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Posted on October 09, 2008 11:28 AM · permalink
Posted on October 09, 2008 11:28 AM · permalink
हाल ही में विदेश से लौटा हूं। स्तब्धनुमा खुमारी में उत्साहित हूं। अभी फिजूल की बातें सुनने का टाइम नहीं है। अच्छा भाई साहब एक बात तो बताइए कि क्या आप भी कभी विदेश गए हैं? नाराज मत होइए, गए होंगे। ऐसा है कि मैं तो पहली ही बार गया था, इसलिए तो ज्यादा ही उत्साहित हूं। इसलिए पूछ डाला। खैर, आप भी इसी तरह से उत्साहित होंगे, जब पहली बार वहां से लौटे होंगे। स्तब्धनुमा खुमारी का तो ऐसा है कि वहां का डिस्प्लिन, जज्बात, देशभक्त आदि-आदि देखकर मेरे पेट में मरोड़ उठने लगे, आंखें तक भर-भर आईं। कसम से क्या गजब की देशभक्त होते हैं। आप ने देखे तो होंगे ही वहां, सच्ची बोलिओ गए थे कि नहीं? वो क्या है कि हम भी आम देशवासियों टाइप किसी के अब्राड आदि जाने की बात पर आसानी से कम ही यकीन करते हैं। नहीं आप बोल रहे हो तो गए तो होगे ही। यार क्या सडकें हैं... क्या बिल्डिंगें हैं.... कितनी प्यारी-प्यारी कारें हैं.... कितने सुंदर-सुंदर तो लोग हैं...गंदगी का कहीं नामोनिशान नहीं। सड़कों पर कचरा कहीं मिलता तक नहीं। देश को साफ सुथरा रखने के प्रति कितने कांशस रहते हैं विदेशी सोच-सोच के ही मुझे तो चक्कर आने लगते हैं।
कुछ तो इतने सफाई प्रेमी रहते हैं कि गंदगी करने से पहले ही उसे साफ करने की जुगत में चिंतित रहते हैं। यकीन नहीं आ रहा होगा, आएगा भी कैसे कभी गए हो..... मान लिया गए होगे। एक बार मैंने एक अंग्रेज को डस्टबिन के पास खड़े देखा, काफी देर तक जब वो वहां से नहीं हिला तो मैंने पूछा कि भाई साहब क्या बात है। उसने जो कहा उसे सुनकर अपना देश होता तो कोई उसे डस्टबिन में ही डालकर केरोसिन छिड़क देता। कह रहा था कि उसका दोस्त अभी कुछ केले लेकर आने वाला है इसी कारण वह यहां खड़ा है ताकि खाकर छिलके डस्टबिन में फेंक सके। क्यों? ताकि सड़क पर कहीं गंदगी न रहे। फुरसतिया कहीं का। आप करेंगे ऐसा? क्या कहा-हां करेंगे... आपकी इतनी मजाल... अपने देश को लजाओगे क्या? ... आप कम से कम भारतवासी तो नहीं हो सकते। मैं मान ही नहीं सकता। क्या कोई अपने देशवासी भाई को ऐसा ‘गंदा’ जवाब देता है भला?
