमें महिलाएं भी शामिल थीं जिन्हें इस नारे के स्त्री-विरोधी होने का कोई अन्दाज़ा नहीं था.
आखिरी बात यह कि गांधी जब सत्याग्रह करते थे तो वे सरकार और सरकारी संस्थाओं से अनुमति नहीं मांगते थे कि वे इस या उस स्थल पर सत्याग्रह या उपवास करेंगे. अन्ना के आन्दोलन में जैसा नाटकीय घटनाक्रम आन्दोलन का स्थल तय करने के सिलसिले में दिखाई दिया उस से ऐसा लगा जैसे अन्ना का यह कोई प्रायोजित आयोजन हो. यहां हम फिर ध्यान दिला दें कि ऊपर हमने गांधी के जिस उपवास का ज़िक्र किया वह किसी सार्वजनिक स्थल पर नहीं बल्कि मौलाना मुहम्मद अली के घर पर रखा गया था और इक्कीस दिन बाद हिंसा के समाप्त हो जाने पर ही तोड़ा गया था.
गांधी और अन्ना में एक बुनियादी फ़र्क़ यह भी है कि हालांकि गांधी का सारा बल समग्र मानवीय स्थिति पर रहता था, वे बहुत बड़ी मात्रा में अध्यात्म और आध्यात्मिक उपायों को अपनी सामाजिक-राजनैतिक विचारधारा में गूंथे रहते थे, ताहम उन्होंने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि उनका आन्दोलन उतना ही राजनैतिक और सामाजिक भी है. अभी तक अन्ना और उनके साथियों ने यही कहा है कि उनका सम्बन्ध राजनीति से नहीं है. और, यह बात तो हम सब जानते हैं कि राजनीति से कोई सम्बन्ध न रखने की बात कहने वाले की भी एक राजनीति होती है. हमारे प्यारे कवि मुक्तिबोध जब किसी से मिलते थे तो एक सवाल ज़रूर करते थे -- "पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?" इसलिए अभी नहीं तो अपने आन्दोलन के और आगे बढ़ने पर अन्ना हज़ारे और उनके साथियों को अपनी राजनीति तो स्पष्ट करनी ही होगी. अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे गांधी के आन्दोलन की तो बात ही क्या, लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों के भी क़रीब नहीं पहुंच पायेंगे, भले ही इस समय कितनी ही तेजस्विता क्यों न दिखाई दे रही हो.
मार्क्स का सुप्रसिद्ध कथन है कि इतिहास अपने को दोहराता है, मगर हू-ब-हू नहीं. पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार स्वांग के रूप में. गांधी का आन्दोलन गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व से मण्डित होने के बावजूद अपने समय और परिस्थितियों की पैदावार था. यही हाल जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन का भी था. उसे दोहराने की कोई भी कोशिश दिक़्क़तें ही पैदा करेगी. जयप्रकाश नारायण ने उसे दोहराने की कोशिश की थी तो अंजाम उन्नीस महीने के आपात काल और उसके बाद की विपदाओं की त्रासदी के रूप में सामने आया था. अन्ना हज़ारे के आन्दोलन में - अगर उसे क़ायदे से संभाला न गया तो स्वांग बनने की तमाम सम्भावनाएं मौजूद हैं जिनका एक ट्रेलर इसी रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के उपवास में लोग देख चुके हैं.
Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on August 26, 2011 07:47 AM· permalink
इस चिट्ठी में, चेन्नई में फूल बेचने वाले लड़के, थॉम से मुलाकात की चर्चा है।
चेन्नई में मुझे अपने मित्र के यहां सुबह नाश्ते पर जाना था। मैंने सोचा कि उसकी पत्नी के लिए कुछ फूल ले चलूं। उसके घर जाते समय, रास्तें में एक १४-१५ साल का लड़का फूलों के साथ खड़ा हुआ था। मैंने रूक कर, उससे फूल लिया।
मुझे बहुत फूलों वाले बुके देना नहीं पसंद है। मैं हमेशा केवल एक ही फूल देना पसंद करता हूं। इसमें पैसा बरबाद नहीं होता है और भावना भी व्यक्त हो जाती है।
मैंने लड़के से नारंगी रंग का गुलाब लिया और पैक करने को कहा। उसने बताया,
'मेरा नाम थॉम है। मैं चेन्नई से नहीं हूं। मुझे तमिल नहीं आती है पर हिन्दी अच्छी आती है।'
मुझे लगा कि वह उत्तर भारत से है।
थॉम ने उस गुलाब के फूल के साथ एक मोरपंखी की डंठल को प्लास्टिक में पैक किया। उसके बाद एक चमकती हुई पन्नी लगायी। इसके लिए उसने मुझसे दस रूपये लिये।
मैंने उससे पूछा कि क्या यह दुकान तुम्हारी है उसने जवाब दिया,
'यह दुकान मेरी नहीं है। मेरे मालिक की है और मैं उसके लिये काम करता हूं।'
मैंने पूछा कि तुम्हें कितना पैसा मिलता है। उसने कहा,
'मालिक मुझे रहने की जगह और खाने के साथ, प्रतिदिन का दस रूपया देते हैं।'
मैंने उससे पूछा कि कितने फूल बेच लेते हो। उसने कहा,
'यह निर्भर करता है कि समय कैसा है। शादी के समय ज्यादा फूल बिकते है। उस समय मैं कम से कम ५००/-रूपये का फूल बेच लेता हूं।'
उसने फूलों को बहुत अच्छी तरह से पैक किया। लगता था कि वह इसमें माहिर है।
मैंने उससे पूछा कि क्या तुम पढ़ते हो उसने कहा सर हिला कर मना किया। यह सुनकर थोड़ा सा दुख हुआ। काश, वह जिसके साथ रहता हो, वह उसे स्कूल में भी भेजते तो शायद थॉम का जीवन बेहतर हो जाता। यदि इस चिट्ठी के पढ़ने वालो में,
वह व्यक्ति भी हो, जिसके साथ थॉम काम करता है तो मैं चाहूंगा कि वह थॉम को पढ़ने के लिये भेजे;
उस व्यक्ति का कोई मित्र हो तो वह उस व्यक्ति को, थॉम को स्कूल भेजने के लिये प्रेरित करे।
मैं चेन्नई एक सम्मेलन में मुझे भाग लेने के लिए गया था। दोपहर में, मैंने उसमें भाग लिया तथा अपनी बात सबके सामने रखी। वह सराही भी गयी। हांलाकि, वह अंग्रेजी में थी। उसके बाद हम लोग जल्दी सो गये। क्योंकि अगले दिन सुबह हमें वापस दिल्ली जाना था।
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में, बसंतकुज दिल्ली की डी.टी. स्टार प्रॉमेनेड मॉल की, ओम शांति बुक स्टॉल से, 'एनीथिंग फार यू मैम' (Anything for you Ma'am) पुस्तक खरीदने चलेंगे।
हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol ► after the heading. This will take you to the page where file is. his will take you to the page where file is. Click where ‘Download’ and there after name of the file is written.)
