फुरसत के रात दिन (हिन्दी ब्लॉग)

Last updated by Venus on 27th January 2012 at 7:31 a.m. CST for Amit Chakradeo

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Posted by RC Mishra on January 03, 2012 03:09 PM· permalink

My Weekly Twitter Updates for 2011-10-30

  • Why on earth should kids TV channels have late night programming on Sandhi Sudha? Case of kids getting early arthritis? #
  • May the auspicious festival of lights illuminate your way and bring the glow of joy and fortune. Happy Diwali! #

Posted by Debashish Chakrabarty on October 29, 2011 09:00 PM· permalink

My Weekly Twitter Updates for 2011-10-16

  • Any way to retire @40 and start getting an unemployment allowance? Nah! #
  • In @LinkedIn email titled "Some news to make yr day go better" first news headline says "Father Of C & UNIX, Dennis Ritchie, Passes Away" #

Posted by Debashish Chakrabarty on October 15, 2011 09:00 PM· permalink

मैराथन में दौडने के बाद दिया बच्चे को जन्म - Khaskhabar.com


Khaskhabar.com

मैराथन में दौडने के बाद दिया बच्चे को जन्म
Khaskhabar.com
शिकागो। एक महिला धावक ने मैराथन में दौडने के बाद बच्चे को जन्म दिया। दरअसल धाविका अबेर मिलेर गर्भवती थी और 42 किमी की शिकागो मैराथन की फिनिश लाइन पार करने के कुछ ही मिनट बाद उसे प्रसव पीडा शुरू हुई और कुछ घंटे बाद उसने एक बच्ची को जन्म दिया। जब धाविका अबेर मैराथन में दौड रही थी तब उसके पेट में 39 सप्ताह का गर्भ था। अबेर को गर्भवती होने का पता रेस के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के बाद चला था। अबेर ने यह मैराथन>छह घंटे 25 मिनट पूरी ...
पहले मैराथन में दौड़ी, फिर बच्ची जन्मीनवभारत टाइम्स
मैराथन के बाद महिला ने बच्ची को जन्म दियाstar.newsbullet

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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

भारत का हिस्सा नहीं है जम्मू-कश्मीर : पाक - याहू! जागरण


SamayLive

भारत का हिस्सा नहीं है जम्मू-कश्मीर : पाक
याहू! जागरण
संयुक्त राष्ट्र। पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ एक बार भड़काऊ बयान देते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया है। उसने कहा है कि जम्मू-कश्मीर कभी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा और घाटी के बाशिंदों की इच्छा जानने के लिए संयुक्त राष्ट्र की अगुवाई में एक जनमत संग्रह कराने की मांग की। गुस्साए भारत ने पड़ोसी देश के इस बयान को 'गैरजिम्मेदाराना' बताया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में ...
जम्मू कश्मीर भारत का कभी अभिन्न हिस्सा नहीं रहाKhaskhabar.com
पाकिस्तान का भड़काऊ बयान, कहा- जम्मू कश्मीर नहीं है भारत का अभिन्न अंगदैनिक भास्कर
कश्मीर नहीं रहा कभी भारत का हिस्साः पाकअमर उजाला
Patrika.com
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

तेलंगाना: चंद्रशेखर राव के ख़िलाफ़ मामला दर्ज - बीबीसी हिन्दी


हिन्‍दी लोक

तेलंगाना: चंद्रशेखर राव के ख़िलाफ़ मामला दर्ज
बीबीसी हिन्दी
हैदराबाद में पुलिस ने टीआरएस अध्यक्ष चंद्रशेखर राव के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने का एक मामला दर्ज किया है. इन कथित भाषणों का संबंध राज्य में चल रहे अलग तेलंगाना आंदोलन से है. इस बीच आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन चला रही तेलंगाना संयुक्त संघर्ष समिति का प्रस्तावित रेल रोको कार्यक्रम तीन दिनों के लिए टाल दिया गया है. रेल रोको आंदोलन 12 अक्तूबर की बजाए 15 अक्तूबर से शुरू होगा. समिति के संयोजक कोंडा राम ने कहा ...
टीआरएस प्रमुख सहित तीन नेताओं पर भडकाऊ बयान देने का मामला दर्जKhaskhabar.com
तेलंगाना के 3 नेताओं के खिलाफ मामला दर्जअमर उजाला
भड़काऊ भाषण के कारण चंद्रशेखर के खिलाफ मामला दर्जPatrika.com

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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

PSLV-C18 की सभी तैयारियां पूरी, उल्टी गिनती शुरू - Live हिन्दुस्तान


Khaskhabar.com

PSLV-C18 की सभी तैयारियां पूरी, उल्टी गिनती शुरू
Live हिन्दुस्तान
धुव्रीय उपग्रह प्रक्षेपण वाहन पीएसएलवी-सी 18 की मदद से अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले मेघा ट्रापिक्यूस उपग्रह और तीन अन्य उपग्रहों को छोड़े जाने की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। प्रक्षेपण वाहन की उल्टी गिनती सूचारु रूप से चल रही है। उपग्रहों को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से कल छोड़ा जाएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] के सूत्रों ने बताया कि बूस्टर स्ट्राप ऑन मोटर्स रहित पीएसएलवी-सी 18 बुधवार ...
पीएसएलवी सी-18 की उल्टी गिनती शुरू हुईमनी कॉंट्रोल
उपग्रह लांचिंग की उलटी गिनती में सुचारू प्रगतिKhaskhabar.com
मौसम उपग्रह की लांचिंग के लिए उलटी गिनती शुरूदैनिक भास्कर
अमर उजाला -Patrika.com
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

चिदंबरम की भूमिका की जांच मामले में फैसला सुरक्षित - Khaskhabar.com


SamayLive

चिदंबरम की भूमिका की जांच मामले में फैसला सुरक्षित
Khaskhabar.com
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले की केन्द्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) की जांच की निगरानी एवं तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम की भूमिका की जांच कराए जाने संबंधी याचिकाओं पर सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की खंडपीठ ने मुख्य याचिकाकर्ता सेंटर फार पब्लिक इन्ट्रेस्ट लिटिगेशन(सीपीआईएल) के वकील प्रशांत भूषण, एक अन्य याचिकाकर्ता ...
2 जी केस: चिदंबरम की जांच संबंधी याचिका पर फैसला सुरक्षितनवभारत टाइम्स
एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में चिदंबरम का नाम घसीटे जाने का विरोधPressnote.in
2 जी घोटाले की फांस में पी चिदंबरमआज तक
प्रातःकाल -एनडीटीवी खबर -IBN Khabar
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

दिग्विजय ने अन्ना को लिखा,भ्रष्ट लोग साथ तो भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा - Khaskhabar.com


आज तक

दिग्विजय ने अन्ना को लिखा,भ्रष्ट लोग साथ तो भ्रष्टाचार कैसे खत्म होगा
Khaskhabar.com
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के सम्बंधों को लेकर उनकी विश्वसनीयता पर संदेह ख़डा करते हुए मंगलवार को पूछा कि जब संसद ने लोकपाल विधेयक पर उनकी मांगों का समर्थन किया है, तो फिर वह कांग्रेस का विरोध क्यों कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने एक खुले पत्र में अन्ना से कहा है कि आपका यह बयान कि आपको यह जानकारी नहीं कि आरएसएस ने आपके आंदोलन का समर्थन किया है, ...
दिग्विजय ने अन्ना की विश्वसनीयता पर उठाए सवालLive हिन्दुस्तान
दिग्विजय का ख़त अन्ना के नामबीबीसी हिन्दी
दिग्विजय ने अन्ना को लिखा, आपका इस्तेमाल हो रहा हैमनी कॉंट्रोल
हिन्‍दी लोक -नवभारत टाइम्स
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

भंवरी को खोजने में नाकाम रही सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार - दैनिक भास्कर


SamayLive

भंवरी को खोजने में नाकाम रही सरकार को हाईकोर्ट की कड़ी फटकार
दैनिक भास्कर
जोधपुर। भंवरी देवी अपहरण मामले में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले की सुनवाई में राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को जमकर लताड़ लगाई। मंगलवार को न्यायाधीश गोविंद माथुर व न्यायाधीश एनके जैन द्वितीय की खंडपीठ ने मौखिक रूप से यहां तक कह दिया कि एक महीने से एक महिला गायब है और सरकार को उसकी चिंता ही नहीं है। जनता पुलिस के भरोसे बैठी है और सरकार को अपनी पुलिस पर ही भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि इतिहास में अब तक ऐसी नाकारा सरकार ...
एफएसएल जांच में बाल बरामदPressnote.in
भंवरी देवी अपहरण में इस्तेमाल वाहन बरामदअमर उजाला
भंवरी देवी मामले में पुलिस पर लगे आरोपPatrika.com
SamayLive -P7News
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

आडवाणी पहुंचे सिताबदियारा - दैनिक भास्कर


Raviwar

आडवाणी पहुंचे सिताबदियारा
दैनिक भास्कर
सिताब दियारा(छपरा). भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लड़ाई को अपनी रथयात्ना से आगे बढ़ाते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने मंगलवार को अपनी 38 दिन की जनचेतना यात्ना आरंभ की जिसे बिहार के मुख्यमंत्नी नीतीश कुमार ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित लोक नायक जय प्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताब दियारा से आडवाणी की यात्ना शुरू हुई। बाद में आडवाणी कुमार के साथ यहां ...
आडवाणी की रथयात्रा प्रारंभ्भ, नीतिश ने दिखाई हरी झंडीKhaskhabar.com
सिताबदियारा से आडवाणी ने फूंका भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुलLive हिन्दुस्तान
'व्यवस्था परिवर्तन' के नारे के साथ आडवाणी की यात्रा शुरूstar.newsbullet
नवभारत टाइम्स -IBN Khabar -Bhadas4Media
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

उत्तर प्रदेश में बिजली संकट गहराया - Khaskhabar.com


याहू! जागरण

उत्तर प्रदेश में बिजली संकट गहराया
Khaskhabar.com
लखनऊ। कोयले की कमी के कारण ताप विद्युत संयंत्रों में उत्पादन ल़डख़डा गया है। इसके चलते उत्तर प्रदेश में बिजली संकट गहरा गया है। उत्पादन में कमी के कारण प्रदेश में लोगों को त्योहारी मौसम में जबर्दस्त बिजली कटौती का सामना करना प़ड रहा है सूबे में बीते पखव़ाडे भारी बारिश के चलते गीले कोयले की समस्या से बिजली उत्पादन में पहले ही गिरावट आ गई थी। अब कोल इंडिया के कर्मचारियों की ह़डताल ने परेशानी और बढ़ा दी है। ...
उत्तर प्रदेश में बिजली संकट गहरायाअमर उजाला
दिल्ली सरकार ने बिजली किल्लत ठींकरा यूपी पर फोड़ाLive हिन्दुस्तान
दिल्ली की बिजली हड़प रहा है उत्तर प्रदेशजोश 18
नवभारत टाइम्स -याहू! जागरण -Business standard Hindi
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Posted on October 11, 2011 12:28 PM· permalink

जुगराफ़िया


शांतिशहर में नहीं पैदा हुई थी।गाँव में पैदा हुई थी। जन्मलेने के पाँच साल बाद तक भीउसने शहर नहीं देखा था। उसकागाँव ही उसकी सम्पूर्ण दुनियाथा। जो चीज़ गाँव में थी वहीउसकी दुनिया में थी और जो चीज़गाँव में नहीं थी वो दुनियामें भी नहीं थी। गाँव में किसीके भी आँगन में गुलाब का फूलनहीं होता था इसलिए शांति केलिए दुनिया में गुलाब का फूलनहीं होता था। इसी तरह आईसक्रीमऔर टीवी जैसी चीज़े जो गाँवके दृश्य में कहीं उपस्थितनहीं थे, वो भी उसकीदुनिया का हिस्सा नहीं थे।इसलिए पूरे पाँच साल तक गुलाब,आईसक्रीम और टीवी सेख़ाली दुनिया मे रहने के बादशांति जब शहर गई तो उसकी दुनियाबदल गई।

शहरमें गुलाब, आईसक्रीम,और टीवी के अलावा भीबहुत कुछ ऐसा था जो शांति नेकभी नहीं देखा था। शहर मेंनज़र के ठहरने का कोई ठिकानाही नहीं था। इतनी चीज़े होतीदेखने को कि नज़र लगातार भटकतीरहती। वो जितनी देर जागतीरहती, हर नई चीज़को फटी-फटी आँखोंसे ताकती रहती। सारी नई चीज़ेउसकी आँखों के रास्ते अन्दरचली जातीं। और जब शांति सोतीतो अन्दर आईं नई चीज़े उसकीदुनिया में रात भर खलबली मचातीरहतीं। कुछ तोड़-फोड़भी करतीं पर बहुत ज़्यादा नहींक्योंकि शांति की दुनिया मेंबहुत सारी ख़ाली जगह थी। उसकीदुनिया में बहुत सारी ख़ालीजगह थी क्येंकि गाँव में बहुतसारी ख़ाली जगह थी।

गाँवमें जब शांति घर से बाहर निकलतीऔर किसी भी एक दिशा में चलतीतो बहुत देर तक उस दिशा मेंचलते रहने पर भी उस दिशा काअंत नहीं होता था। गाँव केबाहर में बहुत सारा बाहर था।और इसी तरह गाँव के अन्दर मेंभी बहुत सारा अन्दर था पर बाहरसे कम। जब वो अन्दर आती तो अन्दरभी बाहर की तरह बहुत सारी ख़ालीजगह थी। बहुत सारे लोगों कोअन्दर आ जाने का बाद भी घर भरतानहीं था। मुर्गी, कुत्ते,चूहे, बिल्लीऔर गाय के अन्दर आ जाने पर भीनहीं। घर का मतलब था मिट्टीकी दीवारों के बीच की और खपरैलके छप्पर के नीचे की ख़ालीजगह। जिसमें खाट, बिछौना,बरतन, घड़ा,अनाज और तेल की ढिबरीजैसी चीज़ें रखी जा सकें।

गाँवमें चीज़ें कम थीं। और उन परभरोसा किया जा सकता था। पेड़अपनी जगह रहता था, तालाबअपनी जगह, घूरा अपनीजगह और सबके घर अपनी जगह पर।सूप खूंटी पर ही होता, रस्सीकुँए की घिर्री पर ही रहती,और उपले दीवार पर ही।वो चलती और बदलती नहीं थी औरऔर अगर वो चलती और बदलती भी तो भी तो इतना धीरे जैसे कि मौसमबदलता है। शांति ने पाया किशहर में ऐसा नहीं था। शहर मेंकुछ तय नहीं था कि कौन सी चीज़कब कहाँ चली जाएगी और कब क्याशकल ले लेगी। कल तक सड़क परजहाँ पेड़ था, कलवहाँ खम्बा हो सकता है। जहाँघर था, वहाँ मैदानहो सकता है। और जहाँ मैदान था,वहाँ ऊँची दीवार होसकती है। किसी के घर के अन्दरजहाँ भगवान थे, वहाँटीवी हो सकता है। जहाँ टीवीथा, वहाँ बिस्तर होसकता है और जहाँ बिस्तर था,वहाँ कल को बाथरूम होसकता है।

एकबार तो ऐसा भी हुआ कि शांति केघर के सामने जो घर था वो घर तोरहा पर जिन लोगों का घर था वोलोग ही नहीं रहे। शांति के लिएवह बहुत ही सन्न कर देने वालीघटना रही। वो बार-बारउस घर के दरवाजे पर पड़े तालेको देखती और फिर भी मान नहींपाती कि वो लोग सचमुच अपना घरछोड़कर चले गए। कुछ दिनों बादजब उसने इस दरवाजे को खुलादेखा तो वो बेहिचक उस घर मेंअन्दर तक दौड़ गई। पर अन्दरतो कोई और ही लोग थे। और अन्दरजो घर उसे दिखा वो घर भी कोईऔर ही घर था। दीवारें और छतवही थे पर सामान अलग था। वोलोग और सामान मिलकर उसके अन्दरफिर से एक खलबली पैदा कर रहेथे। शांति के भीतर की दुनियामें उस घर का जो जुगराफ़ियाथा, वो बाहर केजुगराफ़िये से टकरा कर बहुतदिनों तक अजीब उलझन पैदा करतारहा।

औरबाद में जब ख़ुद शांति के पापाको अपना घर बदलना पड़ा तब तोहालत और भी विकट हो गई। यह बातउसे बड़ी कठिनाई से समझ आई किघर भी किराए पर लिया और दियाजाता है। घर बदलने के बाद भीलम्बे समय तक वो पहले वाले एककमरे के घर को ही घर कहती औरवहीं चलने की ज़िद करती। शांतिके मम्मी-पापा समझदारथे- उनको ऐसी कोईतक़लीफ़ नहीं थी। वो उसे कईतरह से लुभाते और समझाते किदेखो ये घर अधिक बड़ा है,रौशनीदार है।

धीरे-धीरेशांति भी समझदार हो गई। पुरानेदोस्तों को आसानी से भूलनासीख गई। और जल्दी से नए दोस्तबनाना भी सीख गई। और जो चीज़पहले उसके भीतर बहुत उलझन पैदाकरती थी, उसी बातमें उसे दिलचस्पी पैदा हो गई।वो जब भी किसी के घर जाती तोउस घर के रहने वालों से मिलनेजाती और उस घर से भी मिलने जाती।एक जैसे मकान होने पर भी कोईदो घर एक जैसे नहीं होते। हरघर अलग होता। वैसे ही जैसे हरआदमी के नाक-कान-मुँहहोता है फिर भी हर आदमी अलगहोता है।

शांतिको किसी के घर के भीतर जाना उसव्यक्ति के भीतर प्रवेश करनेजैसा लगता। शांति को लगता जैसेघर के अन्दर कई लोग रहते हैंवैसे ही व्यक्ति के अन्दर भीकई लोग रहते हैं। शांति ने यहभी पाया कि हर बार हर घर कुछबदल जाता है वैसे ही जैसे हरबार हर आदमी भी थोड़ा सा बदलजाता है। शांति के लिए किसीके घर जाना लगभग उससे हाथ मिलानेऔर दोस्ती करने जैसा था। रहस्यमयलोग अपने घर के दरवाजे हमेशाबंद रखते। शांति जिनसे दोस्तीकरना चाहती, उन्हेघर बुलाती और उन्हे अपना कमराज़रूर दिखाती। सिर्फ़ उन्हीलोगों के लिए उसके दरवाजे बंदरहते जिन्हे वो पसन्द नहींकरती।

शांतिकी यह दिलचस्पी शादी के पहलेतक क़ायम रही। पर अब वो दिननहीं रहे। अब लोग एक-दूसरेके घर नहीं आते-जाते।जाते भी हैं तो शालीनता सेलिविंग रूम में गुफ़्तगू करतेहैं और लौट आते हैँ। लिविंगरूम की बनावट से आदमी की बनावटभर का ही पता चलता है और कुछनहीं। अधिकतर लोग बाहर कहींमिलने लगे हैं। और वो जगहेंऐसी हैं जिनमें उनकी कोई निजतानहीं झलकती। शांति के लिए यहएक नई उलझन बन गई है। शांति कोलगने लगा है कि वो किसी को नहींपहचानती। कौन कैसा है, कुछभी नहीं जानती।

***


(इस इतवार दैनिक भास्कर में छपी)

Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on October 11, 2011 06:10 AM· permalink

इसमें झिझक कैसी

वक्त ही ऐसा कि हवा भटकती है
सांय सांय सिर फोड़ती खिड़की दरवाजों पर,
इस कोलहाल के वीराने मुझे अपनी सांस से भी लगता है डर
मैं उसे आशा की तरह साधे रहता हूँ अपनी मुस्कान में.

Posted by मोहन राणा - Mohan Rana (noreply@blogger.com) on October 10, 2011 10:21 PM· permalink

भट्टा परसौल गैंगरेपः 16 जवानों के खिलाफ होगा मामला दर्ज - दैनिक भास्कर


SamayLive

भट्टा परसौल गैंगरेपः 16 जवानों के खिलाफ होगा मामला दर्ज
दैनिक भास्कर
लखनऊ. उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के भट्टा परसौल गांव में महिलाओं के साथ बलात्कार मामले में पीएसी के जवानों पर मामला दर्ज किया जाएगा। नोयडा की अदालत ने सोमवार को पुलिस की पुनरीक्षण चाचिका को रद्द करते हुए यह आदेश दिया। इस मामले में गौतमबुद्धनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) ने सितंबर में पीएसी की 49 वीं बटालियन के कमाण्डर और 15-16 जवानों के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करने का आदेश जारी किया था। ...
भट्टा पारसौल सामूहिक बलात्कार मामले में याचिका खारिजLive हिन्दुस्तान
भट्टा परसौल: अदालत के फैसले पर सियासतstar.newsbullet
भट्टा परसौल बलात्कार: 16 जवानों पर मामला दर्जमनी कॉंट्रोल
Patrika.com -SamayLive -P7News
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Posted on October 10, 2011 07:45 PM· permalink