अच्छा एक किस्सा सुनो- एक बार एक किसी मोहल्ले में सफाई करता दिखा। मालूमात करने पर पता चला कि वह तो बिचारे किसी कंपनी के सीनियर ऑफिसर हैं। जब कभी टाइम मिलता है तो मोहल्ले की सफाई में जुट जाते हैं। ताकि कचरे का ढेर न लग जाए। अब लो ऐसे-ऐसे सनकी भरे पड़े हैं विदेश में कि पूछो मत। हम क्या इतने फोकट हैं कि ऑफिस जाना छोड़कर ऐसे निकृष्ट से कामों में भिड़े रहें। वहां भले ही काम न हो लेकिन कार्यालयीन समय का ऐसा घोर अपव्यय कदापि नहीं करेंगे। एक सुबह से पूरी स्ट्रीट के लोगों को एक नाली की सफाई में लिप्त पाया। कैसे ठरकी मोहल्ला है, मैंने तत्काल सोच लिया था कि यहां अपने दोस्त के घर रहना ही नहीं है। ऐसी फालतू की चीजें देख-देखकर आदतें खराब होने का डर था भाई। इसलिए मैं वहां से खिसक लिया था। अरे, हमारी वो बजबजाती नालियों की बात ही कुछ और है, विदेशियों ने देखी ही नहीं हैं वे शानदार नाले-नालियां। क्या तो गंदगी- राष्ट्रीय एकता के जीवंत स्मारक हैं जीवंत स्मारक। सौहार्द से सराबोर। समरसता से ओतप्रोत। विशाल खुली बांहें जो चाहे आसरा ले ले। क्या तो जानवर, क्या तो शराबी,क्या तो सन्यासी। सब का समान भाव से स्वागत। ऐसा उत्साह। इतनी उद्दात भावना। ठेठ गांव से धुर शहरों तक। महक का आलम ये कि 50-50 कोस तक ख्याति की लहरें पहुंचे। नाक पर चाहे कितना भी रूमाल लगा लो सब बेअसर। खुले आम सुबह की कुछ मुर्गेनुमा बैठकर की जाने वाली क्रियाओं के लिए भी सर्वथा अनुकूल। कहीं होती है इतनी सस्ती भोर संगोष्ठी, बड़ी-बड़ी समस्याओं का हल इसी संगोष्ठी से निकला है। हालांकि ये बात इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है लेकिन आम आदमी से पूछकर देख लो, बता देगा।
और ये यहां विरासत के ऐसे प्रतिमानों को नष्ट करने पर तुले हैं, कृतघ्न कहीं के। इनके यहां होती नहीं हैं ये चीजें तो हमारे यहां कि ऐसी चीजों को लेकर नाक-भ सिकोड़ते फिरते हैं। देश गंदा है। ‘है तो है, तुम कर लो।’ बस दूसरे देशों की गंदगी में ही दिलचस्पी, वहां का कूड़ा ही दिखता है इन्हें, गर्दे पर ही नजर रहती है। मुझे नहीं जमते भइया ऐसे लोग। तभी तो नाली को साफ करते देखकर मेरा तो खून खौल गया। बस चलता तो सालों को वहीं नाली में ही ढकेल देता। विदेश का मामला था अपन ने भी सोचा दोस्त किसी लफड़े में पड जाएगा। नहीं तो सच्ची में ढकेल ही देता फिर कोई कुछ भी कर लेता, नौटंकी अपन को बर्दाश्त ही नहीं। लेकिन एक बात तो है काम ईमानदारी से करते हैं पट्ठे, साले सारे के सारे जुट जाते हैं। ज्यादा न-नुकर नहीं करते। हमारे यहां तो ऐसे कामों के लिए एक को खोजने जाओ तो सारा दिन मनाते रहो फिर इकट्ठे भी हों तो आपस में ही इतनी किच-किच कि इससे तो अच्छा साली नाली ही गंदी पड़ी रहे। सो पड़ी ही रहती है। हालांकि इसके पीछे हमारा स्वाभाविक धरोहरों को संजोने का प्रेम है, और नहीं तो क्या? तभी तो हमने वर्षों की मेहनत से इन नाले-नालियों में इतिहास-पुरातत्व की कई लेयर जमा कर ली हैं।