बीस साल पहले, आज के दिन लिनेक्स करनल प्रकाशित हुआ था। इस चिट्ठी में इसी की चर्चा है।
‘उन्मुक्त जी, “बीस साल पहले” फिल्म तो १९७२ में आयी थी – घिसी पिटी थी – चली भी नहीं। क्या फायदा उसकी चर्चा करने से? कोई तड़कती भड़कती फिल्म की चर्चा करते तब कोई बात थी।’
अरे, मैं कोई फिल्म की चर्चा थोड़ी कर रहा हूं। मैं तो लिनेक्स के बारे में बात कर रहा हूं।
‘लिनेक्स के बारे में! अरे, आपके शीर्षक या आज के दिन का लिनेक्स से क्या वास्ता?’
है तो कुछ, चलिये कुछ बातें उसी के बारे में।
यूनिक्स दुनिया का सबसे पहला लेकिन सबसे सुदृढ़ एवं सबसे बेहतरीन ऑपरेटिंग सिस्टम है। लेकिन यह कुछ मुश्किल है। इसे सिखाने के लिये ऐमस्टरडैम के कम्प्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर एन्डी टैनाबॉम ने मिनिक्स नामक ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया। इसमें कुछ कमियां थीं । इसी को दूर करने के लिये लिनुस टोरवाल्ड ने, २५ अगस्त १९९१ को, आज ही के दिन, २० साल पहले, ‘comp.os.minix’ नामक न्यूज़ग्रुप में यह चिट्ठी प्रकाशित की,
‘I’m doing a (free) operating system (just a hobby, won’t be big and professional like gnu) for 386 (486) AT cones. … I’d like any feedback on things people like/dislike in minix, as my OS resembles it … I’d like to know what features most people would want. Any suggestions are welcome, but I won’t promise I’ll implement them ‘
मैं एक (मुक्त) ऑपरेटिंग सिस्टम ३८६ (४८६) पीसी के लिये शौक के तौर पर कर रहा हूं पर यह ग्नयू की तरह बड़ा नहीं होगा … मैं, आपका मिनिक्स के बारे में फीडबैक चाहूंगा कि उसमें आपको क्या पसन्द है और क्या पसन्द नहीं। क्योंकि मेरा ऑपरेटिंग सिस्टम उसी के तरह है … मैं यह भी चाहूंगा कि आप उसमें किस तरह की सुविधायें चाहते हैं। हर तरह के सुझावों का स्वागत है। लेकिन मैं उन्हें अमल करने का वायदा नहीं करता हूं
अगले साल १९९२ में, लिनेक्स को, जीपीएल लाइसेन्स के अन्दर प्रकाशित किया गया। यहीं से लिनेक्स की यात्रा शुरू हुई। यदि आप हिन्दी में लिनेक्स के बारे में जानना चाहें तो ‘लिनेक्स की कहानी‘ पढ़े या फिर मुक्त सॉप्टवेयर में दिलचस्पी रखते हों तो ओपेन सोर्स सौफ्टवेर पर भी एक नजर डालें।
अंग्रेजी में लिनेक्स की कहानी का यह विडियो भी अच्छा है। इसका आनन्द लें।
‘मुक्त मानक और वामन की वापसी’ श्रृंखला की अलग अलग कड़ियों को आप नीचे दिये गये लिंक पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं। इसकी कुछ कड़ियों को, आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये नीचे लिंक के बगल में ब्रैकेट ( ) के अन्दर लिखे ► चिन्ह पर चटका लगायें। यह ऑडियो फाइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप सारे ऑपरेटिंग सिस्टम में, फायरफॉक्स ३.५ या उसके आगे के संस्करण में सुन सकते हैं। इन्हें आप,
Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
Linux पर सभी प्रोग्रामो में,
सुन सकते हैं। ब्रैकेट के अन्दर चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें। इन्हें डिफॉल्ट करने के तरीके या फायरफॉक्स में सुनने के लिये मैंने यहां विस्तार से बताया है।