होनहार भूत और अनहोनी

panini

हि न्दी में ‘होना’ एक बहुत आम क्रिया है। कुछ घटित होने के अर्थ में होना क्रिया बोली और लिखत-पढ़त की भाषा में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली क्रिया है। ‘होना’ क्रिया का जन्म अधिकांश विद्वान संस्कृत के ‘भवन्’ से मानते हैं। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक भवन का प्राकृत रूप होण था जिसका हिन्दी रूप होना है। समझा जा सकता है कि भवन > हअण > होण > होन > होना, कुछ इस क्रम में ‘होना’ का विकास समझ आता है। इस वाक्य को अगर यूँ लिखा जाए- “कुछ इस क्रम में होना का विकास हुआ होगा” गौर करें कि ये ‘हुआ’ और ‘होगा’ भी ‘होना’ के ही कालसूचक क्रियारूप हैं अर्थात ये भी ‘भवन’ से सम्बद्ध हैं। होना की मूल धातु ‘हो’ है। कुछ का कुछ होना यानी काम बिगड़ना,  किसी का होना यानी अपनी आस्था किसी को सौंपना, होता-सोता यानी सगा-सम्बन्धी। होकर रहना यानी अनिष्ट घटना आदि। 
हिन्दी वर्तमानकालिक वाक्य रचनाओं के अन्त में ‘हूँ’, ‘है’, ‘हो’ जैसी सहायक क्रियाएँ अवश्य लगती हैं। ये सभी ‘हो’ या ‘होना’ से सम्बद्ध हैं। विभिन्न व्याकरणाचार्यों ने ‘होना’ के विभिन्न रूपों का विकास संस्कृत की ‘अस्’ धातु या ‘भू’ धातु से माना है। इसमें ‘भू’ से ही होना का विकास अब सर्वमान्य है। उदयनारायण तिवारी और धीरेन्द्र वर्मा हूँ रूप को ‘अस्मि’ से यूँ सिद्ध करते हैं- संस्कृत, अस्मि > प्राकृत, अम्हिं > हिन्दी, हूँ। डॉ भोलानाथ तिवारी ‘हूँ’ का विकास संस्कृत की ‘भू’ धातु के वर्तमानकालिक रूप से ही मानते हैं मसलन संस्कृत, पाली में भवामी > प्राकृत में होमी > अपभ्रंश में होवि > हौं > हिन्दी, हूँ। डॉ तिवारी कहते हैं कि ये सभी रूप ‘हो’ धातु के हैं जो कि ‘भू’ से ही विकसित हो सकते हैं न कि ‘अस्’ से। इन सहायक क्रियाओँ की विशेषता ये है कि इनमें पुरुष और वचन के अनुरूप बदलाव होता है। लिंग से वाक्य रचना में कोई अन्तर नहीं पड़ता। जैसे उत्तम पुरुष में- मैं जा रहा हूँ / हम जा रहे हैं। मध्यम पुरुष में तुम जा रहे हो / वे जा रहे हैं। अन्य पुरुष में वह जा रहा है/ वे जा रहे हैं। ‘भव’ से ही पूरवी बोलियों का ‘भया / भवा’ शब्द बना है। हिन्दी में इसका रूप ‘हुआ’ बनता है। ‘भयो’ का मालवी रूपान्तर काँईं ‘हुओ’ / काँईं’ होयो’ है। अन्यमनस्कता को सिद्ध करने के लिए हिन्दी में ‘हूँ-हाँ करना’ मुहावरा बहुत कुछ कह देता है।
संस्कृत के ‘भवनम्’ का एक अर्थ होता है आवास, निवास, घर, प्रकोष्ठ, स्थान, आधार, इमारत या प्रकृति। यहाँ प्रकृति शब्द पर गौर करें। इसके अलावा जितने भी पर्याय हैं वे सब आश्रय शब्द के दायरे में आते हैं। ये निर्मित हैं। भवन को बनाया जाता है अर्थात उसमें होने की क्रिया निहित है। कुछ आश्रय प्राकृतिक भी होते हैं जैसे वृक्ष-कोटर, पर्वत-कंदरा, गुफा आदि। ये सब मनुष्य के प्राकृतिक आवास होते हैं। प्रकृति अपने आप में जीव-जगत का नैसर्गिक आश्रय है, इसलिए प्रकृति का एक अर्थ ‘भवन’ महत्वपूर्ण है। भवनम् बना है संस्कृत धातु ‘भू’ से जिसमें मूलतः घटित होने का भाव है। घटित होने में उगने, पैदा होने, जन्म लेने, उदित होने, आकार लेने, उगने, निकलने, जीवित रहने, विद्यमान रहने का भाव है। व्यापक और दार्शनिक अर्थों में ये सब क्रियाएँ और भावार्थ सृष्टि की ओर इंगित करते हैं।
भू से संस्कृत में भूः बनता है जिसमें विश्व, सृष्टि, पृथ्वी जैसे भाव हैं। पृथ्वी के सभी भाव बड़े प्रतीकात्मक में हैं। इसी कड़ी में ‘भू’ से बना भूमि जो विश्व के सभी जीवधारियों का आश्रय है। ‘भूमि’ जैसी रचना में होने का भाव स्वतः निहित है। ‘भूमि’ यानी जो हो चुकी है अर्थात जो विद्यमान है। ‘भूमिका’ शब्द का अर्थ भी ज़मीन, आधार, पृथ्वी, स्थान, प्रदेश आदि है। अभिनय के संदर्भ में भूमिका का अर्थ है नाटक का कोई चरित्र। यहाँ आधार शब्द प्रमुख है। नाटकीय चरित्र ही नाटक का आधार होते हैं। ‘भौमिक’ का अर्थ है पार्थिव अर्थात भूमि सम्बन्धी। ‘भू’ के साथ जब ‘क्त’ प्रत्यय लगता है तो बनता है ‘भूत’ अर्थात जो हो चुका है, बीत चुका है, व्यतीत हो चुका है। अतीत का विषय। जो घट चुका है। भूतकाल का हिस्सा है इसलिए जो सामने है, वर्तमान है, जो सामने है, वह भी भूत है और जो घट चुका है, जो अतीत है वह भी भूत है। भूत यानी तत्व यानी पंचमहाभूत-अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश। ज़ाहिर है समूची सृष्टि के भाव वाला ‘भू’ यहाँ स्पष्ट है। व्यतीत के अर्थ में ‘भूत’ का एक अर्थ और है, मगर यही अर्थ सर्वाधिक लोकप्रिय और व्यापक है। भूत यानी प्रेत, पिशाच, मृतात्मा, बुरी आत्मा आदि। मनुष्य का जीवन जब सम्पन्न हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। यह माना जाता है कि प्रत्येक शरीर में आत्मा का वास होता है। सद्ग्रहस्थ या सन्यासी को मोक्ष मिलता है मगर विषय वासना से युक्त जीवधारी की आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता और मतात्मा तभी भूत कहलाती है। भूत का होना यहाँ सिद्ध है। जो हो चुका है, बीत चुका है वही भूत है। न भूतो, न भविष्यति उक्ति से सब अवगत हैं।
वनम् से बने ‘होना’ में अस्तित्व या विद्यमानता का भाव प्रमुख है। ‘भव्य’ शब्द भी इसी मूल का है जिसमें उत्तम, शानदार, योग्य जैसे भाव है। मुख्यतः भव्य में भी विद्यमानता या होने वाला जैसे ही भाव है। अर्थविस्तार होते हुए इसमें मनोहर, प्रिय, अत्युत्तम, आलीशान जैसे भाव भी समा गए। होना मे मुहावरेदार अर्थवत्ता भी है। होनी, अनहोनी, होनहार जैसे शब्द जो इसी कड़ी से जुड़े हैं, मुहावरे की अर्थवत्ता रखते हैं। ‘होनी’ का अर्थ हो जो होने वाला है अर्थात भविष्य के गर्भ में छुपी बात। अनहोनी यानी अनिष्ट, दुर्भाग्य आदि। ‘होनहार’ का अर्थ सकारात्मक है। भविष्य में होने वाली अच्छी बात। होनहार संज्ञा के रूप में अच्छे गुणों वाला सुपुत्र भी होता है। अच्छे लक्षणों वाली संतति या बच्चा होनहार कहलाता है। होनहार बिरवान के, होत चीकने पात कहावत किसने नहीं सुनी होगी। ‘भू’ धातु से हिन्दी समेत अनेक भाषाओं में कई शब्द बने हैं।

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Posted by अजित वडनेरकर (wadnerkar.ajit@gmail.com) on October 10, 2011 07:36 PM· permalink

टीम अन्ना का कांग्रेस को निशाना बनाना ठीक नहीं :संतोष हेगड़े - नवभारत टाइम्स


टीम अन्ना का कांग्रेस को निशाना बनाना ठीक नहीं :संतोष हेगड़े
नवभारत टाइम्स
बेंगलुरु।। टीम अन्ना के सदस्य संतोष हेगड़े ने हिसार उपचुनाव में हजारे के कांग्रेस विरोधी रुख पर यह कहकर असहमति जताई कि किसी राजनीतिक दल के खिलाफ प्रचार करना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि हर पार्टी में अच्छे और ईमानदार लोग होते हैं और किसी समूचे संगठन को निशाना बनाना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि वह इस तरह के विचार के खिलाफ हैं। कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त ने कहा, 'मेरे हिसाब से कांग्रेस शब्द का ...
कांग्रेस के ख़िलाफ़ प्रचार अभियान ग़लत: हेगड़ेबीबीसी हिन्दी
हिसार में कांग्रेस के विरोध पर टीम अन्ना में फूट, हेगड़े ने कहा- गलत कर रहे हैं अन्नादैनिक भास्कर

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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

असम में पुलिस फायरिंग में 4 किसानों की मौत, 10 ज़ख़्मी - दैनिक भास्कर


असम में पुलिस फायरिंग में 4 किसानों की मौत, 10 ज़ख़्मी
दैनिक भास्कर
गुवाहाटी. असम में जूट के दाम को लेकर किसान और पुलिस के बीच झड़प में चार किसान मारे गए हैं। झड़प में 10 किसान ज़ख़्मी भी हुए हैं। बारपेटा जिले के बीसामारी इलाके में यह झड़प तब हुई जब जूट के ज़्यादा दाम की मांग कर रहे किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर जाम लगाने की कोशिश की। पुलिस ने जब किसानों को ऐसा करने से रोका तो किसानों ने उन पर हमला कर दिया। इस पर पुलिस ने जवाबी कार्रवाई में फायरिंग कर दी। इस संघर्ष में डीएसपी को भी चोट ...
किसानों पर पुलिस फायरिंग में चार की मौतKhaskhabar.com
पुलिस फ़ायरिंग में चार किसानों की मौतबीबीसी हिन्दी
असम: पुलिस फायरिंग में 4 किसान की मौतPatrika.com
नवभारत टाइम्स
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

हाइटैक होगा आडवाणी का रथ - Khaskhabar.com


SamayLive

हाइटैक होगा आडवाणी का रथ
Khaskhabar.com
&nbह्यp; नई दिल्ली। बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा मंगलवार 11 अक्टूबर से शुरू हो रही है। आडवाणी का रथ हाईटैक होगा। उनके रथ में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस दूरसंचार की सभी सुविधाएं होंगी। आडवाणी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बस को अपने रथ के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। आडवाणी का यह हाइटैक रथ पुणे में तैयार हो रहा है। आडवाणी रोजना 300 किमी की यात्रा करेंगे। आडवाणी की यह रथयात्रा 18 राज्यों से गुजरते हुए 12000 ...
रथयात्रा से पहले सरकार पर बरसे आडवाणीP7News
लिफ्ट, TV, कंप्यूटर से लैस होगा आडवाणी का रथLive हिन्दुस्तान
इंदौर में आडवाणी की रथ यात्रा की तैयारियां जोरों परमेरी खबर.कोम
दैनिक भास्कर -IBN Khabar -Patrika.com
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

गुजरात: लोकायुक्त पर हाईकोर्ट का विभाजित फैसला - Khaskhabar.com


आज तक

गुजरात: लोकायुक्त पर हाईकोर्ट का विभाजित फैसला
Khaskhabar.com
अहमदाबाद। गुजरात गुवर्नर कमला की ओर से लोकायुक्त की एकतरफा नियुक्ति को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका पर गुजरात हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने सोमवार को अलग-अलग फैसला सुनाया। जस्टिस एकील कुरैशी ने निर्णय दिया कि गवर्नर ने लोकायुक्त की नियुक्ति अपने संवैधानिक दायरे में की है वहीं जस्टिस सोनिया गोकानी ने गवर्नर के नियुक्ति आदेश को रद्द कर दिया। दोनों जजों में मतैक्यता नहीं बनने के कारण अब यह मामला सुनवाई के लिए ...
गुजरात लोकायुक्त, जजों में मतभेद, मोदी को राहत नहींआज तक
मोदी को झटका : गुजरात हाईकोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति को सही बतायादैनिक भास्कर
गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति पर बड़ी बेंच करेगी सुनवाईनवभारत टाइम्स
बीबीसी हिन्दी -IBN Khabar -SamayLive
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम के खिलाफ जांच पर फैसला सुरक्षित रखा, कनिमोझी को राहत - दैनिक भास्कर


आज तक

सुप्रीम कोर्ट ने चिदंबरम के खिलाफ जांच पर फैसला सुरक्षित रखा, कनिमोझी को राहत
दैनिक भास्कर
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दोषी होने के आरोपों की जांच कराने के मुद्दे पर सुनवाई पूरी कर ली है। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। दूसरी तरफ 2जी मामले में गत 20 मई से तिहाड़ जेल में बंद कनिमोझी की जमानत याचिका का सीबीआई ने विरोध न करने का निर्णय लिया है। सीबीआई ने यह निर्णय कनिमोझी के महिला होने के नाते लिया है।गौरतलब है कि 2008 में जब यह घोटाला हुआ ...
2जी में चिदंबरम की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला रिजर्वIBN Khabar
2जी: चिदंबरम मामले पर सुनवाई पूरी, कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखाSamayLive
2 जी घोटाले की फांस में पी चिदंबरमआज तक
Patrika.com
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

कांशीराम की पुण्यतिथि पर माया ने खोला योजनाओं का पीटारा - Khaskhabar.com


Oneindia Hindi

कांशीराम की पुण्यतिथि पर माया ने खोला योजनाओं का पीटारा
Khaskhabar.com
लखनऊ। मुख्यमंत्री मायावती ने बसपा संस्थापक कांशीराम की 5वीं पुण्यतिथि पर रविवार को उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही राज्य के विकास व गरीबों के उत्थान के लिए योजनाओं का पिटारा खोल दिया। उन्होंने 60 अरब रूपये से ज्यादा लागत की 484 विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास कर उन्हें जनता को समर्पित किया। प्रवक्ता के मुताबिक मायावती ने कहा कि ये सभी विकास व जनकल्याणकारी कार्यRम एवं परियोजनाएं सामाजिक परिवर्तन आंदोलन ...
मायावती ने की छह हजार करोड़ रु. की योजनाओं की घोषणामनी कॉंट्रोल
मायावती की घोषणाओं को विपक्षी दलों ने चुनावी आडंबर बतायाPressnote.in
कांशीराम की पुण्य तिथि पर संकल्प सभा आजयाहू! जागरण
एनडीटीवी खबर -आज तक -star.newsbullet
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

अजमल आमिर कसाब की फांसी पर रोक - Live हिन्दुस्तान


SamayLive

अजमल आमिर कसाब की फांसी पर रोक
Live हिन्दुस्तान
गए एक मात्र पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब की फांसी की सजा पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की खंडपीठ ने बंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ कसाब की विशेष अनुमति याचिका मंजूर करते हुए फांसी की सजा पर फिलहाल रोक लगाए जाने का आदेश दिया। इस मामले की नियमित सुनवाई आगामी 31 जनवरी से होगी। कसाब को 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई के विभिन्न स्थानों पर हुए हमले के दौरान जीवित पकड़ा गया था। ...
कसाब की फांसी पर रोक, सुप्रीम कोर्ट अपील पर सुनवाई करेगाKhaskhabar.com
अजमल कसाब की फांसी पर रोकअमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट में कसाब की फांसी की सजा बरकरार,फांसी पर फिलहाल रोकदैनिक भास्कर
नवभारत टाइम्स -आज तक -देशबन्धु
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

अन्ना गैर कांग्रेसी दलों के बहकावे में : दिग्गी - Khaskhabar.com


Khaskhabar.com

अन्ना गैर कांग्रेसी दलों के बहकावे में : दिग्गी
Khaskhabar.com
आगरा। कांग्रेस महासचिव दिगि्वजय सिंह ने समाजसेवी अन्ना हजारे पर आरोप लगाते हुए कहा कि अन्ना गैर कांग्रेसी दलों के बहकावे में आ गए हैं इसलिए टीम अन्ना ने कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलकर दुप्प्रचार कर दिया है। बिजलीघर स्थित रविनगर में करौली बस हादसे के शिकार हुए लोगों के परिजनों से मिलने पहुंचे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने रविवार को कहा कि अन्ना को गैर कांग्रेसी दलों ने राष्ट्रपति बनाने का सब्जबाग दिखाया है। ...
भाजपा के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं अन्ना: दिग्विजयमनी कॉंट्रोल
अन्ना BJP के राष्ट्रपति पद के बहकावे में आ गए हैं: दिग्विजयमेरी खबर.कोम
अन्ना को राष्ट्रपति भवन के सपने दिखा रही बीजेपीः कांग्रेसनवभारत टाइम्स
एनडीटीवी खबर -जोश 18
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

संजीव भट्ट की ज़मानत पर सुनवाई टली - बीबीसी हिन्दी


आज तक

संजीव भट्ट की ज़मानत पर सुनवाई टली
बीबीसी हिन्दी
गुजरात के चर्चित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की ज़मानत याचिका पर सुनवाई मंगलवार तक के लिए टाल दी गई है. संजीव भट्ट पर अपने एक मातहत सिपाही केडी पंत से कथित तौर पर दबाव डालकर हलफ़नामा दाख़िल करवाने का आरोप है. पंत की पुलिस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने संजीव भट्ट को गिरफ़्तार किया था. इस समय संजीव भट्ट न्यायिक हिरासत में हैं.
संजीव भट्ट की रिमांड याचिका पर फैसला 30 नवंबर तक रूकाKhaskhabar.com
भट्ट को पुलिस रिमांड पर भेजने पर सुनवाई स्थगितLive हिन्दुस्तान
संजीव भट्ट मामला: हिरासत पर फैसले पर 30 नवंबर तक रोकSamayLive
दैनिक भास्कर -P7News -नवभारत टाइम्स
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Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

और दिलों को छूकर जगजीत के गीत अमर हो गए…

शकील अहमद मुंबई। होठों से छूकर भारतीय उपमहाद्वीप के लोग उन्हें आधुनिक युग की ग़ज़ल सबसे बेहतरीन गायक और एक तरह ग़ज़ल को दुबारा ज़िंदगी देनेवाला मानते हैं। जगजीत सिंह को ‘ग़ज़ल सम्राट’ कहा गया, ‘ग़ज़ल का बादशाह’ कहा गया। और जगजीत भी ग़ज़लकारों के पैरोकार की तरह ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

कब-कब बनी मुंबई आतंकवादियों का निशाना…

मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी कही जानेवाली मुंबई पर आतंकवादियों ने कई बार योजनाबद्ध रूप से हमले किए हैं। पेश है उन हमलों का लेखा-जोखा : * मुंबई पर आतंकवादी हमलों की शुरूआत 12 मार्च 1993 से हुई, जब मुंबई ने पहली बार शृंखलाबद्ध बम धमाकों का खौफनाक मंजर देखा और ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

क्या कांग्रेस ‘बदले की राजनीति’ खेल रही है?

मुंबई। रामलीला मैदान में योगगुरु बाबा रामदेव द्वारा कालेधन के खिलाफ शुरू हुआ आमरण अनशन जब केंद्र सरकार ने जोर-जबरदस्ती खत्म करवाया, तो बाबा रामदेव और कांग्रेस सरकार के बीच कड़वाहट कुछ इस कद्र बड़ी की दोनों खुलेआम एक-दूसरे की निंदा करने लगे और आरोप-प्रत्यारोप का एक लंबा दौर शुरू ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

क्या शेयर बाजार में गिरावट मंदी का संकेत है?

पिछले कई सालों से विकास की राह पर सरपट दौड़ रहे भारत के शेयर बाजारों में कई दिनों से चली आ रही सुस्ती ने इस सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन भयानक रूप धारण कर लिया। सेंसेक्स ने 650 अंकों से ज्यादा की डुबकी लगा दी, जबकि निफ्टी ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने लायक हैं?

राहुल गांधी की चाची मेनका गांधी ने उन्हें लम्बी उम्र का आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो बनें, वैसे भी इस देश में प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी योग्यता की जरूरत नहीं है। मेनका गांधी ने राहुल गांधी की काबिलीयत पर सवालिया निशान खड़ा ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

अब गीत ‘कमीने’ होकर ‘पोटी पे बैठते’ हैं यहां!

कहां वो हुस्न-ओ-इश्क की शिकायतें, कहां वो मुहब्बत-ओ-रुसवाई की बातें; कहां वो दिल की रंगीनियां, अठखेलियां, कहां वो बगीचों की हंसीन मुलाकातें! यूं तो सुमधुर संगीत का दौर कभी खत्म नहीं होता और न ही शायरी या कविता कभी फिल्मों से दूर हो सकती है, लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

धोनी का कोई सानी नहीं

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी टीम चेन्नई को लगातार दूसरी बार चैपियन बनाकर दिखा दिया है कि क्रिकेट की दुनिया में उनका कोई सानी नहीं है। आईपीएल में धोनी की टीम चेन्नई तीन बार फाइनल में पहुंची है जिसमें से दो बार उसने खिताब पर ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

कान फिल्म समारोह में भारत की ‘हीरोईन’

पूर्व विश्व सुंदरी और बॉलीवुड की खूबसूरत अदाकारा ऐश्वर्य राय बच्चन पिछले दस बरसों से फ्रांस में आयोजित होनेवाले कान अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अपनी खूबसूरती के जलवे लगातार बिखेरते आ रही हैं। इस साल भी उनके अंदाज ने सभी का मन मोह लिया और फोटोग्राफर्स उनकी एक झलक पाने ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

अमेरिका-पाकिस्तान के ख़ास रिश्तों का राज़!

अलकायदा के सरगना और दुनिया के सबसे बड़े घोषित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की खोज करते-करते अमेरिका ने दस बरस में घाटियों, दर्रों, गुफाओं, पहाड़ियों और न जाने कहां-कहां की खाक छानी, लेकिन वह मिला तो उसी के साथी पाकिस्तान की मांद में, उसके अनुसार आतंकवाद की लड़ाई में उसका ...

Posted on October 10, 2011 12:28 PM· permalink

संजय दानी की ग़ज़ल - वो समझती है वफ़ा का अर्थ ,ये बेवफ़ाई उसकी इक नादानी है।

ठहरा ठहरा सा रगों का पानी है, शौक की कश्ती मगर दीवानी है।   हुस्न की लह्रें हुईं हरजाई बेश, अब मुहब्बत का सफ़र बेमानी है।   देखा जब से महजबीं का पाक रुख, जाने क्यूं इस दिल में बेईमानी है।   सब्र की बुनियाद जर्जर हो चुकी, बस हवस की राह में आसानी है।   वो समझती है वफ़ा का अर्थ ,ये बेवफ़ाई उसकी इक नादानी है।   चेहरे से वो सख्त लगती है मगर, उसकी सीरत की गली गुड़धानी है।   गो बड़े शहरों में पैसा है बहुत,

>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 08:17 AM· permalink

उपहारों के अधुनिक विकल्प

geek-giftदीपावली पर मित्रों को उपहार देने की सोच रहे हैं तो इन उपहारों पर भी नजर डाल लें, इन्हें आधुनिक तौर-तरीका भी कह सकते है और उपहार देने का ‘गीक’ अंदाज भी.

Posted by तरकश ब्यूरो (pbengani@gmail.com) on October 10, 2011 08:08 AM· permalink

विजय वर्मा की ग़ज़ल - रंग-ए-जिंदगानी

रंग-ए-जिंदगानी. रंग-ए-जिंदगानी यूँ अनमना क्यूँ है ? आखिर तू मेरी महफ़िल से फ़ना क्यूँ है?   माना विपथगमन की होगी कोई वाइस मत पूछ दामन अश्कों से सना क्यूँ है?   गुरूर के पेड़ों पर कभी फल नहीं लगते. वो शख्स आखिर इस कदर तना क्यूँ है?   दुआ-सलाम ही तो की है,रुसवा नहीं की तेरे शहर में खैरियत पूछना मना क्यूँ है?   उजाला तो हो,बर्क मेरे नशेमन पे गिरे सब परेशां है,अँधेरा इतना घना क्यूँ है?   दर्द अगर

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:51 AM· permalink

मुरसलीन (साकी) की रचना

उसने मेरी वफा का ऐसा सिला दिया चाहत को मेरी रूसवा सरे आम कर दिया   दामन के मेरे फूल कुछ ऐसे चुरा कर आंखों में मेरी अश्‍कों के कांटों को भर दिया   चाहता मैं फिर भी था अपना बना लूं लेकिन बदनामियों के डर से मेरा रूख पलट गया   पीता न था मैं आकर साकी तेरी गली में देखा तेरा फरेब तो फिर मैं बदल गया   हर बार यही सोच कर पीता हूं छोड दूं हर बार मैं पीता रहा और शराबी बन गया -- मुरसलीन (साकी) जिला

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:43 AM· permalink

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत - रसगुल्लों की चाहत ने बंद लड़ाई करवा दी

एक है गुल्ली एक है टुल्लीदोनों ऊधम करती हैंकितना भी डाँटो समझाओनहीं किसी से डरतीं हैं टुल्ली है चुलबुल थोड़ी सीगुल्ली सीधी सादी हैअक्सर चाय और बिस्कुटदेती उनको दादी है आपस में दोनों लड़ती हैंबाल खींचतीं आपस मेंउनमें समझौता करवानानहीं किसी के था बस में| मम्मी ने रसगुल्ले लाकररखे एक कटोरी मेंभरकर लाई चाकलेट वहएक छोटी सी बोरी में| मम्मी बोली अब तुम दोनोंकभी न लड़ना आपस मेंवरना चाकलेट रसगुल्लेकर

>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 10, 2011 07:16 AM· permalink

एक जीवित गजल मौन हुई

jagjit-singhप्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह का सोमवार सुबह 8 बजे निधन हो गया. वे 23 सितंबर से मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती थे.