कभी सदियों में खुदाई हो तो आश्चर्य नहीं कि को छोटी-मोटी सभ्यता इन्हीं के किनारे निकल आए। नालीघाट जैसी महान धरोहर को संजो कर रखने वाली विकसित सभ्यता। खैर, मैं बात कर रहा था कि विदेश में ऐसा नहीं होता। एक बार कुछ लोग दिखे एक जगह मूर्ति बने खडे थे, टस से मस नहीं हो रहे थे। पास गया तो पता चला राष्ट्रगान बज रहा था। सब वहीं पर जमे हुए थे सीना ताने-सिर ऊपर उठाए। अब लो बताओ कैसे लोग हैं सांस तो ले लो भइया कहीं शहीद ही ना हो जाओ। ऐसे दिखावे के चक्कर में। हमें देखो ऐसे चक्करों में बिलकुल नहीं पड़ते। राष्ट्रगीत बजे या गान पड़े हैं तो पड़े हैं। काहै का दिखावा दिल में है तो देशभक्त का सैलाब। जब कहोगे रेडीमेड निकाल कर दिखा देंगे। क्या खड़े होने भर से साबित हो जाएगी देशभक्त। इन विदेशियों के तरीके इन्हीं मामलों में तो खिसकेले हैं, सारा जोर दिखावे में दिल से कुछ नहीं, भावनाएं भाड़ में जाएं, दिखावा होना चाहिए। करते रहो दिखावा। मैं तो सालों को बस के आगे धकेल देता। काफी लोग थे तो इसलिए तो बस रहने ही दिया।
फिर एक दिन टीवी देख रहा था। कहीं बाहर का कोई नेता इनके पार्लियामेंट में गलाफाड़ रहा था। फ्रेंच में अपना भाषण ठोंक रहा था। सबके खोपड़े में हैडफोन। मुझे तो सुनते-सुनते ही बेहोशी छाने लगी। कहां हमारे नेता हैं। देश से बाहर जाते ही तहजीब का ख्याल रखते हैं, मेजबानी को आदर देते हैं, सामने वालों को परेशानी न हो, इसलिए दनादन अंग्रेजी में बोलते हैं। इस मामले इतने अनुरागी जीव हैं कि जिस देश में जाएं, वहां की भाषा में बोलने को तैयार हैं, वो तो वहां की भाषा न सीख पाने की मजबूरी है। अन्यथा तो किसी गैर देशवासी के कष्ट से हम तत्काल ही द्रवित हो जाते हैं। एक ये हैं विदेश में आकर भी मातृभाषा में भाषण भांज रहे हैं। देखते नहीं लोगों को कितनी परेशानी हो रही होगी। होए तो होए इन्हें क्या? ये तो अपना मातृभाषा प्रेम ही दिखाते रहेंगे। दिखावटी कहीं के। एक बार एक स्ट्रीट पर जा रहा था। देखा एक भिखारीनुमा आदमी सड़क पर हैट रखकर वायलिन पर अंगुलियां घसीटे ही जा रहा है, लोग उसके हैट में नोट डाल रहे हैं। देखते ही अपने ने भांप लिया बच्चू लोगों को ब्लैक मेल करके पैसे ऐंठ रहा हैं कि डालो हैट में नोट नहीं तो ऐसे ही भयानक वायलिन बजा-बजा के कान फोड डालूंगा। एक हमारे यहां के हैं, शालीन नफासत भरे अंदाज वाले, भिखारीपन की ठसक लिए। काहै का गाना-बजाना। भिखारी हैं तो काम किस बात का और डराना ही होगा तो वायलिन या संगीत से डराएंगे क्या?, वैसई न छीन लेंगे नोट।
इसलिए तो मुझे कई बार लगता है साले स्ट्रीट पर भी डिजाइनर भिखारी खड़े कर देते हैं। ताकि बाहर से आने वालों पर इम्प्रैशन पड़े कि देख लो हमारे भिखारी तक कमा के खाने की भावना रखते हैं। अबे, सोचते ही नहीं कमाने खाने का जज्बा रखते तो भिखारी बनते क्या? नकली नहीं लगते ये लोग आपको, देखो मना मत करिओ नहीं तो फिर मानूंगा ही नहीं कि कभी विदेश गए थे। हां, क्या कहा- लगते हैं। गुरु, पैंतरे बदलू, पक्के देशवासी ही हो। अच्छा एक तो इतना तो ये बैकग्राउंड में नकलीपन भरे हैं ऊपर से बातें सुनो पट्ठों की नकली-नकली सी। यू नो माई कंट्री... माई नेशन...