Posted by संजय बेंगाणी (sanjaybengani@gmail.com) on October 10, 2011 06:46 AM· permalink

प्रोत्साहन बहुत ज़रूरी है


बच्चों के साथ रोज़ जाने कितने ही अनुभव होते रहते हैं।  कक्षा २/३ के छात्र-छात्रायें। ७-८ साल के बच्चे। रोज़ ही किसी न किसी वजह से एक बार खुल कर हँस लेने का मौका मिल ही जाता है।  यहाँ के नियम के अनुसार, सारे दिन ही शिक्षिका को कक्षा के बच्चों के साथ रहना होता है।  चाहे कोई भी विषय हो, उन्हें एक ही शिक्षिका को पढ़ाना होता है (कुछ एक को छोड़ कर)।  इस तरह शिक्षक/ शिक्षिका और बच्चों के बीच का संपर्क बहुत मज़बूत होता है।  एक दिन मेरे स्कूल न आने से बच्चे उदास हो जाते हैं और अगले दिन बच्चों से सबसे पहले यही सुनने को मिलता है, " आई मिस्ड यू येस्टर्डे"।  उपस्थिति मार्क करते समय बच्चे मुझे गुड्मार्निं कहते हैं।  कार्पेट पर बैठ कर बच्चे अपनी पिछले दिन की कई घटनायें बताते हैं।  सारा दिन उनके साथ किस तरह गुज़र जाता है पता ही नहीं चलता।

कई छोटी-छोटी बातें होती ही रहती हैं।  कल रीसेस के समय दो बच्चियाँ मेरे पास आईं, " आपके लिये हमने एक केक बनाया है...चॉकोलेट आइसिंग वाला"। मैंने कहा अच्छा? वो कैसे? तो पता चला कि रीसेस में उन्होंने खेलते हुये मिट्टी और पत्थर से मेरे लिये एक केक बनाया था। तो वो चाहतीं थी कि मैं उस केक को काटूँ। तो भई हम ने भी उस केक को काटा...कहा, कितना सुंदर है...आदि :)  बच्चियों की चेहरे की खुशी देखते बनती थी।

सराहना बच्चों के लिये बहुत बड़ा प्रोत्साहन का काम करती है।  प्रोत्साहन भी दो तरह के होते हैं- एक प्रोत्साहन वह कि बच्चे किसी चीज़ की आशा में अपना काम करें। यह अच्छी बात है मगर दूसरा प्रोत्साहन वह जो कि जो अन्दरुनी परिवर्तन लाये।  बच्चा खुद अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर उस काम को करे, किसी प्राइज़ की आशा में नहीं।  सराहना करते वक़्त सिर्फ़ इतना कह देना कि ’वाह बहुत अच्छा जवाब दिया’ और एक "गुड" लिख देना काफ़ी नहीं होता। साथ में ये भी बताया जाये कि क्या अच्छा था जवाब में। इसके अलावा भी जवाब में और क्या होना चाहिये था कि जवाब और अच्छा होता। कक्षा में गलत जवाब के लिये कभी भी सज़ा नहीं दी जानी चाहिये।  सज़ा भला क्यों? कि उसे जवाब नहीं आया? या उसका ध्यान नहीं था पढ़ाई में।  अगर बच्चे को नहीं आता कोई जवाब तो मौका दिया जाये कि वो अपने साथी के साथ मिल कर जवाब तलाशे और फिर खुद इन्जडिपेंडेट्ली जवाब दे। इस तरह बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है। सज़ा ( वह भी ऐसी जिससे बच्चा कुछ सीखे) सिर्फ़ व्यवहार या अन्य वाजिब वजह से दी जानी चाहिये। जैसे मेरी कक्षा में बच्चे कोई काम करना भूल जायें (जैसे रीडिंग लॉग या स्कूल डायरी न साइन करवाई हो अनुभावकों से) तो ज़रूर सज़ा मिलती है उन्हें कि वो अपना काम याद रखें अगले दिन के लिये।  उन्हें अपने मूल्यवान रीसेस के आधे घंटे में से २ मिनट देने होते हैं यानि सभी मित्रगण खेलने गये पर वो दो मिनट बाद जायेंगे। और जो बच्चे यह सब साइन करवा के लायें, उन्हें एक स्टिकर मिलेगा और ३० स्टिकर इकट्ठा कर लें वे तो एक प्राइज़।  हाँ होमवर्क न करे कोई, तो रीसेस में मेरे साथ बैठ कर करना होगा होमवर्क...! प्राय: सभी बच्चे अपना काम करते हैं इस तरह।

कल एक बच्ची का जन्मदिन था मेरी कक्षा में। मेरे पास एक बक्सा है, छोटा सा कार्ड्बोर्ड का। बच्चे जानते हैं कि टीचर का यह ट्रेशर बॉक्स किसी के जन्मदिन पर खुलता है या टीचर बहुत खुश हो किसी के व्यवहार से तो ही। तो उस वक़्त उस बच्चे को उस ट्रेशर बॉक्स से आँख बंद कर के कोई भी चीज़ चुनने का मौका मिलता है। वह एक छोटी सी किता ब भी हो सकती है, कोई पेन या कोई खिलौना भी।  बच्चे नहीं जानते कि उस बक्से के अंदर क्या है।  देखा जाये तो यह सब बाह्य प्रोत्साहन हैं (extrinsic motivation) लेकिन कई बातों के लिये बहुत कारगर।  बच्चे द्वारा किये गए किसी भी अच्छे काम की सराहना और यह बताना कि वो काम क्यों अच्छा था, इसके क्या अच्छे फल हुये अन्दरुनी प्रोत्साहन का उदाहरण है।  उसी को नियम बना लेना बच्चों की आदत में ढल जाता है फिर।  पूरे जीवन के लिये एक अच्छी शिक्षा।

फिर अगले सप्ताह की शुरुआत होगी। बच्चों की खिलखिलाहट सुनने को मिलेगी और उनके सप्ताहांत के अनुभव सुनने को। मैं भी उन्हें बताने को उत्सुक हूँ कि इस सप्ताहांत मेरी पिट्स्बर्ग की यात्रा, रंगीन पेड़ों को देखते हुये कैसी रही...।  फिर फ़ॉल कलर्स पर कुछ चित्र बनाने का आर्ट प्रोजेक्ट उसी से संबंधित...








Posted by मानसी (noreply@blogger.com) on October 10, 2011 03:21 AM· permalink

वहीं वापिस बुलाने को

तुम्हारे गीत जो पुरबाईयां आकर सुनाती थीं
तुम्हारा चित्र नभ में जो बदरिया आ बनाती थी
तुम्हारा नाम जो तट को नदी आकर सुनाती थी
वो कलियाँ जो तुम्हारी छाँह पाकर मुस्कुराती थीं
मेरी सुधियों के आँगन में समन्दर पार कर करके
अचानक आ गईं, मुझको वहीं वापिस बुलाने को
 
जहाँ पर भावनाओं की सदा गंगा उमड़ती है
जहाँ पर भोर के संग रागिनी नूतन मचलती है
जहाँ पर गंध के झोंके तुम्हारी बात करते हैं
जहाँ अपनत्व की भाषा बिना शब्दों सँवरती है
जहाँ की वाटिकाओं के गुलाबों की यही आशा
तुम्हारे कुन्तलों में गुँथ सकें, जूड़ा सजाने को
 
मिला था पथ तुम्हारा राह मेरी से जहाँ आकर
जहाँ फ़ूटा अधर से था प्रथम परिचय रँगा आखर
जहाँ दस उंगलियों ने छू लिया था एक पुस्तक को
जहाँ झेंपी निगाहें,रह गये थे होंठ मुस्का कर
जहाँ पर उम्र के उस गांव की चौपाल रहती है
प्रतीक्षा में, कोई आये नया किस्सा सुनाने को
 
जहाँ पीपल तले अब भी शपथ जीवन्त होती है
जहाँ अब भी चुनरिया उंगलियों का बन्ध होती है
जहाँ पर दॄष्टि करती है नये इक ग्रंथ की रचना
जहाँ की रीत में पदरज सिरों पर धार्य होती है
जहाँ पर आस्थायें प्राण का संचार कर अब भी
बनाती ईश पत्थर को, सहज ही सर नवाने को

Posted by राकेश खंडेलवाल (noreply@blogger.com) on October 10, 2011 01:46 AM· permalink

...तो तीर्थाटन पर चले जाएं प्रधानमंत्री- गडकरी - Khaskhabar.com


SamayLive

...तो तीर्थाटन पर चले जाएं प्रधानमंत्री- गडकरी
Khaskhabar.com
देहरादून। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज कहा कि प्रधानमंत्री अगर भ्रष्टाचार पर रोक लगा पाने में असहाय हैं, तो उन्हें तीर्थाटन पर चले जाना चाहिए। गडकरी ने उत्तराखंड में भाजपा का चुनावी अभियान शुरू करने के मौके पर यहां आयोजित पार्टी कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन में कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लगा पाने की अपनी लाचारी जाहिर करने के बाद बेहतर यही है कि उन्हें अपना पद त्याग कर तीर्थाटन पर चले जाना ...
पीएम पद छोड़ें और तीर्थयात्रा पर निकल लें- भाजपादैनिक भास्कर
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Posted on October 09, 2011 06:26 PM· permalink

ऐसे ही एक पहलवानी भरा इतवार…

इतवार का दिन नौकरी पेशा वालों के लिये आराम का दिन माना जाता है। कुछ इसे बचे काम निपटाने का दिन भी मानते हैं। लेकिन यह वैचारिक मतभेद हर इतवार को खतम हो जाता है क्योंकि बचे काम निपटाने वाले भी अपने काम निपटाने का काम अक्सर अगले इतवार तक के लिये स्थगित कर देते हैं। नतीजतन इतवार का दिन आराम का दिन ही होकर रह जाता है।

किसी नियम सिद्धि के लिये अपवाद की आवश्यकता का भी नियम है। इसी जालिम नियम का पालन करते हुये आज सुबह-सुबह बच्चे को लेकर ’राष्ट्रीय विज्ञान मेधा खोज परीक्षा’ के अखाड़े में जाना पड़ा। अखाड़ा से अगर आप थोड़ा चकित होना चाहें तो हो लें। कुछ देर की बात है। आगे आप शायद सहमत हो जायें।

घर से वाया गुमटी होते हुये परीक्षा केन्द्र वाले स्कूल जाना हुआ। सड़क फ़ुल वात्सल्य से हमारी गाड़ी को उछालती, संभालती रही। पहली बार मुझे इस बात का एहसास हुआ कि सड़क की चौड़ाई आमतौर पर गाड़ियों की चौड़ाई से ज्यादा क्यों रखी जाती है। ऐसा इसलिये होता है ताकि गाड़ी जब किसी गढ्ढे में पड़कर उछले तो वापस आकर सड़क पर ही गिर सके। गुमटी शहर का कभी सबसे अच्छा बाजार माना जाता था। आज यह शहर के अन्य सभी बाजारों की लुटा-पिटा सा दीखता है। कहीं सड़क खुदी है,कहीं सड़क के नीचे का नाला परदा प्रथा का विरोध करते हुये अपने मुखड़े से सड़क का घूंघट हटाकर निर्द्वंद बहता है। बेहया सा। गढ्ढों में पड़कर उछलने से दिमाग में फ़ंसा निदा फ़ाजली जी शेर झटके से याद आ गया:
यूं जिंदगी से टूटता रहा, जुड़ता रहा मैं,
जैसे कोई मां बच्चा खिलाये उछाल के।

सड़क को देखकर यह भी लगा कि आने वाले कुछ दिनों में कहीं यह सरस्वती नदी की तरह लुप्त न हो जाये। पूरी सड़क पर गाड़ियां तितर-बितर देश के घपलो घोटालों सी पसरी थी। जानवर दिखे नहीं सुबह। शायद वे भी इतवार मना रहे हों।

स्कूल पहुंचकर गेट के खुलने का इंतजार किया। बच्चे का रोल नंबर और परीक्षा केन्द्र रात में ही घंटों फ़ोनियाने के बाद रात बारह बजने से कुछ मिनट पहले ही बता दिया गया। हमने प्रतिभा खोजने वालों की प्रतिभा और इंतजाम को नमन किया कि उन्होंने परीक्षा शुरु होने के कुछ घंटे पहले ही बच्चों का परीक्षा केन्द्र तय कर दिया।

केंद्र का फ़ाटक जब खुला तो बच्चे और अभिभावक नोटिस बोर्ड की तरफ़ लपके ताकि कमरा नंबर पता कर सकें। लोग ज्यादा थे और नोटिस बोर्ड एक ही इसलिये वहां मांग और आपूर्ति का नियम लागू हो गया। नोटिस बोर्ड के सामने वह चीज जमा हो गयी जिसे अपने यहां भीड़ के नाम से जाना जाता था। उसके बाद वह हुआ जिसे भीड़ का सहज व्यवहार माना जाता है और जिसे आम जनता धक्कममुक्का के नाम से जानती है। पहले भीड़ आपस में धक्कममुक्का करती रही। फ़िर उसने इसमें अपने आसपास के परिवेश को भी शामिल कर लिया। अब परिवेश के नाम पर सबसे नजदीक नोटिस बोर्ड ही था सो वह ही इस प्रक्रिया का शिकार बना।

धक्कममुक्का का शिकार बने नोटिस बोर्ड पर अचानक गति विज्ञान के नियम ने हमला बोल दिया और वह परिणामी बल की दिशा में विस्थापित होने लगा। जैसे ही एक तरफ़ थोड़ा सा विस्थापन हुआ वैसे ही न्यूटन जी का तीसरा नियम भी ताल ठोंक कर मैदान में आ गया। बोर्ड दूसरी तरफ़ विस्थापित होने लगा। इसके बाद तीसरी तरफ़ और अंतत: सब तरफ़ विस्थापित होने लगा। आखिर में नोटिस बोर्ड की हालत निर्दलीय विधायक सरीखी हो गयी। वह उधर ही विस्थापित हो जाता जिधर बल-बहुमत होता।

लेकिन बात केवल बोर्ड के विस्थापन तक ही सीमित न रही। इस बीच बल प्रयोग की अधिकता के चलते नोटिस बोर्ड का रूप परिवर्तन भी होने लगा। बोर्ड और स्टैंड में पहले मतभेद हुआ। फ़िर मनभेद हुआ। स्टैंड एक तरफ़ जाना चाहता तो बोर्ड दूसरी तरफ़। मतभेद/मनभेद के बाद दोनों के बीच दरार पड़ गयी। फ़िर वह दरार बढ़ भी गयी। अंतत: हुआ यह कि नोटिस बोर्ड और उसके स्टैंड का गठबंधन टूट गया। दोनों पाकिस्तान और बांगलादेश की तरह अलग-अलग हो गये। जनता स्टैंड को नीचे छोड़कर बोर्ड की तरफ़ लपक ली। इससे उपयोगिता के सिद्धांत की भी खड़े-खड़े पुष्टि हो गयी। अब मामला नोटिस बोर्ड तक ही केन्द्रित होकर रह गया।

हमने बहुत मेहनत से भीड़ के अन्दर घुसकर नोटिस बोर्ड के नजदीक पहुंचने की बहुत कोशिश की। लेकिन बहुत देर तक असफ़ल रहे। रह-रहकर अपना मोबाइल भी देखते रहे। यह विचारते हुये कि कहीं कोई इसे पार न कर दे। लेकिन मोबाइल मेरे पास आखिर तक बना रहा। इससे पुष्टि हुई कि मोबाइल चोर या तो आराम तलब होते हैं या फ़िर वहां जाना पसंद नहीं करते जहां प्रतिभा की खोज होती हो!

अंतत: हम हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती के नियम का पालन करते हुये बोर्ड के एकदम पास पहुंचे। लोग उसके ऊपर थे। दायें थे। बायें थे। इधर थे। उधर थे। मतलब सब तरफ़ थे। उसकी हालत गुंडों के बीच फ़ंसी रजिया सी हो गयी थी। हल्का हो जाने के कारण उसे लपक कोई उठा लेता जैसे चील चूहा पंजे में ले जाती है। लेकिन उसी समय कोई दूसरा उसे बाज की तरह झपटकर वापस वहीं ले आता। उसका परिणामी विस्थापन शून्य ही रहा।

जब अपने बच्चे का कमरा नंबर पता करके हम निकलने लगे तो जनता ने निकलने नहीं दिया। हम पीछे निकलने की कोशिश करते-जनता धकिया के आगे कर देती। हमारी हालत ब्लागर की सी हो गयी जो आता तो अपने से है लेकिन अगर वह बताकर वापस जाना चाहे तो लोग उसे जाने नहीं देते। फ़िर हमने नीचे झुककर निकलने की सोची तो जनता सहयोग देकर और नीचे करने लगी। एक बारगी लगा हम फ़र्श के गले लग जायेंगे। लेकिन हम झटके से एक तरफ़ निकले लेकिन वहां खड़ी मोटर साइकिल ने रास्ता रोक लिया। शायद वह भी किसी का कमरा नम्बर देखने में लगी थी।

जब कमरे पहुंचे तो देखा कि वह अन्ना मय था। हर कमरे में ’अन्ना नहीं ये आंधी है’ वाले पोस्टर लगे थे। उन आंधी वाले कमरों में पंखे मंथर गति से चल रहे थे। एक हाल नुमा कमरे में 20 वाट का सीएफ़एल जल रहा था। रोशनी इतनी पर्याप्त थी कि अगर किसी का मन करे तो रोशनी के सहारे यह विश्वास के साथ कह सकता था कि उस कमरे में एक बल्ब जल रहा था। न सिर्फ़ इतना बल्कि कोशिश करके यह भी बता सकता था कि बल्ब कमरे में किधर लगा हुआ था। कमरे की मेज-कुर्सी ऐसी थीं जैसे किसी अनगढ़ स्केचिये बच्चे ने जो मेज-कुर्सी बनाई उसई को लकड़ी पहना के वहां धर दिया गया।

जो कमरा बताया गया बच्चे की सीट उसमें थी नहीं। ’ जिन खोजा-तिन पाइयां’ के जीपीआरएस की पूंछ पकड़कर जब हम मेज तक पहुंचे तो वह कमरा बताये कमरे से तीन कमरे दूरी पर था।

इस बीच हमने जल्दी-जल्दी आसपास का माहौल देखा। बहुत दिन बाद तीन मंजिले से किसी की छत पर पड़ी खटिया देखी। मोहल्ला देखा। खटिया देखते ही ’सरकाई लेव खटिया जाड़ा लगे’ गाना याद आया लेकिन फ़िर हमने गाने से कहा यहां उचित नहीं है तुमसे और ज्यादा हेल-मेल। बाद में मिलेंगे।

और ज्यादा कुछ देखते-करते तब तक स्कूल वालों ने कुछ अनाउंस करना शुरू कर दिया। शोर में कुछ सुनाई नहीं दिया लेकिन जिस तरह लोग बाहर जाने लगे उससे लगा कि उन सबको बाहर कर दिया गया है जो बच्चों की मेधा परीक्षा में विघ्न पहुंचा सकते हैं। महाजनो एन गत: स: पन्था का अनुसरण करते हुये हम भी बाहर आ गये।

हम इतने में ही पसीने-पसीने हो लिये। जो बच्चे वहां वहां अपनी मेधा की जांच करवाने आये होंगे उनका क्या हाल हुआ होगा। कल्पना की जा सकती है।

यह तो एक दिन की बात है। ऐसे न जाने कितने वाकये होते हैं जब बच्चों की मेधा की परीक्षायें होती रहती हैं। इनमें सफ़ल होना भले मेधा की बात होती हो लेकिन इसमें सम्म्लित होने में मेधा का कम पहलवानी का रोल ज्यादा होता है।

इसके बाद भी जब अगर नारायणमूर्ति जी कहें कि मेधा के स्तर में गिरावट आयी है तो किसी को भी बुरा लग सकता है। शायद ऐसा हुआ हो कुछ मेधा पहलवानी में खर्च हो गयी हो।

लौटते समय देखा कि गुमटी चौराहे पर किसी भी तरह की मेधा परीक्षा के झांसे से दूर दिहाड़ी मजूर अपने-अपने औजार लिये अपने आज के खरीदार के इंतजार में खड़े थे।

Posted by फ़ुरसतिया on October 09, 2011 06:18 PM· permalink

नियति

तयशुदा

नियत-से

जीवन में,

जब भी कुछ

अचानक से

घटता है –

अप्रत्याशित,

अनचाहा –

जी रहा आदमी

रह जाता है

भौंचक्का,

जैसे

पटरी से उतर गयी हो

एक रेलगाड़ी,

छोटा बच्चा

ठोकर लगने से

गिर गया हो जैसे,

मगर कुछ समय बाद

आदमी समझ जाता है ,

जान जाता है सच्चाई

कि नहीं होता कुछ भी

नियत या तयशुदा,

सब बस खेल हैं

नियति के;

और वह

चल पड़ता है पुन:

अगली बार

भौचक्का होने तक |

 


Posted by दीपक on October 09, 2011 02:40 PM· permalink

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें दिल की बात... किश्त 3

धारावाहिक की पिछली कड़ियाँ - एक , दो, आओ कहें...दिल की बात कैस जौनपुरी (3) आई लव यू बाबा...! बाबा...! बहुत दिनों से आपको, दिल में जो है वो बताने का मन था. वो बात... जो मेरे दिल में एक पत्थर की तरह चुभके बैठी थी. आज कह देता हूँ बस.... बचपन से मैं खुद को दूसरों से कम...या बदनसीब समझता था. वो सब जो बाकी लोगों को मिल रहा है...वो मुझे क्यों नहीं मिल रहा था...? वो खिलौने...वो घड़ी...वो कपड़े...अन्दर

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 12:25 PM· permalink

पुस्तक समीक्षा- धरती और मनुष्य को सुन्दर बनाने का शिव संकल्प : पत्थरों के शहर में

समीक्षक- डॉ.वेद प्रकाश अमिताभ डी-131, रमेश विहार, अलीगढ़-202001 समीक्ष्य कृति- पत्थरों के शहर में , गजलकार- नीरज शास्त्री प्रकाशक- जवाहर पुस्तकालय मथुरा पृष्ठ-अस्सी , मूल्य- एक सौ पचास रुपये मात्र ''अपनी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए'' दुष्यन्त कुमार की यह अवधारणा नीरज शास्त्री के गजल संग्रह 'पत्थरों के शहर में' की रचनाओं में ध्वनित है। रचनाकार का स्पष्ट उद्घोष है-'देश की हालत बदलना

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 12:13 PM· permalink

कृष्ण कुमार यादव का विश्व डाक दिवस' (9 अक्तूबर) पर विशेष आलेख - डाक टिकटों की अनूठी दुनिया

डाक-टिकट भला किसे नहीं अच्छे लगते. याद कीजिये बचपन के वो दिन, जब अनायास ही लिफाफों से टिकट निकालकर सुरक्षित रख लेते थे. न जाने कितने देशों की रंग-बिरंगी डाक टिकटें, अभी भी कहीं-न-कहीं सुरक्षित हैं. आज जब करोड़ों में डाक-टिकटों की नीलामी होती है तो दुर्लभ डाक टिकटों की ऐतिहासिकता और मोल पता चलता है. आज तो यह सिर्फ शौक ही नहीं, बल्कि व्यवसाय का रूप भी धारण कर चुका है. डाक- टिकटों का व्यवस्थित

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 09, 2011 07:04 AM· permalink

कांशीराम की पुण्य तिथि पर

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।


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Posted by Aflatoon अफ़लातून on October 09, 2011 05:30 AM· permalink

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - एक सरकार का सवाल है बाबा

इस गरीब देश को एक सरकार चाहिए। सरकार कैसी भी हो, लेकिन चले, काम करे और जरुरत के समय आम आदमी की मदद करे। इस देश का हर मतदाता एक स्‍थायी, टिकाउू और मजबूत सरकार चाहता है, मजबूर सरकार नहीं। आखिर कब तक देश सरकार विहीन रहेगा। अगर सरकार नहीं होगी तो देश कैसे चलेगा। देश को चलाना है तो सरकार चाहिए। चुनाव-दर चुनाव आये और गये मगर देश को सरकार नहीं मिली। कभी मिली तो चली नहीं। चली तो किसी ने टांग खींच कर

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:22 AM· permalink

शंकर लाल की कविता - रावण क्यों जलाएँ

चलो रावण जलाये मैदान में जमघट छाया है आज फिर दशहरा आया है अधर्म को खत्म कर धर्म का परचम फहराने को नवदुर्गा का आशीष लेकर श्रीराम जी का रथ आया है अभी राम का बाण चलेगा ये पापी रावण धूं-धूं कर जलेगा |   यो तो हर बार दशहरा आता है हर बार रावण को जलाया भी जाता है फिर भी वह यही खड़ा नजर आता है लगता है शायद केवल उसका पुतला जलता है अक्स मगर यही हमारे समाज में पल रहा है फिर कभी भ्रष्टाचारी बनकर

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:14 AM· permalink

धनंजय कुमार उपाध्याय की कविता - आतंकवाद

आतंकवाद ब्रिटिश शासन के अंत के बाद स्वाधीन भारत में आतंकवाद गहरे सदमे का यह प्रहार नहीं झेल सकेगा अपना समाज   राजीव कांड में इसका हाथ कश्मीर चाहता पृथक राष्ट्र नागा और बोडो का विवाद स्वाधीन भारत में आतंकवाद   नहीं रहेगी राजनीति में चहल-पहल जब हो जायेगा इसका हल करते है नेता आज-कल नहीं निकलेगा इसका कोई हल   कश्मीर से कन्याकुमारी गुजरात से लेकर अरुणाचल चारों तरफ बस एक ही बात

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:09 AM· permalink

अखिलेष श्रीवास्‍तव “छत्तीसगढ़़िया” की हास्य व्यंग्य कविता - भारतीय क्रिकेट टीम का इंग्‍लैण्‍ड दौरा-2011 (हास्‍य व्‍यंग्य और थोड़़ी सच्‍चाई)

लौट के बुद्धू घर को आये घुटने टेके सिर को झुकाये, गुलामों जैसा खेल दिखाये।अंग्रेजों से मात खा गये, सभी मैचों को हार के आये। इंसान समझकर भेजे थे, इंग्‍लैण्‍ड पहुँच गदहा कहलाये। दहाड़़ते थे शेरों जैसे , पूँछ दबा कर भारत आये। करोड़़ों रुपए कमाने वाले, सौ रुपये का खेल दिखाये। कितनी पार्टी और उत्‍सव में, कन्‍याओं संग कमर हिलाये। उसी का यह परिणाम है भाई, नौटंकी सा खेल दिखाये। बैटिंग बालिंग बच्‍चों

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:07 AM· permalink

सीमा ‘स्‍मृति’ की तीन कविताएँ

1- जीवन चक्र काट दिए जाते पेड़ जरूरत पड़ने पर वर्षों पश्‍चात् जमीन में बहुत गहरे तक दबी जडें कभी कभी उचित हवा पानी ऊर्जा पाकर फूट पड़ती हैं लेकर कोमल कोंपलें । वो कहते हैं मैं वो कटा पेड़ हूँ जिसकी जड़ों को भी जलाया गया वक्‍त की जरूरत के नाम पर धू- धू करके और उसी क्षण नया एक वृक्ष तभी लगाया था नयी हरियाली के नाम पर । क्‍यों जड़ें तुम्‍हारी याद करती हैं क्‍यों जडें उम्‍मीद

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:04 AM· permalink

शशांक मिश्र भारती के दशहरा विशेष हाइकु

एक रावण राज कब से कब तक पुतले जलें।   दो हंसा रावण अपनो की वृद्धि से इसबार भी।   तीन विजयपर्व कब किस-किसका रावण हंसे।   चार वन में राम घर में कोहराम कैसा उत्‍सव। ---   सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र. 9410985048

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 09:01 AM· permalink

सदा बिहारी साहु की कविता - हे! पर्वत

कविताहे पर्वतडॉ. सदा बिहारी साहुप्रबंधक, सिडबी, लखनऊ तुम कैलाश हो, तुम हो नियमगिरिऔर तुम गोवर्धनधरती पर विराजमान, तुम ही तुमतुम वर्णित हो, युगों-युगों से लेखकों के लेख मेंकालिदास के काव्य मेंया कभी बच्चों के चित्रांकन में तुम पूज्य हो, तुम्हें नमनहे कैलाश, हे गोवर्धनतुम श्रेष्ठ हो, तुम सुदृढ़और तुम महानतुम हो संजीवनी, जीवन के संगहो तुम प्रकृति का बड़ा अवदानपर आज तुम लुट चुके होखो चुके हो अपना

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 08, 2011 08:26 AM· permalink

हरी मिर्च वाली धनिये चटनी का स्वाद (Taste of Green Chilli Chutney)

    हरी मिर्च वाली धनिये की चटनी बचपन से खाते आ रहे हैं, पहले जब मिक्सी घर में नहीं हुआ करती थी तब सिलबट्टे पर मम्मी या पापा चटनी पीसकर बनाते थे, अभी भी अच्छे से याद है कि थोड़ा थोड़ा पानी पीसने के दौरान डालते थे और चटनी बिल्कुल बारीक पिसती थी, अच्छी तरह से याद है कि उस समय धनिया पत्ती की एक एक पत्ती तोड़कर पीसने के लिये रखते थे, एक भी धनिये का डंठल नहीं गलती से भी नहीं छूटता था। मसाला धनिया, मिर्च, ट्माटर को ओखली में डालकर मूसल से कूटते थे और फ़िर सिलबट्टे पर चटनी को पिसा जाता था।

    हरी मिर्च वाली धनिये की चटनी बाद में मिक्सी घर पर आ गई तो उसी में चटनी बनने लगी और धनिया पत्ती पहले की तरह ही तोड़ी जाती, बिना डंठल के, पर एक बार चटनी हम बना रहे थे तो धनिया पत्ती तोड़ने में बहुत आलस आता था, कि एक एक पत्ती तोड़ते रहो और फ़िर चटनी बनाओ, हमने धनिया की गड्डी धोई और चाकू से पीछे की जड़ें काटकर नजर बचाकर धनिये की चटनी बना डाली, घर में बहुत शोर हुआ कि लड़का बहुत आलसी है और आज चटनी में धनिये के डंठल भी डाल दिये, अब हम तो समय बचाने की कोशिश में नया प्रयोग कर दिये थे, पर फ़िर उसी में इतना स्वाद आने लगा कि हमारी विधि से ही चटनी घर में बनाई जाने लगी।

    चटनी भी मौसम के अनुसार स्वाद की बनाई जाती थी, साधारण धनिये की, पुदीना पत्ती के साथ, कैरी के साथ । मसाले में नमक, लाल मिर्च डालते थे फ़िर बाद में हींग और जीरा का प्रयोग भी होने लगा। प्याज और लहसुन के साथ भी चटनी का स्वाद परखा गया।

    हरी मिर्च तीखे के अनुसार कम या ज्यादा डालते हैं, अभी थोड़े दिनों पहले बहुत तीखी चटनी खाने की इच्छा हुई तो खूब सारी मिर्च डाल दी तो उस चटनी में से एक चम्मच चटनी भी नहीं खा पाये। अब सोचा कि कम मिर्च की चटनी बनायें तो पता चला कि मिर्च ही इतनी तीखी है कि ५-६ मिर्च में तो बहुत तीखा हो जाता है। बचपन की याद है ७-८ मिर्च में भी चटनी इतनी तीखी नहीं होती थी तो लाल मिर्च डालते थे।

    सिलबट्टे पर चटनी पीसने से बैठकर मेहनत करनी होती थी, परंतु मिक्सी में वह सब मेहनत खत्म हो गई, आँखों में जो मिर्च की चरपराहट होती होगी उसका अहसास ही आँखों में पानी ला देता है। अब तो चटनी बनाते समय आँखों में चरपराहट का पता नहीं चलता है। मिक्सी में तो चटनी बनाते समय बीच में  दो बार चम्मच घुमाई और चटनी २-३ मिनिट में बन जाती है, हो सकता है कि चटनी उतनी ही बारीक पिसती हो जितनी कि सिलबट्टे पर, अब याद नहीं, और अब सिलबट्टा है नहीं कि पीसकर देख लें। पर हाँ गजब की तरक्की की है, पहले सिलबट्टे पर पीसने में चटनी का बनने वाला समय कम से कम ३० मिनिट का होता था और अब ज्यादा से ज्यादा ५ मिनिट का होता है।

    पर यह तो है कि सिलबट्टे की चटनी का स्वाद अब मिक्सी वाली चटनी में नहीं आता ।

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 07, 2011 03:26 PM· permalink

कैस जौनपुरी का धारावाहिक - आओ कहें दिल की बात - किश्त -2

धारावाहिक की पिछली कड़ी - कड़ी 1 आओ कहें...दिल की बात कैस जौनपुरी प्रिय शीतल...! प्रिय शीतल को, ढेर सारा प्यार...! शीतल...हमारी शादी को आज तकरीबन चार महीने और सत्तरह दिन हो गए हैं. हर औरत की ख्वाहिश होती है कि वो शादी के बाद अपने पति के साथ रहे. लेकिन कुछ कारणों की वजह से हम-तुम साथ नहीं रह पा रहे हैं वो कारण भी तुम्हें मालूम हैं... जैसे हम सीधे बम्बई नहीं आ सकते क्योंकि

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 05:36 AM· permalink

कृष्ण कुमार यादव का आलेख - दशहरे पर रावण की पूजा

दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन 'दश' व 'हरा' से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे की

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 02:16 AM· permalink

जी. रिजवाना बेगम का आलेख - अलका सरावगी के उपन्यासों में उत्तर-आधुनिकता

हिंदी साहित्य के इतिहास का अध्ययन करने के पश्चात्  यह बात स्पष्ट हो जाता है कि आज जो बहुप्रचलित तथा लोकप्रिय विधा 'उपन्यास' है वह आधुनिक काल में ही आरम्भ हुई. हिंदी उपन्यास का प्रारंभिक युग सामान्य जन जीवन से दूर रहा. इस तथ्य को कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता. जासूसी, तिलस्मी, मनोरंजन प्रधान उपन्यास  प्रराम्ब में ज़रूर लिखे गए परन्तु साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं है. इसलिए आचार्य

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Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 07, 2011 02:16 AM· permalink

कौन बनेगा करोड़पति ?




करोड़पति के सेट पर, हो गया आज बवाल ।
कंप्यूटर स्क्रीन पर, आया गज़ब सवाल ॥
आया गज़ब सवाल जीतकर,फास्टेस्ट फिंगर फस्ट ।
हॉट सीट पर आ गए, नेता जी एक भ्रस्ट ॥
पहला प्रश्न जिताएगा, रुपये पाँच हजार ।
देश में भ्रस्टाचार का , कौन है जिम्मेदार ? ॥
सही जवाब बतलाइए , ऑप्शन ये रहे चार ।
ए) जनता बी) मंत्री सी) नेता डी) सरकार ॥
हम ही नेता, हम ही मंत्री, हमरी ही सरकार ।
जो जनता को लौक किया, चुनाव जाएँगे हार ॥
मंत्री जी पड़ गए सोच में, मदद करे अब कौन।
बोले - विपक्ष के अध्यक्ष को लगाया जाये फोन ॥
तीस सेकंड में हो गई, नोट वोट की डील ।
कुइट किया नेता जी बोले एक्चुली व्हाट आई फील ॥
बिना जवाब के अरबों बनते अपनी वोट - सीट पर।
क्या रखा है "राघव " छोड़ो ऐसी हॉट-सीट पर ॥
झूठे वादे, झूठी क़समें, झूठे दिखा कर सपने ।
वहाँ जनता के वोटिंग पेड्स पर सारे ऑप्शन अपने ॥
कभी कभी बस भाषण बाज़ी, करके तेवर तीखे ।
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥
हो गया आज बवाल, सेट पर करोड़पति के ॥

Posted by भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav (raghav.id@gmail.com) on October 06, 2011 08:48 PM· permalink

विनम्र श्रद्धांजलि




अपने हृदय की iTunes पहचान कर,
विश्व के पटल पर दीपक जला गया,
iPhone जैसा ज़ोरदार आविष्कार किया,
रूढ़ियों की जमी हुई बर्फ पिघला गया,
प्रतिद्वंदियों की आंखों में भी iTears आये,
मन कह रहा है आज आदमी भला गया,
Steve नें उगाये दुनिया में लाखों jobs,
iSad कर परलोक में चला गया.

विनम्र श्रद्धांजलि.

Posted by अभिनव (shukla_abhinav@yahoo.com) on October 06, 2011 08:39 PM· permalink

कुण्डलियां

-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
कुण्डलियां
 --( 1 )--
जैसा चाहो और से, दो औरों को यार।
आवक जावक के जुडे़, आपस मे सब तार।।
आपस मे सब तार, गणित इतना ही होता।।
मिलती वैसी फसल, बीज जो जैसे बोता।।
ठकुरेला’ कवि कहें, नियम इस जग का ऐसा।।
पाओगे हर बार, यार बॉंटोगे जैसा।।




--( 2 )

धन की महिमा अमित है, सभी समेटें अंक।
पाकर बौरायें सभी, राजा हो या रंक।।
राजा हो या रंक, सभी इस धन पर मरते।।
धन की खातिर लोग, न जाने क्या क्या करते।।
ठकुरेला’ कवि कहें, कामना यह हर जन की।।
जीवन भर बरसात, रहे उसके घर धन की।।

Posted by डा० व्योम (jagdishvyom@gmail.com) on October 06, 2011 03:11 PM· permalink

स्टीव जॉबस्—कम्प्यूटर उपभोक्ता उत्पाद के पथ प्रदर्शक

स्टीव जॉबस् का चित्र विकिपीडिया से
यह चिट्ठी, स्टीव जॉबस् को श्रद्धांजलि है।
इस चिट्ठी को आप सुन भी सकते हैं। सुनने के लिये यहां चटका लगायें। यह पॉडकास्ट ogg फॉरमैट में है। यदि सुनने में मुश्किल हो तो ऊपर दाहिने तरफ का पृष्ट, "'बकबक' पर पॉडकास्ट कैसे सुने" देखें। 

स्टीव का जन्म २४ फरवरी १९५५ में हुआ था। उन्हें जन्म देने वाली, बिन ब्याही मां थी। इसलिये वे स्टीव को गोद में देना चाहती थीं। वे स्वयं स्नातक कक्षा की छात्रा थीं। इसी कारण, वे चाहती थीं कि स्टीव को कोई स्नातक दम्पत्ति ही गोद ले। 

सबसे पहले एक वकील दम्पत्ति उन्हें गोद लेने के लिये आये। बाद में उस दम्पत्ति को लगा कि किसी लड़की गोद लेना ठीक रहेगा। इसलिये उन्होंने स्टीव को गोद नहीं लिया। 

स्टीव को, दूसरे दम्पत्ति ने गोद लिया। लेकिन उनकी होने वाली मां ने कालेज की शिक्षा पूरी नहीं की थी और पिता तो हाई स्कूल भी पास नहीं थे। इसलिये बिन ब्याही मां ने, कई महीनो तक गोदनामे पर दस्तखत नहीं किया। लेकिन जब गोद लेने वाले दम्पत्ति ने वायदा किया कि वे स्टीव को स्नातक पढ़ाई के लिये भेजेंगे, तभी वे दस्तखत करने को राजी हुईं। 

स्टीव अक्सर स्कूल में दिया गया काम नहीं करते थे। उन्हें इसमें बोरियत लगती थी। वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उनके गोद लेने वाले माता पिता मध्यम परिवार से थे। उन्हें लगा कि वे उनका पैसा बेकार कर रहे हैं। 

स्टीव को हिन्दी टूटी फूटी आती थी। वे सत्य की खोज में, भारत में आये। इसके लिये उन्होंने साधूओं और महात्माओं के चक्कर भी लगाये। लेकिन उनका यह अनुभव अच्छा नहीं रहा। लेकिन इसी दौरान, वे अपने आप, सत्य के करीब पहुंचे, 
'I started to realise that maybe Thomas Edison did a lot more to improve the World than Karl Marx and Kairolie Baba put together'
मुझे लगा कि थॉमस ऍडिसन इस दुनिया को बेहतर बनाने में ज्यादा मदद की बजाय कार्ल मार्क्स या फिर किसी साधू महात्मा ने।
बाद में उन्होंने ऍप्पल कम्पनी बनायी और कम्प्यूटर की दुनिया में क्रान्ति ला दी। कम्पयूटर उपभोक्ता बाज़ार की पकड़ रखने वाला उनसे बेहतर व्यक्ति नहीं हुआ। इसी कारण मैक कंपनी के उत्पाद—चाहे वे कम्प्यूटर हों, या लैपटॉप, या आईपॉड, या फिर आईपैड—बेहतरीन उत्पाद हैं और इनका नशा भी अलग है।

मैंने कुछ समय पहले जेफरीस् यंग और विलियेम साइमन के द्वारा लिखी स्टीव जॉब की जीवनी 'आईकॉन: स्टीव जॉबस् द ग्रेटेस्ट सेकेन्ड एक्ट इन द हिस्टरी ऑफ बिसिनेस' पढ़ी। इसके पहले शब्द को दो तरह से पढ़ा जा सकता है: 

  • पहला, icon यानि की वह शख्स जो आदर का प्रतीक हो; 
  • दूसरा  I con यानि कि मैं छल करता हूं। 

यह पुस्तक उनके उस चरित्र के बारे में भी चर्चा करती है जिसके बारे में हम नहीं सुनना चाहते हैं। यह उनकी कमियों, उनके मानवीय गुणों को भी बताती है। । यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व का संतुलित चित्रण करती है और पढ़ने योग्य है। लेकिन यह पुस्तक किसी भी ऍप्पल स्टोर में नहीं बिक सकती है। 


स्टीव के जीवन में तीन महत्वपूर्ण घटनायें हुई हैं,
  • पहली, वे विश्वविद्यालय तो गये पर डिग्री न ले सके। उन्होंने विश्विद्यालय छोड़ दिया (ड्रॉप आउट)। 
  • दूसरा, वे ऍप्पेल कंप्यूटर से निकाल दिये गये। लेकिन बाद में, उन्हें वापस लिया गया।
  • तीसरा, उन्हे पाचक-ग्रंथि में कैंसर हो गया और पता चला कि वे छः महीने तक ही जीवित रह सकेंगे। लेकिन बाद मेंउन्होंने ऑपरेशन कराया।    
इन सब के बावजूद भी, वे स्वयं  इतना उठ सके और ऍप्पल कंप्यूटर कंपनी इतना ऊपर ले जा सके। इसका कारण उनके शब्दों  में,
'The only thing that kept me going was that I loved what I did. You've got to find what your love ... the only way to do great work is to love what you do. If you haven't found it yet, keep looking. Don't settle. As with all matters of the heart, you'll know when you find it. And, like any great relationship, it just gets better and better as the years roll on.
...
Don't let the noise of others' opinions drown out your own inner voice. And most important, have the courage to follow your heart and intuition. They somehow already know what you truly want to become. Everything else is secondary.'

मैं जो भी करता हूं उससे प्यार करता हूं। इसी ने मुझे आगे चलते रहने की प्रेणना दी। तुम्हे वह तलाशना है जिससे तुम प्यार करते हो ... जीवन में किसी बड़े सफल काम को करने के लिऐ, तुम जो भी करो, उससे प्यार करो। यदि तुम्हें अपना प्यार नहीं मिला है तो उसे ढूंढो - रुको नहीं। तुम्हें मालुम चल जायगा जब वह तुम्हें मिलेगा। यह दिल के किसी भी अन्य विषय की तरह है। समय बीतते, यह किसी भी अन्य रिश्ते की तरह बेहतर होता जायेगा।
...
दूसरों के विचारों से, अपने अन्दर की आवाज को मत बाधित होने दो। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने दिल और अन्तर्ज्ञान का अनुकरण करो। वे भली भांति जानते हैं कि तुम क्या बनना चाहते हो। बाकी सब गौण है।
इसी साल उन्होंने बिमारी के कारण ऍप्पल कंप्यूटर से इस्तीफ दे दिया। कल,  पांच अक्टूबर २०११ को, कैंसर के कारण, उनकी मृत्यु हो गयी। मेरा उनको सलाम।



कुछ समय पहले मैंने, 'अपने प्यार को ढ़ूंढिये' नामक चिट्ठी में, उनके बारे में लिखा है। वहां पर उनके द्वारा स्टैनफोर्ड विश्विद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिये गये भाषण की चर्चा की है तथा इस तरह की अन्य चिट्ठियों की भी चर्चा है। स्टीव के द्वारा दिया गया यह एक बेहतरीन भाषण है। यदि आपने नहीं सुना है तब इसे अवश्य सुनिये।

इस मूल भाषण को अंग्रेजी में यहां और इसका कुछ संक्षिप्त रूप हिन्दी में यहां पढ़ सकते हैं

मैक कम्प्यूटर १९८४ बजार में आया था। इसका सुपर बोल में विज्ञापन भी अनूठा था। इसकी चर्चा मैंने 'क्यों साल १९८४, उन्नीस सौ चौरासी की तरह नहीं था'  नामक चिट्ठी में की थी। शायद इसे आप पढ़ना चाहें। 


About this post in Hindi-Roman and English 
yeh hindi (devnagri) kee chitthi steve jobs ko shradhanjali hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post in Hindi (Devnagri) is obituary of Steve Jobs. You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द  
।  Steven Paul Jobs, Apple computerPixer Animated Studio,
iCon: Steve Jobs, The Greatest Second Act in the History of Business,  
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Posted by उन्मुक्त (unmukt.s@gmail.com) on October 06, 2011 09:02 AM· permalink

भूखे रहो, मूर्ख रहो - स्टीव जॉब्स


हम जैसे लाखों लोगों के प्रेरणा स्रोत - कंप्यूटर गुरु और दूरदृष्टि युक्त सफल व्यवसायी, स्टीव जॉब्स नहीं रहे.
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें.
प्रस्तुत है, उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप उनके एक अत्यंत विख्यात भाषण का हिंदी रूपांतर.
यह रचनाकार में पूर्व प्रकाशित है.