टाइप की। अबे, हमारा भी कंट्री, हमारा भी नेशन है। हम कभी गाते दिखते हैं क्या? ये क्या कि बात-बात पर प्राउड करने लगो। प्राउडी लोग अपने को पसंद ही नहीं इसलिए अपने देश की गर्व से बातें करते ही नहीं हैं कि पता नहीं भइया सामने वाला देश के बारे में क्या सोचने लगें। इसलिए तो देश के बारे में सारी अच्छी-अच्छी बातों को किताबों में ही रखते हैं। बोलते है क्या? ज्यादा जानना है तो किताबों में पढ़ लो। लोगों से पूछोगे तो बेचारे सीधे सहज लोग, घमंड का नमोनिशान नहीं। संकोच के मारे क्या अच्छा बता पाएंगे देश के बारे में, ज्यादा जोर दोगे तो आपका सम्मान रखने के लिए यहां कि बुराई और शुरू कर देंगे। इतनी सादगी कहीं मिलती है भला। सीधे-सादे, भोले-भाले, घमंड रहित लोगों का देश है।
दूसरे लोगों-देशों के प्रति इतना प्रेम रखते हैं कि अपने देश की तारीफ करना ही भूल जाते हैं। सहज हैं ना। ऐसा नहीं है कि ये जेनरेशन ही इतनी विनम्र है। हमारी तो पिछली कई जेनरेशनों में ऐसी विनम्रता कूटकूट कर भरी है। ऐसा विनय से लबालब लोगों का देश देखा है कहीं? जो अपने व्यक्तिगत गुणों को सर्वोपरि मानें। घमंड के समूल नाश के लिए सबकुछ दांव पर लगा दें, देश तक। यूं ही नहीं दुगुर्णों से मुक्ति पाई जाती है। अच्छी-अच्छी चीजों की कुर्बानी देनी पड़ती है। भारी प्रयास करना होता है। क्या तारीफ करूं अपने देशवासियों की। यहां तो देश के लिए सम्मान की भावना तक नहीं है। ये क्या कि देश का झंडा तक लपेटे फिर रहे हैं। क्यों भाई? ऐसा क्या सम्मान कि झंडा तक पहन लिया ऊपर से अंदर तक। हमें देखो झंडा छूने देते हैं किसी को, ससम्मान चढ़ाया-उतारा फिर लपेट कर रख दिया। वर्षों तक तो हम उसे गोपनीय वस्तु की तरह सरकारी तौर पर सहेजकर रखे रहे। अब जाकर कुछ फहराने-वहराने की छूट दी है। तो भी दस नियम पंद्रह कायदे साथ में बता दिए हैं। वो तो हम जरा नियम-कायदों का लिहाज कर जाते हैं अन्यथा तो हमारा राष्ट्रप्रेम इतना उत्कृष्ट कोटि का है कि एक बार झंडा फहराएं तो वर्षों तक यूं ही लहराने दें।
ऐसे ही मुझे इनकी युवा पीढ़ी पर बड़ी कोफ्त होती है। देश-दुनिया की कोई जानकारी ही नहीं। वैरी पुअर जनरल नॉलेज। एक हमारे बच्चे हैं, अमेरिका के बारे में पूछ लो टप्प से बता देंगे। इतनी इंफॉर्मेशन रखते हैं जैसे हायर सेकंडरी वहीं से किया हो। मेहनती है हमारी युवा पीढ़ी । वीजा जैसी कंपलीकेटेड चीज के बारे में पूछ लो-एच-1,पी-1 कोई सा भी वन-ट-थ्री हो सभी की मुकम्मल मालूमात। पूरा टेलेंड अमेरिका को विकसित करने में लगा देंगे। यू नो वही वसुधैव कुटुंबकम् की भावना। फिर देश का भी ध्यान रखते हैं। विदेश संभालेंगे हम और देश को गंजले,संजले मंझले भैइया, इतने सारे तो हैं कोई भी संभाल लेगा ही। विदेश जाकर भी इतनी चिंता है देश की , कहीं देखे हैं ऐसे लोग। ऐसे ही नहीं सूचना और तकनीक में विश्व में भारतीय छाए हुए हैं। इतनी तेजी से तरक्की कर रहे हैं भैइया कि मुझे तो डर लगता है कि आने वाले समय में कहीं नई जेनरेशन को देशभक्ति के मायने भी देशभक्ति डॉट कॉम में ही नहीं समझाना पड़े। आज ही संभलियो भिया।
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संपर्क:
अनुज खरे
सी-175
मॉडल टाउन
जयपुर
मो.- 9829288739
Posted by Raviratlami (noreply@blogger.com) on October 09, 2008 06:10 AM · permalink