ये हैं कंप्यूटर गुरू स्टीव जॉब्सएप्पल कंप्यूटर और पिक्सार एनिमेशन स्टूडियोज़ के प्रमुख. मौक़ा है स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का. दिन रविवार. तारीख़ 12 जून 2005.

मुख्य वक्ता स्टीव जॉब्स ने छात्रों को जो कुछ बताया वह जीवन को सच्ची जीवटता से जीने की सही मिसाल है. इससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं – बहुत कुछ.

प्रस्तुत है स्टीव जॉब्स के संबोधन का पूरा पाठ- (मूल अंग्रेज़ी से अनुवादआशीष श्रीवास्तव (http://desh-duniya.blogspot.com/ ) )

इस विद्यापीठ के, जिसे विश्व के सर्वोत्तम विद्यापीठों में से एक माना जाता है, दीक्षान्त समारोह में शामिल होकर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ. मैंने किसी महाविद्यालय से उपाधि नहीं ली है. सच्चाई यह है कि मैं यहां पर आज मौजूद हूं यह महाविद्यालय और उपाधि से मेरी सबसे ज्यादा निकटता है. आज मैं आपको अपनी जिन्दगी से जुड़ी तीन कहानियाँ सुनाने जा रहा हूं. बस वही. कोई बड़ी बात नहीं, सिर्फ तीन कहानियां.

पहली कहानी है बिन्दुओं को मिलाने के बारे में.

मैंने रीड कालेज पहले ६ महीने में ही छोड़ दिया था, लेकिन मैं वहां पर अगले १८ महीने और रहा. उसके बाद मैंने कालेज सही अर्थों में छोड़ दिया. मैंने कालेज क्यों छोड़ा ?

दरअसल इसकी नींव तो मेरे जन्म लेने से पहले से रखी जा चुकी थी . मेरी जन्मदात्री जवान कुंवारी मां कालेज स्नातक छात्रा थी. उसने मुझे किसी को गोद देने का निश्चय किया था. उसकी मजबूत सोच थी कि मुझे किसी कालेज स्नातक माता पिता को ही गोद लेना चाहिए. इस लिये एक वकील और उसकी पत्नी मुझे गोद लेने के लिये तैयार थे, लेकिन जब मेरा जन्म हुआ तब उन्होंने आखिरी क्षणों में लड़की गोद लेना निश्चय किया. अब मेरे पालक जो प्रतीक्षा सूची में थे को आधी रात में फोन कर के पूछा गया "अप्रत्याशित रूप से हमारे पास एक बालक शिशु है, क्या आप उसे गोद लेना चाहेंगे ?" उनका जवाब हां में ही था. मेरी जन्मदात्री मां को बाद में जब पता चला कि मेरी मां और पिता ने किसी कालेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त नहीं की है, गोद लेने के काग़ज़ातों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. मेरे माता पिता के मुझे कालेज भेजने के आश्वासन देने बाद मेरी जन्मदात्री मां किसी तरह से हस्ताक्षर करने को तैयार हुई.

और, इस तरह १७ साल बाद मैं कालेज गया. लेकिन मैंने जो कालेज चुना था वह स्टैनफोर्ड के जैसा ही महंगा कालेज था. मेरे माता पिता की सारी कमाई मेरी फीस में चली जाती थी. ६ महीनों के बाद मैंने महसूस किया कि इस कालेज शिक्षा का कोई लाभ मेरे लिए नहीं है. मुझे नहीं मालूम था कि मैं जिन्दगी में क्या करना चाहता हूँ, और मेरे कालेज की शिक्षा इसमें क्या मदद करने वाली है. और मैं उस कालेज शिक्षा पर अपने माता पिता की सारी जिंदगी की कमाई खर्च कर रहा था. तब मैंने कालेज छोड़ने का निश्चय किया और विश्वास किया कि इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा, यह एक डरावना निर्णय था, लेकिन जब आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह निर्णय मेरे द्वारा लिये गये सर्वोत्तम निर्णयों में से एक है. जिस क्षण मैंने कालेज छोड़ा, मैंने अरुचिकर कक्षाओं में जाना बन्द कर दिया और रुचिकर कक्षाओं में जाना कम कर दिया.

यह सब अच्छा (रोमांटिक) नहीं था. मेरे पास सोने के लिये कमरा नहीं था, मैं दोस्तों के कमरे में जमीन पर सोता था. मैं कोक की बोतलों को जमा कर वापस करता था जिससे मुझे हर बोतल पर ५ सेंट मिलते थे, इन पैसों से मैं खाना खरीदता था. हर रविवार मैं ७ मील चलकर हरे कृष्णा मन्दिर अच्छा खाना खाने जाता था. मुझे यह सब अच्छा लगता था. मेरी जिज्ञासा और अंतरात्मा को लेकर मेरा संघर्ष बाद में अमूल्य साबित हुआ. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ
रीड कालेज उस समय कैलीग्राफी (लिपि/अक्षर बनाने की कला) का सबसे अच्छा शिक्षण देता था. पूरे कैम्पस में हर पोस्टर , दराजों पर लिखे गये नाम बहुत ही सुंदरता से लिखे गये थे. मैं कालेज छोड़ चुका था और मुझे सामान्य कक्षाएँ नहीं करनी होती थी, मैंने कैलीग्राफी की कक्षाएँ करने का निश्चय किया. मैंने शेरीफ और सैन्स शेरीफ टाईप फ़ेस सीखा, विभिन्न तरह के अक्षरों के बीच की कम ज्यादा जगह छोड़ने के बारे में सीखा, मैंने सीखा कि क्या है जो किसी टाइपोग्राफी को अच्छा बनाती है. यह एक सुंदर , ऐतिहासिक, कला है, जो विज्ञान नहीं सिखा सकता, और मुझे मनोरंजक लगा.

इसमें से कुछ भी मेरी जीवन में काम आएगा ऐसी उम्मीद नहीं थी. लेकिन १० साल बाद जब हम पहला मैकिंतोश बना रहे थे, यह सब मुझे याद आया. और यह सब हमने मैक में डाला. वह पहला कम्पयूटर था जिसके अक्षर सुंदर थे. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैक के पास विभिन्न चौड़ाई और दो अक्षरों के बीच भिन्न-भिन्न खाली जगह वाले फ़ॉन्ट नहीं होते . और जिस तरह विन्डोज ने मैक की नकल की, यह संभावना है कि किसी भी निजी कम्प्यूटर में ये नहीं होता. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैंने कैलीग्राफी की कक्षा नहीं की होती और निजी कम्प्यूटर में सुन्दर टाइपोग्राफी नहीं होती. हां मेरे कालेज में रहते हुए बिन्दुओं को सामने की ओर जोड़ना असंभव था, लेकिन दस साल बाद ये आसान है.
फिर से आप बिन्दुओं को आगे की तरफ नहीं जोड़ सकते, आप उन्हें पीछे की ओर देखते हुए ही जोड़ सकते हैं. आपको भरोसा करना होगा कि ये सभी बिंदु भविष्य में जुड़ जाएंगे. आपको अपनी शक्ति, भाग्य, जीवन, कर्म वगैरह पर भरोसा करना होगा. मेरी इस शैली ने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया है और इसी ने मेरा जीवन कुछ हट कर बनाया है.

मेरी दूसरी कहानी है प्यार और नुकसान के बारे में

मैं भाग्यशाली था. मैंने जिन्दगी की शुरूआत में जान लिया था कि मुझे किससे प्यार है. वाझ और मैंने अपने मातापिता के गैरेज में "एप्प्ल" की शुरूआत की, जब मैं २० साल का था. हमने कड़ी मेहनत की और १० साल में एप्प्ल गैरेज में काम करने वाले हम २ लोगों से बढकर २ बिलियन डॉलर और ४००० कर्मचारियों वाली कंपनी बन चुका था. एक साल पहले हम अपनी सबसे खूबसूरत कृति मैकिंतोश को बाजार में उतार चुके थे, और मैं ३० साल का हो चुका था. और तब मुझे एप्प्ल से निकाल दिया गया ! आप उस कम्पनी से कैसे निकाले जा सकते हैं जिसकी स्थापना आपने की थी ? अच्छा, जैसे-जैसे एप्पल बढने लगा था, हम लोगों ने कुछ ऐसे लोगों को नौकरी दी थी जिनके बारे में मैं सोचता था कि वे मेरे साथ कंपनी चलाने में प्रतिभाशाली साबित होंगे. और पहला साल अच्छा गया. लेकिन उसके बाद हमारी भविष्य की सोचों में अंतर आने लगा और हम अलग होने लगे. जब ऐसा हुआ तब कंपनी के निदेशक मंडल ने उनका साथ दिया. तो ३० साल की उमर में मैं बाहर था. मेरी संपूर्ण वयस्क जिन्दगी का केन्द्र जा चुका था और ये दिल तोड़ देने वाला था.

अगले कुछ महीनों तक मुझे नहीं मालूम था कि क्या करना चाहिए. मुझे महसूस होता था कि मैंने पिछली पीढ़ी के व्यावसायिकों को नीचा दिखाया है. मुझे दिया गया 'बेटन' मैंने नीचे गिरा दिया है. मैं डेविड पैकार्ड और बॉब नोयके से मिला और उनसे इस बुरी स्थिती के लिये क्षमा माँगी. मैं एक असफलता का प्रतीक था और मैंने 'सिलिकॉन वैली' से भाग जाने की भी सोच लिया था. लेकिन मेरे अंदर कुछ आलोकित हो रहा था, मैंने जो किया उससे मुझे प्यार था. एप्प्ल में जो कुछ हो रहा था उसमें कुछ भी नहीं बदला था. मुझे नकार दिया गया था लेकिन मैं उससे प्यार करता था. और मैंने सब कुछ फिर से शुरू करने की ठानी.

मैंने उस समय महसूस नहीं किया लेकिन एप्पल से मुझे निकाल दिया जाना मेरी जिन्दगी में घटित सबसे अच्छी घटना है, एक सफल इंसान होने का बोझ, अब एक नयी शुरूवात करने वाले का हल्का मन बन चुका था. इस घटना ने मुझे अपने जिन्दगी के सबसे क्रियाशील हिस्से में आने का अवसर दिया.

अगले ५ सालों में मैंने एक कम्पनी NeXT शुरू की, एक और कम्पनी 'पिक्सार' भी शुरू की. उसी समय एक प्यारी स्त्री के प्यार के गिरफ़्त में भी आ गया जो बाद में मेरी पत्नी बनी. पिक्सार ने विश्व की सबसे पहली कम्प्यूटर द्वारा एनीमेशन फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनायी. आज पिक्सार विश्व का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है. परिस्थितियों में बदलाव कुछ ऐसे हुआ कि एप्प्ल ने NeXT को खरीद लिया, मैं एप्प्ल वापिस लौटा और जो तकनीक हमने NeXT में विकसित की आज एप्पल की तकनीक का हृदय है. और लारेंस और मेरा एक सुखी परिवार है.

मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मुझे एप्पल से निकाला नहीं गया होता तो ये सब कुछ नहीं होता. वह एक कड़वी दवाई थी लेकिन मरीज को उसकी जरूरत होती है. यदि जिन्दगी आपके सर पर एक ईंट का प्रहार करे तो भी भरोसा ना छोड़ें. मुझे विश्वास है कि इकलौती चीज जो मुझे संघर्ष करने की प्रेरणा देती रही, वो था मेरा अपने किये गये कार्य से प्यार. आपको अपना प्यार पाना है, और यह आपके काम के लिये उतना ही सच है जितना आपके प्रेमी के लिये. आपका कार्य आपकी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रहा है और अपने जीवन में संतोष पाने का इकलौता रास्ता है आपका सोचना कि जो काम मैं कर रहा हूँ वो सर्वोत्तम है. और एक सर्वोत्तम काम वह है जिससे आप प्यार करते है. यदि आपको अपना प्यार नहीं मिला, ढूंढते रहें – ढूंढते रहें. रुकें नहीं. वह आपको जब भी मिलेगा आपका दिल उसे पहचान लेगा . और एक अच्छे रिश्ते की तरह वह समय के साथ अच्छा, और अच्छा होते जाता है, तो ढूंढते रहिये, रूकें नहीं.

मेरी तीसरी कहानी है मौत के बारे में

जब मैं १७ वर्ष का था, मैंने कहीं पढ़ा था "यदि आप हर दिन को जिन्दगी के अंतिम दिन की तरह जीते हैं, किसी दिन आप जरूर सच होंगे". इसने मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाला था और तब से पिछले ३३ सालों से हर सुबह मैंने आईने में खुद को देखा है और पूछा है "यदि आज मेरी जिन्दगी का अंतिम दिन है तो मैं आज मैं करने जा रहा हु वह मैं करना चाहूँगा या नहीं ?" और जब मेरा उत्तर कुछ दिनों तक लगातार नकारात्मक आया है मुझे मालूम हो जाता है कि मुझे कुछ परिवर्तन की जरूरत है.

अपनी मृत्यु को याद रखना, वह सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसने मुझे जिन्दगी के हर बड़े चुनावों में मदद की है. क्योंकि लगभग सब कुछ , हर उम्मीद , गर्व या असफलता की शर्म का डर ये सब मौत के सामने मायने नहीं रखते, बच जाता है जो सच ए महत्वपूर्ण है. आप एक दिन मरने वाले हैं इसे याद रखना , आपको कुछ खो देने के डर के जाल में फंसने से बचाएगा. आप के पास खोने के लिये कुछ नहीं है, आप को अपने दिल की भावना का पालन नहीं करने के लिये कोई कारण नहीं है.
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एक साल पहले मुझे कैंसर होने का पता चला था. सुबह ७.३० बजे मेरी जांच हुई, और मेरे पित्ताशय में मैने ट्यूमर अच्छी तरह से दिख रहा था. मुझे पित्ताशय क्या होता है यह भी नहीं मालूम था. डाक्टर ने बताया कि इस तरह के कैंसर का कोई इलाज नहीं है और मुझे ३ से ६ महीने से ज्यादा जीने की उम्मीद नहीं रखना चाहिए. डाक्टर ने मुझे घर जा कर सभी काम व्यवस्थित करने की सलाह थी, जो उनकी भाषा में होता है मृत्यु की तैयारी करो. इसका मतलब होता है अपने बच्चों को आपके अगले १० सालों की योजना को कुछ महीनों में बताना. इसका मतलब होता है कि सब कुछ व्यवस्थित कर देना जिससे आपके परिवार को परेशानी कम से कम हो. इसका मतलब था अलविदा कहना.
पूरे दिन मैं उस जांच के भय के साथ रहा. बाद में शाम को मेरी बॉयप्सी हुई,. उन लोगों ने में मेरे गले से एक एन्डोस्कोप, मेरे पेट में, मेरी आंतों तक पहुँचाया और मेरे पित्ताशय से सुई के द्वारा कुछ कोशिकायें निकाली. मैं बेहोश था, लेकिन मेरी पत्नी जो वहां पर थी, ने बताया कि जब डाक्टरों ने कोशिकाओं को सुक्ष्म्दर्शी से देखा और चीखना शुरू कर दिया. यह उन बिरले कैंसर में से एक था जो शल्यचिकित्सा से ठीक हो जाता है. मेरी शल्य चिकित्सा हुई और मैं अब अच्छा हूँ.

यह मौत से मेरा सबसे नजदीकी साक्षात्कार था, और आशा है इसका अनुभव अगले कुछ दशकों तक रहेगा. इस से गुजरने के बाद मैं आपसे कुछ ज्यादा विश्वास से कह सकता हूँ कि मौत एक उपयोगी लेकिन बौद्धिक विषय है.
कोई नहीं मरना चाहता. जो स्वर्ग जाना चाहते है वह भी वहां जाने के लिये मरना नहीं चाहते. लेकिन मौत एक ऐसा मंजिल है जिसे हर किसी को पहुँचना है. कोई बच नहीं पाया है. और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि मौत जिंदगी का सबसे बडा आविष्कार है. वह जीवन का परिवर्तक है. वह पुराने को हटा, नये के लिये रास्ता बनाता है. आज आप नये है, लेकिन एक दिन - आज से ज्यादा दूर नहीं, आप बूढ़े हो जाएंगे और किनारे हटा दिये जाएंगे. नाटकीयता के लिये क्षमा चाहूँगा, लेकिन यही सच है.

आपके पास समय कम है, इसलिये किसी और की जिन्दगी जीने के लिये बर्बाद न करें. किसी और के विचारों के अनुसार जीने के जाल में न फँसें. किसी और की सोच का शोर आपकी अंतरात्मा की आवाज को दबा ना पाये. और, सबसे महत्वपूर्ण, आपके पास अपने दिल और अंतरात्मा के कहे का पालन करने का साहस होना चाहिये. वो किसी-तरह-से जानते है कि आप सच में क्या बनना चाहते हैं. बाकी सब, किसी महत्व का नहीं है.

जब मैं जवान था, एक अच्छा प्रकाशन था "व्होल अर्थ कैटेलाग", जो हमारी पीढ़ी के लिये बाइबिल था. वह यहां मेनलो पार्क से कुछ ही दूर रहने वाले स्टीवर्ट ब्राण्ड ने लिखा था, और उसे काव्यात्मक अंदाज में जीवन दिया था. यह १९६० के दशक के आखिर की बात है जब निजी कम्प्यूटर और डेस्कटॉप का प्रकाशन नहीं था. यह टाइपराटर, कैंची और पोलराईड कैमरों से बनी थी. उसे गूगल का पेपरबैक अंक कहा जा सकता है, ३५ साल पहले, गूगल के आने से पहले. वह एक आदर्श था और अच्छी जानकारी से भरपूर था.

स्टीव और उनकी टीम ने "व्होल अर्थ कैटेलाग" के कई अंक प्रकाशित किये और जब वे थक गये तब उन्होंने उसका अंतिम अंक प्रकाशित किया. यह १९७० के दशक के मध्य की बात है जब मैं आपकी उम्र का था. उसके अंतिम अंक के पिछले कवर पर एक गांव के रास्ते का सुबह के समय का चित्र था, कुछ उस तरह का आपको पहाड़ों में देखने को जरूर मिलेगा यदि आप साहसी है और हिचहाइकिंग करते है. उसके नीचे लिखा था. "भूखे रहो, मूर्ख रहो" यह विदाई का संदेश था, क्योंकि उन्होने प्रकाशन बन्द कर दिया था. भूखे रहो, मूर्ख रहो और मैंने अपने लिये यही चाहा है और आपको भी यही शुभकामना देता हूँ

भूखे रहो, मूर्ख रहो – नए ज्ञान के लिए - भूखे रहो, मूर्ख रहो.

धन्यवाद
स्टीव जॉब्स


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 06, 2011 06:22 AM· permalink

गजैट का जादूगर, स्टीव जॉब्स

steve-jobsस्टीव जॉब्स, सिलिकन वैली के महारथी. कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर व इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद निर्माता कम्पनी एप्पल के इस 56 वर्षिय संस्थापक का कैलिफोर्निया में बुधवार को निधन हो गया.
स्टीव कैंसर से पीडित थे, उनके निधन के साथ एप्पल ने ही नहीं विश्व ने एक दूरदर्शी व रचनात्मक प्रतिभा को खो दिया है. उनमें अलग सोचने और उसे सच में बदल देने की अद्भूत क्षमता थी.

Posted by संजय बेंगाणी (sanjaybengani@gmail.com) on October 06, 2011 05:34 AM· permalink

आसमान में घन कुरंग

पिछले दिनों लंदन के कुछ इलाकों में हुए भारी दंगों का बादल अब शहर पर से छंट चुका है.

पूरा शहर टेम्स नदी के किनारे सालाना जलसा 'टेम्स समारोह' मनाने के लिए जुटा हुआ है. यह समारोह लंदन शहर के जज्बे को सलाम करने और उसके दिल में बसे टेम्स नदी के प्रति अपना प्यार जताने के लिए मनाया जाता है.

टेम्स के किनारे चिनार के हरे और हल्के पीले पत्ते हवा के झोंके के संग इधर-उधर उड़ते रहते हैं. माहौल चारो तरफ काफी खुशगवार है.


दूर तक लगे झाड़-फानूस, खाने-पीने के खोमचों, सडकों पर नाच-गाने और शोर-शराबे को देख कर ऐसा लगता है कि हम किसी भारतीय शहर में आ गए हैं. लेकिन जहाँ भारत में पर्व-त्योहारों पर ही ऐसा रेला दिखता है, वहीं टेम्स के प्रति अपना हक अदा करने के लिए लंदनवासी इस पर्व का आयोजन करते हैं.

हमने अपनी नदियों को देवी-देवता मान कर उसे पूज्य बना दिया पर प्यार और सम्मान देना कहाँ सीखा!

बहरहाल गर्मी की अब बस छाया भर है और शरद की आहट हवाओं में है. हल्की बूंदा-बांदी और बादल के घिरने से ठंड का एहसास होने लगता है. हालांकि कुछ लोग कमीज में हैं तो कुछ लोग स्वेटर और जैकेट पहने हुए दिखते हैं.

वीक एंड पर पबों में मस्ती और सड़कों पर बीयर की टूटी हुई बोतलें! लेकिन सोमवार की सुबह होते ही ट्यूब स्टेशनों, लंदन के सड़कों की पहचान लाल रंग की दुमंजिली बसों पर काम-काज पर आने-जाने वालों की भीड़ का रेला. हल्की धूप में ट्रैफल्गर स्कवेयर पर सैलानियों की चहल-पहल और रात में सोहो की गलियों की रंगनियाँ! शहर अपनी पूरी रफ्तार में है.

पर इस भीड़ और कोलाहल के बीच भी आर्थिक बदहाली की चर्चा कहीं दबी जुबान में तो कहीं सरगोशी से सुनाई पड़ जाती है.

चर्चित सेंट पाल कैथिडरल और लंदन म्यूजियम के बीच सड़क के एक किनारे स्थित इंडियन क्यूजिन नामक एक रेस्तरां में काम करने वाले महफूज कहते हैं, बड़ा कठिन समय है...अजीब-अजीब लगता है कभी कि किस मुलुक में आ गए हैं हम.

तीस वर्षीय महफूज मूलत: बांग्लादेश के सिलहट के हैं और पिछले चार वर्षों से वे लंदन में हैं.

तलघर और पहले मंजिल पर फैले इस रेस्तरां में महज दो-चार लोग डिनर करते हुए दिखते हैं. करी भले ही भारतीय व्यंजन के रुप में लंदन में चर्चित हो लेकिन ज्यादातर भारतीय रेस्तरां में इसे बनाते बांग्लादेशी मूल के लिए लोग ही हैं.

महफूज कहते हैं, आज कल सब कुछ मंदा चल रहा है. कम ही लोग रेस्तरां में आते हैं..पता नहीं क्यों है ऐसा, पर यह पिछले साल था और फिर इस साल भी है.

महफूज अपनी बीवी और दो बच्चों के साथ रहते हैं. बीवी लंदन की नागरिक हैं और अब वे भी लंदन के नागरिक हो गए हैं.

बीवी टीचर थी लेकिन दो बच्चों को संभालने के लिए अभी नौकरी नहीं कर रही है. ऐसे में परिवार पर आर्थिक बोझ आज कल ज्यादा है. वे कहते हैं कि अब तो लगता है कि यहीं के होकर रह गए. अब वापस भी नहीं लौट सकते.

इससे पहले दिन में यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर में भारतीय मीडिया के लेकर एक कांफ्रेस के दौरान भारतीय मूल के प्रोफेसर और शोधार्थियों से मुलाकात हुई. विश्वविद्यालय में एक युवा रिसर्च एसोशिएट ने कहा दोहरी मंदी की मार झेल रहे हैं हम. आप भारत में ही अच्छे हैं.

ऐसा नहीं कि मंदी की मार सिर्फ लंदन पर है. ग्रीस से लेकर फ्रांस तक इससे जूझ रहा है.

ट्यूब में यात्रा के दौरान मिले ग्रीस के एक शोधार्थी का कहना था, एक कमरे का 650 पाउंड देना पड़ रहा है जिसे हम कुछ छात्र मिल कर शेयर कर रहे हैं. और कमरा क्या है बस रहने लायक जगह है.

ग्रीस के हालात को जानते हुए मुझसे यह पूछने कि हिम्मत नहीं हुई कि किस तरह से वे लंदन में जिंदगी बसर कर रहे हैं. मंदी की मार बेरोजगारों से बेहतर कौन जानता है.

शिशु घन-कुरंग लंदन के आसमान की पहचान हैं. इससे पहले भी 70 और 80 के दशक में लंदन आर्थिक मंदी की मार झेल कर मजबूती से उबरा था. पर इस बार मंदी का घना बादल लंदन के आसमान में फैला दिखता है.

ऐसा लगता है कि लोग गर्मी की तपिश के बाद इस बार शीत के असंतोष को झेलने के लिए मन को मजबूत कर रहे हैं.

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 6 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित)

Posted by Arvind Das (noreply@blogger.com) on October 06, 2011 05:01 AM· permalink

दूसरे की गलती से सीखने वाले, बुद्धिमान होते हैं

यह चिट्ठी ई-पाती श्रंखला की कड़ी है। यह श्रंखला, नयी पीढ़ी की जीवन शैली समझने, उनके साथ दूरी कम करने, और उन्हें जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयत्न है। सच में बुद्धिमान वह हैं जो दूसरी की गलती से ही सीख ले लेते हैं।


मैंने कुछ दिन पहले 'जिया धड़क धड़क जाये' शीर्षक से चिट्ठी प्रकाशित की थी। इसमें वर्ष २००८ का लेखा जोखा लिखा था। कुछ लोगों को लगा कि मैं इस बात से दुखी हूं कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं।
  • मुझे इस बात का मलाल नहीं है कि मुझे टिप्पणियां कम मिलती हैं। टिप्पणियां न मिलने के कई कारण हैं। मैं उनसे वाकिफ हूं। मैंने उक्त चिट्ठी पर टिप्पणियों की बात, सांख्यिकी के तौर पर लिखी थी न कि शिकायत के कारण।
  • मुझे मालुम है कि मेरी चिट्ठियां पढ़ी जाती हैं। मुझे, वर्ष २००६ में लिखी चिट्ठियों पर, औसतन एक से भी कम टिप्पणियां मिलीं। फिर भी, हिन्दी चिट्टागजत ने, इसी साल के लिये तरकश द्वारा आयोजित चुनाव में रजत कलम दिया। अब जब समीर जी सामने हों तो किसी और को स्वर्ण कलम कैसे मिल सकता है :-)
  • मुझे यह भी लगता है कि कुछ लोग मेरा लेखन पसन्द करते हैं। शायद, इसीलिये इस वेबसाइट को शुरू किया होगा।


    कौन है यह शख़्स, क्यों शुरू की यह वेबसाइट - कुछ समझ में नहीं आता है। लगता है कि मैं अज्ञात में चिट्ठाकारी करता हूं इसलिये ईश्वर ने मुझे यह सजा दी कि तुम भी इसी सोच में परेशान रहो।

कई लोगों को मेरी यह चिट्ठी, अलग-अलग कारणों से पसन्द नहीं आयी पर मेरे परिवार वालों को यह चिट्ठी अच्छी लगी। मुन्ने की सात समुन्दर पार से लिखी ईमेल और उसे मेरा जवाब यह है।


पापा
मैंने अपने लैपटॉप में मैक का नया सॉफ्टवेयर डलवाया है। इसमें हिन्दी देखने में कोई मुश्किल नहीं है। अब मैं तुम्हारे चिट्ठे का आनन्द ले सकूंगा।

तुम्हारी चिट्ठी 'जिया धड़क धड़क जाये' मन को छूने वाली है। मै अज्ञेयवादी हूं पर यदि ईश्वर है तो सच में, हमारे परिवार को उसका आशिर्वाद प्राप्त है। उसने हमें वह सब कुछ दिया जो आज तक किसी और को दिया है। मैं नहीं समझता कि हमें किसी भी चीज की जरूरत है। हम भाग्यशाली हैं।

तुम्हारी उक्त चिट्ठी को पढ़ने के बाद मुझे रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता कि यह पंक्तियां याद आयीं,

'The woods are lovely, dark and deep,
But I have promises to keep,
And miles to go before I sleep,
And miles to go before I sleep'
जंगल बहुत सुन्दर और घने हैं
मुझे बहुत से वायदे निभाने हैं,
और मुझे सोने से पहले बहुत दूर जाना है
और मुझे सोने से पहले बहुत दूर जाना है।
मुन्ना

बेटे राजा
तुम्हारी प्यारी सी ईमेल मिली। मुझे खुशी है कि मैक के नये सॉफ्टवेयर में हिन्दी देखने में कोई मुश्किल नहीं है। हम तुम इस चिट्ठे के जरिये काफी बात कर पायेंगे।

मैंने अपनी उक्त चिट्ठी में मैंने कुछ पति, पत्नी के सम्बन्धों के बारे में लिखा है। मुझसे कहीं कुछ गलती हो गयी पर तुम्हारी मां से नहीं। एक पुरानी कहावत है,

'Those who learn from the mistakes of others are intelligent; those who are learn from their mistakes are ordinary; and those who even do not learn from their mistakes are fools.'
जो लोग दूसरे की गलती से सीखते हैं वे बुद्धिमान होते हैं। जो अपनी गलती से सीखते हैं वह सधारण होते हैं और जो अपनी गलती से भी नहीं सीखते वे बेवकूफ होते हैं।
मुझे यह बताने की जरूरत नहीं कि मैं किस श्रेणी में आता हूं। मुझे यह भी बताने की जरूरत नहीं कि हम सब तुम्हें किस श्रेणी में समझते हैं और तुम वास्तव में किस श्रेणी के हो।

बिटिया रानी का शोध ठीक चल रहा होगा। भौतिक शास्त्र तो मेरा प्रिय विषय रहा है। यदि मेरा बस चलता तो मैं भी भौतक शास्त्री होता पर शायद भाग्य में फाइलें ही ऊधर उधर करना लिखा था। बिटिया रानी ने वायदा किया है कि वह इस साल कार चलाना सीख लेगी। आशा करता हूं कि वह इस पर कायम रहेगी :-)

लिखना कि तुम्हारा शोध कैसा चल रहा है। क्या तुम्हें हरपीस वायरस के कार्य करने के तरीके के बारे में कुछ और पता चला। यह चिट्ठी भी देखो यह तुम्हारे शोध कार्य में सहायता करेगी।
पापा


मिश्र जी ने टिप्पणी कर, रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता का हरिवंश राय बच्चन के द्वारा किया गया अनुवाद, बताया है। यह मेरे किये गये अनुवाद से कहीं बेहतर है। मैं उसे यहां उद्धरित कर रहा हूं।
'सुन्दर सघन मनोहर वन तरु,
मुझको आज बुलाते हैं।
किये मगर जो वादे मैंने,
याद मुझे आ जाते हैं।
अभी कहाँ आराम मुझे,
यह मूक निमंत्रण छलना है।
और अभी तो मीलों मुझको,
मीलों मुझको चलना है।'

अन्य संबन्धित चिट्ठियां

हिन्दी में नवीनतम पॉडकास्ट Latest podcast in Hindi
सुनने के लिये चिन्ह शीर्षक के बाद लगे चिन्ह ► पर चटका लगायें यह आपको इस फाइल के पेज पर ले जायगा। उसके बाद जहां Download और उसके बाद फाइल का नाम अंग्रेजी में लिखा है वहां चटका लगायें।:
Click on the symbol after the heading. This will take you to the page where file is. Click where 'Download' and there after name of the file is written.)
यह ऑडियो फइलें ogg फॉरमैट में है। इस फॉरमैट की फाईलों को आप -
  • Windows पर कम से कम Audacity, MPlayer, VLC media player, एवं Winamp में;
  • Mac-OX पर कम से कम Audacity, Mplayer एवं VLC में; और
  • Linux पर सभी प्रोग्रामो में - सुन सकते हैं।
बताये गये चिन्ह पर चटका लगायें या फिर डाउनलोड कर ऊपर बताये प्रोग्राम में सुने या इन प्रोग्रामों मे से किसी एक को अपने कंप्यूटर में डिफॉल्ट में कर लें।

About this post in Hindi-Roman and English
yeh post ee-paaati shrnkhla kee kari hai. yeh nayee peedhee ko smjhne, unse dooree kum karne, aur unhein jeevan ke moolyon smjhaane ka praytna hai. sach mein budhimaan vh hain jo doosree kee galtee se hee samajh jaate hain. yeh {devanaagaree script (lipi)} me hai. ise aap roman ya kisee aur bhaarateey lipi me padh sakate hain. isake liye daahine taraf, oopar ke widget ko dekhen.

This post is part of e-paati (e-mail) series and is an attempt to understand the new generation, bridge the between gap and to inculcate right values in them. Intelligent are those who learn and understand from the mistake of the others. It is in Hindi (Devnagri script). You can read it in Roman script or any other Indian regional script also – see the right hand widget for converting it in the other script.


सांकेतिक शब्द
culture, Family, Inspiration, life, Life, Relationship, जीवन शैली, समाज, कैसे जियें, जीवन, दर्शन, जी भर कर जियो

Posted by उन्मुक्त (unmukt.s@gmail.com) on October 06, 2011 03:01 AM· permalink

ऑनलाईन भुगतान के लिये ग्राहक का विश्वास रेल्वे ने दिया है (Railway created faith in consumers for online payment and delivery)

    ऑनलाईन भुगतान आम आदमी ने कब से करना शूरू किया ? और आम आदमी को नेटबैंकिंग और ऑनलाईन भुगतान पर विश्वास कैसे हुआ ?  आजकल जो आम आदमी आराम से विश्वास से  बेधड़क ऑनलाईन नेटबैंकिंग और क्रेडिट कार्ड से भुगतान कर रहा है, पता है इसके लिये रेल्वे विभाग का बहुत बड़ा हाथ है ।

    रेल्वे ने ऑनलाईन टिकट की सुविधा देकर उपभोक्ता सेवा के क्षैत्र में क्रांति पैदा कर दी और आम ग्राहक को विश्वास दिलवाया कि अगर ऑनलाईन भुगतान किया जाये तो उसका टिकट उसे मिल जायेगा, रेल्वे ने वादा किया कि दो दिन में टिकट अगर आपको घर पर मिल जायेगा तो रेल्वे ने अपना वादा निभाया और ग्राहक के विश्वास को जीत लिया।

    ऑनलाईन खरीदी करने पर ग्राहक को समय पर सेवा उपलब्ध होने का जो विश्वास रेल्वे ने ग्राहकों को दिया, इस विश्वास का फ़ायदा भारत के लगभग सभी वेबसाईटों को मिला और ग्राहक ऑनलाईन खरीदी करने में विश्वास करने लगे। इस ईलेक्ट्रॉनिक भूगतान का आँकड़ा अगर देखा जाये तो अविश्वसनीय है, जिस तेजी से ई-भुगतान बढ़ता जा रहा है वह लगभग सभी के लिये अच्छा है, क्योंकि इसमें होने वाला खर्चा काफ़ी कम है और चूँकि इसमें मानवीय हस्तक्षेप नहीं है तो इसमें त्रुटि होने की संभावनाएँ  भी काफ़ी कम हैं।

    रेल्वे आम उपभोक्ता के लिये एक जरूरी सुविधा है और ई-टिकट के लिये रेल्वे ने अलग से शुल्क लेना शुरू किया जो कि आम उपभोक्ता की मजबूरी है, क्योंकि अगर वह रेल्वे स्टेशन जाकर टिकट लेगा तो उसका खर्चा उस शुल्क से कहीं ज्यादा है और उसके लिये उसे रेल्वे स्टेशन जाना होगा, पर ई-टिकटिंग में उपभोक्ता अपने घर पर ही अंतर्जाल की मदद से टिकट कर सकता है।

    ऑनलाईन खरीदी के लिये रेल्वे ने जो मॉडल पेश किया वह बहुत ही सराहनीय है, परंतु ऑनलाईन खरीदी करने पर रेल्वे ने जो अतिरिक्त शुल्क लगाया वह थोड़ी ज्यादती है, रेल्वे का मानवीय हस्तक्षेप कम हो गया और जो रेल्वे खिड़की पर जो ऑनलाईन ग्राहकों का आना कम हुआ उसका फ़ायदा उन ऑनलाईन ग्राहकों को नहीं दिया गया।

    ऑनलाईन खरीदी करने वाले ग्राहकों को कुछ अतिरिक्त सुविधा देनी चाहिये जैसे कि अगर कुछ प्रतिशत की छूट देनी चाहिये जिससे वे ग्राहक वापिस से रेल्वे की खिड़की पर ना जायें और जो ग्राहक रेल्वे खिड़की पर जाते हैं वे भी ऑनलाईन ग्राहक बन जायें। रेल्वे को साथ ही टोल फ़्री सुविधा भी देनी चाहिये जैसे कि आजकल की सभी ऑनलाईन पोर्टल्स दे रहे हैं।

    रेल्वे को मेरी तरफ़ से बहुत बहुत धन्यवाद है कि ग्राहकों का विश्वास ऑनलाईन भूगतान के प्रति जमाया।

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 06, 2011 01:47 AM· permalink

हाशिये पर


शांतिको वो रोज़ मिलती थी। कभी-कभीतो दिन में दो बार भी मिलतीथी। दफ़्तर आते-जाते जब भी शांति का स्कूटर अम्बेडकरचौराहे पर रूकता तो शांति कीनिगाहें ख़ुदबख़ुद ही उसेढूंढने लगती। और पचासों वाहनोंके बीच भी उसकी लहकती हुई कायाको अलग से पहचान लेने में शांतिको कोई मुश्किल नहीं होती।शांति ने उसे जब भी देखा,हमेशा टिपटॉप देखा।हफ़्ते के हर दिन वो एक नए रंगमें दिखाई पड़ती। जिस रंग कीसाड़ी उसी रंग का ब्लाउज़ औरसैण्डल। यहाँ तक कि जुएलरीभी मैचिंग पहनती। वैसे तो वोइतनी सुन्दर थी कि वो कुछ भीमेकप न करती और कुछ भी पहन लेतीतो भी उस पर से नज़रें हटानामुश्किल होता। इतना सजने-धजनेके बाद तो वो बिजलियां ही गिरानेलगती। वो ठुमकते हुए शांतिके पास चली आती और उसकी बलैयांलेने लगती। शांति पर्स खोलकरउसे कुछ न कुछ ज़रूर देती। कभीपाँच रूपये कभी दो रुपये। अगरकभी उसके आने से पहले ही सिगनलहरा हो जाता तो भी वो शांति कोमुसकराकर बलैयां लेके ही विदाकरती और बार-बारआशीर्वाद देती।

कुछलोग कहते हैं कि इनके आशीर्वादमें बड़ी ताक़त होती है। परवही लोग उसे देखकर बुरी तरहघबरा जाते। वो कुछ कहती तोआँखें तरेरने लगते। हाथ लगातीतो छिटकने लगते। और उनके लाखस्त्रीवेश रखने पर भी कुछ लोगउन्हे आता-जाता कीक्रिया में पुरुष की तरह हीसम्बोधित करते। ये सही है किइन हिजड़ों में से कई कीमांसपेशियाँ पुरुषों की भांतिही उभरी हुई होती हैं और चेहरेपर दाढ़ी-मूँछ केखूँटे भी झलकते रहते हैं। परशांति ने पाया है कि उन हिंजड़ोका स्वभाव भी बहुत नाज़ुक औरलचीला होता है जिनके शरीर मेंस्त्रियों जैसी कोई तरलतानहीं होती। उनका शरीर भलेपुरुष का हो वे मन से नारी होतेहैं और हर कोशिश कर के पूरीतरह वही हो भी जाना चाहते हैं।इन कोशिशों में हारमेन्स कीगोलियों से लेकर विदेशों मेंकिए जाने वाले मँहगे ऑपरेशन्सतक होते हैं।

शांतिके लिए यह बात कभी मुद्दा हीनहीं रही कि उन्हे पुरुष मानाजाय या स्त्री। जैसे किसी कानाम होता है या किसी का मज़हबहोता है वैसे ही शांति इसे भीमानती रही है। अगर वे अपने कोस्त्री मानते हैं तो उसमेंकिसी को क्या ऐतराज़ होनाचाहिये। पर कुछ लोगों का नज़रियाइस मसले पर बेहद कट्टर और क्रूरपाया जाता है। और इस क्रूरतासे शांति का परिचय बहुत बचपनमें ही हो गया था। शांति केस्कूल में एक बार एक लड़कापढ़ने आया था नीरज- जोपहनता तो पैंट-शर्टथा लेकिन उसके हाव-भावऔर अंदाज़ सब लड़कियों वालेथे- हर समय खिलखिलाना,कुछ लहराते हुए साचलना, किसी पहाड़ीनदी की तरह धाराप्रवाह बोलना,थोड़ी सी भी चोट लगजाने पर आँखों में आँसू डबडबाजाना। हालांकि कम ही लड़कियांउससे बात करतीं पर वो लड़कियोंके साथ घुलमिलकर के रहने कीपूरी कोशिश करता। लड़कियो कीही तरह वो लड़को से कटता औरलड़के भी उससे कटते। लड़केकभी उससे बात करते भी तो उसकामखौल बनाने के लिए।

नीरजपढ़ने में तेज़ था पर पढ़ाईसे अधिक मन उसका सजने-धजनेऔर फैशन में लगता था। वो बड़ेबाल रखता और हर दिन एक अलगस्टाईल में बाल सजाकर आता।कभी-कभी नीरज अपनीछोटी उंगली में नेल पॉलिश लगालेता था। एक दिन वो दसों उंगलियोंमें नेलपॉलिश लगाकर आ गया।लड़कियों ने झुण्ड बनाकर उसपर मीन-मेख निकाला,लड़कों ने छींटाकसीकी, और टीचर ने देखातो कसकर डाँटा। नीरज ने सरझुका के सुना तो पर उस पर कोईअधिक असर नहीं हुआ। कुछ दिनोंबाद वो स्कूल में लिपस्टिकऔर मस्कारा लेके आ गया और लंचमें कुछ लड़कियों के साथ मिलकरउसने दोनों का इस्तेमाल अपनेचेहरे पर कर डाला। शांति कोयाद है कि वो किसी हीरोईन कीतरह सुन्दर लग रहा था। यह बातवो भी जानता था और उसीलिए ख़ुशीसे इसके क़दम सीधे नहीं पड़रहे थे। न जाने यह उसकी ख़ुशक़िस्मतीथी या बदक़िस्मती, किसीटीचर की नज़र उस पर नहीं पड़ी।छुट्टी होने तक लड़कियों कीखिलखिल और लड़कों की छींटाकसीज़ारी रही। मगर छुट्टी के बादजो हुआ उसकी कल्पना किसी नेनहीं की थी। स्कूल से निकलनेके बाद लड़कों ने उसे घेर लियाऔर उसके कपड़े फाड़ डाले। उसदिन जब नीरज घर पहुँचा तो उसकेशरीर पर कपड़ों के निशान सेबड़े ख़ून के निशान थे।

आख़िरउसका अपराध क्या था? क्या सिर्फ़ इतनाकि वो औरतों की तरह सुन्दरदिखना चाहता था?

नीरजउस दिन के बाद स्कूल लौटकरनहीं आया। शांति को यह भी पतानहीं चला कि उसके बाद वो फिरकिसी स्कूल गया कि नहीं। उसहादसे के बाद नीरज किसी भीसामाजिक समूह में सहज होकररह पाया होगा, मुश्किललगता है। यही सोचकर शांति जबभी हिंजड़ो के समूह को देखतीहै तो सोचने लगती है कि उसकासहपाठी नीरज भी शायद उनमेंशामिल हो गया हो। उस हसीनहिंजड़े को देखकर तो शांतिको हमेशा नीरज की याद आती हैक्योंकि वो कोई बहुत ज़हीनऔर पढ़ा-लिखाइंसान मालूम देता था। जिसकोदेखकर किसी का भी मन में उसेजानने और दोस्ती करने की इच्छापनप जाय। वैसे तो बिना किसीजान-पहचानके ही उनके बीच एक अजीब सीदोस्ती का रिश्ता क़ायम होगया था पर शांति को उसका नामभी नहीं मालूम था। शांति नेकई बार सोचा कि वो कभी रुककरउससे उसका नाम पूछे और उसकीकहानी भी। मगर वो मौक़ा कभीनहीं आया। एक रोज़ शांति कोवो अम्बेडकर चौराहे पर नज़रनहीं आई। और उसके बाद फिर कभीनज़र नहीं आई। आते-जातेशांति की निगाहों उसे खोजतीरहतीं। पर वो नहीं मिली। शांतिके पास यह जानने का कोई ज़रियानहीं था कि वो कहाँ चली गई औरक्यों चली गई?