Posted by vinay k joshi (vinaykjoshi4@gmail.com) on October 09, 2008 05:31 AM · permalink
Posted by Udan Tashtari (noreply@blogger.com) on October 09, 2008 12:59 AM · permalink
Posted by RC Mishra (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 08:51 PM · permalink
Posted by ओम आर्य (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 06:49 PM · permalink
Posted by ramadwivedi on October 08, 2008 05:16 PM · permalink
Posted on October 08, 2008 11:28 AM · permalink
Posted on October 08, 2008 11:28 AM · permalink
Posted on October 08, 2008 11:28 AM · permalink
Posted on October 08, 2008 11:28 AM · permalink
इन दिनों धूप में चौंध तो है लेकिन किरनों की नोकें मुलायम पड़ने लगी हैं। दोपहर में बरछी की तरह लगे तो शाम को सहलाती भी है। ओह, ओस पड़ने लगी है। कितने दिन हुए उसे सुबह-सुबह देखे। बचपन मे उसे शीशी में भरते थे। किसी घास या फूल पर ताजा, हैरत से ताकती एक आंख जिसमें सारी कायनात झिलमिलाती है। लेकिन ओस हमारी जिंदगी से जा रही है और उसकी खाली जगह को भरने के लिए स्प्रे, टिशू पेपर, फेंगशुई और केमिकल से बनी ढेर सारी टायलेट्रीज आ रही है, जिनके बारे में बला की खूबसूरत और जरा सलीके की बेहया मॉडलों का दावा है कि ये चीजें हमें ताजगी और अहसास देती हैं। लाहौल बिला... और मुझ पर माजी का नजला गिरे, मैं फिर मीनमेख निकालने में जुट गई।गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम। मया त्वयि हतेत्रैव गर्जिष्यांत्याशु देवताह।।काश देवी का नेजा अबके बरस इस मर्दाना पाखंड के अजदहे महिषासुर पर गिरे। आमीन।
Posted by नीलोफर (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 10:16 AM · permalink
Posted by भूपेन्द्र राघव । Bhupendra Raghav (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 09:29 AM · permalink
Posted by kavi kulwant (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 08:56 AM · permalink
नेट की दुनिया पर अगर आपका वजूद है, तो यकीनन आपका कोई न कोई एक ब्लॉग होगा. लिनुस टॉरवाल्ड्स का भी होगा? अब तक तो नहीं था, मगर, लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के सृजक, लिनुस टॉरवाल्ड्स भी अंतत: पिछले हफ़्ते से ब्लॉग लेखन में कूद पड़े. और वे नक़ली स्टीव जॉब्स की तरह नक़ली नहीं हैं, पूरे असली हैं.
उनका ब्लॉग – लिनुस का ब्लॉग सादा जीवन उच्च विचार को इंगित करता है. ब्लॉगर प्लेटफ़ॉर्म पर एकदम सादे, सरल टैम्प्लेट पर बिना किसी साज सज्जा के है उनका ब्लॉग. और उन्होंने अपने इस पोस्ट में एक सतर्क पिता के रूप में अपने बच्चों को इंटरनेट के उचित उपयोग संबंधी विचार लिखे हैं.
अब आप वहां आई टिप्पणियों का आनंद लें – लोग बाग़ लिनुस को सीख दे रहे हैं पट्टी पढ़ा रहे हैं कुछ इस तरह:
एक ने टिप्पणी लिखी – आपने ब्लॉगर का प्रयोग क्यों किया? वर्डप्रेस क्यों नहीं? वर्डप्रेस तो मुफ़्त उपलब्ध, ओपन सोर्स ब्लॉग अनुप्रयोग है, जबकि ब्लॉगर का प्रयोग सिर्फ गूगल के सर्वरों पर ही किया जा सकता है.