फिरएक दिन अख़बार में एक ख़बरदेखी- पुलिसमे कुछ हिंजड़ो को भीख माँगनेऔर वैश्यावृत्ति करने केइल्ज़ाम में हवालात में बंदकर दिया था। साथ में पुलिसअफ़सर का बयान भी था कि वो किसीको समाज में अनैतिकता नहींफैलाने देगा। साथ में एक छोटीसी तस्वीर भी थी। उस तस्वीरमें पुलिस अफ़सर के पीछे हवालातमें बंद हिंजड़ो सें से एक काआधा मुँह साड़ी के आँचल से ढकाहुआ था और दिखाई पड़ रहा आधामुँह लाल टमाटर की तरह सूजाहुआ था। शायद उसे भी किसी नेसुन्दर लगने का ईनाम दिया था।शांति ने ग़ौर से देखने कीकोशिश की कहीं वो चेहरा उसेमिलने वाली उसकी अनाम दोस्तका तो नहीं है? परवो कुछ तय नहीं कर सकी-वो एक हिंजड़े काचेहरा भर था जिसके लिए समाजके भीतर या बाहर कोई जगह नहींथी।

***

(पिछले इतवार दैनिक भास्कर में छपी)

Posted by अभय तिवारी (noreply@blogger.com) on October 05, 2011 10:51 AM· permalink

आई-फोन 4एस, क्या है नया

iphone4sवे जो आइ-फोन 5 की प्रतिक्षा कर रहे थे, उन्हें आइ-फोन 4 के उत्तर-कृति (सिक्वल) संस्करण 4s से ही संतोष करना पड़ा है. इसके बाद भी नए संस्करण में नया क्या है, यह जानने की जिज्ञासा कम नहीं हुई है. यही कारण है कि नए संस्करण के जारी होने के साथ ही उत्पादक कम्पनी मैक की साइट चाहकों के भारी आगमन के कारण दबाव में दिखी.

Posted by संजय बेंगाणी (sanjaybengani@gmail.com) on October 05, 2011 09:46 AM· permalink

परितोष मालवीय की कहानी - महीने का पहला इतवार

आज शर्माइन सुबह चार बजे ही उठ गईं। महीने का पहला इतवार जो है। ब्रैड का बड़ा पैकेट और मक्खन तो शर्मा जी कल ही ले आये थे, सिर्फ ग्वाला की बर्फी ही लानी बाकी है। काम में युद्ध स्तर पर भिड़ी हुईं शर्माइन किचिन से ही चिल्लाईं - " जल्दी उठो, छै बजन वाले है। ई बार आठ बजे तक पहुँचने ही है, नहीं तो धूप हो जै। बिक्कू को भी उठा दो और पूजा भी कर लो नहीं तो भगवान बेचारे ऐसे ही बैठे रै जात। लौटत - लौटत

>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 05, 2011 06:10 AM· permalink

पारिवारिक समय का कत्ल कर रहे है अंतर्जाल और फ़ेसबुकिया दोस्त (Facebook and Internet are killing family time)

    अभी कुछ समय से अपने ऊपर ही विश्लेषण कर रहा हूँ कि एक बार लेपटॉप पर कुछ थोड़ा सा कार्य लेकर बैठे तो कार्य तो खत्म हो गया, किंतु बाकी का समय फ़ेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग पढ़ने में निकल जाता है, और यह समय किस तेजी से भागता है, यह तो सिस्टम ट्रे की घड़ी और सामने दीवार पर लगी घड़ी दोनों बताते रहते हैं।

    वर्षों पहले बचपन की सुनहली तस्वीर सामने आती है, जब न बुद्धुबक्सा था न अंतर्जाल तक पहुँचाने वाला ये तकनीकी यंत्र नहीं था, तब लगभग सभी परिवार अपने आप में बेहद मजबूती से बंधे हुए थे, और सबको एक दूसरे के दुख सुख का अहसास होता था, पता होता था। सामाजिक मूल्यों की परिभाषा अलग होती थी और अब सामाजिक मूल्यों की परिभाषा में बदलाव सहज ही देखा जा सकता है।

    कल फ़ेसबुक पर बहुत सारे दोस्तों को जो कि केवल फ़ेसबुक दोस्त थे, जो इसलिये बना लिये गये थे कि उनके और हमारे कुछ कॉमन दोस्त थे, हटा रहे थे। दोस्तों की इतनी भीड़ देखकर दंग था और उनके द्वारा जारी किये गये स्टेटसों को भी देखकर, कुछ तो केवल अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे और कुछ केवल समय का कत्ल कर रहे थे, तो हमने सोचा कि ऐसे समय का कत्ल करने वाले दोस्तों से पीछा छुड़ाना ज्यादा ठीक होगा, ठीक है थोड़ा सा अपना पारिवारिक समय का कत्ल होगा।

    पीछा छुड़ाने से यह फ़ायदा तो होगा जो वाकई में दोस्त हैं उनके दुख सुख में शामिल तो हो सकेंगे उनकी वर्तमान गतिविधियों को देख तो सकेंगे। कल इतने समय फ़ेसबुक पर शायद पहली बार मैंने वक्त गुजारा और देखा कि कुछ लोग तो केवल दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं और सार्वाधिक दोस्त बनाने की होड़ में लगे हैं। केवल अपने मन को तृप्त करने के लिये ?

    समय आ गया है कि थोड़ा अपने समय का कत्ल करके ऐसी चीजों से बचा जाये और बेहतरीन समय प्रबंधन कर परिवार को उचित समय दिया जा सके।

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 05, 2011 03:22 AM· permalink

सेक्‍युलर देशों में भी चर्च का हस्‍तक्षेप

  • इंग्‍लैण्‍ड  - इंग्‍लैण्‍ड के राजा/रानी का एंग्लीकेन चर्च का सदस्‍य होना अनिवार्य है। 24 बिशप व 2 आर्कविशप, संसद के उच्‍च सदन House of Lords के सदस्‍य मनोनित होते हैं। 
  • इटली   - वहाँ का संविधान कहता है कि "कैथोलिक मत के ईसाई तत्‍व ही सार्वजनिक शिक्षा की नींव और शिखर दोनों है" शिक्षकों और उपदेशकों को चर्च अधिकारियों की सम्‍मति लेनी पड़ती है, अन्‍यथा वे पद से बर्खास्‍त कर दिये जाते है। 
  • पुर्तगाल- शिक्षा चर्च के अधिकारियो की सम्‍मति से ही होनी अनिवार्य है।
  • कोलम्बिया - कैथोलिक मत के अतिरिक्त किसी भी अन्‍य को अपने पूजा घर से बाहर प्रचार की अनिमति नही है।
  • डेनमार्क - यहाँ का राष्‍ट्रीय चर्च लूथेरियन चर्च है। इसी चर्च को राज करने का अधिकार है और चर्च की सभी गति‍विधियों के लिये धन सरकार द्वारा दिया जाता है। 
  • नार्वे - राजा सदै लूथेरियन चर्च का अनुयायी होगा, आधे से अधिक मन्‍त्रियों का चयन चर्च करेगा। सभी विद्यालयो मे ईसाई मत की शिक्षा अनिवार्य है।
  • स्‍वीडन - ईसाईयों के अतिरिक्त अन्‍य मत के व्‍यक्तियों को अने बच्‍चों की शिक्षा के लिये विद्यालय चलाने पर प्रतिबन्‍ध है।
  • अमेरिका - वहाँ के न्‍यायालयों ने अमेरिका को ईसाई देश माना है। "अमेरिका के बहुसंख्‍यक लोगा ईसाई होने के कारण हमारे कानून और संस्‍थाएँ ईसा के उपदेशों से अनुप्राणित होनी चाहिए!" हमारी नीतियों का प्रारम्‍भ ईसाई मत द्वारा हुआ है। हमारी न्‍याय व्‍यवस्‍था की मूल चेतना वही है। सरकारी प्रशासन के पार्वभूमि में ईसाई मत है। कुल मिला कर ईसाई मत देश के कानून का हिस्‍सा है। - अमेरिकन चर्च लॉ0
 एक प्रश्‍न
आखिर क्‍यों जब भारत मे हिन्‍दू विधि विधान से नैतिक शिक्षा, योग शिक्षा, दीप प्रज्ज्‍वल, सरसवती वंदना अथवा वंदेमातरम् आदि से सेकुलर छवि कैसे भ्रष्‍ट हो जाती है?

Posted by महाशक्ति (pramendraps@gmail.com) on October 04, 2011 02:28 PM· permalink

अनुभूति का बोध ( क्षणिका)

सदियाँ गुजर जाती हैं अनुभूति का बोध उगने के लिए शताब्दियाँ गुजर जाती हैं अनुभूति को पगने के लिए अनुभूति मांगती है दिल की सच्चाई सच्चाई में तप कर खरा उतरना बहुत दुर्लभ प्रक्रिया है क्षण -क्षण बदलते मन के भाव अनुभूति की नींव बारम्बार हिला देते हैं | डा. रमा द्विवेदी © All Rights [...]

Posted by ramadwivedi on October 04, 2011 10:14 AM· permalink

मुरसलीन साकी की ग़ज़ल - ये दौरे सियासत है हर चीज बिकाऊ है ये सोच कर ही तूने दिल मेरा लिया होगा...

सब ने तेरी महफिल में मेरा नाम लिया होगा तूने भी तड़प कर दिल थम लिया होगा   कहती है मुझे मजनूं,दीवाना भी कहती है तूने भी तो जालिम कभी प्‍यार किया होगा   देखा था तुझे मैंने बेचैनी की हालत में उस वक्‍त तेरे दिल में मेरा दर्द रहा होगा   कहता है बेवफा आज जमाना मुझको इक बावफा को तूने ये नाम दिया होगा   ये दौरे सियासत है हर चीज बिकाऊ है ये सोच कर ही तूने दिल मेरा लिया होगा -- मुरसलीन साकी

>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 04, 2011 05:42 AM· permalink

बदलते हुए गरबे और डांडिया..

    घर के पास ही दुर्गापूजा का पांडाल लगा है, तो पहले ही दिन पूजा में हो आये, जाकर देखा तो इतना बड़ा पांडाल और इतनी सी मूर्ती, खैर अब मुंबई की आदतें इतनी जल्दी भी नहीं जायेंगी। गरबा और डांडिया का तो कहीं आस पास पता ही नहीं है और अगर है भी तो इतनी दूर वह भी रात १० बजे से शुरू होता है और पूरी तरह से व्यावसायिक, जहाँ गरबा के मैदान में जाने का टिकट है, वह भी ५०० रुपये से शुरु।

    पहले झाबुआ में थे तो वहाँ असली गरबे का रंग चढ़ा था, और जो गरबे वहाँ देखे और खेले थे वह गरबे और डांडिया बस यादें बनकर रह गये हैं। झाबुआ में लगभग हर कॉलोनी में गरबे डांडिया रास का आयोजन होता था, और सभी लोग गरबे में शिरकत किया करते थे। और कहीं पर भी किसी भी जगह डांडिया खेलने की आजादी होती थी, जरूरी नहीं होता था कि कोई शुल्क दिया जाये या वहीं के रहवासी हों।

    परंतु अब तो हर जगह गरबा डांडिया ने व्यावसायिक रूप ले लिया है, डांडिया दुर्गामाता की आराधना करने का ही एक स्वरूप माना जाता है, परंतु आराधना भी अब सामान्य वयक्ति के बस की बात नहीं रह गई है।

    आज भी अच्छॆ से याद है हमारे महाविद्यालय में कार्यालय में कार्यरत राठौड़ साहब इतना अच्छा गरबा गाते थे कि उनकी माँग दूर दूर तक होती थी, जैसे माँ का आशीर्वाद हो उनके ऊपर, उनका सबसे अच्छा गायन लगता था पारंपरिक गरबे पर “पंखिड़ा ओ पंखिड़ा “।

    आजकल पारंपरिक गरबे के गाने तो सुनने को मिलते ही नहीं हैं, आजकल फ़िल्मी गानों पर गरबा होता है। खैर पता नहीं कि झाबुआ में भी अब गरबे का स्वरूप व्यावसायिक हो गया हो, परंतु हाँ पुराने दिन तो याद आते ही हैं।

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 04, 2011 03:27 AM· permalink

क्वांटम टेलीपोर्टेशन: अत्यंत तेज गति के सुपरकंप्युटर की ओर एक कदम

प्रकृति को पूरी तरह से समझना अब तक मानव मन के बूते के बाहर रहा है। मानव ने अपने इतिहास मे प्रकृति के कई रहस्य खोजे, ढेर सारे प्रश्नो का उत्तर पा लिया लेकिन उतने ही नये अनसुलझे रहस्य सामने आते गये है। मानव आज अपनी मातृभूमि पृथ्वी की सीमाओं को लांघ कर चंद्रमा तक जा पहुंचा [...]

Posted by आशीष श्रीवास्तव on October 04, 2011 01:30 AM· permalink

एम एस ऑफ़िस 2010 हिंदी वर्तनी जाँच और गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच - कौन है बेहतर?

जैसा कि अपनी पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था, कि एम एस ऑफ़िस 2010 हिंदी वर्तनी जाँच और गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच में तुलना करेंगे, तो प्रस्तुत है एक त्वरित तुलना.

तुलना के लिए मैंने एक छोटी सी कविता की कुछ पंक्तियाँ लीं, और एमएस वर्ड 2010 हिंदी में चिपकाया और उसी को गूगल डॉक्स में भी चिपकाया.

पाया कि न तो कोई बीस है और न ही उन्नीस!

और, न तो कोई पास है, और न ही फेल!

दोनों के ही वर्तनी जाँच परिणाम आमतौर पर एक जैसे रहे, दोनों  में ही हिंदी के कुछ आम प्रचलित सही शब्दों को भी गलत समझ कर लाल रंग से रंग दिया गया.

हाथ कंगन को आरसी क्या? आपके लिए दोनों के स्क्नीनशॉट उपलब्ध हैं.-

गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच -

google docs hindi spell check result

 

एमएस वर्ड 2010 हिंदी वर्तनी जाँच

ms office 2010 hindi spell check

 

अब आप खुद ही तय करें कि एमएस ऑफ़िस 2010 का 11 सौ रुपए मूल्य का वर्तनी जाँच बेहतर है या मुफ़्त का गूगल डॉक्स हिंदी वर्तनी जाँच.


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 03, 2011 06:50 AM· permalink

भ्रष्टाचार की गंगा का मुहाना बंद करना होगा

पी. साईनाथ
अनुवाद: मनीष शांडिल्य

मनमोहनॉमिक्स के करीब 20 साल पूरे हो रहे हैं, अतः उस कोरस को याद करना बहुत वाजिब होगा, जिसका राग मुखर वर्ग पहले तो खूब गर्व से और फिर खुद को दिलासा देने के लिए अलापता रहा हैः 'आप चाहे जो भी कहें, हमारे पास डॉ मनमोहन सिंह के रूप में सबसे ईमानदार आदमी हैं. उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला जा सकता'. लेकिन ऐसा अब कम सुनने को मिलता है - ऐसे उद्गार अब ईमानदारी का झंडा बुलंद करनेवाले दूसरे चालबाजों की स्तुति में ज्यादा व्यक्त होते हैं. लेकिन बड़ी तादाद में लोग अब रोज यह कहते फिर रहे हैं : 'ईमानदार प्रधानमंत्री निर्विवाद रूप से हमारे इतिहास में अब तक के सबसे भ्रष्ट सरकार की मुखियागिरी कर रहे हैं.' और निश्चय ही इस कथन में कई सबक छुपे हुए हैं.

डॉ सिंह द्वारा संपादकों के साथ साप्ताहिक मुलाकात का फैसला हमें बताता है कि उन्होंने इन घोटालों से क्या सबक सीखा है. अब उन्हें यह लगने लगा है कि सरकार के लिए भ्रष्टाचार जन संपर्क से जुड़ा एक मामला है. हालांकि कुछ ऐसा ही मीडिया के साथ भी है, जो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजनेताओं पर लगातार भौंकता रहा लेकिन इस घोटाले के आरोपी प्रमुख कॉरपोरेट्‌स को बरी कर दिया. डॉ सिंह अक्सर मीडिया को 'अभियोक्ता, अभियोजक और न्यायाधीश' तीनों ही रूपों में एक साथ देखते हैं. (हो सकता है वो इस मामले में सही हों). इसके बावजूद वो प्रमुख संपादकों के साथ बैठकी लगाना चाहते हैं. तो क्या यह जन संपर्क से जुड़ा मामला भर है? या वह यह मानते हैं कि भारत के संपादकों के पास ही ऐसा कोई नुस्खा है, जो सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार (मीडिया के भ्रष्टाचार को छोड़कर) समाप्त कर देगा? मुझे पहले की उम्मीद है.

उनकी सरकार के घोटालों का हिसाब-किताब रखना जनगणना करने की कवायद जैसा है. एक बड़ी और जटिल गणना की तरह. कुछ ऐसे घोटाले हुए जिन्हें दफन कर दिया गया और लेकिन कुछ अभी भी ठंडे नही हुए हैं. आने वाले दिनों में और घोटालों का खुलासा होने वाला है. कुछ का पता चल चुका है, बस भंडाफोड़ बाकी है. साथ ही कई ऐसे हैं जिनपर मीडिया जान-बूझकर चुप्पी बरत रहा है. बहुतेरे के बारे में तथ्य जुटाये जा रहे हैं. हमारा वर्तमान केंद्रीय कैबिनेट संभवतः अब तक का सबसे धनवान मंत्रिमंडल है, जिनके सदस्यों के पास 500 करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति है. पहले के सभी पूर्ववर्ती मंत्रिमंडल सदस्यों की कुल संपत्ति को जोड़ दें तो  भी यह ज्यादा ही होगा.

जाहिर है भ्रष्टाचार के कई कारण हैं और हर किसी के पास इससे जुड़ी अपनी-अपनी पसंदीदा कहानी है. लेकिन तीन ऐसे मूल कारण हैं जिन्हें नजरअंदाज करने से कोई भी विश्लेषण निरर्थक रहेगा. पहला कारण है : भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताएं, जिसमें संपत्ति और सत्ता का बड़े पैमाने पर संकेंद्रण, वर्ग और जाति, लिंग और इनसे जुड़े दूसरे भेदभाव शामिल हैं.

दूसरा पहलू आर्थिक नीतियों का पूरा ढांचा है जिसने इन असमानताओं की खाई पैदा की एवं उसे और ज्यादा गहरा किया है, साथ ही इन्हें एक किस्म की वैधता भी प्रदान की है. पिछले 20 वर्षों में ऐसा तेजी से घटित हुआ है. उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि संविधान का मजाक उड़ाते हुए कॉरपोरेटों को नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है.

और तीसरा पहलू है न्यूनतम जवाबदेही के साथ हरेक तरह का अपराध कर बचने और स्वेच्छाचारिता की संस्कृति का पैर जमाना. ऐसा होना रसूखवालों को अपराध कर बच निकलने का कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही देता है. हद तो यह है कि एक राज्य का कोई जज सिर्फ इस कारण कार्यदिवसों पर सभी तरह की विरोध रैलियों पर रोक लगा देता है क्योंकि उसकी कार कोर्ट जाते वक्त एक रैली में फंस गयी थी. ऐसे निजाम में भांति-भांति के बाबा उस समय तक हरेक कर कानून को तोड़ सकते हैं जब तक कि वे सत्तारूढ़ शासन को चुनौती नहीं देते.

भ्रष्टाचार की गंगोत्री का मुहाना बंद किये बगैर, उससे निपटने की कोशिशें कुछ वैसी ही होंगी कि हम नल खुला छोड़ दें, उससे पानी भी बहता रहे और फर्श को सूखा रखने की कोशिशों में भी लगे रहें. ये स्रोत बहुत पुराने हैं. आज इन स्रोतों का दायरा, आकार और नुकसान नई-नई हदें तय कर रहे हैं.

बीते 20 वर्ष धन के अभूतपूर्व संकेंद्रण के साक्षी रहे हैं, इस धन को अक्सर गलत तरीके से आर्थिक नीति की आड़ में इकट्‌ठा किया गया है. राज्य की भूमिका कॉरपोरेट समृद्धि लाने वाले एक उपकरण मात्र की रह गयी है. वह निजी निवेश के लिए उचित माहौल उपलब्ध कराने भर के लिए रह गया है. प्रत्येक बजट कॉरपोरेट जगत के लिए (और आंशिक रूप से उसके द्वारा भी) तैयार किया जाता है. पिछले छह बजट में सिर्फ प्रत्यक्ष कॉरपोरेट आय कर, सीमा और उत्पाद शुल्क में छूट के रूप में कॉरपोरेट जगत को 21 लाख करोड़ रुपयों का उपहार दिया गया है. और इसी अवधि में खाद्य सब्सिडी और कृषि क्षेत्र को कटौती का सामना करना पड़ा है.
नव-उदारवादी आर्थिक ढांचे के अंतर्गत राज्य आम लोगों की कीमत पर कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए खाद-पानी मुहैया करता है. यही कारण है कि हम उस दौर में जी रहे हैं जहां सब कुछ का निजीकरण किया जा रहा है. कॉरपोरेट मुनाफे को और बढ़ाने के लिए जमीन, पानी, स्पेक्ट्रम जैसे सभी दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों को निजी हाथों में सौंप देना अब राज्य का मिशन बन गया है. यह प्रक्रिया और कुछ नहीं निजी क्षेत्र को उन्हीं को तरजीह देने वाले शर्तों के आधार पर राष्ट्र के संसाधनों को सौंपना है जो कि हमारे समय में भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है. घोटाले तो लक्षण मात्र हैं, रोग यह है कि भारतीय राज्य, नागरिकों की जगह कॉरपोरेट निगमों के हित साधता है.

चुनाव खर्च के बारे में चिंता करनेवालों को दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए. आज एक ऐसा वर्ग पैदा ले चुका है जिसके पास खर्च करने के लिए बहुत अधिक पैसा है, काली कमाई है. वो इतना पैसा उड़ाते हैं, जिसकी कल्पना तक 1947 में संभव नहीं थी. कई राज्यों में, आप करोड़पति हुए बिना चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते.

इस साल मई में चार राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश (और कडप्पा उपचुनाव) में निर्वाचित 825 विधायकों का उदाहरण लें. उनकी घोषित संपत्तियां देखें. हमें इन चुनावों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए नेशनल इलेक्शन वाच (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म -एडीआर) का शुक्रगुजार होना चाहिए. इन आंकड़ों का विश्लेषण करना एक मज़ेदार काम है.

एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि इन 825 विधायकों की घोषित संपत्ति का कुल मूल्य 2,128 करोड़ रुपयों के आसपास है. इनमें से 231 दूसरी बार विधायक बने हैं. 2006 से 2011 के बीच इन्होंने अपनी संपत्ति में 169 प्रतिशत की औसत वृद्धि की है. इसका मतलब यह है कि विधायक बनने के पहले इन्होंने जितनी संपत्ति अर्जित की थी, उससे भी अधिक 'वैध' संपत्ति इन्होंने बतौर विधायक अपने पहले पांच साल के दौरान इकट्‌ठी कर ली.

अब 825 भूमिहीन श्रमिक परिवारों के बारे में सोचें. हम उनकी 'संपत्ति' की तुलना विधायकों की संपत्ति से नहीं कर सकते क्योंकि इन भूमिहीन श्रमिक परिवारों के पास कुछ नहीं है और वो लगातार कर्ज में डूब रहे हैं. इसका हिसाब लगाना बहुत ही दिलचस्प होगा कि मनरेगा जैसी योजना के सहारे कमाते हुए उन्हें 825 विधायकों के बराबर संपत्ति बनाने में कितना वक्त लगेगा?