एक का कहना था – आप सादा सरल ब्लॉगर का प्रयोग ब्लॉग के लिए क्यों कर रहे हैं? आपको तो गिट (git) का प्रयोग करना था – वो ज्यादा गीकी होता!
एक दूसरे बंधु लिनुस को सलाह देने लगे – आप अपने फोटो इंटरनेट पर टांगने के लिए फ्लिकर या पिकासा का प्रयोग कर सकते हैं.
अगली टिप्पणी है – आपने ब्लॉगर का प्रयोग ब्लॉग लेखन के लिए क्यों किया? आपको तो अपना स्वयं का डोमेन लेकर वर्डप्रेस इत्यादि (या गिट के प्रयोग से) के जरिए ब्लॉग लिखना चाहिए.
एक और टिप्पणी है – आपने ब्लॉगर का चुनाव रेंडमली कर लिया या देख-परख कर किया? यदि आप इसबारे में बताएंगे तो बढ़िया स्टोरी बनेगी.
संबंधित आलेख:
लिनुस टॉरवाल्ड्स से साक्षात्कार (हिन्दी में)
लिनुस टॉरवाल्ड्स ने ब्लॉग लिखना क्यों शुरू किया (साक्षात्कार अंग्रेज़ी में)
लिनुस टॉरवाल्ड्स फैक्ट शीट (अंग्रेज़ी में)
चित्र : साभार – लिनुस टॉरवाल्ड्स फैक्ट शीट
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tag – linus torwalds blog, linus’ blog
Posted by Raviratlami (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 08:08 AM · permalink
ईश्वर, सत्ता और कविताहालांकि मोहल्ला पर ईश्वर और कविता पर बहस धीमी पड़ गयी है, और उसको सांप्रदायिकता और आतंकवाद पर बहस ने हाशिये पर ढकेल दिया है, पर मुझे लगता है कि अगर आप आस्था, समाज और सत्ता को लेकर एक स्पष्ट अवधारणा नहीं रखते हैं, तो सारी बहस बेमानी है। हिंदी के प्रखर आलोचक रघुवंशमणि का यह लेख कई स्थापनाओं को स्पष्ट करता है। अभी हाल में ही उन्हें आलोचना का रामविलास शर्मा सम्मान मिला है। उनका यह लेख आप सबको पढ़वाना मुझे ज़रूरी लगा।
विशाल श्रीवास्तव
कल्पना के पुत्र हे भगवानआस्था के स्थान पर संदेह की मांग करती यह कविता बेहद चुनौतीपूर्ण है। संग्रह में दिये गये विवरण के अनुसार इस कविता का रचना समय 1946 है। उस समय के पारंपरिक समाज को देखते हुए यह तथ्य इस कविता के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा देता है। पारंपरिक तौर पर ईश्वर से होने वाली आस्था की माँग के बरक्स अनास्था की मॉग करने वाली यह कविता एक प्रकार का वैचारिक साहस थी। बरबस ध्यान खींच लेने वाली बाबा की यह कविता या तो आश्चर्यमिश्रित उत्साह के साथ पढ़ी गयी या फिर भयाक्रांत निन्दाभाव से। वह दौर हमारे आज के अभी-अभी गुजरे फासीवादी दौर के दु:स्वप्न से बिल्कुल अलग था, वगर्ना संघी भाई लाठी लेकर नागार्जुन को खोजते और बाबा अपनी खास मुद्रा में कोई अटपटा सा उत्तर देते। फासीवादियों को केवल गर्मी और उत्तेजना से मतलब होता है, जिसे वे विचार के लोहे में ढालकर हथियार के तौर पर जनता में ट्रांसफर कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। उन्हें कविता अथवा किसी भी कला के अर्थ, भाव या अभिव्यक्ति की सूक्ष्मताओं से कुछ खास लेना देना नहीं होता। यदि ऐसा न होता तो वे बर्बर दंगाइयों में क्यों तब्दील होते और पिछले तीस वङ्र्ढों का भारतीय इतिहास आदमीयत के खून से सराबोर न होता।
चाहिए मुझको नहीं वरदान
दे सको तो दो मुझे अभिशाप
प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप
चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति
चाहिए संदेह उलझन भ्रांति
किसी धर्मस्थल केईश्वर और धर्म को लेकर प्रचलित मानववादी दृष्टि का हिंदी कविता में अभाव नहीं। लेकिन इन मानववादी कवियों की तुलना वैदिक अथवा भक्ति युग के कवियो से करना गलता होगा। ईश्वर की सम्पूर्ण सत्ता और उसके आगे निरा समर्पित रहने वाला भक्तिभाव इन कवियो में नहीं। न ही यह ईश्वर उनकी कविता का केन्द्रीय विषय बनता है, जैसा कि भक्ति युग के साहित्य में है। नवजागरण पर चल रही सारी खींचा-तानी के बाद भी यह स्वीकार तो करना ही पड़ेगा कि ईश्वर प्रत्यय सम्बन्धी दार्शनिक सोच के मामले में भक्ति कवि, सन्त अगस्ताइन जैसे यूरोपियन मध्ययुगीनों से बहुत आगे नहीं। मगर ये मानवतावादी कवि तो आधुनिकता में पांव डाले हुए हैं। भक्तियुग की अन्तिम परछायीं हिन्दी साहित्य में निराला की कविता में दिखलाई पड़ती है और वहीं से उससे मुक्त होने का मार्ग भी दृष्टिगोचर होता है। वैसे निराला स्वयं भक्ति के कवि तो कतई नहीं। भक्ति है भी तो छायावाद और आधुनिकता के फार्म में। अत: इस पूरे विश्लेषण में निराला से पहले के समय में जाने की जरूरत नहीं महसूस होती।
विवाद में
तीन हजार लोग बम से
दो हजार गोली से
और पाँच सौ
जलाकर मार डाले जाते हैं
चार सौ महिलाओं की
इज्ज़त लूटी जाती है
और तीन सौ शिशुओं को
बलि का बकरा बनाया जाता है
धर्म में
सहिष्णुता का
प्रतिशत ज्ञात कीजिए
अष्टभुजा शुक्ल
मनुष्य रहते हैं इस शहर मेंफिर मनुष्य और उसका सामान्य नागरिक जीवन ईश्वर से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि
जिनमें रहता है भगवान
और चूंकि भगवान मनुष्य में रहता है
इसलिए वह अल्लाह भी हो सकता है
इतना ही यथार्थ है यह शहर जितना यह किईश्वर और मनुष्य की सत्ता का एकाकार होना मानववादी कविता की एक प्रमुख विशेषता है। यह भी कहा जा सकता है कि इस कविता में मनुष्य ही ईश्वर हो जाता है। आगे चलें, तो यह तथ्य सामने आता है कि मनुष्य के तिरस्कार पर ईश्वर और उसकी भक्ति ही निरर्थक हो जाती है। ऐसे में उसके प्रति भक्ति या श्रद्धा का कोई महत्व नहीं। वाह्याडंबरों पर हुए आक्रमण इसी के चलते है। देखें तो ईश्वर और धर्म के प्रति यही सोच भारत में धर्मनिरपेक्षता का मूल बनती है और जिसके कुछ तत्व भक्ति युग में प्राप्त होते हैं। मनुष्य के कारण ही तो ईश्यर का अस्तित्व है वरना धर्म का सारा ताना-बाना बेकार है। आध्यात्म के अखण्ड भाव में पूरे विश्व का समा जाना जरूरी है और मनुष्य तो वही है जो मनुष्य के लिए मरे।
आदमी का कलेजा काटकर उसकी जगह
शिवलिंग रख देने से वह मर जाएगा
अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!ईश्वर के शानदार कृत्यों का यह विडम्बनापूर्ण वर्णन इस शिकायत के साथ समय के यथार्थ तक पहुंचता है कि भगवान ने अपना कामयाब कारखाना बंद कर दिया है और अब जो कुछ भी इस तथाकथित ईश्वरीय सत्ता के नाम पर है वह बुरा ही बुरा है। क्या अच्छे और आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न करने वाला ईश्वर कहीं विलुप्त हो गया है? आखिर समकालीन तबाहियों के बीच 'रहमानुर्रहीम' या 'करूणानिधान' ईश्वर के अस्तित्व के कोई चिन्ह क्यों नहीं दिखाई पड़ते?
कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर
स्वाद की मर्मज्ञ
और दुम की तो बात ही अलग
गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ
तुम्हारे मुखड़े पर झलती हुई
बाढ़ें तो आयी खैर भरपूर, काफी भूकंप, तूफानवीरेन डंगवाल की यह कविता ईश्वर के अस्तित्व और उसके कार्यों को लेकर प्रचलित मान्यताओं और परंपरागत विचारों से प्रारंभ होकर उन्हीं को प्रश्नांकित करती है। ईश्वर की अनुपस्थिति इस बात में है कि अब उसका इस विश्व पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। पर सवाल यह हुआ कि यदि इस पर उसका नियंत्रण नहीं, तो फिर नियंत्रण है किसका। क्या ईश्वर की कोई वास्तविक सत्ता है भी या यह महज एक परंपरागत असत्य है? क्या ईश्वर नयी क्रूर सत्ताओं सा डर कर भाग गया है? शायद उसका इन क्रूर सत्ताओं से कोई परोक्ष-अपरोक्ष समझौता हो गया हो? कुल मिलाकर कवि के लिए ईश्वर असहनीय हो गया है। यही कारण है कि कविता आक्रोश के ऐसे बिन्दु पर समाप्त होती है, जहां ईश्वर संबंधी सारी पारंपरिक अवधारणाएं नष्ट हो जाती हैं।
खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गयी सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थना गृह जरूर उठाये गये एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
उंगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?
अपना कारखाना बंद करकेहिन्दी जगत अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में निहायत ही परंपराग्रस्त रहा है। केवल कुछ लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के होने से यह सिद्ध नहीं होता कि सब कुछ क्रान्तिकारी है। परंपरा अभिविन्यस्त होने में सुरक्षा और मान्यता दोनों मिलती रही है। यही कारण है कि धर्म और ईश्वर की पुनरुत्थानी स्वीकृति यहां की संसदीय राजनीति में प्रतिफलित हुई। ऐसे में ईश्वर की सत्ता को परंपरा के प्रवाह की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके प्रति शंका, प्रश्न अथवा विद्रोह को परोक्षत: एक पूरी सत्ता के प्रति होने वाले विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। हिन्दी कविता में इधर उभरते ईश्वर को सिर्फ आज की तात्कालिक सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति से अलग एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने पर उसका स्पष्ट अलगाव दिखाई पड़ता है। यह बात भी सच है कि इस प्रतिरोध की अपनी एक परंपरा है, ठीक वैसे ही जैसे कूपमंडूकता और जाहिल परंपरावाद की परंपरा है ही। इसी विवेक से जुड़ी प्राश्निकता की यह ईश-निन्दक परंपरा रेखांकित करने योग्य है, भले ही यह धारा अल्पसंख्यक और गौण ही क्यों न हो।
किस घोसले में जा छिपे हो भगवान?
कौन सा है आखिर, वह सातवां आसमान?
हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!
लोग कहते हैं कि ईश्वर ईश्वर ईश्वर
क्या वह बना सकता है एक ऐसा बड़ा ढोका
जिसे वह दांत पीसकर स्वयं ही न उठा सके
Posted by विशाल श्रीवास्तव (noreply@blogger.com) on October 08, 2008 07:46 AM · permalink
नोम चॉम्स्की का एक लेक्चर हमें यूट्यूब पर मिल गया, जो घंटे भर का है। वे दुनिया की पहली पांत के विचारकों में से हैं। धरती के अलग अलग महाद्वीपों में बसे हम लोगों को उन्हें सामने सुनने का मौका शायद ही मिले - लेकिन यूट्यूब ने उन्हें देखने सुनने का मौका आसान कर दिया है। यहां हम उस वीडियो को पेश कर रहे हैं। साथ ही सभ्यताओं का टकराव नाम से मशहूर हुए उनके लेक्चर का एक अंश भी हम यहां छाप रहे हैं।