मनरेगा में मिलने वाले 100 दिन के काम के जरिये वो राष्ट्रीय औसत पर 12 हजार 6 सौ रुपये के आस-पास कमा सकते हैं. इस तरह 825 भूमिहीन परिवारों को 2128 करोड़ रुपये अर्जित करने में 2,000 साल से अधिक लगेंगे. और साथ ही इसके लिए उन्हें भोजन जैसी तुच्छ आदतें छोड़नी पड़ेंगी. अगर श्रमिक परिवारों की संख्या 10 हजार कर दी जाये तो इस जैकपॉट को पाने में 170 साल के करीब का समय लगेगा. यहां तक कि दस लाख घरों को भी ऐसा करने में एक साल से अधिक का ही समय लग जाएगा. (याद रखें कि उन 231 विधायकों ने 60 महीने में अपनी संपत्ति दोगुनी से भी अधिक कर ली.)

इन गहरी असमानताओं के बीच ऐसी कोई संभावना ही नहीं दिखाई देती कि मजदूर परिवारों के पास भी कभी किसी भी तरह की संपत्ति होगी, 2,128 करोड़ रुपयों का तो जिक्र करना ही बेकार है. वे कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे. और वे इन कर्जों के एवज में जो सूद भेरेंगे वो शायद उन विधायकों की तिजोरी में भी जमा होगा जो साहूकार भी हैं. इसके बावजूद उन विधायकों की संपत्ति कॉरपोरेट जगत की उस विशाल संपत्ति की तुलना में मामूली है जो राज्य के सहयोग से जमा की गयी है. एक ओर मनरेगा की कमाई के सहारे दस लाख मजदूर परिवारों को 3.5 लाख करोड़ जमा करने में 275 साल के आसपास लगेंगे और दूसरी ओर पिछले छह साल से लगातार सरकार हर साल इतनी ही राशि कॉरपोरेट सेक्टर को बतौर छूट बांट रही है.

और फिर यहां बस अपराध करने की छूट है, दण्ड का कोई प्रावधान नहीं. डॉ सिंह अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर कर सकते हैं, लेकिन क्या इससे बहुत कुछ बदल जाएगा? एक कृषि मंत्री हैं, जो क्रिकेट पर अधिक समय बिताते हैं और राष्ट्रीय जुनून को फूहड़ता के भद्दे, कारोबारी दलदल में बदलने में मददगार रहे हैं. कपड़ा मंत्री इस शासन की लड़खड़ाती दूसरी पारी में मैदान छोड़ने को मजबूर होने वाले सबसे हालिया 'बल्लेबाज' है. एक दूसरे भारी उद्योग मंत्री हैं जो साहूकारों को मदद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा शर्मिंदा किये जाने के तुरंत बाद ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में पदोन्नत कर दिये गये. अगर उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा भी दिया जाता है तो उनका विकल्प युवा होने के बावजूद हालात बदल नहीं पायेगा. ऐसे में क्या यह सिर्फ सुस्त प्रशासन या लचर नियमों से जुड़ा मामला भर है? नहीं, यह भ्रष्ट नीतियों से जुड़ा मामला है.

क्या आप आज के समय में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं? तो आप संरचनात्मक असमानता को ढाहने के लिए कदम बढ़ायें, जो नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों से उपजा रोग और जवाबदेही के बिना स्वेच्छाचारिता की संस्कृति है. क्या हमें एक लोकपाल की जरूरत है? हां. क्या यह सरकार से भी शक्तिशाली हो सकती है? संवैधानिक ढांचे से ऊपर और जवाबदेही के बिना? अगर हम ऐसा ही लोकपाल चाहते हैं तो हम मुसीबत मोल ले रहे हैं. क्या यह असमानता, आर्थिक नीति और स्वेच्छाचारिता पर काबू पा सकता है? नहीं, लोकपाल का वर्तमान स्वरूप ऐसा करने में सक्षम नहीं. यह समग्र रूप से आम लोगों और उनके संस्थानों के लिए एक बड़ी लड़ाई है. जैसा कि एक पुरानी कहावत है, आपके अधिकार उस प्रक्रिया जितने ही सुरक्षित होते हैं, जिसके द्वारा आप अपने अधिकारों को सुरक्षित रखते हैं.

इस समय देश भर में विस्थापन, जबरन भूमि अधिग्रहण, संसाधनों की लूट के खिलाफ और वन व अन्य अधिकारों की बहाली के लिए लड़ाई तेज हो रही है. ये 'स्थानीय' संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे बड़े पैमाने पर, यहां तक कि वैश्विक फलक पर भ्रष्टाचार को चुनौती देते हैं. वे असमानता और भेदभाव से लड़ रहे हैं. वे खुली छूट, लालच और मुनाफाखोरी का विरोध करते हैं. वे अपने शासकों को जवाबदेह बनाने की कोशिश करते हैं. इरोम शर्मिला जैसे कुछ लोग काले कानूनों की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरे कई केवल वन अधिकार कानून जैसे मौजूदा कानूनों को जमीन पर उतारने के लिए सड़क पर उतर चुके हैं. लेकिन इनमें से कोई भी खुद को राष्ट्र से ऊपर नहीं मानता. ये लोग यह घोषित नहीं करते कि वे कानून बनायेंगे जिसका दूसरों को पालन करना ही होगा. न ही इस पर जोर देते हैं कि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. फिर भी, वे अपने और हमारे अधिकारों के लिए लड़ते हैं और दमनकारी संरचनाओं को और अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं.
इस मामले में अतीत को थोड़ा भुला दिया जा रहा है. मगर एक भ्रष्ट व कमजोर सरकार और बेशक कांग्रेस पार्टी को सब कुछ अच्छी तरह से पता है. बमुश्किल 36 साल पहले, एक व्यक्ति ने खुद को सभी संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर रख लिया था- बिलकुल बेलगाम. यह याद करना वाकई दुखद है कि कितने संगठनों, मध्यमवर्गीय लोगों और यहां तक कि कुछ बुद्धिजीवियों ने उस व्यक्ति और उसके युग के पक्ष में बढ़-चढ़ कर जयकार लगाया था. उस व्यक्ति का नाम था संजय गांधी और उस युग को आपातकाल कहा जाता था.

बाकी सब इतिहास है.

दि हिंदू, 8 जुलाई, 2011 से साभार.

Posted by Reyaz-ul-haque (beingred@gmail.com) on October 03, 2011 06:03 AM· permalink

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की ग़ज़लें - तड़पा है मन प्यार के लिए ऐसे , जैसे बच्चे से कोई खिलौना ले ले।

(१) अब ना कोई मेरे ज़ज्बातों से खेले। शहर क़ातिलों का है यहाँ कैसे चले।   लोगों ने अपना कर ऐसे ठुकराया, जैसे कोई जलते अंगार को छू ले।   तड़पा है मन प्यार के लिए ऐसे , जैसे बच्चे से कोई खिलौना ले ले।   चारों तरफ भीड़ है कोलाहल है, और हसरतें अपनी रह गयी अकेले।   साथी न सही,अजनबी की तरह चलते, लोग तो ना कहते कि हम है अकेले।   (२) क्या कहूँ, तकदीर कितनी बेरुख़ी होती है। मिलते है जब दो दिल

>>> [यहाँ पर रचना की शुरूआती चंद पंक्तियाँ दी गई हैं. पूरी रचना पढ़ने के लिए रचना के शीर्षक में दिए गए लिंक पर क्लिक करें]


Posted by Raviratlami (raviratlami@gmail.com) on October 03, 2011 05:03 AM· permalink

निश्शब्द ही होकर खड़ा हूँ

क्योंकि लिखने के लिये अब शेष कुछ भी तो नहीं है
कोष में थे शब्द जितने, हो चुके हैं खर्च सारे
भावनाओं की धरा पर बूँद तो बरसें निरन्तर
किन्तु जितने बीज बोये, रह गये हैं सब कुँआरे
इसलिये मैं मौन प्रतिध्वनियाँ समेटे अंजुरी में
आपके आ सामने निश्शब्द ही होकर खड़ा हूँ
 
थे दिये बहती हवाओं ने मुझे पल पल, निमंत्रण
उंगलियाँ अपनी बढ़ाईं थाम कर उनको चलूँ मैं
एक जो सदियों पुरानी ओढ़ रक्खी है दुशाला
फ़ेंक कर उसको नया इक आवरण निज पर रखूँ मैं
 
किन्तु मुझको बाँध कर जो एक निष्ठा ने रखा है
मैं उसी के साथ चलने की लिये इक ज़िद अड़ा हूँ
 
मुस्कुराती गंध भेजी थी बुलाने को कली ने
छेड़ कर वंशी बुलाया था लहर ने गुनगुनाकर
बादलों के कर हिंडोले व्योम ने भी द्वार खोले
और मधुबन मोहता था घुंघरुओं को झनझनाकर
 
किन्तु मैं अपनी विरासत में मिली कोई धरोहर
को बना कर कील अपने आप में जमकर पड़ा हूँ
 
खींचती है आज भी अनजान सी डोरी कहीं से
बाँधने को आज फ़िर आतुर कोई है पांव मेरे
सांझ की धुलती गली में सुरमई छींटे उड़ाता
टेरता है कोई फिर उस पार के मेरे सवेरे
 
किन्तु में अभिव्यक्ति की असमर्थता की शाख पर से
भाव के निष्प्राण पत्तों की तरह फ़िर फ़िर झड़ा हूँ.

Posted by राकेश खंडेलवाल (noreply@blogger.com) on October 03, 2011 02:14 AM· permalink

Temporary post

What would the world be like without us

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 02, 2011 05:23 PM· permalink

ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है

ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है,
जैसे कोई रेल चलती जा रही है,

मन लगा है स्वयं से नज़रें चुराने,
रुक गया है प्लेटफोर्म पर पुराने,
तन का सिग्नल लाल करती जा रही है,

खेत नदिया ताल पोखर छूटते हैं,
पटरियों पर कितने पत्थर टूटते हैं,
काल की भी दाल गलती जा रही है,

इक भिखारी गीत गाने में लगा है,
एक मोटू लाल खाने में लगा है,
धूप है, बत्ती भी जलती जा रही है,

है थकन से चूर मंजिल पाएगी ही,
आएगी मंजिल, कभी तो आएगी ही,
मन में कोई आस पलती जा रही है,

ज़िन्दगी ऐसे गुज़रती जा रही है,
जैसे कोई रेल चलती जा रही है.

Posted by अभिनव (shukla_abhinav@yahoo.com) on October 02, 2011 02:23 PM· permalink

घर में बेटी की किलकारियां

घर में बेटी की किलकारियां,
घर में बेटी की किलकारियां.

जैसे सुबह जगी नींद में स्वप्न कोई सुहाना पले,
जैसे दुःख का अंधेरा ढले, मंदिरों में दिया सा जले,
मंदिरों में दिया सा जले,
बज उठीं श्याम की मुरलियां,
घर में बेटी की किलकारियां.

जैसे सागर की लहरों नें हो, तट के आंचल को आकर छुआ,
जैसे तारों भरी रात में, चांदनी नें पढ़ी हो दुआ,
चांदनी नें पढ़ी हो दुआ,
जैसे मोती भरी सीपियां,
घर में बेटी की किलकारियां.

जैसे भूले हुए गीत का, आ गया हो सिरा याद सा,
जैसे साहिर के शब्दों को पा, खिलता संगीत नौशाद का,
खिलता संगीत नौशाद का,
तितलियों की हैं अठखेलियां,
घर में बेटी की किलकारियां.

रेत के गाँव में जिस तरह, कोई नदिया कहानी कहे,
धुप को मुंह चिढ़ाती हुई, मंद शीतल पवन सी बहे,
मंद शीतल पवन सी बहे,
गीत, झूले, हरी डालियाँ,
घर में बेटी की किलकारियां.

जैस मीठे से संतूर पे, राग कोई मधुर सा बजे,
सात रंगों को संग में लिए, आसमां पे धनुष सा सजे,
आसमां पे धनुष सा सजे,
जैसे महकी सी फुलवारियां,
घर में बेटी की किलकारियां.

Posted by अभिनव (shukla_abhinav@yahoo.com) on October 02, 2011 02:21 PM· permalink

जिंदगी की अनमयस्कता से बाहर आने की कोशिश..

     आज बहुत दिनों बाद लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, पता नहीं परंतु ऐसा लग रहा था कि दिमाग के साथ साथ लेखन पर भी विराम लग चुका है। खैर अपनी अनमयस्कता से बाहर आ चुका हूँ और अब वापिस से पटरी पर आने की कोशिश जारी है। न कुछ पढ़ने का मन होता था न लिखने का, यूँ कहें कि कुछ करने का मन नहीं होता था तो ज्यादा ठीक होगा। न किसी से मिलने का, अगर मजबूरी में मिल भी लिये तो मन मारकर मिल लेते कि सामने वाले को बुरा न लगे। खैर जिंदगी में हर तरह के दौर आते हैं, जिसमें सभी तरह की घटनाएँ घटित होती रहती हैं।

    जब जिंदगी बेपटरी हो जाती है तो किसी की भूख मर जाती है और किसी को ज्यादा भूख लगती है, हम दूसरे तरह के निकले, इतनी भूख लगती कि जो सामने आता खा जाते। बस खाते रहो और अपने चिंतन की गहराई में गोते लगाते रहो। कभी ऐसा लगता कि मोटापा ज्यादा बढ़ता जा रहा है, परंतु कुछ अपने से ज्यादा मोटों को देखकर थोड़ी चिंता कम होती कि चलो अपने अभी इससे तो कम हैं। खैर यह तो मन को मनाने की बात है परंतु चिंता का विषय भी है, खैर अब दिनचर्या को ठीक करने का प्रयत्न जारी है।

    इसी बीच एक अच्छी और ठीक ठाक खबर यह रही कि एक और बीमा लिया तो उन्होंने पूरे शरीर की जाँच करवाई तो अपने शरीर के सारे पुर्जे बराबर पाये गये और उसमें हमें उत्तीर्ण कर दिया गया। खासकर टीमटी में तो दौड़ाकर और चलाकर और फ़िर हृदय को आराम मिलने तक जो प्रक्रिया रही तो हृदय की पूरी जाँच हो गई।

    अब फ़िर से लेखन में नियमितता आ पायेगी, ऐसी उम्मीद है, इसी बीच बहुत सारे वित्तीय लेख पढे और बहुत सारे वित्तीय विषयों और प्रबंधन विषयों पर विश्लेषण भी किया अगर वे या कुछ मेरे शब्दों में ढ़ल पाये तो जल्दी ही पोस्ट ठेलायमान होगी।

    लेपटॉप पर विन्डोज का हिन्दी सुविधा भी चालू कर ली है, परंतु उसका कीबोर्ड रेमिंग्टन है, क्या हम उसे फ़ोनोटिक में उपयोग कर सकते हैं ? अगर कोई यह बता दे तो अपना एक माह का समय रेमिंग्टन सीखने से बच जायेगा।

    अब यह संकल्प भी लिया है कि हर महीने कम से कम एक पुस्तक तो पढ़नी ही है, और अपने मोबाईल पर पीडीएफ़ पढ़ने में थोड़ी तकलीफ़ होती है तो अमेजन किंडल फ़ायर लेने की आग मन में लगी हुई है परंतु अब सोचा जा रहा है कि भौतिक रूप से किताबों को ही पढ़ा जाये और अपनी अलमारी को ही भरा जाये।

Posted by Vivek Rastogi (rastogi.v@gmail.com) on October 02, 2011 01:28 PM· permalink

भारत में मुर्दे बोलने लगे हैं: अरुंधति राय

भारत में मुर्दे बोलने लगे हैं
  • अरुंधति राय, अनुवाद: रेयाज उल हक
कश्मीर भारत के दो युद्ध क्षेत्रों में से एक है, जहां से कोई खबर बाहर नहीं निकल सकती. लेकिन गुमनाम कब्रों में दबी लाशें खामोश नहीं रहेंगी

23 सितंबर की सुबह 3 बजे दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचने के कुछ ही घंटों के भीतर अमेरिकी रेडियो पत्रकार डेविड बार्सामियन को वापस भेज दिया गया. पब्लिक रेडियो पर प्रसारण के लिए स्वतंत्र रूप से मुफ्त कार्यक्रम बनाने वाला यह खतरनाक आदमी चालीस वर्षों से भारत आता रहा है और उर्दू सीखने और सितार बजाने जैसे खतरनाक काम कर रहा है.
 
बार्सामियन की एडवर्ड सईद, नोम चोम्स्की, हॉवर्ड जिन, एजाज अहमद और तारिक अली के साथ इंटरव्यू की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं (वे जब नौजवान थे तो चोम्स्की और एडवर्ड हर्मेन की किताब मैन्यूफैक्चरिंग कन्सेंट पर पीटर विंटॉनिक की डॉक्यूमेंटरी फिल्म में बेल-बॉटम पहने हुए एक साक्षात्कारकर्ता के रूप में दिखे थे).
 
भारत के अपने हालिया दौरों के दौरान उन्होंने कार्यकर्ताओं, अकादमिशियनों, फिल्म निर्माताओं, पत्रकारों और लेखकों (जिनमें मैं भी शामिल हूं) से रेडियो इंटरव्यू की शृंखला पर काम किया है. बार्सामियन का काम उनको तुर्की, ईरान, सीरिया, लेबनान और पाकिस्तान ले गया है. वे इनमें से किसी भी देश से वापस नहीं लौटाए गए हैं. तो आखिर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस अकेले, सितार बजाने वाले, उर्दू बोलने वाले, वाम रुझान वाले रेडियो कार्यक्रम निर्माता से इतना डर क्यों गया? बार्सामियन खुद इसका खुलासा इस तरह करते हैं:
‘इसकी वजह कश्मीर है. मैंने झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, नर्मदा बांध, किसानों की आत्महत्याओं, गुजरात जनसंहार और विनायक सेन के मुकदमे पर काम किया है. लेकिन यह कश्मीर है जो भारतीय राज्य की चिंताओं के केंद्र में है. इस मुद्दे पर सरकारी कहानी को चुनौती नहीं दी जा सकती.’

उनको लौटा देने के बारे में आयी खबरों में आधिकारिक ‘स्रोतों’ का हवाला दिया गया था, जिनका कहना था कि बार्सामियन ने ‘2009-10 के अपने दौरे के दौरान वीजा नियमों का उल्लंघन करते हुए पेशेवर रूप से काम किया था, जबकि उनके पास पर्यटक वीसा था.’ भारत में वीजा नियमों के जरिए सरकार की चिंताओं और पूर्वाग्रहों का अंदाजा लगाया जा सकता है. ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ के फटे हुए पुराने बैनर का इस्तेमाल करते हुए गृह मंत्रालय ने आदेश जारी किया है कि सम्मेलनों में बुलाए गए विद्वानों और अकादमीशियनों को वीजा जारी करने से पहले सुरक्षा क्लियरेंस जरूरी है. इस क्लियरेंस की जरूरत कॉरपोरेट एक्जीक्यूटिवों और बिजनेसमैनों को नहीं होगी.
 
तो जो आदमी बांध निर्माण में निवेश करना चाहता है, या एक स्टील प्लांट बनाना चाहता है या एक बॉक्साइट की खान खरीदना चाहता है वह सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जाता. लेकिन एक विद्वान जो शायद विस्थापन या सांप्रदायिकता या इस वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते कुपोषण के बारे में एक सेमिनार में हिस्सा लेना चाहता है, वह सुरक्षा के लिए खतरा है. बुरे इरादों वाले आतंकवादियों ने शायद यह अंदाजा लगा लिया होगा कि किसी सेमिनार में हिस्सा लेने की तरकीब अपनाने के बजाय कामकाजी पोशाक में सज-धज कर कोई खान खरीदने का नाटक करना ज्यादा कारगर होगा.
 
डेविड बार्सामियन कोई खान खरीदने या किसी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत नहीं आए थे. वे बस लोगों से बातें करने आए थे. ‘आधिकारिक सूत्रों’ के मुताबिक उनके खिलाफ जो शिकायत की गई है, वह यह है कि भारत के अपने पिछले दौरे के दौरान उन्होंने जम्मू और कश्मीर की घटनाओं के बारे में रिपोर्टिंग की थी और वह रिपोर्टिंग ‘तथ्यों पर आधारित नहीं थी’. याद रखें कि बार्सामियन रिपोर्टर नहीं हैं. वे लोगों से बातें करने वाले आदमी हैं. वे अधिकतर असहमत लोगों से उस समाज के बारे में बातचीत करते हैं, जिनमें वो लोग रहते हैं.
 
क्या पर्यटक जिस देश में जाते हैं, वहां के लोगों से बातें करना गैर कानूनी है? क्या यह मेरे लिए गैर कानूनी होगा कि मैं अमेरिका या यूरोप जाऊं और वहां मिले लोगों के बारे में लिखूं? भले ही मेरा लेखन ‘तथ्यों पर आधारित नहीं हो?’ कौन तय करेगा कि कौन ‘तथ्य’ सही है और कौन नहीं? क्या बार्सामियन तब भी लौटा दिए जाते अगर उन्होंने दुनिया के सबसे सघन फौजी कब्जे में (कश्मीर में अंदाजन एक करोड़ की आबादी पर छह लाख सक्रिय फौजी जवान तैनात हैं) रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में बातचीत रिकॉर्ड करने के बजाय कश्मीर चुनावों में भारी मतदान की तारीफ करने वाली बातचीत रिकॉर्ड की होती?
 
डेविड बार्सामियन पहले आदमी नहीं हैं, जिन्हें कश्मीर की संवेदनशीलता के नाम पर भारत सरकार ने वापस लौटा दिया है. सान फ्रांसिस्को के एक नृतत्वशास्त्री प्रोफेसर रिचर्ड शापिरो नवंबर, 2010 में दिल्ली हवाई अड्डे से बिना कोई वजह बताए वापस लौटा दिए गए थे. शायद यह उनकी सहयोगी अंगना चटर्जी पर दबाव डालने का एक तरीका था. अंगना इंटरनेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल ऑन ह्युमन राइट्स एंड जस्टिस की सह-संयोजक है, जिसने सबसे पहले कश्मीर के गुमनाम सामूहिक कब्रों की मौजूदगी को दर्ज किया था.
 
सितंबर, 2011 में मनीला स्थित एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉल्यूंटरी डिसएपियरेंस (अफाद) के मायो आकिनो को दिल्ली हवाई अड्डे से वापस लौटा दिया गया. इस साल के शुरू में 28 मई को एक मुखर भारतीय जनवादी अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को श्रीनगर हवाई अड्डे से दिल्ली लौटा दिया गया था. कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने उनको लौटा देने को जायज ठहराते हुए कहा था कि नवलखा और मुझ जैसे लेखकों को कश्मीर के मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ‘कश्मीर जलने के लिए नहीं है.’
 
कश्मीर को सारी चीजों से काटा जा रहा है. उसे दो सीमाओं पर सख्त गश्ती के जरिए बाहर की बाकी दुनिया से काटा जा रहा है. ये सीमाएं हैं दिल्ली और श्रीनगर. मानों कश्मीर आजाद हो चुका हो और जिसके पास वीजा देने की अपनी अलग व्यवस्था हो. इसकी सीमा के भीतर सरकार और फौज के लिए शिकार का अनवरत सिलसिला चलता रहता है. कश्मीरी पत्रकारों और आम लोगों को काबू में करने की कला के तहत रिश्वत, धमकियां, ब्लैकमेल और बयान न की जा सकने वाली क्रूरता की मदद